Thursday, 25 March 2021

मूर्ति पूजा, पुराण, आर्य समाजी कमियां।

 


 

 *******
 
हिन्दू धर्म को सनातन धर्म कहा जाता है, जिसका अर्थ है सदा से अर्थात सृष्टि से आरंभ से चला आने वाला धर्म सत्युग (सतयुग) में धर्म ही सबका शासक था।
न राज्यं नैव राजसीन्न दण्डो नैव दाण्डिक:
धर्मेणैव प्रजा: सर्वारक्ष्यन्ते स्व परस्परमद् ।। (म.मा.)
तब सारी प्रजा धर्म से ही एक दूसरे की रक्षा करती थी, सब लोहो ंके धर्म में संलग्न होने से कहीं भी अन्याय का नाम निशान नहीं था । किसी का भी मन अधर्म की ओर प्रवृत्त नहीं होता था ऐसी परिस्थिति में किसी नियामक राजा की आवश्यकता नहीं थी ।
वस्तुत: समस्त जगत एकमात्र धर्म के बल पर ही सुरक्षित और सुस्थिर रहत ाहै । धर्म विश्व की प्रतिष्ठा है । धर्म शब्द की व्युत्पत्ति दो प्रकार से है।
1. धनानि स्त्रोतीनि धर्म-अर्थात जो धर्म प्राणियों को सुखी करने के लियेे सब प्रकार से धन धान्य आदि की वृष्टि करता है वह धर्म है ।
2. धारयते इत धर्म: अर्थात जो धर्म पालन पोषण आदि के द्वारा प्राणियों को सब प्रकार से आप्यायित करता हुआ सबको धारण किये रहता है उसे धर्म कहते हैं ।
धर्म में अपार शक्ति है, वह सदा सत्य रूप में है, धर्म सात्रात ईश्वर का सांसारिक रूप है, मनु ने धर्म के दस लक्षमण इस प्रकार बताये हैं ।
घृति: क्षमा दमोडस्तेयं शौचमिन्द्रिय निग्रह:
धीर्विद्या सत्यमक्रोधो दशकं धर्म लक्षणम् ।। (मनु 6/92)
अर्थात धैर्य, क्षमा, मन पर नियंत्रण, चोरी न करना (न्याय पूर्ण जीवन) शरीर के अंदर बाहर की पवित्रता, इंद्रियों पर नियंत्रण, विवेक बुद्धि (सद्बुद्धि) विद्या, सत्य, अक्रोध, इन सबको जिस आध्यात्मिक उर्जा के माध्यम से पाने के लिए मनुष्य ने एक मार्ग खोज निकाला उसे हम अपने अपने धर्म में मूर्ति पूजा कहते हैं। मूर्ति पूजा का संबंध ईश्वर से है । ईश्वर का वास्तविक स्वरूप हम नहीं जानते । हमने अपने धर्म के माध्यम से ही उसे पहचाना उसकी आरादना की, अपना दु:ख सुख उसे ही सुनाया । उसी ने हमारी मनोकामनाएं पूर्ण की । असंख्य मंदिरों में भगवान की सुन्दर प्रतिमाओं (मूर्तिओं) को देखकर हम अपने ईश्वर के आगे नतमस्तक हो गये । हमारे मन के विश्वास को उस अदृश्य शक्ति ने बनाये रखा। अपना आशीर्वाद दिया । अपने धर्म पर किये गये अटूट आस्था का ही परिणाम है कि लोग मंदिरों, गुरूद्वारों, मस्जिदों, गिरजाघरों आदि में अपनी श्रद्धा से उस सर्वशक्तिमान ईश्वर के दर्शनार्थ जाते रहते हैं ।
सनातन धर्म ने हमें ब्रह्ममुहूर्त में उठकर नित्य कर्म से निवृत होकर पूजा पाठ कर्म करने के लिये प्रेरित किया। आज विश्व के विभिन्न भागों में सनातन धर्मावलंबियों की संख्या लगभग 95 करोड़ से अधिक है। सनातन धर्म की सबसे बड़ी विशेषता उसकी धार्णिक सहिष्णुता है । सनातन धर्म सर्वे भवन्तु सुखिन:, सर्वे सन्तु निरामया: के सिद्धांत पर खड़ा है । सनातन धर्म ने देवी देवताओं की पूजा के लिए हमें अपनी इच्छा पर छोड़ दिया है । हम जिसे चाहे उस देवी देवता की आराधना करें, मूर्ति पूजा करें ।
मूर्ति पूजा के तथ्यों की यदि संक्षिप्त विवेचना की जाय तो मूर्ति पूजा का श्रीगमेश वैदिक सभ्यता से ही माना गया है क्योंकि इसी युग में आध्यात्मिक चिन्तन का उदय हुआ , जिसे वेदान्त कहा गया। तभी अवतारवाद का भी वेद में मंत्र आया प्रजापतिश्चरति गर्भे अन्तरजायमानो बहुधा विजायते (यजु. 31/19) इन्द्रो मायाभि: पुरूरूप ईयते (ऋगवेद सं. 6/47/18) इन्हीं मंत्रों के अनुाद रूप में भगवत गीता में कहा गया है-
अजोडपि सन अव्ययात्मा भूतानामीश्वरोडपि सन
प्रकृति स्वामधिष्ठाय सम्भवाम्यात्ममायमा (4/6)
परमात्मा का विविध प्रकार से पृथ्वी में प्रकट होना ही अवतार है । भगवत गीता में ही धर्म की रक्षा के लिए पृथ्वी पर भगवान के अवतार को सिद्ध किया है ।
