Thursday, 25 March 2021

दयानंद आत्मचरित

 

दयानंद आत्मचरित
--------------------------- एक अधूरा सच ।
स्वामी दयानंद एक सामान्य मनुष्य थे , और उनमे भी सामान्य मनुष्यो की तरह से सारे गुण मौजूद थे । इसीलिए जब उन्होंने अपनी जीवनी दुनिया के सामने रखी तो निश्चित ही एक सामान्य इंसान की तरह सिर्फ अच्छी बाते ही दुनिया तक पहुंचे ऐसी कोशिस की होगी ।
यही किया भी , और हम जब इतिहास पढ़ते है या उनकी जीवनी पढ़ते है तो हमे वही दीखता हे जो वो दिखाना चाहते होंगे ।
कौन जाने सच क्या होगा ?
क्योकि उनकी जीवनी में काफी बाते अधूरे सच की तरफ इशारा करती है, जिनकी प्रमाणिकता इतिहास के अंधेरो में सदा सदा के लिए खो गयी है । जैसे -
१* दयानंद का जन्म -
(अ) आर्य समाजी गपोड़ा:- स्वामी दयानंद का जन्म गुजरात प्रान्त के काठियावाड़ के मौरवी राज्य में टंकारा नामक ग्राम में १२ फरवरी, १८२४ को हुआ था
(ब) और दयानंद के अनुसार :- दयानंद ने अपनी जीवनी सन् १८७६ में लिखीं और १८८० में थियोसोफिस्ट पत्र द्वारा उसे छपवाया ।
दयानंद अपने आत्मचरित के पृष्ठ संख्या १ में कहते हैं - मैंने जिस परिवार में जन्मग्रहण किया वह एक विस्तृत सम्पत्तिसम्पन्न परिवार था । हमारा कुटुम्ब इस समय १५ पृथक- पृथक परिवारों में विभक्त है और इस समय मेरी अवस्था ४६ वा ५० वर्ष की है।
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#समीक्षा_१ :- आर्य समाजीयों के अनुसार दयानंद का जन्म १२ फरवरी १८२४ को हुआ जबकि दयानंद अपने आत्मचरित में कहते हैं कि आत्मचरित लिखते समय अर्थात् १८७६ में उनकी उम्र ४६ वा ५० वर्ष की है अर्थात स्वामी जी को ही अपनी उम्र का पता नहीं था उनके कथनानुसार उनका जन्म १८२२ से १८२६ के आसपास हुआ था ।
अब समाजी हमें ये बताए कि जब स्वयं दयानंद को ही अपनी सही सही उम्र का पता नहीं था तो फिर समाजी किस आधार पर इतने विश्वास के साथ ये बात कहते हैं कि दयानंद जन्म १२ फरवरी १८२४ में हुआ था
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२* दयानंद के बचपन का नाम, उनके माता और पिता का नाम आदि -
(अ) आर्य समाजी गपोड़ा :- स्वामी दयानंद के बचपन का नाम मूलजी दयाराम था तो कुछ कहते हैं कि उनके बचपन का नाम मूलशंकर था । इसी प्रकार दयानंद के माता, पिता के बारे में कुछ लोग कहते हैं कि उनके पिता का नाम अम्बाशंकर और माता का नाम यशोदाबाई था , तो वही कुछ का कहना है कि उनके पिता का नाम करशनजी लालजी त्रिवेदी और माता का नाम यशोदाबाई था ।
अब आइए दयानंद क्या कहते हैं वो भी देख लेते हैं।
(ब) दयानंद के अनुसार :- दयानंद अपने आत्मचरित के पृष्ठ संख्या १ में लिखते हैं कि - अनेक लोग यह जिज्ञासा करते हैं मैं ब्राह्मण हूँ वा नही, और वे लोग अनुरोध करते हैं कि इसके प्रमाण के लिए अपने कुटुम्बियों का नाम बतलाओं अथवा उनमें से किसी का लिखा हुआ कोई पत्र दिखलाओं । ये कहना अनावश्यक है कि गुजरातवासी लोगों के साथ मैं अधिकतर अनुरागसुत्र में निबद्ध हूँ । अपने कुटुम्बियों के साथ यदि मेरा किसी प्रकार से साक्षात् हो जाए, तो जिस सांसारिक अशांति से मैंने अपने आप को स्वतंत्र किया हैं फिर मुझे उसी अशांतिजाल में निश्चय ही फसना होगा, इसी कारण से मैं अपने कुटुम्बियों के नाम बतलाना व उनमें से किसी का लिखा पत्र प्रदर्शन करना उचित नहीं समझता ।
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#समीक्षा_२ :- अब आर्य समाजी हमें ये बताए कि दयानंद ने तो अपने माता पिता, अपनी पहचान आदि के बारे में कुछ भी बताने से साफ साफ मना कर दिया, फिर समाजी किस आधार पर इतने विश्वास के साथ यह बात कहते हैं कि दयानंद की माता यशोदाबाई और उनके दो पिता अम्बाशंकर और करशनजी लालजी त्रिवेदी थे ।
वैसे ये कोई आश्चर्य की बात नहीं है क्योंकि स्वामी जी के हिसाब से तो एक स्त्री के ग्यारह पति तक हो सकते हैं फिर स्वामी जी के दो बाप क्यों नहीं हो सकते,
बहुत बढ़िया समाजियों ऐसे ही लगे रहो और मैं तो कहता हूँ, फिर से जाँच करें , क्या पता यशोदाबाई के दो से ज्यादा नियोगी पति हो ??
