Thursday, 25 March 2021

ब्राह्मण ग्रन्थ वेद नहीं, नए मंत्र,सत्यार्थ प्रकाश।

#क्या_ब्राह्मण_ग्रन्थ_ही_पुराण_हैं? :- 

आर्य समाजी विलाप करते रहते हैं कि ब्राह्मण ग्रन्थ वेद नहीं पुराण हैं।  हमारा पक्ष है कि ब्राह्मणभाग पुराण नहीं बल्कि वेद हैं आज तक जितने भाष्यकार ऋषि महर्षि मुनि और आचार्य हो चुके हैं उन सबों ने मन्त्रभाग और ब्राह्मणभाग दोनों को एक जैसा वेद माना है । अतः हम कुछ प्रमाण प्रस्तुत करतें हैं यथा :――

सायणाचार्य ऋग्वेदादि-भाष्यभूमिका ( उपोद्धात ) में महर्षि आपस्तम्ब की यज्ञ-परिभाषा का प्रमाण उद्धृत करते हुए लिखते हैं कि-

१)तच्चोदकेषु मन्त्राख्या। (मीमांसा २ । २३ )
२)शेषे ब्राह्मणशब्दः ।( मीमांस २ । ३३)

अर्थात्-प्रेरणालक्षण श्रुति-समुच्चय को मन्त्र कहते हैं और शेष समस्त वेद का नाम ब्राह्मण है।
इसीलिए सायण, आपस्तम्ब और जैमिनि की सम्मति में भी मन्त्र तथा ब्राह्मण दोनों ही वेद हैं।

(३) न्यायाचार्य महर्षि गौतम जी ने वेदों की प्रमाणता सिद्ध करने के लिये पूर्वपक्ष में वेदों पर आक्षेप किये हैं और उन आक्षेपों के जो उदाहरण दिये हैं वे वर्तमान ब्राह्मणभाग के हैं । यदि ब्राह्मण भाग वेद न होता' तो वेदों पर शङ्का करने के लिये वेद भिन्न भाग का उदाहरण देना क्या मूल्य रखता था ? 
गौतम जी कहते हैं:- 
तदप्रामाण्यमनृतव्याघातपुनरुक्तदोषेभ्यः ।।(न्यायदर्शन । १ । ५७)

अर्थात् - वह ( वेद ) प्रमाण नहीं हो सकता क्योंकि उसमें असत्य, पूर्वापरविरोध और एक ही बात को अनेक बार कहना इत्यादि दोष हैं। जैसे वेद में लिखा है कि 'पत्रकाय: पुवेष्ट्या एजेत' जिसे पुत्र की इच्छा हो वह पुत्रेष्टि यज्ञ करे, परन्तु कहीं पुत्रेष्टि यज्ञ करने पर भी पुत्र उत्पन्न नहीं होता। इस प्रकार वेद का यह प्रत्यक्ष-फलसाधक वाक्य मिथ्या हो जाता है तब अग्निहोत्र' 'जुहुयात् स्वर्गकाम:'-स्वर्ग।की कामना वाला अग्निहोत्र करे, इत्यादि परोक्षफलसाधक वाक्यों पर कैसे विश्वास किया जा सकता है ? अत: वेदों में असत्य वाक्य होने से वे मान्य नहीं, इत्यादि पूर्वपक्ष स्थापित करके पश्चात् अकाट्य युक्तियों से इन सब आक्षेपों का समाधान किया है। हम प्रकरण विरुद्ध होने के कारण यहाँ उसके लिखने की आवश्यकता नहीं समझते, परन्तु इस प्रघट्ट में द्रष्टव्य यह है कि यहाँ .. 'पुतकामः' प्रादि जितने वाक्य दिये गये हैं वे ब्राह्मणभाग के हैं क्योंकि विधि और अर्थवाद दो प्रकार का समावेश ब्राह्मण में ही हुआ है। अत: निश्चय हुआ कि गौतम जी की दृष्टि में भी मन्त्र और ब्राह्मण दोनों ही समान रूप से वेद हैं। अन्यथा देवदत्त को मिथ्याभाषी सिद्ध करने के लिये यज्ञदत्त के वाक्यों का उदाहरण देना क्या अर्थ रखता है?