यदा यदा कि धर्मस्य ग्लानिर्भवाते भारत ।
अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम।
परित्राणाय सादूनां विनाशाय च दुष्कृताम्।
धर्म संस्थापनार्थाय सम्भवामि युगे-युगे ।।
अर्थात -धर्म का ह्रास, अधर्म का अभ्युत्थान होने पर सत्पुरूषों की सुरक्षा और दुराचारी दुर्जनों के विनाश एवं धर्म के संस्थापन के लिए पृथ्वी पर भगवान का अवतार होता है।
यह सत्य है कि हर कोई अपने धर्म की रक्षा और अधर्म के विनाश के लिए उस प्रभु के सहारे है जो अदृश्य
है। हमारे चिन्तन में सर्वत्र ईश्वरदर्शन करना ही सर्वोपरि है।
ईशावास्यमिदं सर्वे यत्किं च जगत्यां जगत
सनातन धर्म कहता है कि हम सब ईश्वर के अंश है और सभी को मानवता का भाव रखकर एक दूसरे से स्नेह रखते हुए प्रभु स्मरण करना चाहिए स्वंय भगवान कहते हैं -
ये यथा मां प्रपधन्ते तांस्तथैव भजाम्यहम (भगवतगीता 4/11) जो मुझे जिस प्रकार भजते हैं भी उसको उसी प्रकार भजता हूं। मूर्ति पूजा के साथ हमारा भगवान के सात जन्म से लेकर मृत्यु तक का घनिष्ठ एवं अटूट संबंध है। आवश्यकता है प्रभु के प्रति समर्पित होने और यह मानने की कि मेर ेतो गिरधर गोपाल दूसरों न कोई मीराबाई की भांति ऐसी अनन्य निष्ठा (दृढ़भाव) हो जाने पर फिर प्रभु की कृपा स्वत: ही बरसने लगती है । संत तुलसीदास जी ने इसी संदर्भ में कहा जाकि रही भावना जैसी, प्रभु मूरत देखि तिन तैसी मूर्ति के भेदों की यदि विवेचना की जाय तो ये आठ प्रकार की है। शैली, दारूमयी, लौही, लेप्या, लेख्या, सैकती, मनोमयी और मणिमयी, इन आठ भेदों के भी दो प्रतक से भेद है चला एवं अचला चला मूर्ति वे हैं जो पिटारी आदि में रखकर सर्वत्र ले जायी जा सकती है । उनमें आवाहन विसर्जन के सात अथवा आवाहन विसर्जन के बिना दोनों प्रकार से पूजा की जा सकती है। अचला मूत्रियां वे हैं जिनमें इष्टदेव का आवाहन और प्राण प्रतिष्ठा करके उन्हें किसी मंदिर में स्थापित किया जाता है। उनकी नियमित पूजा में रोज आवाहन विसर्जन की आवश्यकता नहीं रह जाती है ।
यदि मूर्ति पूजा के संदर्भ में विश्व की विभिन्न सभ्यताओं का विश्लेषण किया जाय तो यही ज्ञात होता है कि प्रत्येक सभ्यता के लोग धार्मिक भावनाओ से जुड़े हुए थे और ईश्वर पर उनका विश्वास था। कई सभ्यताओं में मूर्तिकला, चित्रकला, वास्तुकला, मदिर निर्माण कला काफी विकसित थी । भारत में प्राचीन मंदिरों एवं उत्खनन में पाई गई मूर्तियों की सुरक्षा भारतीय पुरतत्व विभाग ने ली है ।
मूर्ति पूजा के तथ्यों पर विचार करने से यह स्पष्ट होता है कि आस्था एवं भावना को उभारने के लिये व्यक्ति को मूर्ति चित्र सदैव प्रतीकारात्मक रूप में चाहिये। आराध्य की मूर्ति की पूजा करके मनुष्य का उसके सात मनोवैज्ञानिक संबंध स्थापित हो जाता है। मन को स्थिर रखने के लिये साधक को मूर्ति की आवश्यकता पड़ती है मूर्ति में ही वह असीम सत्ता का दर्शन करना चाहता है। भगवान की भव्य मूर्ति के दर्शन से मन को एकाग्र करने में सहजता होती है ।
प्रत्येक मूर्ति में शक्ति निहित होती है । मंदिर में स्थापित की जाने वाली सभी मूर्तियो की वैदिक मंत्रों से प्राण प्रतिष्ठा की जाती है। प्राण प्रतिष्ठा के उपरान्त वह मूर्ति शक्ति से परिपूर्ण समझी जाती है। अथर्ववेद (2/13/4) में प्रार्थना है हे भगवान आइए और इस पत्थर की बनी मूर्ति में अधिष्ठित होइए। आपका यह शरीर इस पत्थर की मूर्ति में समाहित हो जाए । वास्तुशास्त्र के अंतर्गत भी उत्तर ईशान कोण में पूजा स्थल अथवा मंदिर की स्थापना हेतु उत्तम स्थान बताया गया है। प्राय: भवन निर्माण में सभी लोग इसी दिशा में अपना पूजा स्थल बनाते हैं ताकि घर में ईश्वर की कृपा से सुख शांति और समृद्धता बनी रहे। अन्तत: यही कहना होगा कि उपासना और ध्यान की उच्च स्तरीय साधना के लिए मूर्ति पूजा से श्रेष्ठ कोई अन्य साधना है ही नहीं।

