Thursday, 25 March 2021

दयानंद जीवन परिचय

 

दयानंद के झूठे जीवन परिचय का भंडाफोड़ (भाग-१) ________________________________
१• प्रारम्भिक जीवन :
दयानंद सरस्वती का जन्म १२ फ़रवरी टंकारा में सन् १८२४ में मोरबी (मुम्बई की मोरवी रियासत) के पास काठियावाड़ क्षेत्र (जिला राजकोट), गुजरात में हुआ था। उनके पिता का नाम करशनजी लालजी तिवारी और माँ का नाम यशोदाबाई था ।
#समीक्षा : मुझे समझ में नहीं आता कि दयानंद की ये जीवनी किस महा चुतिये ने लिखी है
जब दयानंद ने अपने पुरे जीवन यहाँ तक कि अपने जीवन चरित्र में भी अपने माता पिता अपने जन्म स्थान आदि के बारे में कुछ न बताकर मौन ही रहा तो ये सब क्या चुतियापंति है ??
जीवन परिचय लिखने वाला तो इतने विश्वास के साथ ऐसे लिख रहा है जैसे दयानंद को वही पैदा करके आया हो हद है यार छोडने कि भी कोई लिमिट होती है
कैसे कैसे लोग है दुनिया में फर्जी माँ बाप भी पैदा कर देते है।
 
 
 
दयानंद के झूठे जीवन परिचय का भंडाफोड़ (भाग -२)
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प्रारम्भिक जीवन (भाग -२) :
उनके जीवन में ऐसी बहुत सी घटनाएं हुईं, जिन्होंने उन्हें सनातन धर्म की पारम्परिक मान्यताओं और ईश्वर के बारे में गंभीर प्रश्न पूछने के लिए विवश कर दिया। एक बार शिवरात्रि की घटना है। तब वे बालक ही थे। शिवरात्रि के उस दिन उनका पूरा परिवार रात्रि जागरण के लिए एक मन्दिर में ही रुका हुआ था। सारे परिवार के सो जाने के पश्चात् भी वे जागते रहे कि भगवान शिव आयेंगे उसे दर्शन देंगे और प्रसाद ग्रहण करेंगे। उन्होंने देखा कि शिवजी के लिए रखे भोग को चूहे खा रहे हैं। यह देख कर वे बहुत आश्चर्यचकित हुए और सोचने लगे कि जो ईश्वर स्वयं को चढ़ाये गये प्रसाद की रक्षा नहीं कर सकता वह मानवता की रक्षा क्या करेगा? इस बात पर उन्होंने अपने पिता से बहस की और तर्क दिया कि हमें ऐसे असहाय ईश्वर की उपासना नहीं करनी चाहिए।
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#समीक्षा : अब इस चुतिये को मैं कौन सी गाली दूँ कोई बतायेगा
चुतियानंद के दल्ले जो स्वयं को वैदिक कहते हैं जरा इन मंत्रों के अर्थ बताए
प्रजापतिश्चरति गर्भेऽअन्तरजायमानो बहुधा विजायते ।
तस्य योनिं परि पश्यन्ति धीरास्तस्मिन्ह तस्थुर्भुवनानि विश्वा ॥ (यजुर्वेद- ३१/१९)
एषो ह देव:प्रदिशोनु सर्वा: पूर्वो ह जात:स उ गर्भे अन्त: ।
स एव जात: स जनिष्यमाण: प्रत्यड्ं जनातस्तिष्ठति सर्वतोमुख: ॥ (यजुर्वेद- ३२/४)
जैसा कि वेद कहते हैं जो ईश्वर कण कण में व्याप्त है सभी दिशाओं- उपदिशाओं माता के गर्भ में , जीवात्मा में और सबके हृदय में विचरता है बहुत प्रकार से विशेषकर प्रकट होता है उस प्रजापति के स्वरूप को ध्यानशील विद्वान ज्ञानी जन उसे सब ओर देखते हैं
और एक ये गधा है जिसे जीवात्मा में ईश्वर का स्वरूप नहीं दिखता स्वयं अपने ही वेदभाष्य में कहता है वो ईश्वर माँ के गर्भ में जीवात्मा में हर जगह विचरता है ज्ञानी जन उसका स्वरूप हर ओर देख पाते है । पर स्वयं जीवात्मा में ईश्वर का स्वरूप नहीं देख पाता स्वंय मानता है कि कण कण मे ईश्वर है । पर उन्हीं कणों से बनी मुर्ती में ईश्वर को नही मानता इस गधे को तो यदि ईश्वर साक्षात दर्शन भी दे देता तो ये चुतिया उनसे भी ईश्वर होने का प्रमाण माँगता
अब यदि इसके जैसे आंडू गांडू सनकी लोंडे को भी ईश्वर दर्शन देने लगे तो बस हो गया
और ये भाष्य किसी और का नहीं बल्कि स्वयं दयानंद का ही है
अब दूसरी बात ये चुतियानंद बोलता है जो ईश्वर स्वयं के चढ़ाए गए प्रसाद की रक्षा नहीं कर सकता वह मानवता की रक्षा क्या करेगा?
