Thursday, 25 March 2021

पौराणिक प्रकाश।

कृष्ण जन्म खंड - अध्याय 112
कृपया इसको ध्यान से पढ़े - खासकर पौराणिक विद्वान - और मुझे कुछ सवालो के जवाब देने का कष्ट करे -
1. कुछ पौराणिक कृष्ण के चरित्र पर जो दोष पुराण लगाते हैं उनको ये कह कर ख़ारिज करते हैं की ये मिलावटी है - पर प्रूफ करने की बात कहो तो चुपके से खिसक जाते हैं - ऐसा क्यों ????? मिलावटी चीज़ को मानना कहा तक न्यायसंगत और तर्कसंगत है ??? जबकि आपको ज्ञात है की पुराणो में मिलावट है - तो भाई सीधे तौर पर वेदो की और क्यों नहीं लौट आते ???
2. कृष्ण जी ने 16108 कन्यायो से विवाह रचाया - यही नहीं उनके साथ रमण (सेक्स) भी किया - भाई कोई मुझे बताएगा - इतना सेक्स करने के लिए कितना समय चाहिए और किस प्रकार संभव है ??? क्या कृष्ण जी को - ग़ाज़ी - अकबर - मुग़ल लुटेरा समझ रखा है क्या ?????
3. कृष्ण जी ने जो इन स्त्रियों के साथ रमण किया - इस पर कुछ पौराणिक बोलते हैं की उस समय कृष्ण की उम्र - 7 वर्ष थी - तो भाई आप मुझे एक बात बताओ - 7 वर्ष की आयु में "रमण" किस प्रकार हो सकता है ?? दूसरा चलो यदि मान भी लू तो बताओ भाई की जो "महाबली मुर दैत्य" को यमलोक भेजा - तो क्या 7 वर्ष का बालक ऐसा कर सकता है - दोनों ही बातो से स्पष्ट है की कृष्ण जी की उम्र यौवन अवस्था की थी -
4. पुराणो में क़ुरानी बहिश्त का नजारा - जी हां - थोड़ा ध्यान से पढ़िए - कृष्ण जन्म खंड - अध्याय 112 में "महाबली मुर दैत्य" को मारने का एक विवरण मिलता है - वहाँ कृष्ण ने देखा की "16000" स्त्रीया जिनकी आयु 100 वर्ष थी पर वो नव-यौवना थी - यानि की पूर्ण युवा थी - उनपर उम्र का कोई असर नहीं हुआ था - तो कृष्ण जी ने उन सबसे विवाह कर लिया और रमण (सेक्स) कर संतान भी उत्पन्न की - वो भी हर स्त्री से 10 लड़के और एक कन्या - तो भाई जरा हिसाब लगावो की कृष्ण की कुल संतानो की संख्या कितनी हुई ????
5. मुझे कोई पौरणिक विद्वान ये भी कृपया समझाने की चेष्टा करे की मुर दैत्य को क्यों मारा गया - क्योंकि ये स्पष्ट नहीं है की किस कारण इस बेचारे दैत्य को मारा - कही उसकी "16000" स्त्रियों के लालच में तो नहीं ?
अब इतना कुछ सुनने के बाद और प्रमाण के तौर पर इमेज है - चेक करे
तो भाई कृष्णा जी - पूर्णतया शुद्धचरित्र - योगी - महाज्ञानी - वेद कर्म करने हारे - वीर - एक पत्नी वाले - अत्यंत ज्ञानी - थे -
में कैसे पुराणिक आधार पर - लम्पट - कपटी - दोषी - या यु कहु की भाई मेरे पास शब्द नहीं - में कृष्ण को गलत नहीं बोल सकता - पर पुराणो के आधार पर चरित्रहीन भी नहीं मान सकता -
पौराणिक कृष्ण और महाभारत के कृष्ण - दोनों के चरित्र का अध्ययन करे तब किसी निर्णय पर पहुंचे - पर चिंतन - पूर्वाग्रह और दुराग्रह से न करके - शुद्ध बुद्धि से करे - हठ को त्याग दे - सत्य को अपना ले।
नमस्ते

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आगे के संसार भर के पौराणिक विद्वानों से 31 प्रश्न का प्रसार-