■■■

आर्य समाजी अक्सर ये कहते हुए देखे जाते हैं कि ब्राह्मणों ने शूद्रों को वेदादि शास्त्रों के ज्ञान से दूर रखा। ताकि ब्राह्मणों का ही प्रभुत्व जमा रहे। मानो शूद्र लोग इतने अधिक दिमाग वाले थे कि यदि उन्हें वेद पढ़ा दिए जाते तो वे सब ब्राह्मणों को शास्त्रार्थ में हरा देते। 
ठीक है भाई। एक बार के लिए हम तुम्हारी बात मान लेते हैं कि शूद्रों को वेद नहीं पढ़ने दिए गए।
लेकिन मुझे ये बताओ कि लोकतंत्र आने के पिछले 70 वर्षों से वेदादि शास्त्र बाजार में सबके लिए उपलब्ध हैं। कोई भी खरीदे और पढ़े। कोई रोकने वाला नहीं था। अपना चुपचाप वेद खरीद लाते और घर पर लाकर पढ़ लेते। और शूद्र समाज तो बहुसंख्यक है। तो पिछले 70 वर्षों में कितने शूद्र समाज के लोगों ने वेद, उपनिषद खरीद कर लाकर पढ़ लिए? अगर उनको इतना ही शौक था तो वे स्वतंत्रता के बाद अवश्य ही वेद, उपनिषद पढ़ लिए होते। पूरा मौका था उनके पास। आर्य समाज जैसे कई फ़र्ज़ी संगठन भी भारत में खुल चुके थे जो सबको वेद पढ़ाने के लिए तैयार बैठे हैं? फिर कितने शूद्रों ने पढ़ लिए? 
ऐसे कितने शूद्र स्वेच्छा से उन संगठनों में वेद पढ़ने की इच्छा से गए? जो सच में ज्ञान पिपासु थे?  और जो भी 1-2% गए तो वे ज्ञान पाने की इच्छा से गए या या बस ब्राह्मण बनने के लोभ से गए? 