प्रथम तो कोई ये बताए प्रसाद खाने वाला जीव चाकू छूरी काटा लेकर ईश्वर से लडने आया था क्या ??
या फिर अपनी भूख शांत करने के लिए प्रसाद खाने फिर इसमें रक्षा कर पाने व ना कर पाने वाली बात कहाँ से आ गई
जो ईश्वर दयानंद जैसे गधे का पेट भर सकता है उसके लिए भोजन का प्रबंध कर सकता है उसके लिए स्वतंत्र छोड़ रखा है वो अन्य जीवों को क्यों रोकेगा ??
बकचोदी के बादशाह आंड समाजी ये बताए वह ईश्वर तो अपने चढ़ाये हुए प्रसाद की रक्षा न कर सका इसलिए मानवता की रक्षा करने में असमर्थ है
चलो यही बता दो की वह निराकार ईश्वर मानवता की रक्षा किस प्रकार करता है दयानंद ने किस ईश्वर की खोज की खोज की प्रमाण के साथ सिद्ध करें
 
 
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दयानंद आत्मचरित (एक अधूरा सच)- भाग १
स्वामी दयानंद एक साधारण मनुष्य थे, और उनके अंदर भी साधारण मनुष्यों की ही भाँति सभी गुण व दोष मौजूद थे, इसीलिए जब उन्होंने अपना आत्मचरित दुनिया के सामने रखा तो निश्चित ही एक साधारण मनुष्य की भाँति सिर्फ उनकी अच्छी बाते ही दुनिया तक पहुंचे ऐसी कोशिश की होगी, और यही किया भी, क्योकि जब हम इतिहास पर दृष्टि डालते है और उनका जीवन चरित्र पढ़ते है तो हमे केवल वही दिखता है जो वो हमें दिखाना चाहते होंगे, कौन जाने सच क्या होगा?
क्योकि उनके जीवन चरित्र में काफी बातें ऐसी हैं जो आधे अधूरे सच की तरफ इशारा करती है, जिनकी प्रमाणिकता इतिहास के अंधेरों में सदा सदा के लिए खो गयी है, जैसे-
१• स्वामी दयानंद का जन्म-
(अ) आर्य समाजी गपोड़ा- स्वामी दयानंद का जन्म गुजरात प्रान्त के काठियावाड़ के मौरवी राज्य में टंकारा नामक ग्राम में १२ फरवरी १८२४ को हुआ था।
(ब) स्वामी दयानंद के अनुसार- दयानंद ने अपनी जीवनी सन् १८७६ में लिखीं और १८८०, में थियोसोफिस्ट पत्र में उसे छपवाया।
दयानंद अपने आत्मचरित के पृष्ठ संख्या १ में लिखते हैं कि- मैंने जिस परिवार में जन्मग्रहण किया वह एक विस्तृत सम्पत्तिसम्पन्न परिवार था, हमारा कुटुम्ब इस समय १५ पृथक-पृथक परिवारों में विभक्त है और इस समय मेरी अवस्था ४६ वा ५० वर्ष की है।
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#समीक्षा_१-- ऊपर लिखीं दोनों ही वर्ता जिसमें एक तो दयानंदीयों द्वारा तैयार कल्पित दयानंद चरित और दूसरी स्वयं दयानंद द्वारा लिखीं आत्मचरित है, इन दोनों में से कौन सी बात सत्य मानें और कौन सी असत्य, यह तो अब हमारे दयानंदी भाई ही बता सकते हैं, अब जबकि दयानंद ने अपने आत्मचरित में यह स्पष्ट लिखा है कि इस आत्मचरित को लिखते समय अर्थात १८७६ में उनकी उम्र ४६ वा ५० वर्ष की है अर्थात स्वयं स्वामी जी को ही अपनी ठीक-ठीक उम्र का पता नहीं था, उनके इस लेखानुसार उनका जन्म १८२२ से १८२६ के आसपास हुआ था, परन्तु हमारे दयानंदी भाई तो यह कहते हैं कि "दयानंद जी का जन्म गुजरात प्रान्त के काठियावाड़ के मौरवी राज्य में टंकारा नामक ग्राम में १२ फरवरी १८२४ को हुआ था" दयानंदी यह बात इतने विश्वास के साथ लिखते हैं जैसे मानों दयानंद के जन्म के समय वही पर उपस्थित थे, सो यहाँ आर्य समाजीयों से हमारा यह प्रश्न है कि जब दयानंद को ही अपनी ठीक-ठीक उम्र का पता नहीं था, तो फिर दयानंदी किस आधार पर इतने विश्वास के साथ यह कहते हैं कि दयानंद का जन्म १२ फरवरी १८२४ को हुआ था, दयानंदी इस बात को साफ करें कि वह इनमें से कौन सी बात सत्य मानते हैं जो स्वयं दयानंद ने अपने आत्मचरित में लिखीं हैं या फिर दयानंद के अन्ध भक्त नियोगी चमचों द्वारा तैयार यह कल्पित दयानंद चरित?
