दयानंद पैदाइशी मुर्ख
---------------------------------------------------(दयानंद ने प्रमाण के साथ स्वीकार किया कि वो पागल है)
सत्यार्थ प्रकाश अष्टम समुल्लास
दयानंद लिखते हैं - जैसे कोई कहे कि ‘मम मातापितरौ न स्तोऽहमेवमेव जातः। मम मुखे जिह्वा नास्ति वदामि च ।’
अर्थात् मेरे माता-पिता न थे ऐसे ही मैं उत्पन्न हुआ हूं। मेरे मुख में जीभ नहीं है परन्तु बोलता हूं। बिल में सर्प न था निकल आया। मैं कहीं नहीं था, ये भी कहीं न थे और हम सब जने आये हैं। ऐसी असम्भव बात प्रमत्तगीत अर्थात् पागल लोगों की है।
इसके बाद स्वामी जी इसी समुल्लास में आगे लिखते हैं कि -
'मनुष्या ऋषयश्च ये' [यजु: अध्याय ३१, मुंडकोप० ९, और २/७/१]
'ततो मनुष्या अजायन्त’ [शत० ब्रा० कां० १४]
इस प्रमाण से यही निश्चय है कि आदि में अनेक अर्थात् सैकड़ों, सहस्रों मनुष्य उत्पन्न हुए । और सृष्टि में देखने से भी निश्चित होता है कि मनुष्य अनेक माँ बाप के सन्तान हैं।
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समीक्षा- दयानंद अपनी बुद्धि मानो जैसे कबाडे में बेच आए हो, ऐसा मैं इसलिए बोल रहा हूँ क्योंकि अपनी बात को सिद्ध करने के लिए दयानंद ने जो दो फर्जी मंत्र चेप मारे, और उन्हें वेद वचन बताया, असल मे ऐसा कोई भी मंत्र वेद, उपनिषद, या फिर ब्राह्मण ग्रंथ में मौजूद ही नहीं है
खेर दयानंद के इस दावे में कितनी सच्चाई है आइए उसकी जांच करते हैं ।
स्वामी जी आदि में मनुष्यों की सृष्टि को लेकर क्या मानते हैं क्या नहीं, वो उनका अपना मत है और उससे हमें कुछ मतलब नहीं, अब क्योकि दयानंद इतिहास, पुराण तो मानते नहीं इसलिए इस विषय पर बात करना व्यर्थ है पर स्वामी जी के इस लेख से जो हाल प्रकट होता है सो लिखते हैं, पाठकगण ! ध्यान दें -
#चुतियापा_नम्बर_१• इसके प्रमाण में दयानंद ने स्वयं ही उल्टी सिधी संस्कृत गढ़ कर उसे वेद वचन बता दिया । पर उसमें कितनी सच्चाई है आइए उसकी जांच करते हैं -
दयानंद लिखते है- 'मनुष्या ऋषयश्च ये' [यजु: अध्याय ३१, मुंडकोप० ९ और २/७/१]
यजुर्वेद अध्याय ३१ में कुल २२ मंत्र है पर उनमें से किसी एक में भी ऐसा कुछ भी नही लिखा । अब या तो दयानंद ने कभी वेद ही नही पढ़े या फिर वो इतने बड़े धूर्त थे कि अपने झूठ को ईश्वरीय वाणी बताकर लोगों को मुर्ख बनाना चाहते थे
अर्थात यजुर्वेद अध्याय ३१ में ये मंत्र नहीं है ऐसे ही निकल आया ।
(दयानंद के पागल होने का पहला प्रमाण)
#चुतियापा_नम्बर_२ - दयानंद के अनुसार यह मंत्र मुंडकोपनिषत् ९और २/७/१ में भी है
बड़े आश्चर्य की बात है कि पुरे मुंडकोपनिषत् में कुल ३ ही मुंडक है फिर ये नौवां मुंडक कहाँ से आ गया
