Thursday, 25 March 2021

आर्य समाजी ग्रंथों की कमियां।

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आर्य समाज की वेदृषि वाली रामायण के भरत जी तो स्वप्न के शुभाशुभ फल को मानते हैं। लगता है आर्य श्रेष्ठ भरत जी भी पौराणिक थे।

द्वापर और त्रेता के परशुराम और हनुमान दोनों अलग अलग हैं। भला कोई लाखों वर्ष कैसे जी सकता है? जियेगा तो आर्य समाज की बात झूठी हो जाएगी

आर्य समाज की vedrishi वाली रामायण में लिखा है कि हनुमान की गर्जना से ही  राक्षस मर गए। 
कोई आर्य समाजी अपनी चीख से ऐसा करे तो माने


जगदीश्वरानंद आर्य:- हनुमान जी mono plane से गए।
राहुल आर्य:- हनुमान जी तैर कर गए।
अग्निव्रत आर्य:- हनुमान जी उड़ कर गए।


आर्य समाजियों की Vedrishi वाली रामायण के हनुमान तो अपने शरीर को बहुत छोटा और बहुत बड़ा भी कर लेते हैं। 
इसमें कौन सा विज्ञान है?

आर्य समाज के अनुसार त्रेता वाले परशुराम और द्वापर वाले परशुराम अलग-अलग व्यक्ति हैं।
लेकिन उनके माता पिता का नाम इनको नहीं मालूम।

सत्यार्थ प्रकाश के अनुसार तो कम से कम 25 वर्ष की आयु तक गरुकुल में रह कर सब विद्याओं का अध्ययन करे और 25 वर्ष की अवस्था में गरुकुल में आचार्य द्वारा परीक्षा करके बालकों का वर्ण निर्धारण होना चाहिए, जबकि हमारे भारत में तो ऐसे अनेकों उदाहरण हैं जब 15 वर्ष और इससे भी कम आयु के क्षत्रिय बालक भी युद्ध लड़ने गए। धर्मवीर छत्रपति सम्भा जी महाराज और गुरु गोविंद सिंह जी के पुत्र उन्हीं लोगों में से हैं। अब यदि आर्य समाज के थोथे सिद्धांत उस समय लागू होते तो हिंदुओं की क्या स्थिति होती, ये विचार करने योग्य है।

शिवाजी महाराज तो "जय भवानी" का ही नारा लगाते थे। "ओ३म" का नहीं। 
राजपूत योद्धा भी "जय एकलिंगनाथ" बोलते थे।
मतलब वे सब पौराणिक थे।

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ये है असली वाल्मीकि रामायण जिसमें बालकाण्ड में देवताओं का ब्रह्मा जी के पास जाने और फिर भगवान विष्णु से अवतार लेने की प्रार्थना की गई है।
ये सब वेदृषि रामायण में से उड़ा दिया गया।
 क्यों? क्योंकि अनार्य समाजी इतने गिरे हुए लोग हैं कि अपने मत की पुष्टि के लिए इनको भले ही वाल्मीकि जी की, वेद व्यास जी की लिखी बातों को काटना पड़े तो भी काटेंगे। 
ये लोग साकार भगवान को नहीं मानते, अवतार को नहीं मानते, देवी देवताओं को नहीं मानते परन्तु वाल्मीकि, व्यास आदि ऋषि तो मानते हैं।  इसलिए ले दे कर अनार्य समाजियों के पास यही उपाय बचता है कि चलो अब ऋषियों के साहित्य पर ही कैंची चलाओ। ताकि इनके मार्ग में कोई चीज़ रोड़ा न बने।
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अनार्य समाजी लोग अक्सर दूसरों पर मिलावट का आरोप लगाते हैं। वे कहते हैं कि पंडे पुजारी ब्राह्मणों ने रामायण, महाभारत में मिलावट कर दी। हालांकि वे आजतक सिद्ध नहीं कर पाए कि मिलावट किसने करी, कहाँ कहाँ करी। वास्तव में वो आरोप केवल ब्राह्मणों को गाली देने का एक बहाना है। क्योंकि लोकतंत्र में ब्राह्मणों को कोई भी गाली दे सकता है। इस बात का फायदा भीमटों के साथ साथ अनार्य समाजी भी उठाते ही हैं।

 आज मैं आपको प्रमाण सहित दिखा रहा हूँ कि कैसे अनार्य समजियों ने खुद रामायण में कांट छांट भी करी और मिलावट भी करी। दो अलग अलग श्लोकों के टुकड़े उठाकर, उन्हें एक श्लोक बना दिया, ताकि इनका अपना मत सिद्ध हो जाये। और इसी वेदृषि वाली रामायण को ये लोग शुध्द रामायण कहकर बेचते हैं। अब बेचारे लोगों को क्या मालूम कि शुध्द वाली वास्तव में शुद्ध नहीं बल्कि मिलावटी है।