इतना ही नहीं। पिछले 7-8 वर्षों से तो सबके पास स्मार्टफोन हैं। इंटरनेट बहुत सस्ता हो गया। लगभग हर ग्रन्थ नेट से भी फ्री में डाउनलोड करने की सुविधा है। तो कितने शूद्रों ने इस सुविधा का लाभ लेते हुए वेद, उपनिषद, दर्शन, पुराण, रामायण, महाभारत आदि ग्रन्थ पढ़े? भारत में शूद्रों की कुल आबादी में से कितने प्रतिशत ने ज्ञान पाने की इच्छा से अपने ग्रन्थों का अध्ययन किया? 
ज्ञान पाने की बात मैं इसलिए बोल रहा हूँ क्योंकि बहुत से लोग तो उन ग्रन्थों में दोष निकालने  की भावना से भी उन्हें भी पढ़ते हैं। उनका पढनान पढ़ना सब एक बराबर ही है।
और जिन्होंने ज्ञान पाने के लिए पढ़े, उनमेंसे भी कितने उस ज्ञान व धर्म को कुछ अंशों में अपने जीवन में धारण कर पाए? 

ये सब डाटा आर्य समाज उपलब्ध करवाए। पिछले 150 वर्षों का डाटा उपलब्ध करवाए। जो जो कर्मणा ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र तुम लोगों ने बनाये, उनका डाटा उपलब्ध करवाओ। दिखाओ हमें कि कौन कौन से कर्मणा वैश्य या शूद्र तुम लोगों ने अपने गुरुकुलों से तैयार करके बनाये?

■■■■

अनार्य समाजियों द्वारा बार बार पुराणों पर अनर्गल प्रलाप करने के कारण, मनमर्जी से किसी ग्रन्थ को प्रामाणिक और किसी को अप्रमाणिक मानने के कारण, नियोग जैसा पशु धर्म को मान्यता देने के कारण पूर्वकाल में आचार्यों ने अनार्य समाजियों का टेंटुआ अपने पैर के नीचे दबा के रखा था, काशी से अनार्य समाजियों को जाति से बहिष्कृत करने का पत्र जारी हुआ था। इसलिए बिचारे आजतक ब्राह्मणों को गाली बकते हैं और खुद ही ब्राह्मण बनने का प्रयास करते हैं। अतः इन्हें आप हिन्दू न समझें। ये भी म्लेच्छ प्रायः ही हैं। 
नीचे वो काशी से जारी पत्र दिया जा रहा है।


■■■■

जिन भगवान के अवतारों और चमत्कारों वाली बातों को तुम लोग पण्डों की मिलावट समझते हो, उन सब बातों को तो आदि  शंकराचार्य जी, रामानुजाचार्य जी, मध्वाचार्य जी, निम्बार्काचार्य जी, वल्लभाचार्य जी, चैतन्य महाप्रभु जी आदि सबने स्वीकार किया है।
इसलिए तुम्हारी दी हुई सारी गालियां उन्हीं आचार्यों को लगती हैं, और बदले में तुम्हारा नरक जाना कन्फर्म हो जाता है।
दिए जाओ जितनी मर्ज़ी गालियां, तुम्हारा ही हानि है।
और अब तो तुम्हारे ही समाज के अग्निवर्त जी ने भी मनुष्य का उड़ना स्वीकार कर लिया, सब योग सिद्धियों को स्वीकार कर लिया। तो एक काम करो, अब उनको भी गालियां देनी शुरू करो।