२• दयानंद के बचपन का नाम, उनके माता और पिता का नाम आदि-
(अ) आर्य समाजी गपोड़ा - दयानंदीयों के अनुसार स्वामी दयानंद के बचपन का नाम मूलजी दयाराम था तो कुछ कहते हैं कि उनके बचपन का नाम मूलशंकर था, इसी प्रकार दयानंद के माता, पिता के बारे में कुछ लोग कहते हैं कि उनके पिता का नाम अम्बाशंकर और माता का नाम यशोदाबाई था, तो वही कुछ का कहना है कि उनके पिता का नाम करशनजी लालजी त्रिवेदी और माता का नाम यशोदाबाई था।
अब आइए दयानंद क्या कहते हैं वो भी देख लेते हैं।
(ब) दयानंद के अनुसार- दयानंद अपने आत्मचरित के पृष्ठ संख्या १ में लिखते हैं कि- अनेक लोग यह जिज्ञासा करते हैं मैं ब्राह्मण हूँ वा नही, और वे लोग अनुरोध करते हैं कि इसके प्रमाण के लिए अपने कुटुम्बियों का नाम बतलाओं अथवा उनमें से किसी का लिखा हुआ कोई पत्र दिखलाओं, ये कहना अनावश्यक है कि गुजरातवासी लोगों के साथ मैं अधिकतर अनुरागसुत्र में निबद्ध हूँ, अपने कुटुम्बियों के साथ यदि मेरा किसी प्रकार से साक्षात् हो जाए, तो जिस सांसारिक अशांति से मैंने अपने आप को स्वतंत्र किया हैं फिर मुझे उसी अशांतिजाल में निश्चय ही फसना होगा, इसी कारण से मैं अपने कुटुम्बियों के नाम बतलाना व उनमें से किसी का लिखा पत्र प्रदर्शन करना उचित नहीं समझता।
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#समीक्षा_२-- अब यह बात तो हमें हमारे दयानंदी भाई समझा सकते हैं कि जब स्वामी दयानंद ने अपने आत्मचरित में अपने माता पिता कुल गोत्र आदि के बारे मे कुछ भी लिखने वा बताने से साफ-साफ मना कर दिया, तो फिर दयानंदी किस आधार पर इतने विश्वास के साथ यह बात कहते हैं कि "दयानंद की माता का नाम यशोदाबाई और उनके दो नियोगी पिता जिनके नाम क्रमशः अम्बाशंकर और करशनजी लालजी त्रिवेदी थे, वैसे यह कोई आश्चर्य की बात भी नहीं है क्योंकि स्वामी जी के मतानुसार एक स्त्री एकादश (ग्यारह) पति तक कर सकती है, जब यह हाल है कि एक स्त्री के ग्यारह पति हो सकते हैं तो फिर स्वामी दयानंद जी के दो पिता क्यों नहीं हो सकते? शाबाश! दयानंदीयों ऐसे ही लगें रहो और मैं तो कहता हूँ एक बार फिर से जाँच करें, क्या पता यशोदाबाई के दो से अधिक नियोगी पति सिद्ध हो जाये।
स्वामी जी के इस लेख से यह तो स्पष्ट हो जाता है कि स्वामी जी के जन्म और उनके वर्ण का पता लग पाना लगभग असंभव है, और ऐसे व्यक्ति के लिए स्वामी जी सत्यार्थ प्रकाश प्रथम संस्करण के पृष्ठ ६७ में लिखते हैं कि मलेच्छ नाम निंदित नहीं है जिन पुरुषों के आचरण में वर्णों का स्पष्ट उच्चारण नहीं होता उनका नाम मलेच्छ है,
दयानंद के लेखानुसार वे मलेच्छ ठहरें अब दयानंदीयों को अधिकार है कि वह अपने गुरु की आज्ञा को स्वीकार करें या फिर तिरस्कार,
और सुनिये इसी लेख में आगे दयानंद जी लिखते हैं कि "अपने कुटुम्बियों के साथ यदि मेरा किसी प्रकार साक्षात् हो जाये तो जिस सांसारिक अशांति से मैंने अपने आपको स्वतंत्र किया हैं फिर मुझे उसी अशांतिजाल में निश्चय ही फसना होगा"
अब यहाँ स्वामी जी से हमारा यह प्रश्न है कि उन्होंने यह बात क्या सोचकर लिखीं हैं? यह भ्रम स्वामी जी के मन में कैसे उत्पन्न हो गया कि उन्होंने सांसारिक अशांति से स्वयं को स्वतंत्र कर लिया, शायद यहाँ स्वामी दयानंद अपने आप को अज्ञानवश सन्यासी समझ बैठे हैं, इस कारण यह बात लिख दी हो, परन्तु सन्यासीयों वाले लक्षण स्वामी जी में दिखते नहीं, सुनिये कठोपनिषद में इस प्रकार कथन है कि--
