Thursday, 25 March 2021

अश्लील शब्द

 

वयं को वैदिक वैदिक कहते नहीं थकने वाले समाजीयो जरा दयानंद के इस (यजुर्वेद २५/६) भाष्य को पढकर बताए कि चुतड कौन सा वैदिक शब्द है दयानंद ने ये चुतड शब्द कौन से वैदिक शब्दकोश से निकाला है
क्या वैदिक काल में ऐसे अश्लील शब्द चलन में थे ??
क्या ये ऋषि की भाषा हो सकती है ??
क्या वेद सम्मत है??
खेर जिसका दिमाग ही चुतड जैसा हो वो यही सब लिख सकता है दयानंद के भाष्य करने का तरीका देखकर तो मुझे ऐसा प्रतीत होता है कि दुनिया में जितने भी अश्लील प्रवृत्ति के जिनके जिव्हा पर सदैव चुतड, योनि, रांड विर्य आदि ही रहता है सब के सब दयानंद की भाँति सर्वश्रेष्ठ भाष्यकार एवं महर्षि बनने की योग्यता रखते हैं
 

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स्वामी जी का कामसुत्र वाला ज्ञान।
स्वामी जी ‘सत्यार्थ प्रकाश’ में लिखते है कि एक ब्रह्मचारी के लिए अष्ट प्रकार के मैथुन
जैसे:- स्त्री दर्शन, स्त्री चर्चा और स्त्री संग अदि सब निषिद्ध है, मगर स्वामी जी ने अपनी पुस्तक में न केवल स्त्री चर्चा और सेक्स चर्चा की है, बल्कि एक नव विवाहित जोड़े को गर्भाधान किस प्रकार करना चाहिए ? इस विधि का खुला चित्रण किया है।
विषय वस्तु पर एक नज़र डालिए -
............. जब वीर्य का गर्भाशय में गिरने का समय हो उस समय स्त्री और पुरूष दोनों स्थिर और नासिका के सामने नासिका, नेत्र के सामने नेत्र अर्थात् सूधा शरीर और अत्यन्त प्रसन्नचित्त रहें, डिगें नहीं। पुरूष अपने शरीर को ढीला छोड़े और स्त्री वीर्य प्राप्ति-समय अपान वायु को ऊपर खींचे, योनि को ऊपर संकोच कर वीर्य का ऊपर आकर्षण करके गर्भाशय में स्थिर करे। पश्चात् दोनों शुद्ध जल से स्नान करें।
गर्भास्थिति होने का परिज्ञान विदुषी स्त्री को तो उसी समय हो जाता है, परन्तु इसका निश्चय एक मास के पश्चात् रजस्वला न होने पर सब को हो जाता है।
जब महीने भर में रजस्वला न होने से गर्भस्थिति का निश्चय हो जाए तब से एक वर्ष पर्यन्त स्त्री-पुरूष का समागम कभी न होना चाहिए, क्योंकि ऐसा होने से सन्तान उत्तम और पुनः दूसरा सन्तान भी वैसा ही होता है। अन्यथा वीर्य व्यर्थ जाता, दोनों की आयु घट जाती और अनेक प्रकार के रोग होते हैं, परन्तु ऊपर से भाषणादि प्रेमयुक्त व्यवहार दोनों को अवश्य रखने चाहिए।
................ संतान छह दिन तक माता का दूध पिये और स्त्री भी अपने शरीर के पुष्टि के अर्थ अनेक प्रकार के उत्तम भोजन करे और योनिसंकोचादि भी करे। छठे दिन स्त्री बाहर निकले और सन्तान के दूध पीने के लिए कोई धायी रक्खे। उसको खान-पान अच्छा करावे। वह सन्तान को दूध पिलाया करे और पालन भी करे, परन्तु उसकी माता लड़के पर पूर्ण दृष्टि रक्खे, किसी प्रकार का अनुचित व्यवहार उसके पालन में न हो। स्त्री दूध बन्ध करने के अर्थ स्तन के अग्रभाग पर ऐसा लेप करे कि जिससे दूध स्रवित न हो। उसी प्रकार खान-पान का व्यवहार भी यथायोग्य रक्खे।
