Thursday, 25 March 2021

ब्राह्मण ग्रन्थ वेद नहीं, नए मंत्र,सत्यार्थ प्रकाश।

#क्या_ब्राह्मण_ग्रन्थ_ही_पुराण_हैं? :- 

आर्य समाजी विलाप करते रहते हैं कि ब्राह्मण ग्रन्थ वेद नहीं पुराण हैं।  हमारा पक्ष है कि ब्राह्मणभाग पुराण नहीं बल्कि वेद हैं आज तक जितने भाष्यकार ऋषि महर्षि मुनि और आचार्य हो चुके हैं उन सबों ने मन्त्रभाग और ब्राह्मणभाग दोनों को एक जैसा वेद माना है । अतः हम कुछ प्रमाण प्रस्तुत करतें हैं यथा :――

सायणाचार्य ऋग्वेदादि-भाष्यभूमिका ( उपोद्धात ) में महर्षि आपस्तम्ब की यज्ञ-परिभाषा का प्रमाण उद्धृत करते हुए लिखते हैं कि-

१)तच्चोदकेषु मन्त्राख्या। (मीमांसा २ । २३ )
२)शेषे ब्राह्मणशब्दः ।( मीमांस २ । ३३)

अर्थात्-प्रेरणालक्षण श्रुति-समुच्चय को मन्त्र कहते हैं और शेष समस्त वेद का नाम ब्राह्मण है।
इसीलिए सायण, आपस्तम्ब और जैमिनि की सम्मति में भी मन्त्र तथा ब्राह्मण दोनों ही वेद हैं।

(३) न्यायाचार्य महर्षि गौतम जी ने वेदों की प्रमाणता सिद्ध करने के लिये पूर्वपक्ष में वेदों पर आक्षेप किये हैं और उन आक्षेपों के जो उदाहरण दिये हैं वे वर्तमान ब्राह्मणभाग के हैं । यदि ब्राह्मण भाग वेद न होता' तो वेदों पर शङ्का करने के लिये वेद भिन्न भाग का उदाहरण देना क्या मूल्य रखता था ? 
गौतम जी कहते हैं:- 
तदप्रामाण्यमनृतव्याघातपुनरुक्तदोषेभ्यः ।।(न्यायदर्शन । १ । ५७)

अर्थात् - वह ( वेद ) प्रमाण नहीं हो सकता क्योंकि उसमें असत्य, पूर्वापरविरोध और एक ही बात को अनेक बार कहना इत्यादि दोष हैं। जैसे वेद में लिखा है कि 'पत्रकाय: पुवेष्ट्या एजेत' जिसे पुत्र की इच्छा हो वह पुत्रेष्टि यज्ञ करे, परन्तु कहीं पुत्रेष्टि यज्ञ करने पर भी पुत्र उत्पन्न नहीं होता। इस प्रकार वेद का यह प्रत्यक्ष-फलसाधक वाक्य मिथ्या हो जाता है तब अग्निहोत्र' 'जुहुयात् स्वर्गकाम:'-स्वर्ग।की कामना वाला अग्निहोत्र करे, इत्यादि परोक्षफलसाधक वाक्यों पर कैसे विश्वास किया जा सकता है ? अत: वेदों में असत्य वाक्य होने से वे मान्य नहीं, इत्यादि पूर्वपक्ष स्थापित करके पश्चात् अकाट्य युक्तियों से इन सब आक्षेपों का समाधान किया है। हम प्रकरण विरुद्ध होने के कारण यहाँ उसके लिखने की आवश्यकता नहीं समझते, परन्तु इस प्रघट्ट में द्रष्टव्य यह है कि यहाँ .. 'पुतकामः' प्रादि जितने वाक्य दिये गये हैं वे ब्राह्मणभाग के हैं क्योंकि विधि और अर्थवाद दो प्रकार का समावेश ब्राह्मण में ही हुआ है। अत: निश्चय हुआ कि गौतम जी की दृष्टि में भी मन्त्र और ब्राह्मण दोनों ही समान रूप से वेद हैं। अन्यथा देवदत्त को मिथ्याभाषी सिद्ध करने के लिये यज्ञदत्त के वाक्यों का उदाहरण देना क्या अर्थ रखता है?

