Thursday, 25 March 2021

पुनर्विवाह और नियोग

 

सत्यार्थ प्रकाश’ के चतुर्थ समुल्लास के क्रम सं0 120 से 149 तक की सामग्री पुनर्विवाह और नियोग विषय से संबंधित है। लिखा है कि
द्विजों यानी ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य वर्णों में पुनर्विवाह कभी नहीं होने चाहिए। (4-121)
स्वामी जी ने पुनर्विवाह के कुछ दोष भी गिनाए हैं जैसे -
(1) पुनर्विवाह की अनुमति से जब चाहे पुरुष को स्त्री और स्त्री को पुरुष छोड़कर दूसरा विवाह कर सकते हैं।
(2) पत्नी की मृत्यु की स्थिति में अगर पुरुष दूसरा विवाह करता है तो पूर्व पत्नी के सामान आदि को लेकर और यदि पति की मृत्यु की स्थिति में स्त्री दूसरा विवाह करती है तो पूर्व पति के सामान आदि को लेकर कुटुम्ब वालों में झगड़ा होगा।
(3) यदि स्त्री और पुरुष दूसरा विवाह करते हैं तो उनका पतिव्रत और स्त्रीव्रत धर्म नष्ट हो जाएगा।
(4) विधवा स्त्री के साथ कोई कुंवारा पुरुष और विधुर पुरुष के साथ कोई कुंवारी कन्या विवाह न करेगी। अगर कोई ऐसा करता है तो यह अन्याय और अधर्म होगा। ऐसी स्थिति में पुरुष और स्त्री को नियोग की आवश्यकता होगी और यही धर्म है।
किसी ने स्वामी जी से सवाल किया कि अगर स्त्री अथवा पुरुष में से किसी एक की मृत्यु हो जाती है और उनके कोई संतान भी नहीं है तब अगर पुनर्विवाह न हो तो उनका कुल नष्ट हो जाएगा। पुनर्विवाह न होने की स्थिति में व्यभिचार और गर्भपात आदि बहुत से दुष्ट कर्म होंगे। इसलिए पुनर्विवाह होना अच्छा है।
जवाब दिया गया कि ऐसी स्थिति में स्त्री और पुरुष ब्रह्मचर्य में स्थित रहे और वंश परंपरा के लिए स्वजाति का लड़का गोद ले लें। इससे कुल भी चलेगा और व्यभिचार भी न होगा और अगर ब्रह्मचारी न रह सके तो नियोग से संतानोत्पत्ति कर ले। पुनर्विवाह कभी न करें। आइए अब देखते हैं कि ‘नियोग’ क्या है ?
अगर किसी पुरुष की स्त्री मर गई है और उसके कोई संतान नहीं है तो वह पुरुष किसी नियुक्त विधवा स्त्री से यौन संबंध स्थापित कर संतान उत्पन्न कर सकता है। गर्भ स्थिति के निश्चय हो जाने पर नियुक्त स्त्री और पुरुष के संबंध खत्म हो जाएंगे और नियुक्ता स्त्री दो-तीन वर्ष तक लड़के का पालन करके नियुक्त पुरुष को दे देगी। ऐसे एक विधवा स्त्री दो अपने लिए और दो-दो चार अन्य पुरुषों के लिए अर्थात कुल 10 पुत्र उत्पन्न कर सकती है। (यहाँ यह स्पष्ट नहीं किया गया है कि यदि कन्या उत्पन्न होती है तो नियोग की क्या ‘शर्ते रहेगी ?) इसी प्रकार एक विधुर दो अपने लिए और दो-दो चार अन्य विधवाओं के लिए पुत्र उत्पन्न कर सकता है। ऐसे मिलकर 10-10 संतानोत्पत्ति की आज्ञा वेद में है।
स्वामी जी ने इस मंत्र का उदाहरण दे रखा है ।
इमां त्वमिन्द्र मीढ्वः सुपुत्रां सुभगां कृणु।
दशास्यां पुत्राना धेहि पतिमेकादशं कृधि।
(ऋग्वेद 10-85-45)
भावार्थ ः ‘‘हे वीर्य सेचन हार ‘शक्तिशाली वर! तू इस विवाहित स्त्री या विधवा स्त्रियों को श्रेष्ठ पुत्र और सौभाग्य युक्त कर। इस विवाहित स्त्री से दस पुत्र उत्पन्न कर और ग्यारहवीं स्त्री को मान। हे स्त्री! तू भी विवाहित पुरुष या नियुक्त पुरुषों से दस संतान उत्पन्न कर और ग्यारहवें पति को समझ।’’