अब नीचे दिए चित्रों में देखिए। ये जो सफेद वाला चित्र है ये वेदृषि रामायण के बालकाण्ड का आठवां सर्ग है जिसमें लिखा है कि दशरथ जी के पुत्रेष्टि यज्ञ सम्पन्न होने पर ऋष्यश्रृंग द्वारा रानियों को खीर का पात्र दिया गया।

और जो थोड़ा पीला चित्र है वो असली रामायण का है जिसमें यज्ञकुंड से विशालकाय पुरुष का प्रकट होना लिखा है।

अब आप इस बात पर भी गौर कीजिए कि कैसे अनार्य समाजियों ने दो अलग अलग श्लोकों से कुछ टुकड़ा उठाकर उनको जोड़ कर एक श्लोक बना दिया। असली वाल्मीकि रामायण (पीले रंग के पृष्ठ) में बालकाण्ड के 16वें सर्ग के श्लोक संख्या 11, 14, 15 में जो श्लोक दिए हैं उन्हीं को टुकड़ों में उठाकर, उनमें संस्कृत का हेरफेर करके नए श्लोक रचकर उसे वेदृषि रामायण के बालकाण्ड के सर्ग 8 में डाल दिया गया है। (लाल निशान वाले संस्कृत श्लोकों को ध्यान से पढ़िए कि कैसे श्लोक बिगाड़े गए, उनमें अनार्य समाज द्वारा मिलावट करी गयी)

पहली बात तो ये कि जो श्लोक असली रामायण में सर्ग संख्या 16 में थे वो श्लोक वेदृषि रामायण में सर्ग संख्या 8 में कैसे? लगता है बीच वाले 8 सर्ग अनार्य समाजी चाय में डुबोकर निगल गये? वो क्यों निगल गए उसका कारण अगली किसी पोस्ट में बताऊंगा। अभी आप लोग इनकी इस मक्कारी को देखिए कि कैसे ये ऋषियों के साहित्य को नष्ट करने का प्रयास कर रहे हैं, उसे अपने मतानुकूल ढालने का प्रयास कर रहे हैं। श्लोकों को काट रहे हैं, अपने नए श्लोक बना कर डाल रहे हैं। जो वाल्मीकि जी ने लिखा उसमें छेड़छाड़ करने का दुस्साहस ये लोग कर रहे हैं। क्यों? क्योंकि दिव्य देव, गन्धर्व आदि योनियों को ये नहीं मानते, चमत्कारों को ये नहीं मानते, भगवान के साकार रूप को ये नहीं मानते। इसलिए जहां कहीं भी भगवान के साकार रूप, दिव्य चमत्कारों का वर्णन ऋषियों ने किया उन सब बातों को ये लोग काट देते हैं, बदल देते हैं। ये सब नीचता किसलिए? ताकि इनके मत की पुष्टि हो जाये। मतलब ये तो वही बात हुई कि मानो कोई बालक अपनी गणित की पुस्तक में से 6 का पहाड़ा वाला पन्ना ही फाड़ फैंके और बाद में लोगों को, अध्यापकों को, कहता फिरे कि देखो 6 का पहाड़ा होता ही नहीं। 

जय श्री राम।


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वेदृषि रामायण के बालकांड के सर्ग 6 के श्लोक संख्या 5 में दशरथ जी कह रहे हैं कि "विधिहीन यज्ञ करने वाला शीघ्र नष्ट हो जाता है"।

तो कोई आर्य समाजी हमें ये बताए कि ऐसी कौन सी यज्ञ करने की विधि होती है जिसे न करने से ऐसी नौबत आ जाये कि यज्ञकर्ता ही नष्ट हो जाये? क्योंकि आर्य समाज के अनुसार तो वायुमंडल की शुद्धि के लिए ही यज्ञ किया जाता है। तो उसमें विधि क्या? अरे जब हवन सामग्री घृत आदि के साथ मिलाकर अग्नि में आहुति दोगे तो दो ही बातें होंगी। या तो वायु शुद्धि हो ही जाएगी अथवा नहीं होगी। और मान लो कि वायु शुद्धि न हुई तो उससे यज्ञकर्ता कैसे नष्ट हो सकता है?  अब बताओ कि वो कौन सी विधि है जिसे पालन न करने पर यज्ञकर्ता शीघ्र नष्ट हो जाता है?

