सत्यार्थ प्रकाश के द्वितीय समुल्लास में स्वामी जी लिखते हैं - स्त्री योनिसंकोचन, शोधन और पुरुष वीर्य
का स्तंभन करे, पुनः सन्तान जितने होंगे वे भी सब उत्तम होंगे ।
समीक्षा- स्वामी जी! आप तो कहते थे कि हमारा मत वेद है। अब आप ये बताइये कि यह किस वेदमन्त्र का अनुवाद है ? यदि सत्यार्थप्रकाश में आप योनिसंकोचन की कोई औषधि लिख देते तो विषयीसंसार का अपूर्व उपकार हो जाता, औषधि न लिखने के कारण स्त्रियों के मन की मन ही में रह गई |
क्या ये गप्प ही वैदिकधर्म कहलाता है ?
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सत्यार्थ प्रकाश के द्वितीय समुल्लास में स्वामी दयानंद जी ने कहा है कि शूद्र आदि का उपनयन किए बिना ही उन्हें गुरुकुल में पढ़ने भेज दिया जाए।
किंतु आज के आर्य समाज के अनुसार तो स्त्री और शूद्रों को भी उपनयन का अधिकार है। और वे आर्य समाज मे भर्ती होने वाले सब बालक बालिकाओं के उपनयन करवाते ही हैं। और इतना ही नहीं, आर्य समाजी गण तो घर वापसी के बहाने विधर्मियों तक का उपनयन करवा देते हैं।
तो या तो आज के आर्य समाजी गुरु की अवज्ञा कर के गुरु द्रोह जैसा पाप कर रहे हैं। या फिर स्वामी दयानंद जी ने ये सब गलत लिखा?
[यहां पर तो स्वामी जी ने उस शुद्र का वर्ण जन्मना ही माना है न कि कर्मणा। क्योंकि अभी तो वो बेचारा बालक है। अभी से उसको शुद्र समझ के उपनयन से वंचित रखना क्या उसके साथ अन्याय नहीं?]
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बाकी धर्म नए हैं, नए वाले तो धर्म ही नहीं है। ये तो मजहब हैं, मत हैं। धर्म का अर्थ होता है धारण करना। सनातन धर्म ही असली धर्म है। बाकी सभी मजहबों का कोई प्रवर्तक है। जो शुरू हुआ वह ख़तम भी होगा, लेकिन सनातन धर्म का कोई आदि ही नहीं तो अंत भी नहीं। यह नित्य है।
इस तरह की पोस्टें आती हैं। धर्म वालों को कोई रोजगार, स्वास्थ्य और शिक्षा नहीं चाहिए, बस ऐसे ही फ़ालतू मुद्दों पर भाव विभोर हो रहे हैं। आसमान छूने वाला भव्य राम मन्दिर बन रहा है। हमारा धर्म बहुत उंचा है। बाकी मजहबों को तो कुछ पता ही नहीं हैं ।
ऐसी पोस्टें देख कर टीका टिप्पणी भी तो इन्हीं बातों पर ही होगी ना। पर ये धर्म के पैरोकार नास्तिकों को पाठ पढ़ाएंगे कि टीका टिप्पणी करनी है तो दूसरे मजहबों की भी करो। यही तो इनका एजेंडा है। दूसरे लोगों को भड़काना। इनकी चालों में नहीं आना है। यह नास्तिकों को अपने दंगों वाली मानसिकता में हथियार बनाना चाहते है।
जब ज्ञान बढ़ रहा है, विज्ञान बढ़ रहा है तो धर्म को भी आगे बढ़ना चाहिए। जब धर्म की बातें लिखी गई तब सीवर नहीं था। घर में पानी की व्यवस्था नहीं थी।
शिव पुराण में सुबह उठ कर जंगल, पानी, दातुन कुल्ला, स्नान और वस्त्र धोने की विधि लिखी हुई है। तो क्या हम आज भी वही करेंगे? उत्तर की तरफ मुंह करना है। लिंग और गुदा पर मिट्टी मलना हैै। कितनी मिट्टी मलनी है इस का परिमाण भी लिखा है। ( मैने मजाक सुना है कि मुसलमान पेशाब करने के बाद लिंग पर मिट्टी लगा कर साफ़ करते हैं।) कुल्ला कितनी बार करना है। जहां स्नान करना है वहां कपडे नहीं धोने है। कपडे धोने कैसे है वह भी लिखा है। जाहिर है यह तो लिखा नहीं हो सकता कि वाशिंग मशीन में कपडे धो लो। तो क्या असली सनातनी हिन्दू वहीं है जो इसी प्रकार करेगा ? शिव पुराण किताब का पन्ना पोस्ट कर दिया है। पढ़ कर अमल करो और बन जाओ असली सनातनी। पर मोदी के स्वच्छ भारत अभियान का क्या होगा ? इस तरीके से तो यह अभियान सनातन संस्कृति का विरोधी है।
इन फ़ालतू की बातों में कुछ नहीं रखा है। छोड़ो पुरानी बातें। धर्म निजी मसला है। इसको अपने घर तक सीमित रखें। ज्ञान की बातें करें। दिमाग को विकसित करें। इतिहास का अच्छे से अध्यन करें। इतिहास में क्या गलतियां हुई, क्यों हुई, उनका सुधार कैसे करें, ऐसी बातों पर चर्चा होनी चाहिए। अंधविश्वासी मत बनो। दिमाग को खुला रखो। विरोधी पक्ष की बात पर विचार करो। हो सकता है वह सही हो।

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