■■■
#आर्य_समाज_की_चालाकियां :-
#अप्रामाणिक_बातें_मनमाने_अर्थ:-
सत्यार्थ प्रकाश प्रथम समुल्लास में पहले तो स्वामी जी ने कैवल्य उपनिषद का प्रमाण देकर लिखा :-
❝स ब्रह्मा स विष्णुः स रुद्रस्स शिवस्सोऽक्षरस्स परमः स्वराट्।
स इन्द्रस्स कालाग्निस्स चन्द्रमाः॥७॥ ~कैवल्य उपनिषत्
भावर्थ : सब जगत् के बनाने से ‘ब्रह्मा’, सर्वत्र व्यापक होने से ‘विष्णु’, दुष्टों को दण्ड देके रुलाने से ‘रुद्र’, मंगलमय और सब का कल्याणकर्त्ता होने से ‘शिव’,
जो सर्वत्र व्याप्त अविनाशी, स्वयं प्रकाशस्वरूप और प्रलय में सब का काल और काल का भी काल है, इसलिए परमेश्वर का नाम ‘कालाग्नि’ है❞
फिर पांच पन्ने आगे लिखा है कि--
❝इसलिए सब मनुष्यों को योग्य है कि परमेश्वर ही की स्तुति, प्रार्थना और उपासना करें, उससे भिन्न की कभी न करें। क्योंकि ब्रह्मा, विष्णु, महादेव नामक पूर्वज महाशय विद्वान्, दैत्य दानवादि निकृष्ट मनुष्य और अन्य साधारण मनुष्यों ने भी परमेश्वर ही में विश्वास करके उसी की स्तुति, प्रार्थना और उपासना करी, उससे भिन्न की नहीं की, वैसे हम सब को करना योग्य है❞
#समीक्षा— सबसे पहले तो ये बात है कि आप धन्य हो स्वामी जी, कहाँ तो आप दस ही उपनिषद मानते थे, और आज मतलब पड़ा तो ग्यारहवाँ "कैवल्य उपनिषद" भी मान बैठे? अब यदि हम लोग कैवल्य उपनिषद से ही अन्य प्रमाण देकर आर्य समाज के किसी मत का खण्डन करें तो क्या आपको स्वीकार होगा? यदि नहीं तो आपको कैवल्य उपनिषद से प्रमाण देकर आग में हाथ नहीं डालना चाहिए था।
बात बात पर प्रमाण मांगने वाले आर्य समाजी लोग अब अपने स्वामी जी से भी इस बात का प्रमाण मांगें कि ब्रह्मा,विष्णु,शिव यदि पूर्वज थे तो उनका जीवन चरित बताएं, उनके माता पिता, पुत्रादि के नाम बताएं।
जब स्वामी जी ने ब्रह्मा, विष्णु, शिव को हमारा कोई पूर्वज विद्वान बताया तब उन्हें इस बात का भी प्रमाण तो देना ही चाहिए न?
धन्य है स्वामी जी आपकी बुद्धि! आपकी बुद्धि का पता तो यहीं चल जाता है, इसमें कोई प्रमाण तो दे दिया होता की ये ब्रह्मा, विष्णु, शिव आदि मनुष्य थे? यदि प्रमाण नहीं मिला तो कोई उल्टी सीधी संस्कृत ही गढ़ लिए होते, आपके मंदबुद्धि चेले उसे भी पत्थर की लकीर समझ लेते, यह आपको ही योग्य है कि ब्रह्मादिक नाम ईश्वर के बताकर फिर उन्हें पूर्वज विद्वान बता दिया और तो और यह अर्थ भी आपका अशुद्ध है, सही अर्थ इस प्रकार है देखिए—
स ब्रह्मा स विष्णुः स रुद्रस्स शिवस्सोऽक्षरस्स परमः स्वराट्।
स इन्द्रस्स कालाग्निस्स चन्द्रमाः॥ ~कैवल्य उपनिषत्
अर्थ— वो ब्रह्मारूप हो जगत की रचना करता, विष्णु रूप हो पालन करता, रूद्ररूप हो दुष्टों को कर्मफल भुगाकर रूलाता शिव ही मंगल करता है वो ही स्वराट इन्द्र, चन्द्रमा है, और कालाग्निरूप धारण कर प्रलय करता है ।
यह सब देवता उसी के रूप है, नहीं तो बताइये की आप यहाँ किन ब्रह्मा, विष्णु और महादेव की बात कर रहे हैं, यह तीनों विद्वान किनके पुत्र थे? जो कहो की स्वयं उत्पन्न हो गए तो आपका सृष्टि क्रम जाता रहेगा कि बिना माता, पिता के कोई मनुष्य उत्पन्न नहीं होता। क्योंकि आपने ही सत्यार्थ प्रकाश में लिखा है कि "वे सब कथाएं कपोल कल्पित हैं जिनमें किसी का बिना माता, पिता से उत्पन्न होने का वर्णन है"।