प्रश्न-22-शिवपुराण में बहुत से द्रष्टान्त देकर लिखा है कि-
    (1) "जितने भी ऋषि, मुनि व देवता शिव के भक्त होने के कारण,  शिव की माया के प्रभाव में आये वे  सभी महाव्यभिचारी बन गए। "
    (2) "दारुबन में अपने भक्तो की स्त्रियों के साथ शिवजी ने व्यभिचार किया।"
    (3) "महानंदा वैश्या, जो शिवजी की भक्तिन थी उससे शिवजी ने फ़ीस देकर वेश्यागमन किया।"
 इन सब बातों को जानते हुए भी लोग शिवजी के भक्त बनकर लिंग(मूत्रेन्द्रिय) को पूजते है तो क्या इसका अर्थ यह नहीं है कि वे लोग शिव माया के प्रभाव में आकर व्यभिचारी बनना चाहते है अथवा वे लिंगोपसक होने से अपने को व्यभिचारी घोषित करते है? शिवपुराण में आखिर शिवमाया के व्यभिचार वाले प्रचार प्रकरण को अत्याधिक महत्व एवं विशेष प्रभाव के साथ उसको वर्णन करने का आखिर क्या तात्पर्य है? (शिवपुराण उमासंहिता अध्याय 4)

प्रश्न-23-ब्रह्मा, विष्णु व महादेव ये तीनो एक दुसरे के बाप होने का दावा करते है। ऐसा पुराणों में वर्णित है, तब आप बतावें कि वास्तव में इन तीनो में " बाप" बनने का किसका दावा सच्चा है और क्यों?

प्रश्न-24- पद्मपुराण में न्याय, वैशेषिक एवं सांख्य दर्शन तथा मतस्य, कूर्म, लिंग, शिव, स्कन्द व अग्निपुराण में इनको नरक में ले जाने वाले "तामस शास्त्र" के रूप में बताया गया है। कृपया हेतु व प्रमाणो से पुराण के इस दावे को सत्य सिद्ध करें। (पद्मपुराण खण्ड, अध्याय 236 कलकत्ता द्वारा प्रकाशित)

प्रश्न-25- जबकि शिवपुराण "तामस" व "नर्क" में ले जाने वाला पुराण है और शिवजी भी उसी के अनुसार व्यभिचार के प्रचारक देवता होने से भक्तो को नरक में ले जाने वाले है तो फिर ऐसे तामसी देवता की बहिष्कार की व्यवस्था सनातनी विद्वान् क्यों नहीं करते है?

प्रश्न-26- महाभारत में लिखा है कि - "नारायण ऋषि ने अपने सिर में से एक सफ़ेद व एक काला बाल उखाड़ कर फेंक दिया, सफ़ेद बाल "रोहणी" के गर्भाशय में गया जिससे "बलराम" बनकर प्रकट हुआ था तथा काला बाल "देवकी" के गर्भ में प्रविष्ट होकर "कृष्ण" के रूप में प्रकट हुआ। तो नारायण ऋषि के सिर के काले बाल वाले अवतार "श्री कृष्ण जी" को ईश्वर का अवतार कैसे माना जा सकता है? ( महाभारत आदिपर्व अध्याय 196)

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संसार के पौराणिक विद्वानों से 31 प्रश्न-आचार्य डॉ श्रीराम आर्य

हम अपने पौराणिक विद्वानों से कुछ प्रश्न चिरकाल से करते चले आ रहे है, जिनका उत्तर हमें आज तक प्राप्त नहीं हुआ। सभी प्रश्नों के साथ उनके स्थलों को भी दर्शाया गया है। गत चालीस वर्षो से हम आशा लगाये बैठे है कि पौराणिक समुदाय का आखिर कोई विद्वान् तो इनका उत्तर देगा ही!