नाविरतो दुश्चरितान्नाशान्तो नासमाहितः।
नाशान्तमानसो वाऽपि प्रज्ञानेनैनमाप्नुयात्॥ ~कठोपनिषद {वल्ली २, मंत्र २४}
जो दुराचार से पृथक नहीं, जिसका मन शांत नहीं, जिसकी आत्मा योगी नहीं वह सन्यास लेकर भी परमात्मा को प्राप्त नहीं कर सकता, अर्थात उसका सन्यास लेना व्यर्थ है, जो पुरुष काम, क्रोध, मद, लोभ, मोह, इन पांच विकारों से मुक्त है वही सन्यासी है।
परन्तु स्वामी जी में तो यह इच्छाएं और अवगुण कूट-कूट के भरी हुई हैं, भला सन्यासी होकर चोंगा बूट जुता पहनना, घड़ी बांधना, हुक्का पिना, कुर्सी मेज प्रयोग करना, रूपयाँ बटोरना, मांसभक्षियों के हाथ से भोजन लेकर भोजन करना, क्रोध करना, गालियाँ देना किस ग्रथ में लिखा है और सांसारिक अशांति किसे कहते हैं? इसे ही तो कहते हैं, और दयानंद जी ने संसार का त्याग किया ही कब? सन्यासी तो उसे कहते हैं जो संसार के व्यवहार से कुछ सम्बन्ध नहीं रखता, लोक में जन निंदा करें वा स्तुति, और अप्रतिष्ठा करें तो भी जिसके चित्त में कुछ हर्ष शोक न हो वही सन्यासी कहलाने योग्य है लेकिन दयानंद जी की तो कोई निंदा करता है तो उन्हें कितना दुख होता है तुरन्त उसको उत्तर देने में कटिबद्ध हो उस पर गालियों की वर्षा करने लगते हैं, वितैषणा का त्याग भी स्वामी जी के अन्दर नहीं पाया जाता, धन की इच्छा तो स्वामी जी के अन्दर इस हद तक है कि उसकी पूर्ति नहीं होती, धन की प्राप्ति के लिए कैसे-कैसे प्रयत्न किये, भीख माँग-माँग कर अपना निजी यंत्रालय खोला, उसके पश्चात भी पुस्तकों के मुल्य दोगुने तीनगुने रखें, तुम्हारी पुस्तक कोई और न छाप सकें इसलिए उसकी रजिस्ट्री करवाईं, उपदेश मण्डली के नाम से एकलक्ष्य रूपयाँ एकत्रित करने में यथाशक्ति प्रयत्न किया गया, लोभ ने तुम्हारे मन में यहाँ तक निवास किया था कि धनवानों पूंजीपतियों से प्रितिसमेत घंटों वर्ता होती थी निर्धनों की तो बूझ ही न थी, प्रतिष्ठा इतनी चाहते थे कि हमेशा कोठी, बंगलें और महलों में ही ठहरते थे, पुत्र तो था ही नहीं परन्तु जो मुख्य सेवकादि है उनमें तुम प्रिति करते हो, कामवासना तो मन में ऐसे भरी थी कि अपने अश्लील लेख एवं भाष्यों से वेदभाष्य और स्वयं निर्मित ग्रंथों को भर दिया,
तो लो तुम इन सब विकारों से मुक्त नहीं इसलिए सन्यासी भी नहीं हो, इससे तुम्हारे मन में उत्पन्न यह भ्रम की तुमने सांसारिक अशांति का त्याग कर दिया, मिथ्या सिद्ध हुआ।
३• पिता से घृणा और माता से प्रेम का रहस्य-
दयानंद अपने आत्मचरित के पृष्ठ संख्या २-५ में लिखते हैं- मेरा परिवार शैवमतवालम्बी था, इसलिए अल्पवय से ही मुझे शिवलिंग की पूजा करनी पड़ी मैं अपेक्षया सबेरे आहार किया करता था और शिवपुजा में बहुत से उपसवास और कठोरता सहन करनी पड़ती हैं इसलिए स्वास्थ्य की हानि के भय से माता मुझे प्रतिदिन शिव की उपासना करने से रोका करती थी, परन्तु पिता उसका प्रतिवाद किया करते थे, इस कारण इस विषय को लेकर माता के साथ पिता का प्रायः विवाद रहा करता था, माता के बारंबार प्रतिदिन शिवपुजा के करने से निषेध करने पर भी पिता मुझको उसके करने के लिए कठोर आदेश किया करते थे, शिवरात्रि