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आर्य समाजियों की वेदृषि रामायण के बालकांड के सर्ग 3 के श्लोक संख्या 5 में लिखा है कि "दशरथ उसी प्रकार अयोध्या में निवास करते थे जिस प्रकार स्वर्ग में इन्द्र बसते हैं।" तो कृपया ये बताइये कि ये इन्द्र कौन हैं? स्वर्ग कहाँ है? और कैसा इन्द्र का ऐश्वर्य है? क्योंकि जब दशरथ जी की यहां इन्द्र से तुलना की गई है तो इसका अर्थ इन्द्र भी मौजूद है तभी तो उससे दशरथ जी की तुलना की गई है। इसलिए हम जानना चाहते हैं कि इन्द्र कहाँ रहता था, स्वर्ग कहाँ था और उसका वैभव कैसा था जो अयोध्या से उसकी तुलना की गई?
और स्वर्ग को जबरदस्ती त्रिविष्टप क्यों लिखा है तुमने?

 फिर श्लोक संख्या 6 में लिखा है कि "सब प्रकार के यंत्र अयोध्या में थे तथा नाना कलाविशारद शिल्पी वहां वास करते थे।" तो अब तुम लोग ये बताओ कि "नाना कलाविशारद शिल्पी" जो थे ये किस वर्ण के थे? ब्राह्मण थे, क्षत्रिय थे, वैश्य थे या शूद्र थे? क्योंकि तुम्हारे दयानंद के अनुसार तो शुद्र का अर्थ होता है अज्ञानी मूर्ख। तो यदि वे नाना कला विशारद लोग शुद्र वर्ण के थे तब वे मूर्ख कैसे कहे जा सकते हैं? क्योंकि उन्हें अनेक कलाएं आती हैं, वे उच्च कोटि के शिल्पकार (architects/ civil engineers) हैं तो फिर वे मूर्ख नहीं कहे जा सकते। तो अब तुम लोग बताओ कि वे कौन से वर्ण के लोग थे? यदि शुद्र थे तब तो दयानंद का खण्डन हो जाएगा क्योंकि उसने शुद्र का अर्थ अज्ञानी मूर्ख किया है और मैं समझता हूं कि किसी भी civil engineer या architect को अज्ञानी या मूर्ख नहीं कहा जा सकता। और यदि वे शुद्र नहीं थे तो शास्त्रानुसार वे किस वर्ण में गिने जाएंगे?

फिर अगले श्लोक संख्या 7 में लिखा है कि उस नगर में सूत, मागध और वंदीजन भी रहते थे। तो कर्म के आधार पर वर्णव्यवस्था मानने वाले तुम लोग अब ये बताओ कि वे सूत, मागध और वंदीजन किस वर्ण में आएंगे? क्योंकि यदि वे शुद्र हैं तो फिर उन्हें भी मूर्ख गिनना पड़ेगा (ऐसा ही स्वामी दयानंद का आदेश है)। यदि वे शुद्र नहीं थे तो किस वर्ण में गिने जाएंगे?

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वेदृषि रामायण बालकांड सर्ग 2- श्लोक संख्या 21 में लिखा है कि " श्री राम, लक्ष्मण, सीता और पत्नियों तथा राष्ट्र सहित दशरथ जी का जो हंसना, बोलना आदि वृत्तांत और चरित्र थे उन सबको महर्षि  बाल्मीकि ने अपने धर्म बल से यथावत जान लिया। " 

कोई आर्य समाजी बता सकता है कि अपने आश्रम पर बैठे हुए वाल्मीकि जी को दशरथ जी व उनके परिवार का हंसना, बोलना कैसे मालूम पड़ गया? ये तो वही बात हुई कि मैं बैठा हूँ अपने घर और मुझे मालूम पड़ जाए कि राहुल आर्य अपने कमरे में बैठा क्या कर रहा है, किससे बातें कर रहा है? बताइये ऐसा कैसे सम्भव है? हां यदि मैंने कैमरे लगा रखे हों उसके कमरे में तब तो सम्भव है।

ध्यान रहे रामायण लिखी गयी थी तब जब राम जी वनवास से लौट चुके थे, और इसमें चरित्र व घटनाएं लिखी हुई हैं वे सब जो रामायण लेखन आरम्भ से पूर्व ही घट चुके थे। तो ऐसा कैसे सम्भव है कि भूतकाल में अनेक वर्षों पहले घटी घटनाओं को वाल्मीकि जी ने जान लिया। और वो भी दशरथ जी का हंसना, बोलना तक जान लिया? मतलब भूतकाल में किस दिन दशरथ जी ने महल में कब किससे क्या बोला, कब हंसे ये बात भी वाल्मीकि जी को मालूम पड़ गयी और वो भी अपने आश्रम में बैठे बैठे। कमाल है! क्या आर्य समाज इस तरह के चमत्कारों को मानता है? यदि नहीं मानता तो आर्य समाजी बताएं कि वाल्मीकि जी को वो घटनाएं कैसे मालूम पड़ीं, जो किसी की private (हंसना, बोलना) बातें थीं??