(४) प्रसिद्ध वैशेषिक-दर्शन के निर्माता महर्षि कणाद जी
दृष्टादृष्टफलक दोनों प्रकार से कार्यों का अनुष्ठान सिद्ध करते हुये लिखते हैं कि-
दृष्टानां दुष्टप्रयोजनानां दृष्टाऽभावे प्रयोगोऽभ्युदयाय ।
(वैशेषिकदर्शन १० । २।८)
अर्थात् - वेदों में जो कर्तव्यरूप से देखे गये हैं, जिनका प्रयोजन इस लोक में प्रत्यक्ष दीखता है, उनका तथा जिन कार्यों का ऐहलौकिक फल नजर नहीं आता उनका अनुष्ठान करना पारलौकिक फल के लिए होता है । उपर्युक्त सूत्र में जिस दृष्टफल और अदृष्टफल-विधान को वेदविहित बताया गया है वह ब्राह्मणभाग में ही उपलब्ध है। अत: मानना पड़ेगा कि कणाद जी ब्राह्मण भाग को वेद ही मानते हैं ।

५) महर्षि व्यास वेदान्तदर्शन में शब्द-प्रमाण मानते हुये
लिखते हैं कि -
श्रुतेस्तु शब्दमूलत्वात् । ( वेदान्त दर्शन २ । १ । २७)
अर्थात् – ब्रह्म प्रत्यक्षानुमान का विषय नहीं, बल्कि उसके होने में श्रुति प्रमाण है, जो शब्दमूलक हैं। सारे वेदान्त को पढ़ जाइये उसमें ब्रह्मप्रतिपादक 'तत्त्वमसि' 'अयमात्मा ब्रह्म' 'सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म' और 'नेह नानाऽस्ति किञ्चन' आदि जितने भी प्रमाण दिये गये हैं, सब ब्राह्मणभागान्तर्गत उपनिषद् आदि ग्रन्थों के हैं और उन सबको 'श्रुति' वेद के नाम से लिखा है। इससे स्पष्ट है कि व्यास जी ब्राह्मण ग्रन्थों के विशिष्ट भाग उपनिषदों को भी वेद स्वीकार करते थे।

(६) पातञ्जल महाभाष्य में पतञ्जलि जी लिखते हैं कि
वेदेपि - ‘य एवं विश्वसृजः सत्राण्यध्यास्त' इति तेषा-
मनुकुर्नस्तद्वत् सत्राण्यध्यासीत सोऽप्यभ्युदयेन
युज्यते । (महाभाष्य पृ. २०)
अर्थ-वेद में लिखा है कि जो इस प्रकार ब्रह्मा के यज्ञों का अनुष्ठान करने वाला भी ऐहलौकिक सुखों को प्राप्त होता है। यहाँ-'य एवं विश्वसृज'  आदि जो वाक्य वेद के नाम से उद्धृत किया है, वह ब्राह्मणभाग में ही उपलब्ध होता है, अत: निश्चित हुआ कि पतञ्जलि जी की सम्मति में भी ब्राह्मणभाग वेद है।

महर्षि पतंजलि ने व्याकरण के महाभाष्य के प्रथम आह्लीक में लिखा है कि-

" सप्तद्वीपा वसुमति त्रयो लोकाश्चतवारो वेदाः सांगाः सरहस्या बहुधा भिन्ना एकशतमध्वर्युशाखाः 
सहस्रवर्त्मा सामवेद एकविंशतिधा बह्वृच्यन्नवधाऽथर्वणो वेदो वकोवाक्यमितिहास: पुराणं वैद्यकमित्येता वाञ्छब्दस्य प्रयोगविषय इति । "

अर्थात:- सप्तद्वीप सहित पृथ्वी, तीनों लोक, चार वेद; शिक्षा, कल्प, व्याकरण, निरुक्त, छन्द, ज्यातिष ये छः उनके अङ्ग हैं, तथा वेदों के रहस्य, उपनिषदें (सरहस्या:) और वेद बहुत प्रकार से विभक्त हैं जैसे कि एक सौ एक शाखा यजुर्वेद की, सहस्त्र शाखा सामवेद, इक्कीस शाखा ऋग्वेद और नौ शाखा अथर्व वेद की हैं। इस प्रकार मंत्रात्मक वेद ग्यारह सौ इकत्तीस शाखाओं में विभक्त है। तर्कादि, इतिहास पुराण, इनमें शब्दप्रयोग होता है। 

यदि नाराशंसी अथवा ब्राह्मण का नाम ही पुराण होता तो 'सांग' लिखकर फिर पुराण लिखने की क्या आवश्यकता थी?