के आने पर पिता ने कहा कि आज तुम्हारी दीक्षा होगी, और मंदिर में जाकर सारी रात जागना होगा, पिता की आज्ञानुसार मैं उस दिन रात्रि को अन्यान्य लोगों के साथ सम्मिलित होकर शिवमंदिर गया, शिवरात्रि का जागरण चार पहरों में विभक्त होता है २ पहर बीत जाने के पश्चात तीसरे पहर में मैंने पिता से घर लौटने की अनुमति मांगी, पिता ने आज्ञा देकर मेरे साथ एक सिपाही कर दिया और इस विषय में कि मैं भोजन करके वृतभंग ने करू बारंबार मुझसे कह दिया, परन्तु घर में आकर जब मैंने माता से क्षुधा की कथा को प्रकाशित किया, तब उन्होंने जो कुछ भी मुझे आहार के लिए दिया उसको मैं बिना खाएँ न रह सका, भोजन के पश्चात मुझे गहरी नींद आ गई दुसरे दिन प्रात:काल पिता ने घर में आकर सुना कि मैंने व्रत भंग किया हैं, यह सुनकर वह मेरे ऊपर बड़े क्रोधित हुए और मुझे भला बुरा कहने लगे इस विषय को लेकर फिर से माता और पिता के बीच विवाद हुआ।
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#समीक्षा_३-- इस लेख को पढ़ने के पश्चात विद्वान लोग आसानी से यह बात समझ सकते हैं कि मूलशंकर बचपन से इतना मूढ़, हठी, ढ़िठ और नास्तिक प्रवृत्ति का क्यों रहा था?
दयानंद को यदि कलयुगी रावण कहें तो यह कहना गलत न होगा, यदि स्वामी जी के पिता ऋषि विश्रवा, तो उनकी माता राक्षसी कैकसी के समान थी और उसका रिजल्ट (परिणाम) धर्म का नाश करने वाला नास्तिक शिरोमणि मूलशंकर हुआ, मूलशंकर के पिता जहाँ उसे धर्म के मार्ग पर ले जा रहे थे, तो दूसरी ओर उसकी माता उसे अपने स्वभाव अनुसार राक्षसी शिक्षा से पोषित कर रही थीं, इसका परिणाम यह हुआ कि जो-जो धर्म कर्म वेदानुसार है उसकी माता ने उससे उल्ट शिक्षा कर मूलशंकर को अधर्मी और नास्तिक प्रवृत्ति का बना दिया, और आगे चलकर वही उसके जीवन का उद्देश्य बन गया, जैसे उसकी माता उसे धर्म कर्म के मार्ग से विमुख कर भौतिकवाद की तरफ ले गई, ठिक उसी प्रकार मूलशंकर भारतवर्ष में घुम-घुम कर धर्म कर्म करने वाले जो व्यक्ति उनसे मिलते उनसे सनातन कर्मकांडों का निषेध कर उनको भ्रमित करते, और जैसा कि इस लेख से स्पष्ट है स्वामी दयानंद बचपन से ही पेटू थे, और इस बात को दयानंद ने अपने इस लेख में स्वीकार भी किया है, पिता उन्हें व्रत आदि करने को कहते परन्तु मूलशंकर से भूख बर्दाश्त नहीं होती थी, क्योकि उसकी माता अक्सर चोरी से उन्हें भोजन करवा उनका व्रत भंग करवा देती, पर जब यह बात उनके पिता को पता चलती कि उन्होंने उनके आदेश की अवहेलना करते हुए व्रत भंग कर दिया, तो वे उनपे क्रोधित हो जाते और उन्हें इसके लिए दंडित करते,इसी कारण मूलशंकर कि माता और पिता का प्रायः विवाद रहा करता था, ऐसे में स्वामी जी को अपने पिता किसी शत्रु से कम नहीं लगते जो अपने नियम धर्म कर्म से उनकी भोगविलास वाले जीवन में अशांति उत्पन्न कर रहे थे, यही कारण था कि मूलशंकर अपने पिता से घृणा करने लगा, पिता उसे जो करने को कहते मूलशंकर उससे उल्टा ही करता, और इसी घृणा ने मूलशंकर को नास्तिक बना दिया।
४• मूर्ति (प्रतिक) पुजा में अविश्वास-