श्लोक संख्या 22 में लिखा है कि लक्ष्मण जी के साथ राम जी ने वन में विचरते हुए जो कुछ किया था, उन सबका वाल्मीकि जी ने साक्षात्कार किया। अब कोई आर्य समाजी हमें ये बताए कि वन में तो राम, लक्ष्मण, सीता ही थे। कोई जासूस तो उनके पीछे वाल्मीकि जी ने नहीं लगाया था न? फिर वाल्मीकि जी को वो घटनाएं कैसे पता लग गईं कि राम जी ने वन में क्या क्या किया? क्या आप लोग घर बैठे बैठे पता कर सकते हो कि इस समय मैं क्या कर रहा हूँ? क्या आप घर बैठे बैठे पता कर सकते हो कि 2 वर्ष पहले मैंने क्या किया था? तो वाल्मीकि जी को कैसे पता लगा? अब इस चमत्कार को आर्य समाजी मानेंगे या नहीं? यदि नहीं मानोगे तो वेदृषि वाली रामायण झूठी हो जाएगी।  

23वें श्लोक में भी यही लिखा है कि "जो जो चरित्र पहले हो चुके थे उन सबको हथेली पर रखे आंवले की भांति देखा "। अब बताओ तुम लोग कि किसी की प्राइवेट लाइफ में  भूतकाल में घटी उन घटनाओं को जानना कैसे सम्भव है? क्या आप जान सकते हो कि मैंने 5 वर्ष पूर्व क्या काम किया था? नहीं जान सकते न? तो वाल्मीकि जी ने कैसे जाना? बात बात पर विज्ञान ढूंढने वाले आर्य समाजी हमें बताएं कि इसमें कौन सा विज्ञान है ? यदि न बता पाएं तो जाकर कहीं शर्म से डूब मरें।


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वेदृषि रामायण बालकांड सर्ग 2- श्लोक संख्या 16 में जो ब्रह्मा जी आये हैं, वे कौन हैं? वे ऋषि थे या देवलोक के दिव्य देवता? यदि वे ऋषि / मनुष्य थे तो क्या कोई आर्य समाजी उन ब्रह्मा जी के बारे में हमें बता सकता है कि वे किसके पुत्र थे, उनका जीवन चरित क्या है? 

 श्लोक संख्या 17 में ब्रह्मा जी कह रहे हैं "जबतक धरा धाम पर पर्वत और नदियां रहेंगी तब तक राम कथा रहेगी"। क्या ये भविष्यवाणी नहीं? कोई आर्य समाजी बता सकता है कि ब्रह्मा जी ने ये बात किस बल पर कह दी? उन्हें क्या मालूम भविष्य में क्या होगा? आर्य समाजी तो भविष्यवाणी में मानते नहीं तो कोई आर्य ऋषि इस तरह का मिथ्या प्रलाप भला क्यों करेगा? हां यदि ऋषि पौराणिक हुआ तब तो वो इस तरह की बात बोल सकता है।


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वेदृषि रामायण बालकांड सर्ग 2- श्लोक संख्या 14 में वाल्मीकि जी द्वारा उस तीर्थ में स्नान करना बोला गया।  अब आर्य समाजी मुझे बताएं कि तुम लोग तो तीर्थों में मानते ही नहीं।।फिर यहां तीर्थ में विधिवत स्नान करना क्यों लिख मारा है?  इससे तो यही सिद्ध होता है कि वाल्मीकि जी भी पौराणिक थे।

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वेदृषि रामायण बालकांड सर्ग 2:-   9वें श्लोक में लिखा गया है कि वाल्मिकी जी ने कहा " है निषाद ! तुझे बहुकाल पर्यंत सुख शांति न मिले" । अब कोई आर्य समाजी मुझे बताए कि ये वाल्मीकि जी द्वारा दी गयी बद्दुआ / हाय / श्राप नहीं तो क्या है? क्या आर्य समाज श्राप में विश्वास रखता है। और श्राप भी ऐसा जिसमें भविष्य वाणी हो कि तुझे बहुकाल पर्यंत सुख न मिले। अब ऐसी भविष्यवाणी कौन कर सकता है? आर्य समाज न तो श्राप में विश्वास रखता है न ही ऐसी किसी भी तरह की भविष्यवाणियों में। क्या गारन्टी है कि उसे सुख नहीं मिलेगा? तो क्या वाल्मीकि जी पौराणिक पण्डे थे जो ऐसे श्राप देने में विश्वास रखते थे। 