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३* पिता से घृणा और माता से प्रेम का रहस्य :-
दयानंद अपने आत्मचरित के पृष्ठ संख्या २-५ में लिखते हैं - मेरा परिवार शैवमतवालम्बी था , इसलिए अल्पवय से ही मुझे शिवलिंग की पूजा करनी पड़ी मैं अपेक्षया सबेरे आहार किया करता था और शिवपुजा में बहुत से उपसवास और कठोरता सहन करनी पड़ती हैं इसलिए स्वास्थ्य की हानि के भय से माता मुझे प्रतिदिन शिव की उपासना करने से रोका करती थी, परन्तु पिता उसका प्रतिवाद किया करते थे। इस कारण इस विषय को लेकर माता के साथ पिता का प्रायः विवाद रहा करता था। माता के बारंबार प्रतिदिन शिवपुजा के करने से निषेध करने पर भी पिता मुझको उसके करने के लिए कठोर आदेश किया करते थे । शिवरात्रि के आने पर पिता ने कहा कि आज तुम्हारी दीक्षा होगी । और मंदिर में जाकर सारी रात जागना होगा। पिता की आज्ञानुसार मैं उस दिन रात्रि को अन्यान्य लोगों के साथ सम्मिलित होकर शिवमंदिर गया । शिवरात्रि का जागरण चार पहरों में विभक्त होता है २ पहर बीत जाने के पश्चात तीसरे पहर में मैंने पिता से घर लौटने की अनुमति मांगी । पिता ने आज्ञा देकर मेरे साथ एक सिपाही कर दिया और इस विषय में कि मैं भोजन करके वृतभंड्ग ने करू बारंबार मुझसे कह दिया। परन्तु घर में आकर जब मैंने माता से क्षुधा की कथा को प्रकाशित किया, तब उन्होंने जो कुछ भी मुझे आहार के लिए दिया उसको मैं बिना खाएँ न रह सका । भोजन के पश्चात मुझे गहरी नींद आ गई दुसरे दिन प्रात:काल पिता ने घर में आकर सुना कि मैंने व्रत भंग किया हैं। यह सुनकर वह मेरे ऊपर बड़े क्रोधित हुए और मुझे भला बुरा कहने लगे इस विषय को लेकर फिर से माता और पिता के बीच विवाद हुआ ।
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#समीक्षा_३ :- इसे पढने के पश्चात बुद्धिमान लोग आसानी से ये बात समझ सकते हैं कि मूलशंकर बचपन से इतना मूढ़, हठी, ढ़िठ और नास्तिक प्रवृत्ति का क्यों रहा था ??