(७) आश्वलायन श्रौतसूत्र के भाष्यकार श्री नारायणस्वामी लिखते:--

#गाथाशब्देन_ब्राह्मणगता_ऋच_उच्यन्ते ।
(आश्वलायन श्रौतसूत्र ५। ६)
अर्थात्-ब्राह्मण भाग में आने वाली ऋचाओं को गाथा कहतेहै। इसी प्रकार आश्वलायन गृह्यसूत्र (३।३।१) की वृत्ति में लिखते हैं कि- #गाथा_नाम_ऋग्विशेषाः।
अर्थात-गाथा नाम विशेष ऋचाओं का है, इन दोनों प्रमाणों में ब्राहाणभागान्तर्गत आने वाली गाथाओं को
ऋचा के नाम से स्मरण किया है । और ऋचाएं केवल वेद में ही होती हैं अत: ब्राह्मणभाग वेद है । 

निरुक्त (४। ६) में तो स्पष्टतयाही ब्रह्म गाथामिश्र भतति' अर्थात् वेद में ही गाथा भाग होता है ऐसा लिख दिया है।

(८) तैत्तिरीयारण्यक (भाष्य २६) में सायणाचार्य जी
लिखते हैं #'गाथा_मन्त्रविशेषा:' अर्थात् मन्त्रविशेष का नाम गाथा है । सो केवल मन्त्र वेद में ही होते हैं । अत: निश्चय हुआ कि ब्राहाण वेद हैं ।

(९) पातञ्जल महाभाष्य में लिखा है कि:-

वेदे खल्वपि- 'पयोव्रतो ब्राह्मणो यवागूवतो राजन्य
मामिक्षावतो वैश्य इत्युच्यते । (महा० १ । १ । १)
अर्थात्-वेद में लिखा है कि ब्राह्मण पयोव्रत होते हैं । क्षत्रिय यवागू व्रत होते हैं और वैश्य आमिक्षाव्रत होते हैं।
उपरोक्त 'पयोव्रत' आदि वाक्य मन्त्रभाग में कहीं भी नहीं, बल्कि यह ब्राह्मणभाग का वाक्य है। पतञ्जलि जी इसे वेदवाक्य कहते हैं अत: निश्चित हुआ कि उनकी दृष्टि में ब्राह्मण वेद हैं।

(१०) इसी ग्रन्थ के दूसरे स्थान में लिखा है कि-
वेदशब्दा अप्येवमभिवदन्ति –'योऽग्निष्टोमेन
यजते य उ चैनमेवं वेद ।'(पृ १०)
अर्थात्-वेद भी ऐसा कहते हैं कि-जो अग्निष्टोम यज्ञ द्वारा
यजन करता है, और जो इसे ऐसा जानता है। यहाँ भी जो ' #योऽग्निष्टोमेन ' आदि वाक्य लिखा है वह मन्त्रमाग का नहीं, बल्कि तैत्तिरीय ब्राह्मण (३।११।८।५) का है। परन्तु पतञ्जलि महाराज इसे 'वेदशब्द के नाम से स्मरण करते हैं अत: निश्चित हुआ कि उनके मत से भी ब्राह्मण ग्रन्थ वेद हैं।

(११) मनु महाराज की दृष्टि में भी ब्राह्मण ग्रन्थ वेद ही हैं:- 

एताश्चान्याश्च सेवेत दीक्षा विप्रो वने वसन् । विविधाश्चाउपनिषदीरात्मसंसिद्धये श्रुतीः । ।
(मनुस्मृति ६ । २९)
अर्थात् - वन में रहता हुआ ब्राह्मण ऐसी धार्मिक दीक्षाओं को सेवन करे और अपने कल्याण के लिये विविध उपनिषद् ग्रन्थों की श्रुति का सेवन करे।
यहां ब्राह्मणान्तर्गत उपनिषद्-वाक्यों को श्रुति कहा है। श्रुति नाम वेदों का है, जैसा कि मनु जी ने स्थानान्तर में स्वयं 'श्रुतिस्तु वेदो विज्ञेयः' ( मनु: २ । १० ) कह कर इसे व्यक्त किया है । अत: निश्चित हुआ कि ब्राह्मण वेद हैं।

(१२) शाबर-मीमांसाभाष्य (।।२।३३) में लिखा है कि-
मन्त्राश्च_ब्राह्मणं_च_वेदः ।
अर्थात्-मन्त्र और ब्राह्मण दोनों ही वेद हैं।