प्रश्न-1-देवीभागवत पुराण में पुराण बनाने वाले को "धूर्त" क्यों बताया गया है?, तथा यदि व्यास जी ने पुराण बनाये तो उनमे तीनो देवो (1)ब्रह्मा, (2) विष्णु, (3) महादेव की 'निंदा' क्यों की गयी है? देखिये-(देवीभागवत पुराण स्कन्द 5, अध्याय 19, श्लोक 12)

प्रश्न-2-पुराणो में शिवजी के उपनाम "महालिंग", "चारुलिंग", "लिंगाध्यक्ष", "कामुकी", "शिखण्डी" व "धूर्त" क्यों दिए गए है? इन नामो से शिवजी की "प्रशंसा" होती है या "निंदा"? (शिवपुराण भाषा टीका)

प्रश्न-3-मतस्यपुराण में शिवजी द्वारा दैत्य पुत्र आडि से सम्भोग करके उसे मारने की कथा दी हुई है। शिवजी ने "आडि" लड़के के साथ "अप्राकृतिक दुष्कर्म" करके ही उसे मारने की विधि क्यों स्वीकार की? कोई ऐसा अन्य तरीका जैसे गला घोटकर मारने आदि का रास्ता क्यों नहीं अपनाया था? क्या आप भी हमारी तरह यह मानने को तैयार है कि पुराणों में मिथ्या कथाओं के द्वारा शिवजी को कलंकित किया गया है? (मतस्यपुराण, अध्याय 155)

प्रश्न-4-सती व पार्वती के विवाह कराते समय ब्रह्मा जी पुरोहित बने थे। दोनों ही विवाहों में सती व् पार्वती को देख कर ब्रह्मा का शुक्रपात होना तथा उस नीचे गिरे हुए वीर्य को छिपाने के लिए पैरो से मल देना व शिश्नेन्द्रिय का मर्दन करना, उसे टांगो में छिपा लेना आदि कर्म क्या ब्रह्मा जी को "चरित्रहीन" व "प्रमेह का रोगी" सिद्ध नहीं करते है? ये गन्दी कथाये शिवपुराण में क्यों दी गई है? (शिवपुराण, पार्वती खण्ड 49 व् सती खण्ड अध्याय 20)

प्रश्न-5-सती तुलसी व वृन्दा से छल करके काला मुंह (बलात्कार) करना पाताल में जाकर दैत्य नारियों से व्यभिचार करना तथा देवताओं को भी वहां जाकर उनसे व्यभिचार के लिए प्रोत्साहित करना, क्या इससे विष्णु का " चरित्र भ्रष्ट" होना सिद्ध नहीं है? ऐसे दुर्बल चरित्र वाले व्यक्ति को क्यों "ईश्वर" मानकर पूजना चाहिए? क्या यही असली विष्णु का चरित्र शिवपुराण में है? (शिवपुराण रुद्रसंहिता, संयुक्तखंड 4 अध्याय 40 व 41 तथा शतरूद्रसंहिता अध्याय 22व 23)

प्रश्न-6-श्रीमद्भागवत पुराण में मूर्ति आदि प्रकृतिजन्य पदार्थो के पूजने वालो को "गधा" बताया गया है। तब ऐसा गलत कार्य करके किसी को भी "विद्वानों में गधा" क्यों बनना चाहिए? (श्रीमद्भागवत पुराण स्कन्द 10 अध्याय 184 श्लोक 13)

प्रश्न-7-महाभागवत पुराण में स्वयं शंकर जी का राधा तथा पार्वती जी का "कृष्णावतार" धारण करना बताया गया है। तब पार्वती के अवतार "श्रीकृष्ण" को विष्णु या ईश्वर का अवतार कैसे माना जा सकता है? (महाभागवत पुराण, खण्ड 9 अध्याय 49)

प्रश्न-8-जब ब्रह्मा, विष्णु व महादेव तीनो ईश्वर है तो शंकर ने विष्णु के " वराह अवतार" को मानकर उसका दांत तोडना, कूर्म अवतार की खोपड़ी उखाड़ना, नृसिंह अवतार का सर काटना आदि कुकर्म करके विष्णु की दुर्गति क्यों की? जिनकी इस प्रकार दुर्गति हो, वह "अवतार" कैसे माने जा सकता है? (लिंग पुराण, पूर्वार्ध अध्याय 93)

प्रश्न-9-केदारकल्प पुराण में शिव का वीर्य पीने से शिव भक्तो को शिवलोक की प्राप्ति तथा वहा भोगने के लिए अछूती सुंदरी, शिव कन्याएं मिलने की बात लिखी है। तब शिवलोक व मुसलमानों के बहिश्त में क्या केवल इतना ही अंतर नहीं है कि बहिश्त में हूरों के साथ साथ भोगने को लौंडे (गिलमें) और साथ में मिलते है। बताएं कि कुरान ने पुराण की नक़ल की है या पुराण ने कुरान की नक़ल की है? तथा आप सनातनियों के लिए दोनों में कौन सा स्थान उपयुक्त रहेगा? (केदारकल्प पुराण पृष्ठ 5-6-9 व 10)

