Thursday, 25 March 2021

दयानंद की पोल।

इस पोस्ट में दो चित्र हैं, और दो ही विषय हैं। एक विषय से सम्बंधित वाक्य हरे रंग से हाईलाइट कर दिए हैं। दूसरे विषय से सम्बंधित वाक्य पीले रंग से।

1. हरे रंग में - सत्यार्थ प्रकाश के चतुर्थ समुल्लास में लिखा है कि "यह गुण कर्मों से वर्णों की व्यवस्था कन्याओं की सोलहवें वर्ष और पुरुषों की पच्चीसवें वर्ष की परीक्षा में नियत करनी चाहिए"। किंतु आगे दशम समुल्लास (दूसरी फोटो) में लिखा है कि "ब्राह्मण वर्ण का सोलहवें, क्षत्रिय का बाइसवें, और वैश्य का चौबीसवें वर्ष में 'केशान्त-कर्म' और मुंडन हो जाना चाहिए"। अब पाठक लोग विचार करें कि क्या ये परस्पर विरोधी बातें नहीं? मानो स्वामी जी ने नकल करके लिखने के चक्कर में ये अक्ल भी न लगाई कि मैं पहले क्या लिख रहा हूँ और बाद में क्या लिख रहा हूँ। अब अनार्य समाजी बताएं कि जब वर्ण का निर्धारण का 25 वर्ष की आयु में एक परीक्षा लेकर होना है तो तुम 25 वर्ष की आयु तक पहुंचने से पहले ही, बिना परीक्षा लिए ही किसी को ब्राह्मण मान कर उसका केशान्त संस्कार 16 वर्ष में कैसे करवा रहे हो?  किसी को क्षत्रिय मान कर 22 वर्ष की आयु में उसका केशान्त कैसे करवा रहे हो?  किसी को वैश्य मान कर 24 वर्ष की आयु में उसका केशान्त संस्कार कैसे करवा रहे हो? ये तो मतलब तुम्हारे दयानंद ने खुद ही खुद के सिद्धांतों पर पानी फेर दिया? कुछ तो झोल किया है दयानंद ने, जिसे आजतक आम जनता समझ नहीं पाई।

2. पीले रंग में- अब यहां स्वामी दयानंद ने हिंदुओं के एक और संस्कार को नष्ट करने की नींव रख दी ये कहकर कि "अति उष्ण देश हो तो सब शिखा सहित भी छेदन करवा देना चाहिए, क्योंकि सिर में बाल रहने से उसमें उष्णता अधिक लगती है, और उससे बुद्धि कम हो जाती है।"  ये बोलकर तो स्वामी जी ने उष्ण प्रदेश में रहने वाले लोगों की शिखा उड़ाने की छूट दे दी। जबकि ऐसा कहीं किसी शास्त्र में नहीं लिखा। 
देखो भई अनार्य समाजियों यदि अपने गुरु का आदर करते हो तो गर्मियों के दिनों में बीकानेर, जोधपुर, जैसलमेर के अनार्य समाजियों को अपनी शिखा उतरवाकर मुंडन करवा लेना चाहिए। वरना तो उष्णता के कारण तुम्हारी अक्ल ही कम हो जाएगी। 

और फिर स्वामी जी की इसी आज्ञा के आधार पर अनार्य समाजी औरतों को भी अपने सिर के केश कटवा लेने चाहियें। अन्यथा वे सब कम अक्ल हो जाएंगी। उनका मुंडन भी करवा दिया करो। तुम्हारे यहां तो उन सबको वेद भी याद करने पड़ते हैं तो ऐसे में यदि गर्मी के दिनों उनकी अक्ल कम हो गयी तब बेचारी याद कैसे करेंगी? इसलिए गर्मियों में उनका मुंडन भी करवा दिया करो। और अबतक जिनका मुंडन न हो चुका हो वे कम अक्ल सिद्ध हुईं।