आइये एक नजर डालते है इस मंत्र के शब्दों पर
इमां - इसको ।। त्वम - तुम ।।
इन्द्र - इन्द्रियों को वश मे करने वाला जितेन्द्रिय पुरुष
मिढ़्वा: - सब सुखो का सिंचन करने वाले पुरुष ।।
सुपुत्राम - उत्तम पुत्र ।। सुभगाम - उत्तम भाग्य वाली ।।
कृणु - कर
दश - दस ।। आस्याम - इस पत्नी मे ।।
पुत्राना - पुत्रो को ।। अधेही -
स्थापित कर ।। पतिम् - पति को ।।
एकादशां कृधि - ग्यारहवा कर ।।
भावार्थ - हे इन्द्रियों पर काबू पाने वाले और सुखो का सिंचन करने वाले पुरुष , तु अपनी पत्नी पर सुखो का वर्षण करता हुआ उसे सुपत्रा और सुभागा बना ।। ( वेदिक काल मे 10 पुत्रो की सीमा थी इसलिए यहा भी ये सीमा 10 ही लिखी है और कहा गया है की 10 पुत्रो के बाद ग्यारहवा खुद को समझ )
अब कोइ आर्य समाजी बताएगा ???
की स्वामी जी ने इस मंत्र को क्यों तोड़ा मरोड़ा और इसमे वीर्य , विधवा और नियोग शब्द कहा है ???
और स्वामी जी ने लिखा है "हे वीर्य सेचन हार"
ये वीर्य सेचन हार क्या होता है ???
मैं जानता हु कोई नही बताएगा
क्योंकि इन धूर्त आर्य समाजियों को सिर्फ दयंनण्ड की राह पर चलकर नियोग को बढ़ावा देना है ।।
और अपनी मक्कारी से सनातन को कलंकित करना है ।।
खैर बढ़ते है आगे ।।
स्वामी जी लिखते है ।।
अगर किसी स्त्री का पति व्यापार आदि के लिए परदेश गया हो तो तीन वर्ष, विद्या के लिए गया हो तो छह वर्ष और अगर धर्म के लिए गया हो तो आठ वर्ष इंतजार कर वह स्त्री भी नियोग द्वारा संतान उत्पन्न कर सकती है। ऐसे ही कुछ नियम पुरुषों के लिए हैं कि अगर संतान न हो तो आठवें, संतान होकर मर जाए तो दसवें और कन्या ही हो तो ग्यारहवें वर्ष अन्य स्त्री से नियोग द्वारा संतान उत्पन्न कर सकता है। पुरुष अप्रिय बोलने वाली पत्नी को छोड़कर दूसरी स्त्री से नियोग का लाभ ले सकता है। ऐसा ही नियम स्त्री के लिए है।
और स्वामी जी ने इन बातो के लिए 2 श्लोक का रेफरेन्स दिया है वो मनुस्मृति के है ।
मैंने अपने पिछले लेख मे उनका अंतर दिखाया था
खैर आप फिर से अंतर देखिए
प्रोषितो धर्मकार्याथ प्रतिक्षयोष्टौ नरः समाः ।।
विद्यार्थ षड्यशसोर्थ वा कामार्थत्रीस्तुवत्सरान् ।।
मनुस्मृति ( 9/ 75 )
स्वामी जी अपनी पुस्तक मे इसका अर्थ लिखते है की
" स्त्री । यदि पुरुष् धर्म कार्य के उद्देश्य से परदेश गया है तो 8 वर्ष , विद्या या कीर्ति के लिए गया है तो 6 वर्ष , और धन इत्यादि कमाने गया है तो 3 वर्ष उसकी राह देखे । उसके पश्चात नियोग करके संतान उत्त्पत्ति कर ले ।
जब विवाहित पति आवे तब नियुक्त पुरुष छूट जावे ।।
जबकि मनुस्मृति मे लिखा है ।
"पति के धर्मकार्य , विद्या-यश प्राप्ति तथा व्यापार के लिए विदेश जाने पर पत्नी को क्रमशः आठ , छह और तीन वर्षो तक उसकी प्रतीक्षा करनी चाहिए"
इस मंत्र मे कही भी नियोग की कोई बात नही लिखी है ।।
क्या स्वामी जी इन मंत्रो मे अपने आप से नियोग शब्द जोड़ देते है ???