■■■■
सत्यार्थ प्रकाश प्रथम समुल्लास पृष्ठ, १० पर स्वामी जी लिखते है
❝स ब्रह्मा स विष्णुः स रुद्रस्स शिवस्सोऽक्षरस्स परमः स्वराट्।
स इन्द्रस्स कालाग्निस्स चन्द्रमाः॥७॥ ~कैवल्य उपनिषत्
भावर्थ : सब जगत् के बनाने से ‘ब्रह्मा’, सर्वत्र व्यापक होने से ‘विष्णु’, दुष्टों को दण्ड देके रुलाने से ‘रुद्र’, मंगलमय और सब का कल्याणकर्त्ता होने से ‘शिव’,
जो सर्वत्र व्याप्त अविनाशी, स्वयं प्रकाशस्वरूप और प्रलय में सब का काल और काल का भी काल है, इसलिए परमेश्वर का नाम ‘कालाग्नि’ है❞
फिर आगे पृष्ठ, १३ पर लिखा है कि--
❝इसलिए सब मनुष्यों को योग्य है कि परमेश्वर ही की स्तुति, प्रार्थना और उपासना करें, उससे भिन्न की कभी न करें। क्योंकि ब्रह्मा, विष्णु, महादेव नामक पूर्वज महाशय विद्वान्, दैत्य दानवादि निकृष्ट मनुष्य और अन्य साधारण मनुष्यों ने भी परमेश्वर ही में विश्वास करके उसी की स्तुति, प्रार्थना और उपासना करी, उससे भिन्न की नहीं की, वैसे हम सब को करना योग्य है❞
#समीक्षा— धन्य है स्वामी जी धूर्त हो तो आपके जैसा, बड़े बड़े धूर्त देखें परन्तु आपके समान दूजा नहीं देखा, कहाँ तो आप दस ही उपनिषद मानते थे, और आज मतलब पड़ा तो ग्यारह वाँ कैवल्य भी मान बैठे और प्रमाण के साथ ब्रह्मा, विष्णु और शिव को ईश्वर बताया, और अब यहाँ उन्हें पूर्वज विद्वान बता दिया, आपकी बुद्धि का पता तो यही चल जाता है, इसमें कोई प्रमाण तो दे दिया होता की यह मनुष्य थे, यदि प्रमाण नहीं मिला तो कोई उल्टी सीधी संस्कृत ही गढ़ लिए होते, आपके मंदबुद्धि नियोगी चेले उसे भी पत्थर की लकीर समझ लेते, यह आपको ही योग्य है कि ब्रह्मादिक नाम ईश्वर के बताकर फिर उन्हें पूर्वज विद्वान बता दिया और तो और यह अर्थ भी आपका अशुद्ध है, सही अर्थ इस प्रकार है देखिए—
स ब्रह्मा स विष्णुः स रुद्रस्स शिवस्सोऽक्षरस्स परमः स्वराट्।
स इन्द्रस्स कालाग्निस्स चन्द्रमाः॥ ~कैवल्य उपनिषत्
अर्थ— वो ब्रह्मारूप हो जगत की रचना करता, विष्णु रूप हो पालन करता, रूद्ररूप हो दुष्टों को कर्मफल भुगाकर रूलाता शिव ही मंगल करता है वो ही स्वराट इन्द्र चन्द्रमा है, और कालाग्निरूप धारण कर प्रलय करता है
यह सब देवता उसी के रूप है, नहीं तो बताइये की आप यहाँ किन ब्रह्मा, विष्णु और महादेव की बात कर रहे हैं, यह तीनों विद्वान किनके पुत्र थे? जो कहो की स्वयं उत्पन्न हो गए तो आपका सृष्टि क्रम जाता रहेगा कि बिना माता, पिता के कोई मनुष्य उत्पन्न नहीं होता, यही तो आपके भंग की तरंग है जो आत्मचरित में लिखा है कि मुझे भंग पीने की ऐसी आदत थी कि कभी-कभी तो उसके कारण मैं सर्वथा बेहोश हो जाया करता था, और फिर दूसरे दिन ही होश हो पाता था।
*******
दयानंद जैसा धुर्त जो खुद की कही बात से पलट जाए पुरे विश्व में नहीं मिलेगा
पुरा पोस्ट ध्यान से पढ़े....