(१३) मीमांसादर्शन (सूत्र १।१।८८ से आरम्भ करके ३३
सूत्रपर्यन्त) में मन्त्रभाग की तरह ब्राह्मण भाग को भी अपौरुषेय सिद्ध किया है, अतः ब्राह्मण ऋषिकृत नहीं, बल्कि मन्त्रों की तरह ऋषिदृष्ट हैं, अतः वह वेद हैं।

(१४) चरणव्यूह ( कण्डिका २ ) में कहा है कि-
#त्रिगुणं_पठ्यते_यत्र_मन्त्राब्राह्मणयोः #सह ।
#यजुर्वेदः #स_विज्ञेयः #शेषाः #शाखान्तराः #स्मृताः ॥
अर्थात्-जिसमें मन्त्रब्राह्मण-सहित त्रिगुण पढ़ा जाता है । वह यजुर्वेद है, शेष उसकी शाखाएं हैं।

यहाँ मन्त्र और ब्राह्मण दोनों को सम्मिलित करके उसे यजुर्वेद के नाम के स्मरण किया गया है। इससे निश्चित हुआ कि ब्राह्मण वेद हैं।

(१५) मनु जी ने हवन काल का निर्णय करते हुए लिखा है कि--
उदितेऽनुदिते चैव समयाध्युषिते तथा ।
सर्वथा वर्तते यज्ञ इतीयं वैदिकी श्रुतिः ।।
( मनुः २ । १५)

अर्थात्-'सूर्योदय हो जाने पर और उदय होने से पूर्व तथा
नक्षत्र सूर्यादि के अदृष्ट काल में भी हवन करना चाहिये' ऐसा वेद का।वचन है। समस्त मन्त्रभाग में ऐसा कोई मन्त्र नहीं मिलता जिस में कि स्पष्टतया यह बताया गया हो कि सूर्योदय हो जाने पर या उदय से पूर्व यज्ञ हो सकता है, ऐसे बचन ब्राह्मणभाग में अवश्य मिलते हैं।
जैसे- 
#उदिते_जुहोति_अनुदिते_जुहोति ।
(ऐतरेयब्राह्मण ५। ५ । ४)
मनु जी ने ब्राह्मण के इन वचनों को वेद बताया है । इससे निश्चित हा कि मनु जी की सम्मति में ब्राह्मण वेदग्रन्थ है।

(१६) आपस्तम्ब जी कहते हैं
मन्त्रब्राह्मणयोर्वेदनामधेयम् ।।
(आपस्तम्ब धौतसूत्र २४:१।३१)
अर्थात्-मन्त्र और ब्राह्मण दोनों को वेद कहते हैं

(१७) बौधायन जी कहते हैं।
मन्त्राब्राह्मणं वेद इत्याचक्षते ।
(बौधायन गृह्यसूत्र २।१।१)
अर्थात्-मन्ना ब्राह्मण दोनों को वेद कहा जाता है
(१८) महर्षि सत्याषाढ जी लिखते हैं-
मन्त्रब्राह्मणयोर्वेदनामधेयम् ।
( सत्याषाढ श्रौतसूत्र १।१।५)
अर्थात् - मन्त्र और ब्राह्मण का नाम वेद है।

१६) महर्षि कौशिक जी लिखते हैं-
अाम्नाय: पुनर्मन्त्राश्च ब्राह्मणानि च । (कौशिकसूत्र १ । ३)
अर्थात्-मन्त्र और ब्राह्मण दोनों को आम्नाय -वेद कहते हैं।

(२०) कात्यायन ऋषि कहते हैं-
मन्त्राब्राह्मणयोर्वेदनामधेयम् । (कात्या० प्रतिज्ञासूत्र)
अर्थात्-वैद नाम मन्त्र और ब्राह्मण का है ।

(२१) सायणाचार्य लिखते हैं-
मन्त्रब्राह्मणात्मक: शब्दराशिर्वेदः । (ऋग्वेद उपोद्धात)
अर्थात् --मन्त्रा बाहाणात्मक शब्द समुदाय को वेद कहते हैं ।

(२२) महर्षि वात्स्यायन पुराणों और ब्राह्मणों को भिन्न २ ग्रन्थ मानते हैं । यथा:--

प्रमाणेन खलु ब्राह्मणेन इतिहासपुराणस्य
प्रामाण्यमभ्युपगम्यते । (न्यायदर्शन भाष्य ४। १ । ६२)