इसके पश्चात स्वामी जी ने एक और मंत्र लिखा है ।।
वन्ध्याष्टमेधिवेद्याब्दे दशमे तु मृतप्रजा ।
एकादशे स्त्री जननी सद्यस्त्वप्रियवादिनि ।।
- मनुस्मृति (9/80)
स्वामी जी इसका अर्थ लिखते है
"वैसे ही पुरुष के लिए भी नियम है , जब विवाह के आठ वर्ष तक स्त्री को गर्भ ही ना रहे , वन्ध्या हो तो आठवे , संतान हो कर मर जावे तो दशवे , जब जब हो तब तब कन्या , पुत्र न होवे तो ग्यारहवे और जो स्त्री अप्रिय बोलने वाली हो तो तुरंत उसको छोड़ कर किसी दूसरी स्त्री से नियोग करके संतानोतपत्ति कर लेवे "
जबकि मनुस्मृति मे लिखा है ।
"पत्नी के वन्ध्या, मृतक बच्चों को जन्म देने वाली तथा बार बार कन्या को ही जन्म देने वाली होने पर पति को क्रमशः आठवे, दसवे और ग्यारहवे वर्ष मे दूसरा विवाह करने का अधिकार है। स्त्री के कटुभाषिणी होने पर पुरुष उसी समय दूसरा विवाह कर सकता है ।
इसमे भी कही नियोग की कोई बात नही की गयी है ।।
बल्कि ध्यान देने योग्य बात ये है की मनुस्मृति मे पुनर्विवाह को आज्ञा है ।
मगर दयानन्द जी ने पुनर्विवाह को वेदों के विपरीत बताया है ।
तो हम यहा पर साफ शब्दों मे ये कह सकते है की दयानन्द जी केवल नियोग को ही सनातन मे बढ़ावा देना चाहते है ।
चलिए और बढ़ते है ।
स्वामी जी सत्यार्थ प्रकाश मे लिखते है
"वेद की आज्ञा है कि ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य वर्णस्थ स्त्री और पुरुष दस से अधिक संतान उत्पन्न न करें, क्योंकि अधिक करने से संतान निर्बल, निर्बुद्धि और अल्पायु होती है। जैसा कि उक्त मंत्र से स्पष्ट है कि नियोग की व्यवस्था केवल विधवा और विधुर स्त्री और पुरुषों के लिए नहीं है बल्कि पति के जीते जी पत्नी और पत्नी के जीते जी पुरुष इसका भरपूर लाभ उठा सकते हैं। "
मैं समस्त सनातनियो से पूछता हु क्या विवाहित पुरुष या विवाहित स्त्री का किसी दूसरे पुरुष या किसी दूसरे स्त्री के साथ संबंध बनाने से क्या पतिव्रता या स्त्रीव्रत धर्म नष्ट नही होगा ???
जैसा उन्होंने पुनर्विवाह के हानियो मे गिनाया है ???