प्रश्न-10-कलयुगी पौराणिक विद्वानों को देवीभागवत पुराण में राक्षसों को "अवतार" बताकर निंदा क्यों की है? पुराण की उक्त व्यवस्था को गलत कैसे माना जा सकता है जबकि पुराणोक्त सम्पूर्ण लक्षण उनमे मिलते है! (देवीभागवत पुराण स्कन्द 3 अध्याय 11)

प्रश्न-11-सौरपुराण में लिखा है कि- "दारुबन में मुनियों की अनुपस्थिति में शिवाजी स्वयं नंग-धडंग तथा विष्णु को सुंदरी (औरत) बनाकर साथ लेकर गए। शिव ने माया फैलाई तो ऋषियों की औरते नंगी और कामातुर होकर शिवजी से जा लिपटी और ऋषियों के नौजवान लड़के काम से व्याकुल होकर परम सुन्दरी औरतों को देखकर विष्णु से जाकर भीड़ गए। इस व्यभिचार को ऋषियों ने शाप देकर शिव को लिंगहीन कर दिया।" तब बतावे कि क्या शिवाजी व विष्णु का यह चरित्र सनातन धर्म के अनुकूल आचरण था? परनारियो को भ्रष्ट करने वाले ऐसे देवताओं की "पूजा करने की जगह उन्हें जूते मारने का विधान" क्यों नहीं किया गया है? (सौरपुराण अध्याय 12)

प्रश्न-12-देवीभागवतपुराण में बृहस्पती, इंद्र, चन्द्र, ब्रह्मा आदि सभी देवताओ को तथा पौराणिक मुनियों को- "मिथ्यावादी", "कामी", "क्रोधी", "मोही", "रोगी", "पापकर्मी" तथा "परनारियो के लम्पट" एवं "छल करने में दक्ष" घोषित किया है। यही लक्षण राक्षसों के होते है,तब  बतावे कि-पौराणिक देवताओ और राक्षसों में और किन-किन गुणों में विरोध बाकी है? (देवी भागवत स्कन्द 4 अध्याय 13)

प्रश्न-13-शिवलिंग शिवजी की मूत्रेन्द्रिय एवं जलहरी पार्वती के गुप्तांग (योनी) की प्रतिमूर्ति (नकल) है, यह बात सनातनधर्म के प्रमाणिक ग्रंथो के निम्न स्थलों से प्रमाणित होती है देखिये-
    (क) भविष्यपुराण में अनसूया से व्यभिचार चेष्टा व शिव को लिंग पूजा का शाप लगना। (भविष्य पुराण प्रतिसर्ग खण्ड 4 अध्याय 17)
    (ख) दारुबन में शिवलिंग का काटना व तभी से लिंग पूजा का आरम्भ होना। (शिवपुराण कोटिरूद्रसंहिता अध्याय 12 व कूर्म पुराण उत्तरार्ध अध्याय 38,39)
    (ग) (भाषा शिवपुराण, नवलकिशोर प्रेस लखनऊ द्वारा प्रकाशित खण्ड 8 व अध्याय 16 पृष्ठ 737 से 750 तक)
    (घ) ( महाभारत, अनुज्ञानपर्व अध्याय 14 व अध्याय 161)
    (ड़) (शिवपुराण, विन्ध्येश्वर संस्करण अध्याय 15 श्लोक 104, 105, 108)
    (च) शब्द्कल्प्मुद्रमकोष में "लिंग" शब्द की व्याख्या करते हुए नाभियुक्त शिवलिंग पूजने का विधान मौजूद है।
    (छ) ( शब्द्कल्प्मुद्रमकोष चतुर्थ काण्ड पृष्ठ 220) में "लिंग" शब्द की व्याख्या करते हुए शिव व सती के रमण का वर्णन तथा रमण के अंत में सती के रज और शिव के वीर्य का पतन एवं उससे शिवलिंगो की पैदाइश का होना?
    (ज) ब्रह्मपुराण में ( शब्द्कल्प्मुद्रमकोष चतुर्थ काण्ड पृष्ठ 222) में भृगु का शाप देना लिखा है कि - "शिव का स्वरुप "योनिलिंग" होगा।" इस प्रकार की कथा सविस्तार मौजूद है। (ब्रह्मपुराण उत्तरखण्ड अध्याय 255 कलकत्ता द्वारा प्रकाषित)
     ऐसी दशा में प्रश्न यह है कि शिवजी का सिर, पेट या पैरों को छोड़कर उनकी मूत्रेन्द्रिय को "शिवलिंग" एवं "जलहरी" को पार्वती के गुप्तांगो की नकल बनाकर पूजने का हो विधान सनातनधर्म में क्यों जारी किया गया है? यह भी बतावे कि शिवजी के शरीर में लिंग के अतिरिक्त अन्य भी कोई अंग था या नहीं? अथवा क्या शिवजी केवल लिंग रूपी आकार के ही थे? जो उनकी सर्वत्र "शिवलिंग" के ही रूप में पूजा की जाती है।