■■■





■■■■■■■■

जो लोग बोल रहे हैं कि आर्य समाज का विरोध क्यों?
वो बताएं फिर रामपाल का, ब्रह्मकुमारी का, राम रहीम का, आसाराम का, साईं बाबा का भी विरोध क्यों? इसलिए न कि ये सब वैदिक धर्म की आड़ में लोगों को भ्रमित करते हैं। तो वही काम तो आर्य समाज भी कर रहा है। वेदों की गीत गा गाकर, ब्रह्मचर्य, गौसेवा, यज्ञ की बात कर करके भी परोक्ष रूप से लोगों को धर्म से दूर कर रहा है। धर्म के कुछ अंगों को सम्हालने को बोल रहा है, बाकी अंगों को काटने को बोल रहा है।

यदि ये कहो कि आर्य समाज ने अच्छे काम बहुत किये हैं तो फिर :- 

राम रहीम के लाखों शिष्य मोदी जी के सफाई अभियान से पहले से ही अनेक शहरों में सफाई अभियान चला कर पूरे शहर को स्वच्छ करते थे, ये भी तो बहुत अच्छा काम है।  उन्होंने लाखों वृक्ष लगाए थे, ये भी तो बहुत अच्छा काम है। आर्य समाज के लोगों के बस में नहीं स्वेच्छा से झाड़ू उठाकर शहर साफ करने। क्योंकि वहां तो सब ब्राह्मण बनने जाते हैं। अब भला वहां जाकर भी कोई झाड़ू ही मारेगा तो उस बिचारे को वहां जाने का लाभ क्या होगा? इसलिए झाड़ू तो वो नहीं लगाएंगे।

आसाराम बापू तो पुराणों का विरोध भी नहीं करते थे, भगवान के साकार रूप को भी मानते थे, ब्रह्मचर्य और आयुर्वेद पर आर्य समाज से अधिक पुस्तकें उनके यहां से छपी हैं। ये भी तो अच्छा काम है। फिर उनका भी विरोध न करो। उनके भी अनेकों गौशालाएं थीं, उन्होंने भी लोगों को ईसाई मिशनरियो से बचाया था। फिर उनका भी विरोध न करो।

और जो तुम ये कहो कि आसाराम और राम रहीम तो अपराधी हैं, तो फिर आर्य समाज गरुकुल के भी एक-दो आचार्य यौन शोषण के मामले में फंस चुके हैं।

आर्य समाज आपके राम, कृष्ण, शिव , शक्ति को ईश्वर ही नहीं मानता, उनकी लीला, कथाओं से युक्त पुराणों को नहीं मानता। आपने जिन्हें परमेश्वर माना, उनको आर्य समाजियों ने आपके जैसे साधारण मनुष्य बना कर रख दिया।

स्वामी दयानंद जी ने न तो आदि गुरु शंकराचार्य को सही माना, न रामानुजाचार्य जी को,न निम्बार्काचार्य जी को, न वल्लभाचार्य जी को, न ही अन्य मीरा बाई, सूरदास, नामदेव,नाभादास, गुरु नानक आदि भक्तों को। उन्होंने अपने आप को ही सबसे सही माना। 

आर्य समाज की नज़र में मूर्ति पूजा करना भी मानसिक विक्षिप्तता है, और राम नाम जपना भी बेकार की बात है। मस्तक पर तिलक लगाना भी विघ्न है।

इतने पर भी आपको लगता है कि आर्य समाजी लोग धर्म रक्षक हैं तो फिर आसाराम, राम रहीम, साईं बाबा, ब्रह्मकुमारी आदि भी धर्म को किसी न किसी रूप में संजो कर रखे ही हुए हैं। फिर तो वे भी ठीक हैं।

No comments:

Post a Comment

दयानन्द के अनर्थ

दोस्तों मैं एक मुसलमान हूं इसलिए मेरा फर्ज है समाज की गंदगी को खत्म करना इसलिए आर्य समाज नामी गंदगी को खत्म होना चाहिए जिसने समाज को गुमराह ...