Thursday, 25 March 2021

गुदेंद्रियों

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सत्यार्थ प्रकाश द्वितीय समुल्लास में स्वामी दयानंद जी यह शिक्षा माता द्वारा पुत्र को देने के लिए कह रहे हैं। धन्य हो स्वामी जी! 

पर लज्जा तो स्त्रियों का आभूषण होता है और जब माता अपने पुत्र को ऐसी शिक्षा देगी तो लज्जा को तो एक कोने में रख देगी।

हो सकता है स्वामी जी ने सोचा हो कि भला हम कहां तक ये बातें बालकों को समझाते फिरेंगे, इसीलिए यह शिक्षा देने का भार भी स्त्रियों के ही सर डाल दिया जाए। 

अद्भुत स्वामी जी। धन्य हो!



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जिन नवीन-आर्यसमाजियों का उद्देश्य सनातन धर्म ग्रंथों के उदाहरणों को गलत-संदर्भ में प्रस्तुत करते हुए- सनातनधर्मियों को अपमानित करना व उन्हें नीचा दिखाना, धर्म विरोधीयों की सहायता करना आदि हैं, उनके लिए सप्रेम --------------
दयानंद यजु:भाष्य
पूषणम् ............ पायुना कृश्माच्छपिंण्डै: ,
स्वामी दयानंद इस मंत्र का अर्थ करते हुए लिखते हैं ---
"हे मनुष्यों, तुम मांगने से पुष्टि करने वालों को स्थूल गुदेंद्रियों के साथ वर्तमान, अंधे सर्पों को गुदेंद्रियों के साथ वर्तमान विशेष कुटिल सर्पों को आंतों से, जलों को नाभि के नीचे के भाग से, अंडकोष को आंडों से, घोडे के लिंग और वीर्य से संतान को, पित्त से भोजनों को, पेट के अंगो को गुदेंद्रिय और शक्तियों से शिखावटों को निरंतर लेओं "
प्रश्न १• नवीन-आर्यसमाजियों को स्वामी जी द्वारा किए गए कई मंत्रो के ऐसे अर्थ अश्लील क्यों नहीं लगते ? और यदि यही शब्द या ऐसे अर्थ इन्हें अन्य सनातनी धर्म ग्रथों मे दिख जाते हैं तो ये सनातनधर्मियों और उनके शास्त्रकारों को -- धूर्त, निशाचर, पाखंडी, नीच और न जाने कितनी गालियाँ देते हैं .
नवीन आर्य समाजी हमें बस ये बताए कि दयानंद के इन भाष्यों के बारे में उनकी क्या राय है ??
प्रश्न २• नवीन आर्यसमाजी बताए कि अंधे सर्पों को गुदा में घुसाने और कुटिल सर्पों को आंतों से लेने की आज्ञा क्या ईश्वर ने दी हैं ?
यदि दी है तो समाजी दिन में ये कितनी बार लेते हैं ?
प्रश्न ३• नवीन आर्य समाजी अंधे कुटिल सर्पों और अश्व के लिंग को गुदा व आंतों में निरंतर लेते रहने के पीछे का विज्ञान समझाए .
प्रश्न ४• गुदा व आंतों में अंधे और कुटिल सर्पों एवं अश्व के लिंग को निरंतर लेते रहने की विशेष युक्ति (तरकीब) का खुलासा करें । क्योकि नवीन आर्यसमाजियों के सर्पों के साथ इस कृत्य की कल्पना करके भी , हमारी समझ से तो बाहर हैं कि सर्पों को ये किस युक्ति से प्रवेश देते होंगें ?
प्रश्न ५• सर्पों को गुदेंद्रिय में लेने की आवश्यकता क्या हैं ? गुदेंद्रिय आनंद ही अगर अपेक्षित हैं, तो सर्प के समान आकार वाली अन्य वस्तुओं का विकल्प भी तो है न आपके लिए ? और यदि लेते समय साँप घबराकर आपको अंदर या बाहर से काट लें, तो वैद्य के पास जाकर क्या कहोगें अभागों ?,
प्रश्न ६• और अंधा सर्प ही क्यो ? आँख वाले सर्पों से क्या गुदेंद्रियों को नजर लगने का भय हैं ??
प्रश्न ७• अर्थ मे आता हैं कि - "अंडकोष को आंडों से निरंतर लेओं " अब नवीन आर्यसमाजी पहले तो अंडकोष और आंडों के बीच का अंतर बताए, और फिर ये बताए कि अंडकोष से आडों को किस प्रकार लिया जा सकता हैं ?
अब कोई अनार्य समाजी ये न कहें कि इसका मतलब ये नहीं है, वो नहीं हैं, फलाना हैं, तो ढिमाका हैं ... क्योकि यही बात जब हम आप लोगों को समझाते हैं तो बुद्धि और विवेक को एक तरफ रखकर आप लोग केवल शब्दों को ही पकड़ के बैठे रहते हो.
तो मेरे नवीन समाजी भाईयों आगे बढ़ें और दयानंद की थुत पर चार जूते 👞 मारकर दयानंद द्वारा किए गए इन अश्लील भाष्यों का विरोध करें

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