श्राप देने के बाद उनका दुखी होना इसी बात का संकेत है कि उन्हें अपने श्राप के सत्य हो जाने का भय था, इसलिए वे दुखी हो गए कि उन्होंने आवेश में आकर ये क्या कर दिया! अतः सिद्ध है कि उस काल में भी श्राप आदि पर विश्वास किया जाता था। वरना आर्य समाजी तो सड़क पर रखे टोने टोटके से भी नहीं दुखी होते, और वाल्मीकि जी श्राप देने से दुखी हो गए? कमाल है।

दयानन्द स्वामी ने भर भर के दूसरे सन्तों / सम्प्रदायों को कठोर शब्द कहे, तो भी उन्हें दुख न हुआ। किंतु वाल्मीकि जी एक हत्यारे को श्राप देकर भी दुखी हुए।

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#बालकाण्ड_सर्ग_2 

आर्य समाज की वेदृषि रामायण के बालकाण्ड के सर्ग - 2 के श्लोक संख्या 2 में लिखा है कि " देवर्षि नारद " आकाश मार्ग से चले गए। और आकाश मार्ग से जाने की व्याख्या करते हुए पृष्ठ के अंत में लिखा है कि " उस काल में अनेक लोगों के पास छोटे छोटे विमान होते थे। नारद जी भी विमान से गए थे"।

● अब मैं सब आर्य समाजियों से पूछना चाहता हूं कि एक तरफ तो तुम्हारे अग्निवर्त जी बोलते हैं कि योगबल से उड़ना सम्भव है, विभूतिपाद की सिद्धियां भी सत्य हैं; और हनुमान जी योगबल से उड़कर गए थे। वहीं दूसरी तरफ तुम अपनी रामायण में ये लिखते हो कि "देवर्षि नारद" प्लेन से गए थे। मतलब एक व्यक्ति जो ऋषि से भी ऊंचा "देवर्षि" है वो तो जा रहा है प्लेन पर, और हनुमान जी गए थे उड़कर? कमाल हो गया। जब हनुमान जी मे योगबल से सिद्धियां आ सकती हैं, तो देवर्षि नारद में योगबल नहीं था क्या? बड़ी अजीब बात है। तो मतलब एक देवर्षि के योग का स्तर वन में रहने वाले वानर से भी घटिया था? फिर उनको देवर्षि कहना ही नहीं चाहिए। फिर वे देवर्षि की उपाधि के लायक ही नहीं। फिर क्यों उन्हें देवर्षि कहा गया? और यदि उस ज़माने में प्लेन अनेक लोगों के पास होते थे, तो ये बात कहीं ग्रन्थों में तो लिखी नहीं हुई। बल्कि तुम लोगों ने अपने मन से बनाकर जोड़ी है। अगर अनेक लोगों के पास विमान होते तो बताओ ईंधन क्या डलता था उनमें? जब तुमने ये बात खोज ली है कि अनेक लोगों के पास विमान होते थे, तो ईंधन की भी जानकारी दो। हवाई पट्टी/ हवाई अड्डों की भी जानकारी दो। 

● अगले श्लोक में तुमने संस्कृत के "देवलोक" का अर्थ हिंदी में "देवाश्रम" कैसे किया?  लोक और आश्रम में अंतर समझ नहीं आता तुम लोगों को? या जानबूझकर गलत अनुवाद किया ताकि भोले भाले हिंदुओं को पागल बना सको? क्योंकि तुम लोग देवलोक/ स्वर्गलोक में मानते ही नहीं हो, इसलिए। 

[ विमान केवल देवलोक के देवताओं और महान राजाओं के पास होते थे वो भी मन के संकल्प से उड़ने वाले, लेकिन आर्य समाज देवलोक के अस्तित्व को मानता ही नहीं ]