प्रश्न-14-पद्मपुराण में सनातनी यजमान का कर्त्तव्य बताया गया है कि -"मृतक श्राद्ध में अपने मरे हुए बाप दादों के सिर की हड्डी पीस कर दूध के साथ श्राद्धभोजी पंडित को प्रेम के साथ पिलाये"। जबकि चिकित्सा चक्रवर्ती ग्रन्थ के पृष्ठ 162 पर लिखा है कि-"सिर की हड्डी दूध में पिलाने से स्त्री को गर्भाधान हो जाता है"। तब बताये कि पंडित जी को हड्डी पिलाने का उद्देश्य भी क्या उनके "गर्भाधान" कराना है और क्या ये संभव है? यजमान कइ यह नौकरी एक्क्षिक होती है या श्राद्ध में पंडित जी की ये सेवा करना उनका अनिवार्य कर्म होता है? यह भी बताने की कृपा करें? (पद्म पुराण सृष्टि खंड, अध्याय 10)

प्रश्न-15-भविष्यपुराण तथा पद्मपुराण में विधान किया गया है कि - ""रण्डियो" (वैश्याओ) को चाहिए कि रविवार के दिन पुराण जानने वाले पंडित जी को घर पर बुला कर उसके साथ बिना परितोषिक "रतिदान" (सम्भोग) किया करें, तो उनको विष्णुलोक की प्राप्ति होगी।" यह तो रण्डियो का सौभाग्य है कि - सनातनी विद्वान् उनसे विशेष प्रेम करते है। इतना और स्पष्ट कर दिया जावें कि रण्डियो के उद्धार का यह नुस्खा कितनी उम्र तक की रण्डियो पर लागू होता है? वास्तव में इस तरीके से रण्डियो को "विष्णुलोक" मिलेगा, अथवा पौराणिक पंडितो को मुफ्त तफरीह (मौज मस्ती) कराने एवं रण्डियो की रात भर की पसीने की कमाई पर हाथ साफ़ कराने के लिए पुराणकार ने यह व्यवस्था की है? यह स्पष्ट नहीं है, कृपया इसका उल्लेख भी अवश्य करें। (भविष्यपुराण उत्तर्पर्व, अध्याय 111 तथा पद्मपुराण सृष्टिखंड अध्याय 20)

प्रश्न-16-भविष्य पुराण के अनुसार मूर्तिपूजा करने का विधान चारो युग मइ केवल द्वापर युग  क्र लिए ही विहित था। तो कल्यिग मै उसका क्रम जारी रखना पुराण के विरुद्ध होने से पापकर्म हुआ। पुराण की यह व्यवस्था पौराणिक पंडितो को क्यों माननीय है? (भविष्यपुराण प्रतिसर्ग 22 श्लोक 11 व 12)

प्रश्न-17-ईसा, मूसा, नूह, अकबर, बाबर, हुमायू, कबीरदास, रैदास, नादिरशाह, तैमूरलंग, तुलसीदास, सूरदास, शिवाजी एवं अंग्रेजो का भारत में आना और उनका शासन करना तथा 10 वे लार्ड तक का एतिहासिक वर्णन जब पुराणों में भरा पड़ा है तो पुराणों के महाभारत कालीन व्यास ऋषि कृत बनाना, कोरा पाखंड नहीं है तो और क्या है?, क्या वेदव्यास जी भारत में अंग्रेजी शासन के अंतर्गत ही पैदा हुए थे? (भविष्यपुराण प्रतिसर्ग खण्ड 6, अध्याय 2, तथा खण्ड 4 अध्याय 17 व 22)

