Thursday, 25 March 2021

नियोग

 

दयानंदभाष्य खंडनम् -५ 
स्वामी जी कितने महान थे....
जहाँ जिस श्लोक में नियोग की गन्ध तक नहीं होती थी पहले तो वहाँ नियोग स्वयं गढ़ते थे फिर उसमें ११, ११ वाला तडका दे मारते थे। इसके बाद ही उसे मुर्ख समाजीयो के सामने परोसते थे

आइए स्वामी जी की धूर्तता का एक नमूना दिखाता हूँ आपको
सत्यार्थ प्रकाश चतुर्थ संमुल्लास:-
प्रोषितो धर्मकार्याथ प्रतिक्षयोष्टौ नरः समाः ।।
विद्यार्थ षड्यशसोर्थ वा कामार्थत्रीस्तुवत्सरान् ।।
मनुस्मृति ( 9/ 75 )
सत्यार्थ प्रकाश के चतुर्थ संमुल्लास मे दयानन्द जी ये इसका रेफरेन्स ( 9/76) मे दे रखा है खैर ये कोई मुद्दा नही है
आते है मुद्दे पर
स्वामी जी अपनी पुस्तक मे इसका अर्थ लिखते है की
" स्त्री । यदि पुरुष् धर्म कार्य के उद्देश्य से परदेश गया है तो 8 वर्ष , विद्या या कीर्ति के लिए गया है तो 6 वर्ष , और धन इत्यादि कमाने गया है तो 3 वर्ष उसकी राह देखे । उसके पश्चात नियोग करके संतान उत्त्पत्ति कर ले ।
जब विवाहित पति आवे तब नियुक्त पुरुष छूट जावे ।।
जबकि मनुस्मृति मे लिखा है ।
"पति के धर्मकार्य , विद्या-यश प्राप्ति तथा व्यापार के लिए विदेश जाने पर पत्नी को क्रमशः आठ , छह और तीन वर्षो तक उसकी प्रतीक्षा करनी चाहिए"
इस श्लोक मे कही भी नियोग की कोई बात ही नही कहीं गई ।।
क्या स्वामी जी इन श्लोकों मे अपने आप से नियोग शब्द जोड़ देते है ???
इसके पश्चात स्वामी जी ने एक और श्लोक लिखा है ।।
वन्ध्याष्टमेधिवेद्याब्दे दशमे तु मृतप्रजा ।
एकादशे स्त्री जननी सद्यस्त्वप्रियवादिनि ।। मनुस्मृति मे (9/80)
स्वामी जी इसका अर्थ लिखते है
"वैसे ही पुरुष के लिए भी नियम है , जब विवाह के आठ वर्ष तक स्त्री को गर्भ ही ना रहे , वन्ध्या हो तो आठवे , संतान हो कर मर जावे तो दशवे , जब जब हो तब तब कन्या , पुत्र न होवे तो ग्यारहवे और जो स्त्री अप्रिय बोलने वाली हो तो तुरंत उसको छोड़ कर किसी दूसरी स्त्री से नियोग करके संतानोतपत्ति कर लेवे "
जबकि मनुस्मृति मे लिखा है ।
"पत्नी के वन्ध्या, मृतक बच्चों को जन्म देने वाली तथा बार बार कन्या को ही जन्म देने वाली होने पर पति को क्रमशः आठवे, दसवे और ग्यारहवे वर्ष मे दूसरा विवाह करने का अधिकार है। स्त्री के कटुभाषिणी होने पर पुरुष उसी समय दूसरा विवाह कर सकता है"
हद है यार ये बंदा लोगों का कितना चुतिया बनाता था
जहाँ नियोग की गन्ध तक नहीं आती वहाँ भी नियोग घुसेड़ रखा है
अब कोई आर्य समाजी कुछ बोलेगा ???

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#नियोग_खण्डन_भाग_2

तुम कहते हो सन्तान उत्पत्ति के लिए नियोग आपद्धर्म है।

 कल्पना करो कोई स्त्री विधवा हो और बांझ भी हो तो वो किसी से भी नियोग करे उसको सन्तान नहीं होने वाली। तो तुम्हारा काल्पनिक आपद्धर्म भी यहां ढेर हो गया।
झक मार कर उसे दूसरे दम्पत्ति से सन्तान उत्पन्न करवा कर उनकी सन्तान गोद लेनी पड़ेगी या नहीं? या जीवन भर निः सन्तान ही रहना पड़ेगा।

जब सन्तान को गोद लेकर काम चल सकता है, फिर इस व्यभिचार तुल्य नियोग की आवश्यकता ही नहीं। 
और गोद लिया पुत्र तो नियोग से उत्पन्न हुई सन्तान की अपेक्षा शुद्ध होगा क्योंकि संस्कारित होगा और निज पति-पत्नी के संयोग से उत्पन्न हुआ होगा तो उसकी उत्पत्ति में कोई पाप भी न होगा। जबकि नियोग में पर-पुरुष से भोग करके उत्पन्न हुआ पुत्र पापमय होगा क्योंकि उसकी उत्पत्ति में ही धर्म को तिलांजलि दे दी गयी है।

तो यदि किसी को सन्तान चाहिए तो वो किसी अन्य दम्पत्ति से प्रार्थना करके अपने लिए एक संस्कारित सन्तान उत्पन्न करवा सकता है।  

हाँ लेकिन यदि तुमको सन्तान के अलावा, भोग भोगने की भी अभिलाषा है (जैसा कि सत्यार्थ प्रकाश के चतुर्थ समुल्लास में लिखा भी है कि यदि ब्रह्मचर्य न रह सके तो नियोग करके सन्तान उत्पन्न कर लेवे) तो अलग बात है। फिर तो तुम चाहे खूब नियोग करो। हमें क्या! 

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सत्यार्थ प्रकाश के द्वितीय समुल्लास में स्वामी जी लिखते हैं - स्त्री योनिसंकोचन, शोधन और पुरुष वीर्य
का स्तंभन करे, पुनः सन्तान जितने होंगे वे भी सब उत्तम होंगे ।

समीक्षा- स्वामी जी! आप तो कहते थे कि हमारा मत वेद है। अब आप ये बताइये कि यह किस वेदमन्त्र का अनुवाद है ? यदि सत्यार्थप्रकाश में आप योनिसंकोचन की कोई औषधि लिख देते तो विषयीसंसार का अपूर्व उपकार हो जाता, औषधि न लिखने के कारण स्त्रियों के मन की मन ही में रह गई |
 क्या ये गप्प ही वैदिकधर्म कहलाता है ?

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