(वैदिक ईशवर) आज्ञा देता हूं, की तू मन, कर्म और शरीर से व्यभिचार कभी मत करो, किंतु धर्मपूर्वक विवाह और नियाग से संतानउतपन्न करते रहो।( वाह क्या ज्ञान है।)
* यह नियोग शिषट पुरुषों कि सम्मति और दोनों की प्रसन्नता से हो सकता है।( दोनों की मर्जी से जीना जायज़ हो गया इंदुइसम में वाह क्या बात है । )
* हे स्त्री ! अपने मूर्तक पति को छोड़ के इस जीवनलोक मे जो तेरी इच्छा हो,तो दूसरे पुरुषों के साथ नियोग करके संतानों प्रप्त कर।
* वैदिक ईशवर मनुष्यों को आज्ञा देता है, की हे इंद्र पते ! तू इस स्त्री को वीर्यदान दे (समझदार को इशारा काफी है।)के सुपुत्र और सौ भाग्ययुक्त कर। पुरुष के प्रति वेद की यह आज्ञा है कि इस विवाहित वा नियोजित स्त्री में 10 बच्चे उत्पन्न कर । अधिक नही (तो क्या ? पूरी फ़ौज पैदा करुंगे बस 10 काफी है ) और हे स्त्री ! तू नियोग 11 पति तक कर अर्थात एक तो उसमे प्रथम विवाहित पति है और 10 प्रयत्न पति कर कर अधिक नही। (तो क्या पुरो के साथ नियोग करुंगे क्या।)
* बड़े-बड़े वीर पुरूष को उतपन्न कर।
( नियोग से कई बड़े-बड़े माह पुरूष पैदा हुए है जिसमे से कुछ नाम आप भी जानते होंगे कर्ण, परशुराम इत्यादि ) तो देवर की कामना करने वाली है, तो तेरा पति विवाहित पति ने राहे या वह रोगी हो या नपुंसक हो जाये तब दूसरे पति के साथ नियोग के जरिये संतान उत्पन्न कर। (वहा पति बीमार पढा है और पत्नी देवर के साथ मजे ले बहुत खूब)
* देवर की परिभाषा वेदो मे
* जैसे विधवा स्त्री देवर के साथ संतानोत्पत्ति करती है वैसे तुम भी करो। (यहा पर ऐसी घटिया शिक्षा दी जा रही है) विधवा का दूसरा पति होता है उसको देवर कहते है।(मतलब वहा पर उसका पति मरा नही की उस स्त्री पर देवर का हक़ हो जाता है वह कितनी अच्छी शिक्षा है।
* हे स्त्री जीवित पति को लक्षय करके उठ खड़ी हो(यहा पर देवर,पंडित,ऋषि मुनि, इत्यदि की बात हो रही है।)मर्त्य इस पति के पास क्यों पड़ी है, आ हाथ ग्रहण करने वाले नियुक्त इस पति के साथ संतान जनने को लक्षय में रखकर संबंध कर।(नियोग कर) ( ऋग्वेद 10:18:8)
* ऋग्वेद 10:10 में भी पूरा नियोग का बयान है।
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नियोग क्या है ?
* आखिर नियोग क्या है ? ये बात पहले बता चुके है फिर भी संक्षेप परिभाषा समझना चाहते हो इतना ही काफी है कोई विधवा स्त्री संतान ( बच्चे ) की चाह रखती है तो वो अपने मरे हुए पति के छोटे भाई या बड़े भाई , किसी ब्रह्मण , साधु इत्यादि से मुँह काला करके बच्चा पैदा कर सकती है और एक वो जिसका पति नपुंसक हो उसकी औरत भी मुँह काला करा सकती है और साधरण भाषा में समझे तो ब्रह्मणो ने अपनी हवस पूरी करने के लिए ये प्रथा चलाई थी ।
* आज भी चल रही है जिसका उद्धरण आसाराम , रामरहीम और वर्तमान के समय ऐसी घटना सुनते और दीखाई देती है ऐसी नियोग की आज्ञा वैदिक ईश्वर २ पग पर चलने वाला मुर्ख मनुष्य जिसने वेदो को अपनी हवस और दुसरो का शोषण करने के लिए 3000 वर्ष पूर्व गढ़ी थी कुछ मुर्ख इसका पालन करते नजर आते है और उससे भी आसान शब्दों में समझा जाये तो नियोग यानि बलत्कार और वैश्या खाना से कुछ कम नहीं बरहाल आज नियोग की विधि क्या है ? ये जानेगे और नियोग के बारे में जानना चाहते हो तो यहाँ देखे 👉 नियोग एक कलंक अब देखते है आगे ......................................................