अर्थात् ब्राह्मण के प्रमाण से इतिहास पुराण की प्रामाणिकता सिद्ध होती है। यहाँ यदि उक्त दोनों ग्रन्थों को विभिन्न न माना जाए.तो प्रामाण्य-प्रमेयभाव सगठित नहीं हो सकता। अर्थात् —अभियुक्त और
साक्षी दो भिन्न २ व्यक्ति ही हो सकते हैं।

(२३) उक्त ब्राह्मणग्रन्द स्वयं पुराणों को अपने से अलग बता रहे हैं यथाः
नवमेऽहनि किचित् पुराणमाचक्षीत ।
(शतपथ १३ । ४ । ३ । १२)
अर्थात् – यज्ञ के नवें दिन कुछ पुराण पढ़ा जाए।
यदि ब्राहाण ग्रन्थ ही पुराण होते तो वे अपने पाठ का ही आदेश न करते। 

कहाँ तक लिखें, ब्राह्मण भाग को मन्त्राभाग की भांति अविशेष वेद सिद्ध करने वाले सहस्रों प्रमाण संगहीत किये जा सकते हैं। किसी भी ऋषि मुनि आचार्य के ग्रन्थ को उठाइये, सर्वत्र ब्राहाणग्रन्थों की वैदिकता का उल्लेख मिलेगा । प्रस्थानत्रयी के भाष्यकार आद्य शङ्कराचार्य, श्रीनिम्बार्काचार्य और श्री माध्वाचार्य आदि सभी विद्वानों
ने एक स्वर से ब्राह्मणों का वेदत्व स्वीकार किया है । इतने पर भी स्वामी दयानन्द और उनके अनुयायी अपनी वेसुरी तान का अलाप नहीं छोड़ते इसके सिवा दुराग्रह के और क्या कहा जा सकता है ?

यहां तक हमने प्रमाणों द्वारा ब्राह्मणभाग का वेद होना सिद्ध किया है । अब कतिपय युक्तियों द्वारा भी इसकी पुष्टि की जाती है जिससे ' #युक्तिप्रमाणाभ्यां_हि_वस्तुसिद्धिः' के अनुसार प्रतिवादियों/समाजियो/नमाज़ियों/ नियोगियों  को
कुछ कह सकने का अवसर ही न मिल सके। इसलिए हम कुछ युक्तियाँ प्रस्तुत करते हैं यथा :――

(१) किसी भी ब्राह्मणग्रन्थ के आदि में अथवा अन्त में 'अथशतपथपुराणम्' 'इति गोपथपुराणम्' ऐसी पुष्पिका का उल्लेख नहीं अतः वे पुराण नहीं हो सकते।
(२) पुराण का सर्वविदित लक्षण-सर्ग प्रतिसर्ग, वंश, मन्वन्तर और वंशानुचरित है, परन्तु ब्राह्मण ग्रन्थ में उक्त विषयों का कहीं भीक्रमबद्ध वर्णन नहीं मिलता है । खास कर चन्द्र-सूर्य-वंशी और तत्तद् वंशीय प्रतिष्ठित व्यक्तियों के चरित्र का तो कहीं भी उल्लेख नहीं। यदि उक्त ग्रन्थों से सर्गादिक-प्रतिपादक वाक्यों का उद्धरण देकर उन्हें
पुराण कहने को दुश्चेष्टा की जाए तो इस तरह के सैंकड़ों मन्त्र मन्त्रभाग में भी विद्यमान हैं। अत: सर्गादि पञ्चलक्षण  होने के कारण ब्राह्मण भाग पुराण नहीं हो सकता ।

३) सर्वत्र शास्त्रों में पुराणों के नाम ब्राह्म, पाद्य, वैष्णव ही लिखे हैं, परन्तु ब्राह्मग्रन्थों में उक्त नामों वाला कोई भी ग्रन्थ नहीं है। अतः वे पुराण नहीं हो सकते ।

(४) पुराणों की संख्या सर्वविदित अठारह है, परन्तु ब्राह्मण ग्रन्थों की इयत्ता का कहीं भी उल्लेख नहीं तथा याज्ञिक विषयविभाग के अनुसार उन्हें विभक्त किया जाए तो वे भी चतु:संहिताओं की तरह चार प्रकार के ही प्रतीत होते हैं। अत: संख्या-रूप लक्षण के अव्याप्त होने से भी ब्राह्मण ग्रन्थ पुराण नहीं हो सकते।