पाठक गण विचार करें कि शिखा उड़वा देना हिंदुओं को मुस्लिम/ ईसाई बनाने के मार्ग पर अग्रसर करना नहीं है क्या? चोटी कटवाने के लिए अनेकों हिंदुओं को विवश किया गया किंतु हिंदुओं ने मर जाना स्वीकार किया परन्तु चोटी कटवाना नहीं स्वीकार किया। और इधर स्वामी जी ने सबकी चोटी पे वैचारिक  उस्तरा फेर ही दिया। हम तो कहते हैं कि अनार्य समाजियों की दाढ़ी-मूंछो की भी सफाई हो जानी चाहिए। ताकि पूरी तरह गर्मी से बचे रहें।  और अपनी कम अक़्ली का प्रदर्शन न करें।


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अनार्य समाजी लोग अक्सर आपको ये झूठ बोलते मिल जाएंगे कि सत्यार्थ प्रकाश में शुरू से ही 14 समुल्लास थे। जबकि सच्चाई ये है कि प्रथम (स्वामी दयानंद की लिखी) सत्यार्थ प्रकाश में 12 समुल्लास थे। जिनमें हिंदु धर्म की तमाम मान्यताओं और परम्पराओं को झूठा बताने में कोई कसर नहीं छोड़ी हुई थी। और ये सब काम स्वामी दयानंद ने किया पाखण्ड मिटाने का बहाना बनाकर। जैसे आजकल बॉलीवुड वाले फिल्मों में आपकी मान्यताओं को ठेस पहुंचाते हैं, और बहाना लगाते हैं कि हम तो पाखण्ड का विरोध कर रहे हैं।
लेकिन बाद में जब हिंदुओं द्वारा इसका कड़ा विरोध हुआ,जब स्वामी जी से पूछा गया कि क्या आपको हिंदुओं में ही कमी नज़र आई, पाखण्ड नज़र आया या अपने जानबूझकर सनातन धर्म को क्षति पहुंचाने के लिए सिर्फ हिंदुओं के धार्मिक मान्यताओं पर उल जलूल बे सिर पैर की टिप्पणियां अपनी पुस्तक में करी, तब उस घोर विरोध के कारण, लोगों के सामने स्वामी दयानंद जी की छवि को साफ सुथरा और समाज सुधारक के रूप में दिखाने के लिए बाद में मुसलमानों और ईसाइयों के खण्डन में 2 समुल्लास और लिखकर सत्यार्थ प्रकाश में जोड़ दिए गए।
इसका प्रमाण नीचे दिए रहे चित्रों में हैं। ये चित्र सत्यार्थ प्रकाश के द्वितीय संस्करण के हैं। जिनमें साफ साफ लिखा है कि प्रथम संस्करण में 13वां, 14वां समुल्लास किसी कारणवश छप नहीं सके थे, जो कि अब छाप दिए गए हैं।

किसी कारणवश का क्या मतलब? क्या प्रेस वाले के पास कागज़ खत्म हो गया था? या स्याही खत्म हो गयी थी? आधी अधूरी पुस्तक कोई छपने देता है क्या? वो भी एक ऐसा व्यक्ति जो ऋषि हो? काहे का ऋषि हुए फिर? जब उसको इतनी समझ ही नहीं कि मैंने क्या छपने के लिए देना है और क्या नहीं? इतनी भी दूरदर्शिता उसमें नहीं थी  तो काहे का ऋषि?

सीधी सी बात है कि पहले ये 2 समुल्लास लिखे ही नहीं गए थे। तो छपते कैसे?
बाद में जोड़े गए ताकि समाज में दयानंद की छवि एक पाखण्ड विरोधी के रूप में बनी रहे न कि हिंदु विरोधी के रूप में। ये चित्र उन नए नए बने आर्य समाजियों के मुंह पर तमाचा है जो आर्य समाज का इतिहास जाने बीने इनसे जुड़ जाते हैं और अपने पुराणों को गाली बकते हैं।

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