प्रश्न-18-जब ब्रह्मा, विष्णु और महादेव पुराणो के अनुसार  चरित्रो की दृष्टि से स्वच्छ नहीं है और अपनी-अपनी मनोकामनाओ की पूर्ति के लिए बड़े बड़े युद्ध व तप करते रहते है, तो उनकी पूजा व उपासना छोड़कर पौराणिको को भी क्यों नहीं उसी एक जगदाधार,परब्रह्म परमेश्वर का ध्यान करना चाहिए जो सारे विश्व के प्राणियों के इन फर्जी देवताओ की उत्पत्ति व पालनकर्ता तथा सबकी मनोकामनाओ की पूर्ति करता है? क्या इन चरित्रहीन देवताओ को पूजने से भक्त भी वैसे ही नअही बनेंगे? इसमें क्या गारंटी है?

प्रश्न-19-राम के सरयू नदी में डूबने से, कृष्ण के पैर में बहेलिया के द्वारा बाण मारने से, नृसिंह जी का शंकर जी द्वारा सिर काटा जाना एवं उनकी खाल उतारने से नृसिंह जी का प्राणान्त हुआ था। क्या अवतारों का अंत इसी प्रकार होता है? और क्या जिनका अंत इसी प्रकार होता है वे भी अवतार मने जाने योग्य है?

प्रश्न-20-रामावतार के निम्न मुख्य कारण पुराण में दिए गए है-
(क) सती वृंदा का सतीत्व धोखे से भंग करने पर उसने विष्णु को शाप दिया जिससे "रामावतार" पैदा हुआ। (शिवपुराण रुद्रसंहिता युद्धखंड अध्याय 23)
(ख) नारद के शाप के कारण "रामावतार" पैदा हुआ। (शिवपुराण रुद्रसंहिता अध्याय 4)
(ग) व्यभिचार की अतृप्त वासनाओ की पूर्ति के लिए विष्णु जी " अवतार" लेते है। (धर्मसंहिता अध्याय 10)
(घ) भृगुशाप के कारण " रामावतार' का अवतरण हुआ। (देवी भागवत स्कन्द 3 अध्याय 12)
        इनसे सिद्ध है कि "रामावतार" विष्णु को पापों में लगे शापों का दंड भुगतने के लिए हुआ था, उसका उद्देश्य लोक कल्याण नहीं था। क्या पुराणों के उपरोक्त प्रमाणों को गलत घोषित करके कोई पौराणिक विद्वान् यह सिद्ध कर सकता है कि "रामावतार" स्वेक्क्षा  से लोककल्याण के लिए हुआ था।? स्मरण रखने की बात यह भी है कि-"राम या कृष्ण की स्वेक्क्षा से विष्णु द्वारा अवतार धारण करना" मानने वालो को देवीभागवतपुराण में मुर्ख बताया गया है। (देवीभागवतपुराण स्कन्द 5 अध्याय 1 श्लोक 47 से 50)

प्रश्न-21-पद्मपुराण की एक चटपटी कथा आपको बताते है। शिवजी ने एक बार (देवताओ को) दावत दी, दावत समाप्त होने के बाद एक शिवदूती वहा आई उसने शिवजी से कहा कि "मुझे ऐसा भोजन कराओ जो तिब्बत  में कही न मिलता हो" शिवजी ने कहा " तुम मेरी उपस्थेन्द्रिय सहित दोनों वृषण (अंडकोश) खा लो, तो तुम्हारी तृप्ति हो जाएगी"। अब यहाँ प्रश्न यह पैदा होता है कि एक स्त्री को शिश्न (लिंग) व वृषण (अंडकोश) खिलाना क्या सनातनी मर्यादा के अनुकूल कर्म था? जिसका शिवाजी ने पालन किया, अथवा लिंगेन्द्रिय सहित वृषण, स्त्रियों को खिलाने की वर्तमान सनातनी प्रथा के आदि प्रचारक क्या महामहिम गुरुघंटाल शंकर जी ही थे? (पद्मपुराण)

प्रश्न-22-

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प्रश्नोत्तरी ( पौराणिक गप्प खण्डन ) :- 