(५) प्रायः सभी ऋषियों ने वेदों की ११३१ शाखायें मानी हैं। आर्य समाजियों के दादागुरु स्वामी दयानन्द जी ने भी 'सत्यार्थप्रकाश' 'ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका' आदि ग्रन्थों में कहीं ११२७ और कहीं ११३१ शाखाओं का उल्लेख किया है । सो जिस प्रकार उपलब्ध चारों संहिताएँ क्रमशः --शाकल, माध्यंदिनी, कोथुमी और शौनिकी नामक शाखाएँ हैं इसी प्रकार उपलब्ध ब्राह्मण, उपनिषद् आदि भी वेदशाखाओं के ही ग्रन्थ विशेष हैं। यदि चार शाखाएँ मान्य हो सकती हैं तो शेष भी उसी भान्ति मान्य होनी चाहिये । अतः ब्राह्मणग्रन्थ वेद शाखा होने के कारण पुराण नहीं हो सकते।

(६) पूर्व भीमांसादर्शन में मन्त्रभाग की तरह ब्राह्मणभाग को भी अपौरुषयता सिद्ध की है, अतः दोनों का 'वेदत्व' भी तुल्य है । फिर वेदभूत ब्राह्मणों को पुराण कैसे कहा जा सकता है ?

(७) यदि ब्राह्मणभाग को ऐतिहासिक-मंत्र विशिष्ट होने के कारण वेदत्व से दूर रक्खा जाता है, तो ऐसा नित्य-इतिहास तो मन्त्र भाग में ठसाठस भरा पड़ा है, जिसका यास्कादि ने अपने ग्रन्थों में स्पष्ट उल्लेख किया है तथा जैमिनि जी ने भी मीमांसादर्शन (पूर्वमीमांसा १।१। ३१) के ' #परन्तु_श्रुतिसाम्यमात्रम्' आदि सूत्रों में उसे व्यवस्थित किया है । ऐसी दशा में मन्त्र-ब्राह्मण के तुल्य होने से उनका वेदत्व भी तुल्य सिद्ध होता है, अत: वेद के अविशिष्ट अंश ब्राह्मण को पुराण नहीं कह सकते।

(८) कहा जाता है कि ब्राह्मणग्रन्थ मन्त्रों का व्याख्यान हैं, अत: वे वेद नहीं, बल्कि पुराण होने चाहिये। यदि यह तर्क ठीक है तब तो।सब मन्त्र भी अकेले ॐकार का व्याख्यान हैं इसलिए जिस प्रकार प्रणव का व्याख्यानभूत समस्त मन्त्रभाग वेद है इसी प्रकार मन्त्रभाग का व्याख्यान भूत ब्राह्मण भाग भी वेद ही हो सकता है पुराण नहीं?

अतः उपरोक्त प्रमाण और युक्तियों के अनुसारा यह सिद्ध है कि ब्राह्मण वेद ही हैं पुराण नहीं । यदि विशेष जाना हो तो पूज्य प्रातः स्मरणीय धर्म सम्राट करपात्री जी महाराज द्वारा रचित ग्रन्थ #वेदार्थपारिजात और# वेदस्वरूप_विमर्श का अवलोकन करें । 

                      ।।  जय श्री राम ।।

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#आर्य_समाज_की_चालाकियां :- 

#नवीन_मन्त्र_निर्माण :- कहां तो आर्य समाज हर बात में वेदों के प्रमाण मांगता फिरता है और स्वयं को शुद्ध वैदिक धर्मी भी घोषित करता है, किंतु यहां पर स्वामी जी ने सत्यार्थ प्रकाश में जो देव तर्पण के लिए मंत्र दिया है यह मंत्र हमें तो किसी वेद में नहीं मिला। 
यहां पर उसे पारस्कर और आश्वलायन गृहसूत्रों का मंत्र बताया है किंतु यह मंत्र तो ग्रह सूत्र में भी नहीं है। तो क्या इसे आर्य समाज की चालाकी ना समझा जाए जो वह वेदों अथवा गृहसूत्रों के नाम पर नए-नए मंत्र बनाकर लोगों को भ्रमित करने का प्रयास कर रहा है? कहीं कहीं से मन्त्र का एक अंश उठाकर उन्हें जोड़कर एक नया मन्त्र तैयार कर देना कहाँ तक उचित है?