उदाहरण के लिए यदि हम दयानंद को रावण के स्थान पर रखकर देखें यदि दयानंद के पिता विश्रवा थे तो उनकी माता राक्षसी कैकसी थीं
मूलशंकर के पिता जहाँ उसे धर्म के मार्ग पर ले जा रहे थे तो दूसरी ओर उसकी माता ने मूलशंकर को अधर्मी और नास्तिक प्रवृत्ति का बना दिया
स्वामी दयानंद बचपन से ही पेटू थे, पिता उन्हें व्रत आदि रखने को कहते पर दयानंद से भूख बर्दाश्त नहीं होती थी क्योंकि उनकी माता अक्सर चोरी से उन्हें भोजन करवा के उनका व्रत भंग करवा देती थी
पर जब पिता को उनके व्रत भंग करने का पता चलता तो वो उनपे क्रोधित हो जाते और उन्हें उसके लिए दंडित भी करते, यही कारण था कि दयानंद अपने पिता से घृणा करने लगे और इसी घृणा ने दयानंद को नास्तिक बना दिया।
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४* मूर्ति (प्रतिक) पुजा में अविश्वास :-
(अ) आर्य समाजी गपोड़ा :-
उनके जीवन में ऐसी बहुत सी घटनाएं हुईं, जिन्होंने उन्हें सनातन धर्म की पारम्परिक मान्यताओं और ईश्वर के बारे में गंभीर प्रश्न पूछने के लिए विवश कर दिया। एक बार शिवरात्रि की घटना है। तब वे बालक ही थे। शिवरात्रि के उस दिन उनका पूरा परिवार रात्रि जागरण के लिए एक मन्दिर में ही रुका हुआ था। सारे परिवार के सो जाने के पश्चात् भी वे जागते रहे कि भगवान शिव आयेंगे उसे दर्शन देंगे और प्रसाद ग्रहण करेंगे। उन्होंने देखा कि शिवजी के लिए रखे भोग को चूहे खा रहे हैं। यह देख कर वे बहुत आश्चर्यचकित हुए और सोचने लगे कि जो ईश्वर स्वयं को चढ़ाये गये प्रसाद की रक्षा नहीं कर सकता वह मानवता की रक्षा क्या करेगा? इस बात पर उन्होंने अपने पिता से बहस की और तर्क दिया कि हमें ऐसे असहाय ईश्वर की उपासना नहीं करनी चाहिए।
(ब) दयानंद के अनुसार :-
दयानंद अपने आत्मचरित के पृष्ठ संख्या ३-४ में लिखते हैं - दो पहरों के पश्चात जब निशिथ काल आया , तब पुरोहित और अन्यान्य लोग मंदिर के बाहर चले गए , उसके कुछ समय पश्चात मैंने देखा कई एक चुहे बिल में से बाहर निकल कर महादेव की पिण्डी के ऊपर इच्छापूर्वक विचरण और उनके मस्तकस्थित चावलआदि का भक्षण करने लगे । मै जागते हुए इस दृश्य को देखता रहा, इस कारण इस दृश्य को देखते समय मेरे सरल अन्त:करण में यह प्रश्न उठा कि जो कई कई सौ दुर्दमनीय दानवों के संहार में समर्थ है, वे अपनी देह पर से थोड़े से चूहों को दूर करने में समर्थ क्यों नहीं । इस प्रश्न को बहुत देर तक सोचते सोचते मेरे मस्तिष्क घूमने लगा, जिस कारण मैं पिता की निद्रा भंग किए बिना रह सका जब पिता जागे, तो मैंने इस प्रश्नको पूछा , जिज्ञासित प्रश्न के उत्तर में पिता ने मुझे समझाते हुए कहा - "तु अल्पबुद्धि बालक है यह तो केवल महादेव का प्रतीक मात्र है" पिता के इस प्रकार के उत्तर से मैं संतुष्ट न सो सका, इसलिए मैंने उसी स्थान और उसी क्षण यह प्रतिज्ञा की कि यदि मैं त्रिशूलधारी महादेव के दर्शन नहीं करूँगा, तो मैं किसी प्रकार से भी उसकी आराधना नहीं करूँगा।