नियोग विधि
* हे स्त्री जीवित पति को लक्षय करके उठ खड़ी हो (यहा पर देवर,पंडित,ऋषि मुनि, इत्यदि की बात हो रही है।) मरे हुए पति के पास क्यों पड़ी है, आ हाथ ग्रहण करने वाले नियुक्त इस पति के साथ संतान जनने को लक्षय में रखकर संबंध कर।(नियोग कर) ( ऋग्वेद 10:18:8)
* जैसा कि पाण्डु राजा की स्त्री कुंती और माद्री आदि ने किया और जैसा व्यास जी ने चित्राडद्र और विचित्रवीर्य के मारे जाने के बाद उन अपनी भाइयो की पत्नियों के साथ नियोग करके अम्बिका में धृतराष्ट्र और अम्बालिका में पाण्डु और दासी से विदुर की उत्पत्ति की ये सब नियोग से हुई संतान है इत्यादि बात इतिहास से प्रमाणित है । ( 4 समुल्लास पेज नंबर 110 )
" कालेSदाता पितावाच्यो वाच्यशचानुपयन पतिः। "
* अर्थात : - विवाह की अवस्था ( १६ वर्ष या उसे भी काम )होने पर कन्या का विवाह न करने वाला पिता निंदनीय और दोषी होता है ।
( मनुस्मृति ९ : ४ )
मनुस्मृति 9 : 90
मनुस्मृति 9 : 88
" नियोग के अनुसार उत्पन्न हुआ पुत्र पति का ही होता है ,नियोग में स्त्री के उत्त्पन हुआ पुत्र स्त्री का ही होता
है । ( मनुस्मृति ९ : ३२ ,४९ , ५२ )
अर्थात : -अगर पति नपुंसक है या बीमार है तो अपनी पत्नी को दूसरे मर्द से मुँह काला करा कर बच्चा पैदा करवा सकता है और उस से जो बच्चा पैदा होगा वो असली पति यानि जो नपुंसक या बीमार ता उसका ही बच्चा माना जाएंगा जिसको हम लोगो आज की भाषा में हराम की ओलाद कहते है जिससे कई बड़े बड़े ऋषिमुनि पैदा हुई जो ऊपर सत्यार्थ प्रकाश का प्रमाण दिया गया है उसी प्रकार कोई विधवा अपनी हवस पूरी करके बच्चा पैदा करना चाहती तो वो भी किसी पुरुष के साथ मुँह काला करा के जो बच्चा पैदा होगा वो स्त्री का होगा बच्चा किसी का भी हो यहाँ पर ब्रह्मण और देवर आदि का काम तो हो गया।
* स्त्रियाँ खेती के समान है और पुरुष बीज के
( मनुस्मृति ९ : ३३ )
* अगर कोई विधवा हो और कोई रंडवा हो दोनों में समझौता हो जाये की बच्चा दोनों का होगा तो दोनों का माना जाएंगा ( मनुस्मृति ९ : ५३ )
रात में सैया दिन में भैया
* अब देखे अश्लीलता की हद पार कर दी है रात में नियोग नाम पर व्यभिचार और बलात्कार और दिन में भाभी और बहू ।
देवर की परिभाषा ?
ऋग्वेदादिभाष्यभूमिक नियोग विषय
* नियोग का काम जिससे लिया गया हो और विधवा का दूसरा पति देवर कहलाता है ।
निरुतकम 3 : 15
मनुस्मृति 9 अधयाय
* बड़ा भाई छोटे भाई की स्त्री के साथ और छोटा भाई बड़े भाई की स्त्री के साथ नियोग द्वारा विधिपूर्वक और संभोग करे और नियोग के अलावा अपराधी माना गया है । ( मनुस्मृति 9 : 58 )
* रात में औरतों की अदला बदली करो दिन में देवर भाभी और अपराधी क्या मिथ्या है ।
* नियोग का काम हो जाने के बाद देवर और भाभी , बड़ा भाई पुत्रवधु के समान व्यवहार करें ।
( मनुस्मृति 9 : 62 , 63 )
नियोग में 11पति और 10बच्चे पैदा की आज्ञा
* नियोग में एक स्त्री 11 से काम ले सकती है ।
अगर पति दूसरे देश जाए तो
* अगर पती धर्म के काम से बाहर जाए तो 8 वर्ष तक उसकी प्रतीक्षा करे , और पढ़ने की वजह
( विद्या प्रप्ति ) के लिए बाहर गया होता 6 वर्ष प्रतीक्षा करे और कमाई के लिए गया है तो 3 वर्ष फिर ना आये तो नियोग से बच्चे पैदा करले ( मनुस्मृति 9 : 75-76 )
हिंदूइस्म और बहुविवाह
मनुस्मृति 9 : 80
* अगर स्त्री केवल पुत्री ही पुत्री जने तो दूसरा विवाह कर लेना चाहिए 👇👇👇
मनुस्मृति 9 : 81
मनुस्मृति 9 : 82
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