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सत्यार्थ प्रकाश के तृतीय समुल्लास में स्वामी जी ने योगवाशिष्ठ, पंचदशी, पुराण, तुलसीदास रामायण, रुक्मिणी मंगल, भाषाग्रंथ आदि के विषय में लिखा है कि "इनको विष मिले अन्न की भांति त्याग देना चाहिए क्योंकि ये ग्रंथ असत्य हैं और जो कोई इन असत्य ग्रंथों में से कुछ सत्य का ग्रहण भी करना चाहे तो भी मिथ्या बातें उसके गले चिपट जाती हैं"। यहां साफ पता चल रहा है कि स्वामी जी ने  इन ग्रंथों की अनुपयोगिता कह दी।

जब आप पुराणों को ही नहीं मानेंगे तो आपके राजाओं और अन्य ऋषियों/महापुरुषों का चरित्र व इतिहास आपको अन्य कहीं भी नहीं मिलेगा। फिर बैठ कर arya invasion theory ही पढ़ना। 

[ वर्तमान युवा पीढ़ी को आर्य समाज का इतिहास मालूम नहीं, इसलिए इनके चक्करों में फंस जाते हैं। यदि वर्तमान पीढ़ी आर्य समाज के इतिहास की छान बीन करे, तो उन्हें मालूम पड़ेगा कि ये आर्य समाज धर्म के नाम  पर लोगों को केवल भ्रमित करता है। ]

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#आर्य_समाज_की_चालाकियां :- 

1. #घुसने_निकलने_की_कुंजी :- सत्यार्थ प्रकाश के तृतीय समुल्लास में यह लिखा गया है कि ऋषि प्रणीत ग्रन्थों को इसलिए पढ़ना चाहिए क्योंकि वे बड़े विद्वान, शास्त्रवित और धर्मात्मा थे। 
फिर आगे कह दिया गया इन ग्रंथों में भी जो जो वेद विरुद्ध हो उस-उस को छोड़ देना। 
लो बताओ, मतलब स्वामी जी एक तरफ तो कह रहे हैं कि वे सब ऋषि बड़े विद्वान, शास्त्रों के जानकार और धर्मात्मा थे, तो दूसरी तरफ कह रहे हैं कि उनके ग्रंथों में भी उन बातों को छोड़ देना जो वेद विरुद्ध हो। 
तो स्वामी जी ये तो बताएं कि यदि वे ऋषि लोग शास्त्रों के जानकार, विद्वान और धर्मात्मा थे तो उन्होंने वेद विरुद्ध बातें कैसे लिखी होंगी? या तो स्वामी जी बाहर से उन ऋषियों की बड़ाई करने के बावजूद भी भीतर से  उन ऋषियों को बुद्धू ही समझ रहे हैं तभी उनको ये ख्याल आया कि उन ऋषियों के ग्रंथों में वेदविरूद्ध बातें भी होंगी  या फिर स्वामी जी हम लोगों को बुद्धू बना रहे हैं!

 इस चालाकी से आर्य समाज को ये फायदा तो है कि जब मन करता है तब उस ग्रन्थ में लिखी किसी बात को प्रमाणिक मान लेते हैं । और जब मन करता है तब उसी ग्रन्थ की दूसरी बात को प्रमाणिक नहीं मानते। और मिलावट मिलावट का राग अलापकर लोगों को बुध्दधु बनाते हैं।
यदि कोई दूसरा मनुष्य उसी ग्रंथ में से कुछ प्रमाण देता है तो उस बात को वेदविरुद्ध और मिलावटी बोलकर अपना उल्लू सीधा करने लगते हैं। इस प्रकार से आर्य समाज के लोग वेदों की ही आड़ में लोगों को वेदों से दूर कर रहे हैं। जो इनके मन को अच्छा लगता है उसे प्रमाणिक मान लेते हैं, जो बात इनकी बुद्धि में नहीं घुसती उसको मिलावटी/वेद विरुद्ध बोलने लगते हैं। वास्तव में ये वेदों को भी नहीं मानते, केवल अपने मन की मानते हैं। जो बात अच्छी लगे, उसे ही मानते हैं।

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दयानन्द के अनर्थ

दोस्तों मैं एक मुसलमान हूं इसलिए मेरा फर्ज है समाज की गंदगी को खत्म करना इसलिए आर्य समाज नामी गंदगी को खत्म होना चाहिए जिसने समाज को गुमराह ...