(अ) आर्य समाजी गपोड़ा- उनके जीवन में ऐसी बहुत सी घटनाएं हुईं, जिन्होंने उन्हें सनातन धर्म की पारम्परिक मान्यताओं और ईश्वर के बारे में गंभीर प्रश्न पूछने के लिए विवश कर दिया, एक बार शिवरात्रि की घटना है, तब वे बालक ही थे, शिवरात्रि के उस दिन उनका पूरा परिवार रात्रि जागरण के लिए एक मन्दिर में ही रुका हुआ था, सारे परिवार के सो जाने के पश्चात् भी वे जागते रहे कि भगवान शिव आयेंगे उसे दर्शन देंगे और प्रसाद ग्रहण करेंगे, उन्होंने देखा कि शिवजी के लिए रखे भोग को चूहे खा रहे हैं, यह देख कर वे बहुत आश्चर्यचकित हुए और सोचने लगे कि जो ईश्वर स्वयं को चढ़ाये गये प्रसाद की रक्षा नहीं कर सकता वह मानवता की रक्षा क्या करेगा? इस बात पर उन्होंने अपने पिता से बहस की और तर्क दिया कि हमें ऐसे असहाय ईश्वर की उपासना नहीं करनी चाहिए।
(ब) स्वामी दयानंद के अनुसार- दयानंद अपने आत्मचरित के पृष्ठ संख्या ३-४ में लिखते हैं- दो पहरों के पश्चात जब निशिथ काल आया, तब पुरोहित और अन्यान्य लोग मंदिर के बाहर चले गए, उसके कुछ समय पश्चात मैंने देखा कई एक चुहे बिल में से बाहर निकल कर महादेव की पिण्डी के ऊपर इच्छापूर्वक विचरण और उनके मस्तकस्थित चावलआदि का भक्षण करने लगे, मै जागते हुए इस दृश्य को देखता रहा, इस कारण इस दृश्य को देखते समय मेरे सरल अन्त:करण में यह प्रश्न उठा कि जो कई कई सौ दुर्दमनीय दानवों के संहार में समर्थ है, वे अपनी देह पर से थोड़े से चूहों को दूर करने में समर्थ क्यों नहीं, इस प्रश्न को बहुत देर तक सोचते सोचते मेरे मस्तिष्क घूमने लगा, जिस कारण मैं पिता की निद्रा भंग किए बिना रह सका जब पिता जागे, तो मैंने इस प्रश्नको पूछा, जिज्ञासित प्रश्न के उत्तर में पिता ने मुझे समझाते हुए कहा- "तु अल्पबुद्धि बालक है यह तो केवल महादेव का प्रतीक मात्र है" पिता के इस प्रकार के उत्तर से मैं संतुष्ट न हो सका, इसलिए मैंने उसी स्थान और उसी क्षण यह प्रतिज्ञा की कि यदि मैं त्रिशूलधारी महादेव के दर्शन नहीं करूँगा, तो मैं किसी प्रकार से भी उसकी आराधना नहीं करूँगा।
"इस प्रकार की प्रतिज्ञा करके मैं घर लौट आया और माता से यह कहकर कि मैं बहुत भूखा हूँ खाने को पदार्थ मांगा"
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#समीक्षा_४-- स्वामी जी आपके पिता ने सहीं कहा था यदि आप अल्पबुद्धि नहीं होते तो इस प्रकार की उटपटांग बातें न करते, वेदादि ग्रंथों में सही कहा गया है कि-
"अविद्यायामन्तरे वर्तमानाः
स्वयं धीराः पण्डितं मन्यमानाः।
जङ्घन्यमानाः परियन्ति मूढा
अन्धेनैव नीयमाना यथान्धाः॥
ऐसे मुढ़ विद्या शून्य रहकर भी बुद्धिमान बनते हैं और इस माया रूपी जगत् में उसी प्रकार भटकते है जिस प्रकार अन्धे के नेतृत्व में अन्धे चलते हुए भटकते है"
यह उपनिषद वचन है जो नेत्रहीन विरजानंद के चैलें दयानंद पर बिल्कुल ठीक बैठती है, यदि दयानंद के अंदर उस चूहे जितनी भी बुद्धि होती तो वो ऐसी मूर्खतापूर्ण बात कभी न करते, स्वामी जी ने यदि कभी वेदआदि ग्रंथों का अध्ययन किया होता तो शायद वें इन श्रुतियों के यथार्थ अर्थ समझ पाते देखिये वेदों में इस प्रकार कथन है कि-
नासदासीन्नो सदासीत्तदानीं नासीद्रजो नो व्योमा परो यत्।
किमावरीवः कुह कस्य शर्मन्नम्भः किमासीद्गहनं गभीरम्॥ ~ऋग्वेद {१०/१२९/१}