( पोस्ट मे सर्वप्रथम मैंने वही लिखा है )
चलिए एक बार हम स्वामी जी के कहने पर नियोग प्रथा को स्वीकार भी कर लेते है की नियोग से व्यभिचार नही होगा ।।
और नियोग केवल विषम परिस्थितियों मे ही किया जाना चाहिए
लेकिन स्वामी जी आगे लिखते है ।
"प्रश्न सं0 149 में लिखा है कि अगर स्त्री गर्भवती हो और पुरुष से न रहा जाए और पुरुष दीर्घरोगी हो और स्त्री से न रहा जाए तो ऐसी स्थिति में दोनों किसी से नियोग कर पुत्रोत्पत्ति कर ले, परन्तु वेश्यागमन अथवा व्यभिचार कभी न करें"
यहा ध्यान देने वाली वाली बात ये है की स्त्री गर्भ से है
मतलब कमी दोनो मे से किसी मे भी नही है फिर भी स्वामी जी
नियोग करने की आज्ञा दे देते है क्या ये व्यभिचार नही ???
और स्वामी जी लिखते है की अगर पुरुष से ना रहा जाये तो किसी विधवा से नियोग कर ले
अगर किसी को विधवा ना मिले तो ???
और उसके बाद भी ना पुरुष से ना रहा जाये तो ???
और ऐसी स्थिति मे अगर पुरुष किसी का बलात्कार करले तो क्या स्वामी जी उसको भी नियोग ही कहेंगे ???
क्या इसमे स्वामी जी अज्ञानता और मूर्खता नही दिखाई पड़ती ???
आगे स्वामी जी लिखते है ।
"लिखा है कि नियोग अपने वर्ण में अथवा उत्तम वर्ण और जाति में होना चाहिए। एक स्त्री 10 पुरुषों तक और एक पुरुष 10 स्त्रियों तक से नियोग कर सकता है। अगर कोई स्त्री अथवा पुरुष 10वें गर्भ से अधिक समागम करे तो कामी और निंदित होते हैं"
ह ह ह ह ये ठीक कुछ उसी तरह है जैसा कोई एक वैश्यावृति को बढ़ावा देकर कह रहा हो की 10 पुरुष के बाद 11वे से समपर्क करवाने वाली निंदनीय है ।।
स्वामी जी आगे लिखते है ।
"विवाहित पुरुष कुंवारी कन्या से और विवाहित स्त्री कुंवारे पुरुष से नियोग नहीं कर सकती।"
मैं पूछता हु क्यों ??
स्वामी जी के अनुसार विवाहित स्त्री विधुर पुरुष से कर सकती है विवाहित पुरुष विधवा स्त्री से कर सकता है
फिर इसमे दोष कैसा ??
पुनर्विवाह और नियोग से संबंधित कुछ नियम, कानून, ‘शर्ते और सिद्धांत आपने पढ़े जिनका प्रतिपादन स्वामी दयानंद ने किया है और जिनको कथित लेखक ने वेद, मनुस्मृति आदि ग्रंथों से सत्य, प्रमाणित और न्यायोचित भी साबित किया है। व्यावहारिक पुष्टि हेतु कुछ ऐतिहासिक प्रमाण भी कथित लेखक ने प्रस्तुत किए हैं और साथ-साथ नियोग की खूबियां भी बयान की हैं। इस कुप्रथा को धर्मानुकूल और न्यायोचित साबित करने के लिए लेखक ने बौद्धिकता और तार्किकता का भी सहारा लिया है। कथित सुधारक ने आज के वातावरण में भी पुनर्विवाह को दोषपूर्ण और नियोग को तर्कसंगत और उचित ठहराया है।
आइए उक्त धारणा का तथ्यपरक विश्लेषण करते हैं।
ऊपर पुनर्विवाह के जो दोष स्वामी दयानंद ने गिनवाए हैं वे सभी हास्यास्पद, बचकाने और मूर्खतापूर्ण हैं। विद्वान लेखक ने जैसा लिखा है कि दूसरा विवाह करने से स्त्री का पतिव्रत धर्म और पुरुष का स्त्रीव्रत धर्म नष्ट हो जाता है परन्तु नियोग करने से दोनों का उक्त धर्म ‘ाुद्ध और सुरक्षित रहता है। क्या यह तर्क मूर्खतापूर्ण नहीं है ?