और मुंडकोपनिषत् के ३ मुंडक के प्रत्येक मुंडक में दो, दो खंड है अर्थात पुरे मुंडकोपनिषत् में कुल मिलाकर ६ खंड है । और दयानंद लिखते है कि यह मंत्र द्वितिय मुंडक के सातवें खंड का पहला मंत्र है । जबकि द्वितिय मुंडक मे केवल २ ही खंड है । फिर दयानंद ये सातवाँ खंड कहाँ से लेकर आए जबकि ७ खंड तो पुरे मुंडकोपनिषत् मे ही नही है
अब या तो दयानंद पागल हो गए या फिर दुसरे को पागल बनाना चाहते थे
अर्थात मुंडकोपनिषत् में ये मंत्र नही है फिर भी निकल आया ।
(दयानंद के पागल होने का दूसरा प्रमाण)
#चुतियापा_नम्बर_३ - दयानंद प्रमाण स्वरूप एक और मंत्र लिखतें है - 'ततो मनुष्या अजायन्त’ [शत० ब्रा० कां० १४]
दयानंद का कहना है कि ये मंत्र शतपथ ब्राह्मण के १४ वें कांड का है।
शतपथ ब्राह्मण के १४ वें कांड में लगभग ८५० मंत्र है परन्तु उनमें से एक में भी ऐसा कुछ भी नही मिलता जैसा कि दयानंद लिखें होने का दावा करते हैं, दयानंद जानते थे कि उनके द्वारा तैयार ये फर्जी मंत्र वेद, उपनिषद, ब्राह्मण ग्रन्थ आदि मे कही नही मिलने वाला , और यदि उनका ये झूठ यदि लोगों के सामने आ गया तो उनकी थुत पर धर के जूते
बरसेंगें, इसलिए दयानंद ने किसी भी मंत्र का रेफरेंस नही लिखा बस भोले भाले कम अक्ल, दिमाग से पैदल नवीन समाजीयों को भ्रमित करने के लिए झूठ बोल दिया कि ये वाक्य वेद आदि ग्रंथों में लिखा है
अर्थात शतपथ ब्राह्मण के १४ वें कांड में ऐसा कुछ नहीं मिला, फिर भी दयानंद ने झूठ बोला कि ये मंत्र शतपथ ब्राह्मण से है
(दयानंद के पागल होने का तीसरा प्रमाण)
अर्थात दयानंद के पास अपनी बात को सिद्ध करने के लिए एक भी ऐसा ठोस प्रमाण नहीं था जिससे वो अपनी बात को सिद्ध कर सकें , लेकिन दयानंद ने फिर भी फर्जी मंत्र चेप मारे
अंततः सब प्रमाणों को देखने और समझने व अच्छी प्रकार से जांचने के बाद यही सिद्ध होता है कि दयानंद ने जो मंत्र प्रमाण स्वरूप प्रस्तुत किए वेद आदि ग्रंथों में उनका मिल पाना असंभव है, और जैसा कि स्वामी जी अपने अष्टम समुल्लास में लिखते हैं कि-
जैसे कोई कहे कि ‘मम मातापितरौ न स्तोऽहमेवमेव जातः। मम मुखे जिह्वा नास्ति वदामि च ।’
अर्थात् मेरे माता-पिता न थे ऐसे ही मैं उत्पन्न हुआ हूं। मेरे मुख में जीभ नहीं है परन्तु बोलता हूं। बिल में सर्प न था निकल आया। मैं कहीं नहीं था, ये भी कहीं न थे और हम सब जने आये हैं। ऐसी असम्भव बात प्रमत्तगीत अर्थात् पागल लोगों की है।
अर्थात ये सभी बातें स्वामी दयानंद पर भी लागू होती है अत: सब प्रमाणों को मद्दे नजर रखते हुए स्वामि दयानंद के कथनानुसार ही स्वयं निर्मित फर्जी मंत्रो द्वारा ऐसी असंभव बात करने के लिए दयानंद को पागल घोषित किया जाता है 


!!जय श्री राम!!
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