(तदानीं)- महाप्रलय काल में, (असत्)- अपरा माया, (न)- नहीं थी, (सत्)- जीव भी, (नो)- नहीं, (आसीत्)- था, (रज:)- रजोगुण भी, (न)- नहीं, (आसीत्) था, (यत्)- जो, (व्योम)- आकाश तमोगुण, (अपर:)- सतोगुण, (नो)- नहीं था, (कुहकस्य)- इन्द्रजाल रूप, (शर्मन्)- ब्रह्मांड के चारों ओर जो, (आवरीव:)- तत्व समूह का आवरण होता है, (तत्) (किं) (नकिमप्यासीत्)- वह भी नहीं था, (गहनंगभीरं)- गहन गंभीर, (अंभ:)- जल, (किं आसीत्)- क्या था? अर्थात नहीं था
न मृत्युरासीदमृतं न तर्हि न रात्र्या अह्न आसीत्प्रकेतः।
आनीदवातं स्वधया तदेकं तस्माद्धान्यन्न परः किं चनास॥ ~ऋग्वेद {१०/१२९/२}
(तर्हि)- उस समय, (मृत्यु)- मृत्यु, (न) नही, (आसीत्)- थी, और (अमृतं)- अमृतत्व अर्थात जीवन भी, (न)- नही, (आसीत्)- था, (रात्र्या: अह्न:)- रात और दिन का, (प्रकेत:)- ज्ञान, (न आसीत्)- नही था, सिर्फ (स्वधया)- अपनी परा शक्ति से, (एकं)- अभिन्न एक, (तत्)- ब्रह्म ही, (आसीत्)- था, (तस्मात् ह)- उस सर्वशक्तिमान से, (अन्यत्)- अन्य, (किंच)- और कुछ भी, (न)- नही, (आसीत्)- था।
अब विचारने की बात है जबकि सृष्टि रचना के पूर्व एक ब्रह्म के अलावा कुछ भी नहीं था, और फिर सब कुछ उससे ही उत्पन्न हुआ, तो क्या वह कण-कण मे विद्यमान न हुआ, और सुनिये,
हिरण्यगर्भः सम् अवर्तताग्रे भूतस्य जातः पतिर् एक ऽ आसीत् । स दाधार पृथिवीं द्याम् उतेमां कस्मै देवाय हविषा विधेम॥ ~यजुर्वेद {१३/४}
सृष्टि के प्रारम्भ में हिरण्यगर्भ पुरुष (प्रजापति ब्रह्मा) सम्पूर्ण ब्रह्मांड के एक मात्र उत्पादक और पालक रहे, वही स्वर्ग अंतरिक्ष और पृथ्वी को धारण करने वाले हैं, उस प्रजापति के लिए हम आहुति समर्पित करते है।
य ऽ इमा विश्वा भुवनानि जुह्वद् ऋषिर् होता न्य् असीदत् पिता नः।
स ऽ आशिषा द्रविणम् इच्छमानः प्रथमच्छदवराँ ऽ आ विवेश॥ ~यजुर्वेद {१७/१७}
(य:)- जो, (ऋषि)- अतीन्द्रेयदृष्टा सर्वज्ञ, (इमा:)- इस, (होता)- संसार रूप होम का कर्ता, (न:)-हमारा, (पिता)- जनक उत्पन्न करने वाला परमात्मा, (विश्वा)- सब, (भुवनानि)- लोक लोकान्तरों को, (जुह्वत)- प्रलयकाल में संहार करता हुआ, (न्यसीद)- अकेला ही स्थित हुआ, (स:)- वह परमेश्वर, (प्रथमच्छत)- प्रथम एक अद्वितीयरूप में प्रविष्ट होता, (आशिषा)- फिर अपने सामर्थ्य से सृष्टि रचना की इच्छा से, (द्रविणम्)- इस द्रव्यरूप जगत को, (इच्छमान:)-इच्छा करता हुआ, (अवरान्)- मायाविकार व्यष्टि समष्टि देहों में, (आविवेश)- अन्तर्यामी रूप से प्रविष्ट हुआ।
प्रजापतिश्चरति गर्भेऽअन्तरजायमानो बहुधा विजायते।
तस्य योनिं परि पश्यन्ति धीरास्तस्मिन्ह तस्थुर्भुवनानि विश्वा॥ ~यजुर्वेद {३१/१९}
प्रजापालक परमात्मा की सत्ता सम्पूर्ण विद्यमान है, वह अजन्मा होकर भी अनेक रूपों में प्रकट होता है, उसकी कारण शक्ति में सम्पूर्ण भुवन समाहित हैं, ज्ञानी जन उसके मुख्य स्वरूप को देख पाते हैं, और सुनिये-
एतावान् अस्य महिमातो ज्यायाँश्च पूरुषः।
पादो ऽस्य विश्वा भूतानि त्रिपाद् अस्यामृतं दिवि॥ ~[यजुर्वेद : अ० ३१, मंत्र ३]
यह त्रिकालात्मक विश्व उस ईश्वर की महिमा ही है, किन्तु उसकी महत्ता इससे भी अधिक है, यह सम्पूर्ण विश्व जीवों सहित जो कुछ भी है उसकी महिमा का एक भाग है, और शेष तीन भाग में प्रकाशमान मोक्ष स्वरूप आप है । और श्रीमद्भगवद्गीता में भी इस प्रकार लिखा है कि (बुद्धे: परतस्तु स:) कि वह परमेश्वर बुद्धि से परे है जब वह बुद्धि से परे है तो भला दयानंद जैसा नास्तिक उसके स्वरूप को कैसे जान सकता है?