(1) प्रश्न :- क्या रावण के दस सिर थे ?
उत्तर :- नहीं रावण ४ वेदों और ६ शास्त्रों का विद्वान था । तो जिसके कारण उसको दस दिमाग वाला दशानन कहा जाता था । तो इसी कारण ४+६ = १०, उसको दशानन कहा जाता है । जिसका अर्थ दस सिर कदापी नहीं है ।

(2) प्रश्न :- क्या हनुमान जी बंदर थे ? और उनकी पूँछ भी थी ?
उत्तर :- नहीं वे मनुष्य थे । क्योंकि जिस जाती के वे थे वह वानर जाती कहलाती है । और जैसे भील नामक जाती थी वैसे ही वानर भी थी । वानर का तात्पर्य बंदर कभी नहीं होता है । और पूँछ वाली बात तुलसी कृत रामायण में आती है । वाल्मिक रामायण में ऐसी गप्पें नहीं हैं । आजकल जो TV serial रामायण पर बनते हैं वे भी तुलसी की रामायण के आधार पर बनते हैं । जिसके कारण लोगों के मनों में यह पूँछ वाले हनुमान जी बैठ गये हैं ! अपनी गदा लेकर !! और serial बनाने वालों से पूछना चाहिये कि जिन वानरों को आप Tv में बंदर मुखी दिखाते हो , तो उनकी स्त्रीयों को वैसा क्यों नहीं दिखाते ? क्यों वे मानवी ही होती हैं ? क्यों नहीं उनके भी पूँछ और बंदर का मुख होता ? 

(3) प्रश्न :- क्या महाभारत के कृष्ण की १६००० रानियाँ थीं ?
उत्तर :- नहीं उनकी एक ही रानी थी । जिसका नाम रुकमणी था । ये १६००० वाली बकवास भागवत पुराण जैसे
मिथ्या ग्रन्थ में लिखी हैं । भला १६००० रानियों से सम्भोग करने वाला कृष्ण जीवित कैसे बचता ? नपुंसकता जैसे रोगों से वह शीघ्र ही मर जाता । और मान लें एक रात एक रानी के पास रुकता तो अपनी ३६५ वीं रानी तक पहुँचने में उसको एक वर्ष लग जाता । और एक वर्ष हर दिन सम्भोग करने वाले व्यक्ति का हाल क्या होगा ? जरा सोचें । यह भागवत पुराण मिथ्याचारियों ने अपने पाप छुपाने के लिये कृष्ण पर मिथ्या दोष लगाये हैं । 

(4) प्रश्न :- क्या कृष्ण गोपियों से क्रीड़ा करते थे ? और जब वे तालाब में नहातीं तो वे उनके कपड़े ले भागते थे ?
उत्तर :- नहीं, कृष्ण का जन्म होते ही वह कुछ वर्ष अपनी प्रथम आयु के वहाँ रहे । करीब ६ वर्ष तक वह वृंदावन में खेलते कूदते रहे । और फिर अवनंतिकापुरी में सांदिपनी के गुरुकुल में भेजा गया । तो वह ३० वर्ष की आयु तक विद्या प्राप्त करके वापिस आये और आकर उनको मथुरा में जन संघ की स्थापना करनी थी । कंस का चक्रव्यूह तोड़ कर । तो उसके पश्चात वे कौरवों और पांडवों के झगड़े मिटाने को हस्तिनापुर और विदेह आदि राज्यों के चक्कर काटते रहे । तो यह रास रचाने और कपड़े उठाने का समय उनको कब मिला ? यह झूठी बातें भागवत में लिखी हैं ।

(5) प्रश्न :- क्या ब्रह्मा के चार मुख थे ?
उत्तर :- नहीं , ब्रह्मा का एक ही मुख था । चारों वेदों के प्रकाण्ड विद्वान कहा जाता था , यानी कि चारों ओर से ज्ञानी जिसको चतुर्मुखी कहा जाता था । तो ब्रह्मा एक उपाधी थी । कई ब्रह्मा सृष्टि की आदि से ले कर अब तक हो गये हैं । और उनके एक ही मूँह था ।

(6) प्रश्न :- क्या विष्णु के चार भुजायें थीं ?
उत्तर :- नहीं ! विष्णु नामक कोई काल्पनिक ईश्वर नहीं है , जिसको आप चित्रों में देखते हो । विष्णु निराकार ईश्वर का ही एक नाम है ।