नीचे वेदृषि रामायण, बालकाण्ड, सर्ग -2 का स्क्रीनशॉट दिया जा रहा है। :-


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#बालकाण्ड_सर्ग_2

आर्य समाजियों द्वारा शुद्धिकरण के नाम पर छापी गयी वेदृषि वाली रामायण के बालकाण्ड के सर्ग- 2 में केवल 25 श्लोक ही छापे गए हैं। जबकि असली मूल वाल्मीकि रामायण के बालकाण्ड सर्ग -2 में कुल 43 श्लोक हैं। अर्थात आर्य समाजियों ने महर्षि वाल्मीकि जी की लेखनी पर कुठाराघात करते हुए उनके साहित्य को नष्ट करने का प्रयास किया। और बालकाण्ड के सर्ग - 2 में दिए गए 43 श्लोकों में से  18 श्लोकों को हटा दिया गया।

नीचे देखिए मैंने प्रमाण के तौर पर दोनों रामायणों के बालकांड के सर्ग- 2 की फ़ोटो भी लगाई है। वेदृषि रामायण के दूसरे सर्ग में केवल 23 श्लोक ही छापे गए हैं।

 मैं पूछता हूँ कि महर्षि वाल्मीकि जी की रचना में कांट छांट करने का अधिकार तुम दुष्ट समाजियों को किसने दिया? दूसरों पर तुम मिलावट का आरोप लगाते हो लेकिन खुद तुम लोगोंने क्या कारनामे कर रखे हैं, पहले अपने अंदर झांक कर देख लो। खुद तुम लोगों ने महान तपस्वी महर्षि वाल्मीकि जी के साहित्य पर कैंची चलाई और ऐसा करते हुए तुम्हें तनिक भी शर्म न आई। अरे डूब मरो जाकर।

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#बालकाण्ड_सर्ग_1 :- 

आर्य समाजियों द्वारा शुद्धिकरण के नाम पर छापी गयी वेदृषि वाली रामायण के बालकाण्ड के प्रथम सर्ग में केवल 18 श्लोक ही छापे गए हैं। जबकि असली मूल वाल्मीकि रामायण में कुल 100 श्लोक हैं। अर्थात आर्य समाजियों ने महर्षि वाल्मीकि जी की लेखनी पर कुठाराघात करते हुए उनके साहित्य को नष्ट करने का प्रयास किया। और बालकाण्ड के प्रथम सर्ग में दिए गए 100 श्लोकों में से 82 श्लोकों पर कैंची चलाकर हटा दिया गया।

 मैं पूछता हूँ कि महर्षि वाल्मीकि जी की रचना में कांट छांट करने का अधिकार तुम दुष्ट समाजियों को किसने दिया? दूसरों पर तुम मिलावट का आरोप लगाते हो लेकिन खुद तुम लोगोंने क्या कारनामे कर रखे हैं, पहले अपने अंदर झांक कर देख लो। खुद तुम लोगों ने महान तपस्वी महर्षि वाल्मीकि जी के साहित्य पर कैंची चलाई और ऐसा करते हुए तुम्हें तनिक भी शर्म न आई। अरे डूब मरो जाकर।

 ऐसा तो कुछ भी नहीं लिखा था उन श्लोकों में जो तुम्हारे मत के विपरीत था। तुम लोग अक्सर जानबूझकर उन्हीं श्लोकों को मिलावटी घोषित करते हो और वे ही श्लोक हटाते हो जिनमें भगवान के साकार रूप का वर्णन होता है अथवा कोई चमत्कारिक बात होती है अथवा कोई ऐसी बात जो तुमको आपत्तिजनक लगती है। किंतु इन हटाये गए 82 श्लोकों में से 75 श्लोक तो ऐसे थे जिनपर किसी आर्य समाजी विद्वान को कोई आपत्ति नहीं हो सकती थी। क्योंकि उन 75 श्लोकों में न तो कोई चमत्कार वाली बात थी,न ही भगवान के साकार रुप वाली। उन 82 श्लोकों में भी केवल 7 श्लोक ऐसे थे जो आर्य समाज के मत के खण्डन में थे। बाकी के 75 पर तो किसी को कोई आपत्ति हो ही नहीं सकती थी। फिर भी तुम लोगों ने हटा दिए। मतलब नीचता की सारी हदें पार करते हुए तुम लोगों ने वाल्मीकि जी के साहित्य पर मनमानी कैंची चलाई और अब इस वेदृषि रामायण को शुद्ध कहकर बेचते हो। 

मुस्लिम आक्रांता आग लगा कर हमारा साहित्य नष्ट करते थे और तुम लोग कांट छांट कर, कैंची चलाकर साहित्य नष्ट करने पर तुले हुए हो। 

 देखिए आर्य समाज की वेदृषि वाली रामायण के बालकाण्ड के सर्ग-1 की फ़ोटो जिसमें केवल 18 श्लोक हैं।  और असली वाल्मीकि रामायण के बालकाण्ड के प्रथम सर्ग की फ़ोटो जिसमें कुल 100 श्लोक हैं:-