"इस प्रकार की प्रतिज्ञा करके मैं घर लौट आया और माता से यह कहकर कि मैं बहुत भूखा हूँ खाने को पदार्थ मांगा "
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#समीक्षा_४ :- स्वामी जी आपके पिता ने सहीं कहा था यदि आप अल्पबुद्धि नहीं होते तो इस प्रकार की उटपटांग बाते ने करते
"अविद्यायामन्तरे वर्तमानाः
स्वयं धीराः पण्डितं मन्यमानाः ।
जङ्घन्यमानाः परियन्ति मूढा
अन्धेनैव नीयमाना यथान्धाः ॥
ऐसे मुढ़ विद्या शून्य रहकर भी बुद्धिमान बनते हैं और इस माया रूपी जगत् में उसी प्रकार भटकते है जिस प्रकार अन्धे के नेतृत्व में अन्धे चलते हुए भटकते है"
यह उपनिषद वचन है जो नेत्रहीन विरजानंद के चेले दयानंद पर बिल्कुल ठीक बैठती है,
यदि दयानंद के अंदर उस चूहे जितनी भी बुद्धि होती तो वो ऐसी मूर्खतापूर्ण बाते न करते , स्वामी जी ने अगर कभी वेदआदि ग्रंथों का अध्ययन किया होता तो शायद समझ पाते। कि -
प्रजापतिश्चरति गर्भेऽअन्तरजायमानो बहुधा विजायते ।
तस्य योनिं परि पश्यन्ति धीरास्तस्मिन्ह तस्थुर्भुवनानि विश्वा ॥१॥
एषो ह देव:प्रदिशोनु सर्वा: पूर्वो ह जात:स उ गर्भे अन्त: ।
स एव जात: स जनिष्यमाण: प्रत्यड्ं जनातस्तिष्ठति सर्वतोमुख: ॥२॥
यत्किञ्च जगत्यां जगत् ॥३॥
य एकोऽवर्णो बहुधा शक्तियोगाद्वरणाननेकान्निहितार्थो दधाति ।
वि चैति चान्ते विश्वमादौ स देवः स नो बुद्ध्या शुभया संयुनक्तु ॥४॥
मायां तु प्रकृतिं विद्यान्मायिनं च महेश्वरम् ।
तस्यावयवभूतैस्तु व्याप्तं सर्वमिदं जगत् ॥५॥
यो योनिं योनिमधितिष्ठत्येको यस्मिन्निदं सं च विचैति सर्वम् ।
तमीशानं वरदं देवमीड्यं निचाय्येमां शान्तिमत्यन्तमेति ॥६॥
क्योकी ऋग्वेद में कहा गया है -
तम आसीत्तमसा गूळ्हमग्रेऽप्रकेतं सलिलं सर्वमा इदम् ।
तुच्छ्येनाभ्वपिहितं यदासीत्तपसस्तन्महिनाजायतैकम् ॥
तस्माद्वा एतस्मादात्मन आकाशः सम्भूतः । आकाशाद्वायुः ।
वायोरग्निः । अग्नेरापः । अद्भ्यः पृथिवी ।
पृथिव्या ओषधयः । ओषधीभ्योन्नम् । अन्नात्पुरुषः ॥
इसलिए "यदा ह्येवैष एतस्मिन्नुदरमन्तरं कुरुते ।
अथ तस्य भयं भवति । तत्वेव भयं विदुषोऽमन्वानस्य ।
तदप्येष श्लोको भवति ॥"
जब तक जीव परमात्मा से किंचित् भी भेद रखता है, तब तक वह अज्ञान रूपी भय से नहीं छूट पाता । वही भय अहंकारी विद्वान को भी हो जाता है।
और मित्रों ये दयानंद वही दयानंद है जो एक समय शुद्ध चैतन्य के नाम से जाने जाते थे और अपने आपको ही ब्रह्म मानते थे ।
और ऐसा मुर्ख ये कहता है कि जब तक महादेव मुझे दर्शन नहीं देते मैं उनकी किसी प्रकार से भी आराधना नहीं करूँगा
तो समाजी हमें ये बताए कि क्या दयानंद ने अपने मतानुसार निराकार ब्रह्म के दर्शन कर लिए थे ?
