इमां त्वमिन्द्र मीढ्वः सुपुत्रां सुभगां कृणु।
दशास्यां पुत्राना धेहि पतिमेकादशं कृधि।
(ऋग्वेद 10-85-45)
भावार्थ ः ‘‘हे वीर्य सेचन हार ‘शक्तिशाली वर! तू इस विवाहित स्त्री या विधवा स्त्रियों को श्रेष्ठ पुत्र और सौभाग्य युक्त कर। इस विवाहित स्त्री से दस पुत्र उत्पन्न कर और ग्यारहवीं स्त्री को मान। हे स्त्री! तू भी विवाहित पुरुष या नियुक्त पुरुषों से दस संतान उत्पन्न कर और ग्यारहवें पति को समझ।’’
आइये एक नजर डालते है इस मंत्र के शब्दों पर
इमां - इसको ।। त्वम - तुम ।।
इन्द्र - इन्द्रियों को वश मे करने वाला जितेन्द्रिय पुरुष
मिढ़्वा: - सब सुखो का सिंचन करने वाले पुरुष ।।
सुपुत्राम - उत्तम पुत्र ।। सुभगाम - उत्तम भाग्य वाली ।।
कृणु - कर
दश - दस ।। आस्याम - इस पत्नी मे ।।
पुत्राना - पुत्रो को ।। अधेही -
स्थापित कर ।। पतिम् - पति को ।।
एकादशां कृधि - ग्यारहवा कर ।।
भावार्थ - हे इन्द्रियों पर काबू पाने वाले और सुखो का सिंचन करने वाले पुरुष , तु अपनी पत्नी पर सुखो का वर्षण करता हुआ उसे सुपत्रा और सुभागा बना ।। ( वेदिक काल मे 10 पुत्रो की सीमा थी इसलिए यहा भी ये सीमा 10 ही लिखी है और कहा गया है की 10 पुत्रो के बाद ग्यारहवा खुद को समझ )
अब कोइ आर्य समाजी बताएगा ???
की स्वामी जी ने इस मंत्र को क्यों तोड़ा मरोड़ा और इसमे वीर्य , विधवा और नियोग शब्द कहा है ???
और स्वामी जी ने लिखा है "हे वीर्य सेचन हार"
ये वीर्य सेचन हार क्या होता है ???
मैं जानता हु कोई नही बताएगा
क्योंकि इन धूर्त आर्य समाजियों को सिर्फ दयंनण्ड की राह पर चलकर नियोग को बढ़ावा देना है ।।
और अपनी मक्कारी से सनातन को कलंकित करना है ।।
आर्य समाजी वैश्याओ वाली हरकते ना करे ।।
मेसेज और पोस्ट मे अपना ज्ञान ना दे मुझे ।।।
अपना ज्ञान यहा पर दे ।।
डंके की चोट पर ।।।
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