आख़िर वह कैसा पतिव्रत धर्म है जो पुनर्विवाह करने से तो नष्ट और भ्रष्ट हो जाएगा और 10 गैर पुरुषों से यौन संबंध बनाने से सुरक्षित और निर्दोष रहेगा ?
अगर किसी पुरुष की पत्नी जीवित है और किसी कारण पुरुष संतान उत्पन्न करने में असमर्थ है तो इसका मतलब यह तो हरगिज़ नहीं है कि उस पुरुष में काम इच्छा ;ैमगनंस कमेपतम) नहीं है।
अगर पुरुष के अन्दर काम इच्छा तो है मगर संतान उत्पन्न नहीं हो रही है और उसकी पत्नी संतान के लिए किसी अन्य पुरुष से नियोग करती है तो ऐसी स्थिति में पुरुष अपनी काम तृप्ति कहाँ और कैसे करेगा ?
यहाँ यह भी विचारणीय है कि नियोग प्रथा में हर जगह पुत्रोत्पत्ति की बात कही गई है,
जबकि जीव विज्ञान के अनुसार 50 प्रतिशत संभावना कन्या जन्म की होती है। कन्या उत्पन्न होने की स्थिति में नियोग के क्या नियम, कानून और ‘शर्ते होंगी, यह स्पष्ट नहीं किया गया है ?
जैसा कि स्वामी जी ने कहा है कि
"अगर किसी स्त्री के बार-बार कन्या ही उत्पन्न हो तो भी पुरुष नियोग द्वारा पुत्र उत्पन्न कर सकता है। "
यहाँ यह तथ्य विचारणीय है कि अगर किसी स्त्री के बार-बार कन्या ही उत्पन्न हो तो इसके लिए स्त्री नहीं, पुरुष जिम्मेदार है। यह एक वैज्ञानिक तथ्य है कि मानव जाति में लिंग का निर्धारण नर द्वारा होता है न कि मादा द्वारा।
यह भी एक तथ्य है कि पुनर्विवाह के दोष और हानियाँ तथा नियोग के गुण और लाभ का उल्लेख केवल द्विज वर्णों, ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य के लिए किया गया है। चैथे वर्ण ‘शूद्र को छोड़ दिया गया है। क्या ‘शुद्रों के लिए नियोग की अनुमति नहीं है ? क्या ‘शूद्रों के लिए नियोग की व्यवस्था दोषपूर्ण और पाप है ?
स्वामी जी आगे लिखते है
"जैसा कि लिखा है कि अगर पत्नी अथवा पति अप्रिय बोले तो भी वे नियोग कर सकते हैं। अगर किसी पुरुष की पत्नी गर्भवती हो और पुरुष से न रहा जाए अथवा पति दीर्घरोगी हो और स्त्री से न रहा जाए तो दोनों कहीं उचित साथी देखकर नियोग कर सकते हैं।"
क्या यहाँ सारे नियमों और नैतिक मान्यताओं को लॉकअप में बन्द नहीं कर दिया गया है ?
क्या नियोग का मतलब स्वच्छंद यौन संबंधों ;ैमग थ्तमम) से नहीं है ?
क्या इससे निम्न और घटिया किसी समाज की कल्पना की जा सकती है?
