दयानंदभाष्य खंडनम् -४
माता, पिता, आचार्य, अतिथि और पुरुष के लिए पत्नी की अहमियत बताते हुए स्वामी जी कहते हैं- `ये पाँच मूर्तिमान् देव जिनके संग से मनुष्यदेह की उत्पित्त, पालन, सत्यशिक्षा, विद्या और सत्योपदेश को प्राप्ति होती है। ये ही परमेश्वर को प्राप्त होने की सीढ़ियाँ हैं।´ (सत्यार्थप्रकाश, एकादशसमुल्लास,)
माता-पिता को छोड़कर तो वो खुद ही भागे थे। विवाह उन्होंने किया नहीं इसलिए पत्नी भी नहीं थी। वो खु़द दूसरों पर आश्रित थे और न ही कभी उन्होंने कुछ कमाया तो अतिथि सेवा का मौका भी उन्होंने खो दिया।
सीढ़ी के चार पाएदान तो उन्होंने खुद अपने हाथों से ही तोड़ डाले।
आचार्य की सेवा उन्होंने ज़रुर की, लेकिन कभी-कभी ऐसा कुछ कर जाते थे कि या तो आचार्य पाठशाला से उनका नाम ही काट देते थे या जितना ज्यादा ज़ोर से हो सकता था उनके डण्डा जमा देते थे,
जिनके निशान उनके शारीर पर हमेशा के लिए छप जाते थे।
तो कुल मिला कर उनके अंदर ऐसा कोई भी गुण नही था जिससे वो ईश्वर को प्राप्त कर सके ।।
कोई है जो कटाक्ष करे ????
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माता, पिता, आचार्य, अतिथि और पुरुष के लिए पत्नी की अहमियत बताते हुए स्वामी जी कहते हैं- `ये पाँच मूर्तिमान् देव जिनके संग से मनुष्यदेह की उत्पित्त, पालन, सत्यशिक्षा, विद्या और सत्योपदेश को प्राप्ति होती है। ये ही परमेश्वर को प्राप्त होने की सीढ़ियाँ हैं।´ (सत्यार्थप्रकाश, एकादशसमुल्लास, पृष्ठ 216)
माता-पिता को छोड़कर तो वो खुद ही भागे थे। विवाह उन्होंने किया नहीं इसलिए पत्नी भी नहीं थी। वो खु़द दूसरों पर आश्रित थे और न ही कभी उन्होंने कुछ कमाया तो अतिथि सेवा का मौका भी उन्होंने खो दिया।
सीढ़ी के चार पाएदान तो उन्होंने खुद अपने हाथों से ही तोड़ डाले।
आचार्य की सेवा उन्होंने ज़रुर की, लेकिन कभी-कभी ऐसा कुछ कर जाते थे कि या तो आचार्य पाठशाला से उनका नाम ही काट देता था या जितना ज्यादा ज़ोर से हो सकता था उनके डण्डा जमा देता था,
जिनके निशान उनके शारीर पर हमेशा के लिए छप जाते थे।
तो कुल मिला कर उनके अंदर ऐसा कोई भी गुण नही था जिससे वो ईश्वर को प्राप्त कर सके ।।
कोई है जो कटाक्ष करे ????
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