सत्यार्थ प्रकाश 5वें समुल्लास के पृष्ठ 144 में सन्यासियों के बारे में स्वामी जी ने लिखा कि "लोक में प्रतिष्ठा व लाभ, धन से भोग वा मान्य, पुत्रादि के मोह से अलग होके, संन्यासी लोग भिक्षुक होकर रात दिन मोक्ष के साधनों में लगे रहते हैं"।
फिर आगे पा पंचम समुल्लास के ही पृष्ठ 153 में मनु स्मृति के श्लोक 11.6 की गलत व्याख्या करते हुए लिख मारा कि "विद्वान और परोपकारी संन्यासियों को देने में कोई दोष नहीं। नाना प्रकार के रत्न, सुवर्णादि संन्यासियों को देवे। "
यहां एक बात ध्यान देने योग्य है कि मनुस्मृति के जिस 11.6 श्लोक का हवाला स्वामी जी ने दिया है उसे तो आर्य समाजियों ने प्रक्षिप्त माना है (आर्य समाजी मनुस्मृति का चित्र संलग्न है उसमें प्रक्षिप्त लिखा है)।
और उस श्लोक का असली अर्थ देखिए (कुल्लुक भट्ट की मनुस्मृति से संलग्न चित्र में), जिसमें बताया गया है कि वहां संन्यासियों के लिए नहीं बल्कि ग्रहस्थ ब्राह्मणों के लिए गौ, भूमि, अन्न आदि देने की बात हो रही है।
अब सोचिए कि स्वामी जी ने एक तो श्लोक का गलत अर्थ करके संन्यासियों को धन संग्रह करना बता दिया, और उसी श्लोक को आर्य समाजियों ने प्रक्षिप्त भी माना।
हे भगवान !
चप्पल किधर है मेरी?
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