(7) प्रश्न :- क्या गणेश का मूँह हाथी का था ?
उत्तर :- हाथी के बच्चे का मूँह इतना चौड़ा होता है कि उसका भार एक छोटे बच्चे का शरीर कैसे सम्भालेगा ? अरे ! उस हाथी के सिर और मानुष्य के बच्चे का तो व्यास ( Diameter ) ही आपस में मेल नहीं खायेगा ? और जैसा कि शिव पुराण की कथा में आता है कि शिवजी ने क्रोध में गणेश का सिर काट दिया, तो फिर वो हाथी के बच्चे का ही शरीर क्यों ढूंढने दौड़े ? उन्होंने वही अपने पुत्र का मनुष्य का कटा हुआ सिर क्यों नहीं लगाया ? ये सब मिथ्या और अप्रमाणिक बातें हैं ।

(8) प्रश्न :- क्या राम और कृष्ण ईश्वर या ईश्वर के अवतार थे ?
उत्तर :- नहीं ! ईश्वर शरीर में नहीं आता । वह निराकार है । हम जानते हैं कि कोई पदार्थ जब परिवर्तित होता है । तो वह अपनी पहली वाली अवस्था से या तो बेहतर होता है या कम ? तो अगर ईश्वर का अवतार मानें तो क्या वह पहले से बेहतर हुआ ? अगर हाँ तो क्या वह पहले पूर्ण नहीं था ? तो फिर सृष्टि को क्या रचता ? और यदि पहले से उसकी शक्ति कम हुई तो यह भी दोष की बात है । दूसरी बात यह है कि ईश्वर निराकार है और अनन्त शक्ति वाला । पर मनुष्य सीमित शक्ति वाला है । अवतार केवल जीवों का होता है जिसके पुनर्जन्म कहते हैं । ईश्वर का अवतार कभी नहीं होता ।

(9) प्रश्न :- क्या चतुर्भुज विषणु भगवान युग युग में अवतार लेते हैं ? 
उत्तर :- अगर पंडों के गणित को मानें तो सत्युग में पाप नहीं होता, तो त्रेता, द्वापर और कलियुग आते आते पाप बढ़ता जाता है । लेकिन आपके अवतार क्यों कम होते जाते हैं ? 
सत्युग में मोहिनी, मत्सय, कुर्म, वराह अवतार हुए हैं ।
त्रेतायुग में वामन, राम, परशुराम ।
द्वापरयुग में कृष्ण, कपिल, वशिष्ट ।
कलियुग में बुद्ध और कल्कि । 

होना तो यह चाहिए था कि ये अवतार कलियुग आते आते यह अवतार बढ़ने चाहिए थे । पर ये यहाँ पौराणिकों की उल्टी गंगा कैसे बह रही है भाई ?? ये तो सरासर ही मूर्खता है । 

(10) प्रश्न :- क्या शिवलिंग की पूजा से महादेव प्रसन्न होते हैं ?
उत्तर :- नहीं, लिंग पूजा करना महाव्याभिचार है । भला कभी किसी पुरुष के लिंग या स्त्री की योनी की पूजा करना कोई धर्मयुक्त कार्य हो सकता है ? ये लिंग पूजा वाममार्गीयों का चलाया हुआ नीच कर्मकाण्ड है । इसका धर्म से दूर दूर तक कोई लेना देना नहीं है । ये जो बारह ज्योतिर्लिंगों की महिमा गा गाकर लिंग पूजा करने का व्यर्थ ही प्रचार किया जा रहा है सो उप्युक्त नहीं है । जिसके कारण धार्मिक व्याभिचार फैल रहा है । इससे कैलाश पति शिव की निंदा होती है । क्योंकि शिवजी महायोगी थे जो किसी समय कैलाश पर निवास करते थे । और उन्होंने योग शास्त्र की रचना भी जो इस समय उपलब्ध नहीं है । इस समय केवल महर्षि पतंजली का ही योग शास्त्र मिलता है । क्योंकि लिंग पर जो पदार्थ लोगों द्वारा अरपण किए जाते हैं वे सब वहाँ के पंडों के पास जाते हैं और वो सब पंडे ऐश करते हैं । 

ओ३म् तत् सत् ।।

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