कथित विद्वान लेखक ने नियोग प्रथा की सत्यता, प्रमाणिकता और व्यावहारिकता की पुष्टि के लिए महाभारत कालीन सभ्यता के दो उदाहरण प्रस्तुत किए हैं। लिखा है कि
"व्यास जी ने चित्रांगद और विचित्र वीर्य के मर जाने के बाद उनकी स्त्रियों से नियोग द्वारा संतान उत्पन्न की। अम्बिका से धृतराष्ट्र, अम्बालिका से पाण्डु और एक दासी से विदुर की उत्पत्ति नियोग प्रक्रिया द्वारा हुई। दूसरा उदाहरण पाण्डु राजा की स्त्री कुंती और माद्री का है। पाण्डु के असमर्थ होने के कारण दोनों स्त्रियों ने नियोग विधि से संतान उत्पन्न की। इतिहास भी इस बात का प्रमाण है।"
जहाँ तक उक्त ऐतिहासिक तथ्यों की बात है महाभारत कालीन सभ्यता में नियोग की तो क्या बात कुंवारी कन्या से संतान उत्पन्न करना भी मान्य और सम्मानीय था।
वेद व्यास और भीष्म पितामह दोनों विद्वान महापुरुषों की उत्पत्ति इस बात का ठोस सबूत है।
तीसरी बात महाभारत कालीन समाज में तो बिना स्त्री संसर्ग के केवल पुरुष ही बच्चें पैदा करने में समर्थ होता था।
महाभारत का मुख्य पात्र गुरु द्रोणाचार्य की उत्पत्ति उक्त बात का सबूत है।
चैथी बात महाभारतकाल में तो चमत्कारिक तरीके से भी बच्चें पैदा होते थे।
पांचाली द्रौपदी की उत्पत्ति इस बात का जीता-जागता सबूत है।
अतः उक्त समाज में नियोग की क्या आवश्यकता थी ?
यहाँ यह भी विचारणीय है कि व्यास जी ने किस नियमों के अंतर्गत नियोग किया ?
दूसरी बात नियोग किया तो एक ही समय में तीन स्त्रियों से क्यों किया?
तीसरी बात यह कि एक मुनि ने निम्न वर्ण की दासी के साथ क्यों समागम किया ?
चैथी बात यह कि जब उस समाज में नियोग प्रथा निर्दोष और मान्य थी तो फिर कुंती ने लोक लाज के डर से कर्ण को नदी में क्यों बहा दिया ?
पांचवी बात यह है कि वे पुरुष कौन थे जिन्होंने कुंती से नियोग द्वारा संतान उत्पन्न की ?
स्वामी जी ने बहुविवाह का निषेध किया है जबकि उक्त सभ्यता में बहुविवाह होते थे।
स्वामी जी ने वेदों से एक मन्त्र का उदहरण् दिया है ।
आ घा ता गच्छानुत्तरा युगानि यत्र जामयः कृराावन्नजामि।
उप बर्बृहि वृषभाय बाहुमन्यमिच्छस्व सुभगे पति मत्।
(ऋग्वेद 10-10-10)
भावार्थ ः ‘‘नपुंसक पति कहता है कि हे देवि! तू मुझ से संतानोत्पत्ति की आशा मत कर। हे सौभाग्यशालिनी! तू किसी वीर्यवान पुरुष के बाहु का सहारा ले। तू मुझ को छोड़कर अन्य पति की इच्छा कर।’’
इसका भावार्थ पता नही कितना सही है या कितना गलत
मगर एक बात जो सायद स्वामी जी को ना दिखी और उन्होंने नियोग को आज के समय मे भी उत्तम बता दिया
और दिखती भी क्यों
उनको व्यभिचार को बढ़ावा भी देना है ।
वो बात ये है की वैदिक काल मे भी चिकित्सा शिक्षा भी बहुत विकसित थी
और अगर कोई पैदा ही नपुंशक होता है तो उसकी विवाह का कोई प्रश्न ही नही बनता
और अगर बाद मे उसको संतान उत्त्पत्ति मे दिक्कत होती है
तो वो रोगी है ।।
और जिस वैदिक काल मे संजीवनी जैसी जडि बूटिया होती थी
विज्ञान इतना हाईटैक होता था क्या उस समय मे इस बीमारी का इलाज़ नही होता होगा ???
