स्वामी जी तिवारी के नहीं बल्कि द्विवेदी के पुत्र थे ???
सत्यार्थ प्रकाश चतुर्थ संमुल्लास स्वामी जी लिखते हैं
प्रोषितो धर्मकार्याथ प्रतिक्षयोष्टौ नरः समाः ।।
विद्यार्थ षड्यशसोर्थ वा कामार्थत्रीस्तुवत्सरान् ।। ( मनुस्मृति - ९/७६ )
" हे स्त्री । यदि पुरुष् धर्म कार्य के उद्देश्य से परदेश गया है तो 8 वर्ष , विद्या या कीर्ति के लिए गया है तो 6 वर्ष , और धन इत्यादि कमाने गया है तो 3 वर्ष उसकी राह देखे । उसके पश्चात नियोग करके संतान उत्त्पत्ति कर ले ।
जब विवाहित पति आवे तब नियुक्त पुरुष छूट जावे ।।
_________________________________
जबकि मनुस्मृति मे लिखा है ।
"पति के धर्मकार्य , विद्या-यश प्राप्ति तथा व्यापार के लिए विदेश जाने पर पत्नी को क्रमशः आठ , छह और तीन वर्षो तक उसकी प्रतीक्षा करनी चाहिए"
इस मंत्र मे कही भी नियोग की कोई बात नही लिखी है ।।
खेर इसकी बात भी अभी करेंगे उससे पहले स्वामी जी का दुसरा मंत्र भी देख लेते है ।
आगे लिखते हैं..
वन्ध्याष्टमेधिवेद्याब्दे दशमे तु मृतप्रजा ।
एकादशे स्त्री जननी सद्यस्त्वप्रियवादिनि ।। ( मनुस्मृति - ९/८१ )
स्वामी जी इसका अर्थ लिखते है
"वैसे ही पुरुष के लिए भी नियम है , जब विवाह के आठ वर्ष तक स्त्री को गर्भ ही ना रहे , वन्ध्या हो तो आठवे , संतान हो कर मर जावे तो दशवे , जब जब हो तब तब कन्या , पुत्र न होवे तो ग्यारहवे और जो स्त्री अप्रिय बोलने वाली हो तो तुरंत उसको छोड़ कर किसी दूसरी स्त्री से नियोग करके संतानोतपत्ति कर लेवे "
_________________________________
जबकि मनुस्मृति मे लिखा है ।
"पत्नी के वन्ध्या, मृतक बच्चों को जन्म देने वाली तथा बार बार कन्या को ही जन्म देने वाली होने पर पति को क्रमशः आठवे, दसवे और ग्यारहवे वर्ष मे दूसरा विवाह करने का अधिकार है। स्त्री के कटुभाषिणी होने पर पुरुष उसी समय दूसरा विवाह कर सकता है"
_________________________________
अब प्रश्न ये उठता है कि जब इन श्लोकों में कही भी नियोग शब्द की गंध तक नहीं है तो फिर स्वामी जी ने इसे नियोग से क्यों जोडा ??
उत्तर : दरअसल इसका जवाब स्वामी जी के अतित से जुड़ा हुआ है जब स्वामी जी इन श्लोकों का भाष्य कर रहे थे तो इन श्लोकों को पढ स्वामी जी थोड़ा भावुक हो गए भावनाओं में ऐसे बहे की स्वामी जी को याद ही नहीं रहा कि वो क्या लिख रहे हैं ??
ये बात है २३ अक्तूबर १८२२ की जब स्वामी जी के पिताजी जी करशनजी लालजी तिवारी धन कमाने ३ वर्ष के लिए विदेश चले गए अब स्वामी जी की माता का घर पर अकेले मन नहीं लगता था खाली घर मानों काटने को दोडता था तब स्वामी जी की माता यशोदाबाई ने गर्भधारण करने का निश्चय किया तत्पश्चात स्वामी जी की माता यशोदाबाई ने
सोमः प्रथमो विविदे गन्धर्वो विविद उत्तरः ।
तृतीयो अग्निष्टे पतिस्तुरीयस्ते मनुष्यजाः (ऋग्वेद म• १०, सुक्त ८५, म• ४०)
के मंत्र अनुसार जैसा कि स्वामी जी ने एक औरत के ११ पति बताए हैं यशोदाबाई ने अपने पड़ोस के द्विवेदी जी को अपना दूसरा नियोगी पति मान लिया और द्विवेदी जी के सामने अपनी पुत्रप्राप्ति की इच्छा रखी द्विवेदी जी ने भी यशोदाबाई को निराश नही किया फिर उसके बाद यशोदाबाई ने द्विवेदी जी के साथ नियोग कर स्वामी नियोगानंद जी को उत्पन्न किया ।
फिर जैसा कि स्वामी जी ने आगे लिखा है कि जब विवाहित पति आवे तब नियुक्त पुरुष छूट जावे ।
इसलिए जब करशनजी लालजी तिवारी विदेश से धन कमाकर लौटे तो यशोदाबाई ने स्वामी जी के नियोगी पिता द्विवेदी जी को छोड़ करशनजी को अपना पति स्वीकार कर लिया ।
अब मेरे जिस किसी भी नियोग समाजी मित्र को मेरी बात पर यदि अंश मात्र भी संदेह हो वो तत्काल स्वामी जी और द्विवेदी जी का DNA Match करवा के देख लें कि स्वामी जी द्विवेदी जी के पुत्र है या नहीं तुरन्त दुध का दुध और पानी का पानी हो जाएगा
और साथ में इस बात की भी जांच पड़ताल कर लें कि स्वामी जी के जन्म के समय करशनजी लालजी तिवारी राजकोट में थे भी या नहीं
और यदि किसी नियोग समाजी को मेरी भाषा अश्लील लग रही हो तो वो इस बात पर भी गौर करें कि मैंने सिर्फ वही लिखा है जो स्वामी जी का भाष्य कहता है अब यदि स्वामी जी का भाष्य ही अश्लील है लिखने मात्र से ही बुरा लग रहा है तो इसमें मैं क्या कर सकता हूँ ??
मैंने तो फिर भी अपनी तरफ से सत्य ही बताया है सबको
स्वयं सोचकर देखें क्या स्वामी जी का ये भाष्य व्यवहार में उतारने उतारने लायक है क्या ??
No comments:
Post a Comment