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वेदृषि वाली रामायण की भूमिका में ही रामायण काल का  वर्णन करते हुए आप लोगों ने वायु पुराण के श्लोकों से रामायण काल की गणना की है और इतना ही नहीं बल्कि आपकी वेदृषि वाली रामायण में तो ये भी लिखा है कि रामायण काल इस मन्वन्तर के 24वें त्रेता युग में लगभग 1 करोड़ 81 लाख वर्ष पूर्व का है।

अब पाठक गण विचार करें कि एक तरफ तो राहुल आर्य, अमित आर्य जैसे youtubers अपने वीडियोस में रामायण काल को 9 लाख वर्ष पूर्व का बोलते हैं, जबकि स्वामी जगदीश्वरानंद द्वारा संपादित उनकी वेदृषि वाली रामायण में 1 करोड़ 81 लाख वर्ष पूर्व का माना गया है; तो राहुल आर्य/ अमित आर्य ठीक बोल रहे हैं या जगदीश्वरानंद सरस्वती जी ठीक बोल रहे हैं? पहले तो खुद आप लोग निर्णय लीजिये कि कौन बड़ा विद्वान है? Youtube पर गाली देकर पैसे कमाने वाला राहुल आर्य या स्वामी जगदीश्वरानंद सरस्वती जैसा बड़ा आर्य विद्वान?  निर्णय करके हम हिन्दुओ को जरूर बता देना। क्योंकि हम तुम लोगों के दोगलेपन से परेशान हो चुके हैं।

एक तरफ तो आप लोग पुराणों को मिलावटी मानते हो, उनको वेद व्यास जी द्वारा रचित भी नहीं मानते और आपके अनुसार तो पुराण रचियता को तो गर्भ में ही मर जाना चाहिए था, पुराणों को जला देना चाहिए; और दूसरी तरफ आप उन्हीं पुराणों से रामायण आदि की काल गणना भी चोरी करते हो, मन्वन्तर , युगादि के मान भी उन्हीं पुराणों से चोरी करते हो। तो ऐसा दोगलापन करते हुए आप लोगों को शर्म क्यों नहीं आती? जब दयानन्द जी ने सत्यार्थ प्रकाश में पुराणों के बारे में कह दिया कि "जो कोई उन ग्रन्थों से कुछ अच्छा भी ग्रहण करना चाहे तो भी बुराई उसके चिपट जाए, अतः उनका त्याग ही उचित है", फिर अपने गुरु की आज्ञा का पालन क्यों नहीं करते? पुराणों से क्यों काल गणना ग्रहण करते हो? ये काल गणना मिलावटी नहीं , इसका क्या सबूत है आपके पास? इसलिए अपनी ये दोहरी चाल चलना बन्द करो, और हिंदुओं को मूर्ख बनाना बन्द करो।

नीचे वेदृषि वाली रामायण से ही स्क्रीनशॉट दिया जा रहा है।

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#आर्य_समाज_की_चालाकियां :-

#पाठ_परिवर्तन :- दूसरों पर मिलावट का आरोप लगाने वाला आर्य समाज स्वयं ही ग्रंथों के श्लोकों में मिलावट करके लोगों को ठगता है। उसका एक उदाहरण आप नीचे दिए हुए फोटोस में देखिए। मनुस्मृति के दूसरे अध्याय का 28 वां श्लोक, वहां पर जो असली मनुस्मृति है उसके अंदर "स्वाध्यायेन व्रतैर्होमै" लिखा हुआ है किन्तु स्वामी जी ने सत्यार्थ प्रकाश के चतुर्थ समुल्लास में पाठ परिवर्तन करके वहां "स्वाध्यायेन जपैर्होर्मे" लिख दिया। इस प्रकार से आर्य समाज अपना मत ऊपर रखने के लिए लोगोंको बुद्धू बनाता है।
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*वैदिक सांख्य दर्शन से आर्य समाज के मत की समीक्षा*

आर्य समाज का मत है कि *"आत्मा स्वभाव से ही कर्म करता है और कर्म का फल भी स्वभाव से भोगता है"* । लेकिन क्या वैदिक दर्शनों में सांख्य दर्शन आर्य समाज के इस मत का समर्थन करता है❓👈🏻 यह जानने के लिए अब हम समीक्षा शुरू करते हैं👇🏻