जबकि वेदों मे औसधिय ज्ञान भी है ।।
अवश्य होता होगा
जो आज भी होता है ।।
दूसरा विषय यह विचारणीय है की स्वामी जी ने इस मंत्र मे लिखा है की "पुरुष अज्ञा देत है अपनी पत्नी को "
अगर पुरुष आज्ञा देतहै अपनी पत्नी को
तो ये इतिहास हो जायेगा
फिर वेद ईश्वर वाणी नहि साबित होगी"
हा अगर यही अगर ऐसा लिखा होता तो मैं शक ना करता
" नपुंशक पुरुष अपनी पत्नी को अज्ञा दे"
मगर ऐसा नही लिखा है ।।
नियोग एक गर्हित और गंदी परंपरा है, इसे किसी भी काल के लिए उचित नहीं कहा जा सकता।
भारतीय चिंतन में नारी की स्थिति अत्यंत दयनीय प्रतीत होती है। ऐसा प्रतीत होता है कि ऋषि, मुनियों और महापुरुषों द्वारा कुछ ऐसे नियम-कानून बनाए गए, जिन्होंने नारी को भोग की वस्तु और नाश्ते की प्लेट बना दिया। नियोग प्रथा ने विधवा स्त्री को कतई वेश्या ही बना दिया। जैसा कि आप ऊपर पढ़ चुके हैं कि एक विधवा 10 पुरुषों से नियोग कर सकती है। यहाँ विधवा और वेश्या ‘शब्दों को एक अर्थ में ले लिया जाए तो ‘शायद अनुचित न होगा।
पाण्डेय जी ने अथर्ववेद का भी एक मंत्र विधवा पुनर्विवाह के समर्थन में प्रस्तुत किया है। जो निम्न है -
‘‘या पूर्वं पतिं वित्त्वाथान्यं विन्दते परम्।
पत्र्चैदनं च तावजं ददातो न वि योषतः।।
समानलोको भवति पुनर्भुवापरः पतिः।
योऽजं पत्र्चैदनं दक्षिणाज्योतिषं ददाति।।’’
(अथर्वसंहिता 9-5-27,28)
उक्त से स्पष्ट है कि वेद भाष्यों में इतना अधिक अर्थ भेद और मतभेद पाया जाता है कि सत्य और विश्वसनीय धारणाओं का निर्णय करना अत्यंत मुश्किल काम है? यहाँ यह भी विचारणीय है कि विवाह का उद्देश्य केवल संतानोत्पत्ति करना ही नहीं होता बल्कि स्वच्छंद यौन संबंध को रोकना और भावों को संयमित करना भी है। यहाँ यह भी विचारणीय है कि जो विषय (नारी और सेक्स) एक बाल ब्रह्मचारी के लिए कतई निषिद्ध था, स्वामी जी ने उसे भी अपनी चर्चा और लेखनी का विषय बनाया है।
बेहद अफसोस और दुःख का विषय है कि जहाँ एक विद्वान और समाज सुधारक को पुनर्विवाह और विधवा विवाह का समर्थन करना चाहिए था, वहाँ कथित समाज सुधारक द्वारा नियोग प्रथा की वकालत की गई है और इसे वर्तमान काल के लिए भी उपयुक्त बताया है। क्या यह एक विद्वान की घटिया मनोवृत्ति का प्रतीक नहीं है ? आज की फिल्में जो कतई निम्न स्तर का प्रदर्शन करती हैं, उनमें भी कहीं इस प्रथा का प्रदर्शन और समर्थन देखने को नहीं मिलता। स्वामी दयानंद को छोड़कर नवजागरण के सभी विद्वानों और सुधारकों द्वारा विधवा पुनर्विवाह का समर्थन किया गया है।
जब किसी कौम या समाज के धार्मिक लोग जघन्य नैतिक बुराइयों और बिगाड़ में गर्क हो जाते हैं, तो वह कौम नैतिक पतन की पराकाष्ठा को पहुंच जाती है। नैतिक बुराइयों में निमग्न होने के बावजूद कथित धार्मिक लोग अपने बचाव और समाज में अपना स्तर और आदर-सम्मान बनाए रखने के लिए और साथ-साथ अपने को सही और सदाचारी साबित करने के लिए उपाय तलाशते हैं। अपने बचाव के लिए कथित मक्कार लोग अपनी धार्मिक पुस्तकों से छेड़छाड़ करते हैं और उनमें फेरबदल कर उस नैतिक बुराई को जो उनमें है, अपने देवताओं, अवतारों, ऋषियों, मुनियों और आदर्शों से जोड़ देते हैं और जनसाधारण को यह समझाकर अपने बचाव का रास्ता निकाल लेते हैं कि यह बुराई नहीं है बल्कि धर्मानुकूल है। ऐसा तो हमारे ऋषि-मुनियों और महापुरुषों ने भी किया ।