------------------------------------
स ब्रह्मा स विष्णुः स रुद्रस्स शिवस्सोऽक्षरस्स परमः स्वराट्।
स इन्द्रस्स कालाग्निस्स चन्द्रमाः।।७।। -कैवल्य उपनिषत्।
भावर्थ : सब जगत् के बनाने से ‘ब्रह्मा’, सर्वत्र व्यापक होने से ‘विष्णु’, दुष्टों को दण्ड देके रुलाने से ‘रुद्र’, मंगलमय और सब का कल्याणकर्त्ता होने से ‘शिव’,
जो सर्वत्र व्याप्त अविनाशी, स्वयं प्रकाशस्वरूप और प्रलय में सब का काल और काल का भी काल है, इसलिए परमेश्वर का नाम ‘कालाग्नि’ है।।७।।
प्रथम समुल्लास मे ही फिर आगे लिख है कि-
इसलिए सब मनुष्यों को योग्य है कि परमेश्वर ही की स्तुति, प्रार्थना और उपासना करें, उससे भिन्न की कभी न करें। क्योंकि ब्रह्मा, विष्णु, महादेव नामक पूर्वज महाशय विद्वान्, दैत्य दानवादि निकृष्ट मनुष्य और अन्य साधारण मनुष्यों ने भी परमेश्वर ही में विश्वास करके उसी की स्तुति, प्रार्थना और उपासना करी, उससे भिन्न की नहीं की। वैसे हम सब को करना योग्य है।
------------------------------------
समीक्षा : इसे कहते हैं दोगला इंसान स्वयं ही प्रमाण के साथ ब्रह्मा, विष्णु, शिव को ईश्वर बताता है और थोड़ा आगे बढ़ेते ही अपनी धूर्तता दिखाते हुए उनको पूर्वज विद्वान आदि बताने लगा । इसमें कोई प्रमाण तो दिया होता कि यह मनुष्य थे, और अगर प्रमाण नही मिला था तो कोई उल्टि सिधि संस्कृत ही गढ़ ली होती तेरे नियोगी चम्चे इसे पत्थर कि लकिर समझ लेते ।
वैसे ये तेरे जैसे धुर्त को ही शोभा देता है कि ब्रह्मादिक नाम ईश्वर के बताकर फिर उन्हे पूर्वज बता दिया,
थुक कर चाटने में तो तेरी बराबरी कोई नहीं कर सकता
और तो और ये अर्थ भी तेरा गलत ही है सही अर्थ इस प्रकार है कि वो ब्रह्मारूप होकर जगत की रचना करता, विष्णु रूप हो पालन करता रूद्ररूप हो दुष्टों को कर्मफल भुगाकर रूलाता शिव ही मंगल करता है वो ही स्वराट इन्द्र चन्द्रमा है। और कालाग्निरूप धारण कर प्रलय करता है
यह सब देवता उसी के रूप है नहीं तो तुने बताया क्यो नही की यह तीनों किसके पुत्र थे
जो कहता की स्वयं उत्पन्न हो गए तो तेरा सृष्टि क्रम जाता है कि माता पिता के बिना कोई मनुष्य उत्पन्न नहीं होता
यही तो तेरी भंग की तंरग है जो जीवन चरित्र में लिखा है कि मुझे भंग पीने की ऐसी आदत थी कि दुसरे दिन ही होश आता था
भंगेड़ी कही का...
*****
साकार रूप के इतने प्रमाण हैं यजुर्वेद संहिता के पांचवे अध्याय में विष्णु शब्द 15 वें अध्याय में रूद्र शब्द
शिव ये शब्द
महामृत्युंजय मंत्र ये सभी हैं दयानंद ने इन पर चर्चा क्यों नही की
एषो ह देव:प्रदिशोनु सर्वा: पूर्वो ह जात: स उ गर्भे अन्त:। स उ गर्भे अन्त:। स एव जात: स जनिष्यमाण: प्रत्यड्ं जनास्तिष्ठति सर्वतोमुख:।।४।।
वह परमात्मा सभी दिशाओं उपदिशाओं में जन्म लिये हुए तथा जन्म लेने के लिए तत्पर सभी प्राणियों में विद्यमान है। वही जन्म लेकर पुनः पुन प्रकट होता है तथा वर्तमान में भी वही विद्यमान है।
ये मंत्र पोल खोल देता यदि दयानंद सत्यार्थ प्रकाश में इसे डाल देता
सच ये है दयानंद महामूरख था जिसे इतिहास भूगोल वक्त साधना की समझ नहीं थी
No comments:
Post a Comment