*न कर्मणाप्यतद्धर्मत्वात् ॥ ५२ ॥(सांख्य दर्शन 1/52)*

*सूत्रार्थ - कर्मणा = कर्म से, अपि = भी , न = नही हो सकता (आत्मा का बंधन),अतद्धर्मत्वात् = क्योंकि यह उस (आत्मा) का धर्म नहीं है।*

*व्याख्या - किसी भी प्रकार (अच्छे अथवा बुरे) कर्म से भी आत्मा का बंधन नहीं हो सकता;क्योंकि कर्म करना (बंधित होना) आत्मा का धर्म नहीं है, कर्म करना ( बंधन) तो शरीर का धर्म है । एक के बन्धन से दूसरे का बन्धित होना तर्क संगत नहीं कहा जा सकता।*

*अतिप्रसक्तिरन्यधर्मत्वे ॥ ५३ ॥(सांख्य दर्शन1/53)*

*सूत्रार्थ - अन्यधर्मत्वे = किसी एक के धर्म से किसी दूसरे का बन्धन मान लेना, अतिप्रसाक्तिः = अति प्रसंग दोष होगा ।*

*व्याख्या - किसी एक के धर्म से दूसरे का बन्धन होना मानने से कथन अत्युक्ति (अति प्रसङ्ग) दोष से युक्त कहा जायेगा।* *अभिप्राय यह है कि एक के धर्म से दूसरे के बन्धन की उक्ति, व्यर्थ ही बात बढ़ाकर कहने के दोष से युक्त होगी।* *यदि उसे यथार्थ सिद्धान्त मान भी लें, तो किसी साधारण व्यक्ति द्वारा किये गये कर्म (धर्म) से मुक्तात्मा भी बन्धन से न बच सकेगा;* *क्योंकि किसी के कर्म का फल कोई भोगेगा। अत: यही निष्कर्ष है कि यह सिद्धान्त भी मिथ्या ही है ॥ ५३ ॥*

*निर्गुणादिश्रुतिविरोधश्चेति ॥ ५४॥ (सांख्य दर्शन 1/54)*

*सूत्रार्थ - निर्गुणादि = श्रुति द्वारा आत्मा को निर्गुण आदि कहा है*, *श्रुतिविरोधश्चेति* = *श्रुति से विरोध होगा* *(आत्मा को बंधनयुक्त कहने से)*

*व्याख्या- श्रुतियों द्वारा आत्मा को निर्गुण, असङ्ग आदि कहा गया है। यथा 'साक्षी चेता केवलो निर्गुणश्च' तथा ' असङ्गो ह्ययं पुरुषः ' आदि। श्वेता० और बृहदा० उपनिषदों में चेतन आत्मा को स्पष्ट रूप से निर्गुण और असङ्ग कहा गया है। अस्तु, प्रकट ही है कि जो निर्गुण (गुणातीत) और असङ्ग है, उसे बन्धनयुक्त कहना उचित नहीं है॥ ५४ ॥*

सांख्य दर्शन के इन सूत्रों👆🏻 ने आर्य समाज के इस मत का खंडन कर दिया। यहाँ सांख्य दर्शन ने स्पष्ट कहा है कि आत्मा स्वभाव से ही अकर्ता , असंग , निर्गुण और मुक्त है । यहाँ सांख्य दर्शन ने आत्मा के कर्ता व कर्मफल भोगता होने का तर्कपूर्वक और प्रमाणपूर्वक खंडन किया है । और वैसे भी प्रश्न यह उठता है कि जब आत्मा प्रकृति से बना ही नही है तो वह प्रकृति से निर्मित कर्म को स्वभाव से करने वाला और कर्म के फल को भोगने वाला कैसे हो सकता है❓इससे सिद्ध हो गया कि आर्य समाज का मत सनातन धर्मशास्त्र विरुद्ध है , और जो मत सनातन धर्मशास्त्र विरुद्ध है वह सनातन धर्मी हो ही नही सकता इसलिए आर्य समाज सनातन धर्मी नही है ।  आर्य समाज सनातन धर्म के विरुद्ध है ।

*🚩🚩🚩हर हर महादेव🚩🚩🚩*

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#सत्यार्थ_प्रकाश 
आर्य समाजी लोग कैवल्य उपनिषद को प्रामाणिक नहीं मानते। उनके अनुसार केवल 11 उपनिषद ही प्रामाणिक हैं और उनके प्रामाणिक अनुसार उन 11 की लिस्ट में कैवल्य का नाम नहीं। परन्तु अपना मतलब साधने के लिए तो ये गधे को भी बाप बना लें। इसलिए सत्यार्थ प्रकाश के आरम्भ में उन्होंने कैवल्य उपनिषद से भी एक मन्त्र उठा लिया।

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