यत्किञ्च जगत्यां जगत्॥१॥ ~ईश० उपनिषद
अर्थात् उस परमात्मा की सत्ता सम्पूर्ण विश्व मे यह जड़चेतन स्वरूप जो विश्व है, वह सर्व ईश्वर से परिपूर्ण है, अर्थात वह कण-कण मे विद्यमान है, इसी कारण उपनिषद आदि ग्रन्थों मे यह कथन है कि-
"यदा ह्येवैष एतस्मिन्नुदरमन्तरं कुरुते।
अथ तस्य भयं भवति। तत्वेव भयं विदुषोऽमन्वानस्य।
तदप्येष श्लोको भवति॥"
जब तक जीव परमात्मा से किंचित् भी भेद रखता है, तब तक वह अज्ञान रूपी भय से नहीं छूट पाता, वही भय अहंकारी विद्वान को भी हो जाता है।
यदि स्वामी जी में इन वेद वचनों को समझने भर की थोड़ी भी समझ होती तो शायद वह मूर्खों की भांति ऐसी बात कभी न करते, और सुनिये, ये दयानंद वही दयानंद है जो एक समय शुद्ध चैतन्य के नाम से जाने जाते थे और अपने आपको ही ब्रह्म मानते थे, और ऐसा मुर्ख ये कहता है कि जब तक महादेव मुझे दर्शन नहीं देते मैं उनकी किसी प्रकार से भी आराधना नहीं करूँगा यह देखिये इस नास्तिक को क्या बोल गया, इसी को अनीश्वरवादी कहते हैं, सहस्रों ऋषि मुनि संसार का त्याग कर, मन में सिर्फ परमात्मा का स्वरूप जानने की इच्छा लिए आरण्य में वर्षों कठिन तपस्या किया करते थे और आज भी करते हैं, और एक यह की नन्ही जान जैसी वैश्या के हाथों मृत्यु को प्राप्त होने वाला मन में ईश्वर के दर्शन करने की इच्छा लिए हडताल पर बैठा है, कि जब तक दर्शन नहीं कर लूगाँ तब तक ईश्वर के अस्तित्व को न स्वीकारूगाँ, धन्य हे! तेरी बुद्धि,
अब तो दयानंदी ही हमें बताए कि क्या दयानंद ने अपने मतानुसार निराकार ब्रह्म के दर्शन कर लिए थे? या पुरे जीवन हडताल पर बैठे रहे, क्योकी बिना दर्शन किए तो दयानंद ईश्वर की स्तुति करने से साफ मना करते हैं।
इसका मतलब दयानंद ने अपने जीवन में कभी भी ईश्वर की स्तुति की ही नहीं पुरी जिंदगी नास्तिक ही बने रहे, अब जब यह हाल है कि समाज का संस्थापक स्वयं नास्तिकतावाद की राह पर चल पड़ा तो उसके चैलों का क्या कहना, वह क्या किसी को धर्म का मार्ग दिखायेगा, जो स्वयं मार्ग से भटक चुका है।
शेष अगले भाग (दयानंद आत्मचरित भाग -२) मे लिखेंगें
{#स्त्रोत- चुतियार्थ प्रकाश, प्रथम खंड- दयानंद आत्मचरित, पृष्ठ १७-३१}
~ उपेन्द्र कुमार 'बागी'
 

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दयानन्द के अनर्थ

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