(4-64, 65, 68)
क्या उक्त को पढ़कर ऐसा नहीं लगता कि जिस प्रकार एक योग गुरू स्त्री-पुरूषों को अनुलोम-विलोम आदि योग क्रियाओं का अभ्यास करता है ठीक इसी प्रकार स्वामी जी ने नव विवाहित जोड़ों को गर्भाधान की विधि और आगे के क्रिया कलापों और संबंधों को इतने विश्वास, साहस और ज्ञान के साथ समझाया है मानो उन्हें इस कठिन तकनीकी (ज्मबीदपबंस) कार्यों का वर्षों का तजुर्बा हो और वे इस कार्य के विशेषज्ञ हों। गर्भाधान की प्रक्रिया समझाने के बाद नोट में यह भी लिखा है कि, ‘‘यह बात रहस्य की है इसलिए इतने ही से समग्र बातें समझ लेनी चाहिए, विशेष लिखना उचित नहीं है।’’
कैसी विचित्र विडंबना है कि एक ऐसा व्यक्ति जो किसी विषय का अ ब स न जानता हो और वह विषय उसके लिए निषिद्ध और निंदनीय भी हो, फिर भी वह व्यक्ति उस विषय का ज्ञाता और प्रवक्ता हो। इससे अधिक धूर्तता, निर्लज्जता और दुस्साहस की बात यह देखिए कि वह व्यक्ति यह दावा भी करता है कि मैं इससे अधिक भी जानता हूँ, जिसका लिखना यहाँ उचित नहीं है। भला सेक्स संबंधी ऐसा कौन सा रहस्य है जिसे एक ब्रह्मचारी तो जान सकता है, मगर एक विवाहित नहीं जान सकता? क्या यहां प्रश्न चिंह नहीं बनता ?
एक बात यह भी देखिए कि ‘सत्यार्थ प्रकाश’ में लगभग 40 बार वीर्य शब्द का प्रयोग हुआ है और लिखा है कि यह अमूल्य है। स्वामी जी के जीवन चरित्र को पढ़ने पर पता चलता है कि स्वामी जी नंगे रहा करते थे। लगभग 48 वर्ष की उम्र के बाद उन्होंने कपड़े पहनने प्रारम्भ किए। क्या यहीं चरित्र चिंतन है एक ब्रह्मचारी का ? क्या कोई धर्मग्रंथ किसी ब्रह्मचारी अथवा संन्यासी को नंगा रहने की अनुमति देता हैं ?
अब जहाँ तक गर्भाधान विधि का प्रश्न है, यह तो एक स्वाभाविक प्रक्रिया है। इसे तो न केवल अनपढ़, गवार मनुष्य जानता है, बल्कि पशु-पक्षी भी जानते है। पशु-पक्षियों को कौन से ‘शास्त्रों का ज्ञान होता हैं ?
उन्हें भला कौन यह सब सिखाता हैं?
स्वामी जी ने गर्भाधान की उक्त विधि के साथ यह भी बताया कि गर्भास्थिति (च्तमहदंदबल) का निश्चय हो जाने के बाद एक वर्ष तक स्त्री-पुरूष को समागम नहीं करना चाहिए, कियोंकी ऐसा करने से अगली संतान निकृष्ट पैदा होती है, दोनों की आयु घट जाती है और अनेक प्रकार के रोग होते है। आगे यह भी लिखा है कि संतान के जन्म के बाद स्त्री योनिसंकोचादि भी करे।
ऐसे पाखंडी को जो अब भी ना समझ सका और अब भी इसे ब्रह्मचारी समझता हो इस दुनिया में उससे बड़ा कोई मुर्ख नहीं ।
आजकल तो दयानन्दीयों की स्थिति कुछ इस प्रकार की हो गई है कि ना तो निगलते ही बन रहा है और ना ही उगलते
“ चले थे नमाज छुड़ाने पर रोजे गले पड़ गए “ वाली कहावत चरितार्थ
 

 
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