क्योकी बिना दर्शन किए तो दयानंद ने ईश्वर की स्तुति करने से साफ मना कर दिया।
इसका मतलब दयानंद ने अपने जीवन में कभी भी ईश्वर की स्तुति की ही नहीं पुरा जिंदगी नास्तिक ही बने रहे ।
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५* दयानंद के गृह त्याग का रहस्य -
(अ) आर्य समाजी गपोड़ा :- अपनी छोटी बहन और चाचा की हैजे के कारण हुई मृत्यु से वे जीवन-मरण के अर्थ पर गहराई से सोचने लगे और ऐसे प्रश्न करने लगे जिससे उनके माता पिता चिन्तित रहने लगे। तब उनके माता-पिता ने उनका विवाह किशोरावस्था के प्रारम्भ में ही करने का निर्णय किया (१९ वीं सदी के भारत में यह आम प्रथा थी)। लेकिन बालक मूलशंकर ने निश्चय किया कि विवाह उनके लिए नहीं बना है और वे १८४६ मे सत्य की खोज मे निकल पड़े।
(ब) दयानंद के अनुसार :-
दयानंद अपने आत्मचरित के पृष्ठ संख्या ६ में लिखते हैं कि - " हम पाँच भाई बहन थे, उनमें दो मेरे भाई और दो बहनें थी, जब मेरी आयु १६ वर्ष की थीं तब मेरे छोटे भाई का जन्म हुआ ,
एक बार रात्रि के समय एक बान्धव के घर मैं नृत्य उत्सव देख रहा था कि घर से एक भृत्य ने आकार समाचार दिया कि मेरी १४ वर्ष की बहन बहुत पीडित हो गई है आश्चर्य है कि यथोचित चिकित्सा के होते हुए भी मेरे घर लौटने के दो घंटे पश्चात उसकी मृत्यु हो गई , उस भगनी के वियोग का शोक मेरे जीवन का पहला शोक था ।
जिस समय सब मेरी भगनी के चारों ओर विलाप और रैदन कर रहे थे , उस समय मैं खड़ा खड़ा यह सोच रहा था कि इस संसार में सभी को एक ना एक दिन मृत्यु के मुख में जाना होगा , इसलिए मुझे भी एक दिन मृत्यु का ग्रास बनना होगा। मेरे मन में मृत्यु का भय बैठ गया, मैं मन ही मन ये सोचने लगा कि किस जगह जाने से मैं मृत्यु के यन्त्रण से बच सकूंगा।
कुछ दिन पिछे मेरे चाचा की भी मृत्यु हो गई , मेरे चाचा सद्गुणसम्पन्न सुशिक्षित व्यक्ति थे और वह मुझको बहुत प्यार करते थे इस कारण में उनके वियोग से बहुत ही व्यथित हुआ , इसके अतिरिक्त इस घटना के पश्चात मैं यह चिन्ता भी करने लगा कि मुझको भी इसी प्रकार से कालकवल बनना पडेगा, जब क्रमश: मृत्युचिन्ता बहुत प्रवल हो गई । तो मै अपने बान्धवों से पुछने लगा कि किस उपाय का अवलम्बन कर मुझे अमरत्व प्राप्त हो सकता है । स्वदेश के पंडितों ने मुझेको योगाभ्यास करने का परामर्श दिया । इसलिए अमरत्व की प्राप्ति हेतु मैंने गृहत्याग का संकल्प किया और एक दिन संध्या के समय बिना किसी को बताए मैंने गृहत्याग कर दिया, उस समय मेरी आयु २० वर्ष थी...
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#समीक्षा_५ :- दयानंद एक साधारण मनुष्य से ज्यादा और कुछ नहीं थे जैसा कि दयानंद ने स्वयं अपने आत्मचरित में यह स्वीकार किया है कि गृह त्याग का कारण उनके मन में बैठा मृत्यु का भय था। दयानंद मृत्यु से इस प्रकार भयभीत हो चुके थे कि उससे बचने के लिए वो हर एक सम्भव प्रयास करने के लिए तैयार थे
दयानंद ने स्वयं लिखा है कि "मैं मन ही मन ये सोचने लगा कि किस जगह जाने से मैं मृत्यु के यन्त्रण से बच सकूंगा", उस समय दयानंद की उम्र लगभग २० वर्ष थी अगर दयानंद में थोड़ी बहुत भी बुद्धि होती तो शायद वो समझ पाते कि चाहे वो संसार के किसी भी कोने में क्यों न चले जाएं, मृत्यु से बचना असम्भव है जिसने जन्म लिया उसकी मृत्यु निश्चित है, और हुआ भी यही स्वामी दयानंद जिस मृत्यु के भय से, अमरत्व की खोज में पूरी जिंदगी इधर उधर भटकते रहे पर अफसोस की उससे बच न सकें,
और समाजी कहते है कि दयानंद ने सत्य की खोज में गृहत्याग किया, अब कोई इन समाजीयों से यह पूछे जो दयानंद मृत्यु जैसे सत्य को न जान सका सारी उम्र उससे इधर उधर भागते रहे, वो कितने बुद्धिमान थे ये समझना कोई बड़ी बात नहीं है ।
शेष अगले भाग में ....

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