वेदकालीन समाज में विधवा स्त्रियों को पुनर्विवाह की अनुमति प्राप्त थी।
उक्त मंत्र (10-18-8) का भावार्थ इस प्रकार है -
‘‘हे नारी ! इस मृत पति को छोड़कर पुनः जीवितों के समूह में पदार्पण करो। तुमसे विवाह के लिए इच्छुक जो तुम्हारा दूसरा भावी पति है, उसे स्वीकार करो।’’
- कुंदन कुमार विक्रांत
 
 
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प्रोषितो धर्मकार्याथ प्रतिक्षयोष्टौ नरः समाः ।।
विद्यार्थ षड्यशसोर्थ वा कामार्थत्रीस्तुवत्सरान् ।।
मनुस्मृति ( 9/ 75 )
सत्यार्थ प्रकाश के चतुर्थ संमुल्लाश मे दयानन्द जी ये इसका रेफरेन्स ( 9/76) मे दे रखा है खैर ये कोई मुद्दा नही है
आते है मुद्दे पर
स्वामी जी अपनी पुस्तक मे इसका अर्थ लिखते है की
" स्त्री । यदि पुरुष् धर्म कार्य के उद्देश्य से परदेश गया है तो 8 वर्ष , विद्या या कीर्ति के लिए गया है तो 6 वर्ष , और धन इत्यादि कमाने गया है तो 3 वर्ष उसकी राह देखे । उसके पश्चात नियोग करके संतान उत्त्पत्ति कर ले ।
जब विवाहित पति आवे तब नियुक्त पुरुष छूट जावे ।।
जबकि मनुस्मृति मे लिखा है ।
"पति के धर्मकार्य , विद्या-यश प्राप्ति तथा व्यापार के लिए विदेश जाने पर पत्नी को क्रमशः आठ , छह और तीन वर्षो तक उसकी प्रतीक्षा करनी चाहिए"
इस मंत्र मे कही भी नियोग की कोई बात नही लिखी है ।।
क्या स्वामी जी इन मंत्रो मे अपने आप से नियोग शब्द जोड़ देते है ???
इसके पश्चात स्वामी जी ने एक और मंत्र लिखा है ।।
जो मनुस्मृति मे (9/80) पर है स्वामी जी ने इसका रेफरेन्स 9/81 पर दे रखा है ।
वन्ध्याष्टमेधिवेद्याब्दे दशमे तु मृतप्रजा ।
एकादशे स्त्री जननी सद्यस्त्वप्रियवादिनि ।।
स्वामी जी इसका अर्थ लिखते है
"वैसे ही पुरुष के लिए भी नियम है , जब विवाह के आठ वर्ष तक स्त्री को गर्भ ही ना रहे , वन्ध्या हो तो आठवे , संतान हो कर मर जावे तो दशवे , जब जब हो तब तब कन्या , पुत्र न होवे तो ग्यारहवे और जो स्त्री अप्रिय बोलने वाली हो तो तुरंत उसको छोड़ कर किसी दूसरी स्त्री से नियोग करके संतानोतपत्ति कर लेवे "
जबकि मनुस्मृति मे लिखा है ।
"पत्नी के वन्ध्या, मृतक बच्चों को जन्म देने वाली तथा बार बार कन्या को ही जन्म देने वाली होने पर पति को क्रमशः आठवे, दसवे और ग्यारहवे वर्ष मे दूसरा विवाह करने का अधिकार है। स्त्री के कटुभाषिणी होने पर पुरुष उसी समय दूसरा विवाह कर सकता है"
अब कोई आर्य समाजी कुछ बोलेगा ???
- कुंदन कुमार विक्रांत
 

 

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