(४) प्रसिद्ध वैशेषिक-दर्शन के निर्माता महर्षि कणाद जी
दृष्टादृष्टफलक दोनों प्रकार से कार्यों का अनुष्ठान सिद्ध करते हुये लिखते हैं कि-
दृष्टानां दुष्टप्रयोजनानां दृष्टाऽभावे प्रयोगोऽभ्युदयाय ।
(वैशेषिकदर्शन १० । २।८)
अर्थात् - वेदों में जो कर्तव्यरूप से देखे गये हैं, जिनका प्रयोजन इस लोक में प्रत्यक्ष दीखता है, उनका तथा जिन कार्यों का ऐहलौकिक फल नजर नहीं आता उनका अनुष्ठान करना पारलौकिक फल के लिए होता है । उपर्युक्त सूत्र में जिस दृष्टफल और अदृष्टफल-विधान को वेदविहित बताया गया है वह ब्राह्मणभाग में ही उपलब्ध है। अत: मानना पड़ेगा कि कणाद जी ब्राह्मण भाग को वेद ही मानते हैं ।

५) महर्षि व्यास वेदान्तदर्शन में शब्द-प्रमाण मानते हुये
लिखते हैं कि -
श्रुतेस्तु शब्दमूलत्वात् । ( वेदान्त दर्शन २ । १ । २७)
अर्थात् – ब्रह्म प्रत्यक्षानुमान का विषय नहीं, बल्कि उसके होने में श्रुति प्रमाण है, जो शब्दमूलक हैं। सारे वेदान्त को पढ़ जाइये उसमें ब्रह्मप्रतिपादक 'तत्त्वमसि' 'अयमात्मा ब्रह्म' 'सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म' और 'नेह नानाऽस्ति किञ्चन' आदि जितने भी प्रमाण दिये गये हैं, सब ब्राह्मणभागान्तर्गत उपनिषद् आदि ग्रन्थों के हैं और उन सबको 'श्रुति' वेद के नाम से लिखा है। इससे स्पष्ट है कि व्यास जी ब्राह्मण ग्रन्थों के विशिष्ट भाग उपनिषदों को भी वेद स्वीकार करते थे।

(६) पातञ्जल महाभाष्य में पतञ्जलि जी लिखते हैं कि
वेदेपि - ‘य एवं विश्वसृजः सत्राण्यध्यास्त' इति तेषा-
मनुकुर्नस्तद्वत् सत्राण्यध्यासीत सोऽप्यभ्युदयेन
युज्यते । (महाभाष्य पृ. २०)
अर्थ-वेद में लिखा है कि जो इस प्रकार ब्रह्मा के यज्ञों का अनुष्ठान करने वाला भी ऐहलौकिक सुखों को प्राप्त होता है। यहाँ-'य एवं विश्वसृज'  आदि जो वाक्य वेद के नाम से उद्धृत किया है, वह ब्राह्मणभाग में ही उपलब्ध होता है, अत: निश्चित हुआ कि पतञ्जलि जी की सम्मति में भी ब्राह्मणभाग वेद है।

महर्षि पतंजलि ने व्याकरण के महाभाष्य के प्रथम आह्लीक में लिखा है कि-

" सप्तद्वीपा वसुमति त्रयो लोकाश्चतवारो वेदाः सांगाः सरहस्या बहुधा भिन्ना एकशतमध्वर्युशाखाः 
सहस्रवर्त्मा सामवेद एकविंशतिधा बह्वृच्यन्नवधाऽथर्वणो वेदो वकोवाक्यमितिहास: पुराणं वैद्यकमित्येता वाञ्छब्दस्य प्रयोगविषय इति । "

अर्थात:- सप्तद्वीप सहित पृथ्वी, तीनों लोक, चार वेद; शिक्षा, कल्प, व्याकरण, निरुक्त, छन्द, ज्यातिष ये छः उनके अङ्ग हैं, तथा वेदों के रहस्य, उपनिषदें (सरहस्या:) और वेद बहुत प्रकार से विभक्त हैं जैसे कि एक सौ एक शाखा यजुर्वेद की, सहस्त्र शाखा सामवेद, इक्कीस शाखा ऋग्वेद और नौ शाखा अथर्व वेद की हैं। इस प्रकार मंत्रात्मक वेद ग्यारह सौ इकत्तीस शाखाओं में विभक्त है। तर्कादि, इतिहास पुराण, इनमें शब्दप्रयोग होता है। 

यदि नाराशंसी अथवा ब्राह्मण का नाम ही पुराण होता तो 'सांग' लिखकर फिर पुराण लिखने की क्या आवश्यकता थी?

(७) आश्वलायन श्रौतसूत्र के भाष्यकार श्री नारायणस्वामी लिखते:--

#गाथाशब्देन_ब्राह्मणगता_ऋच_उच्यन्ते ।
(आश्वलायन श्रौतसूत्र ५। ६)
अर्थात्-ब्राह्मण भाग में आने वाली ऋचाओं को गाथा कहतेहै। इसी प्रकार आश्वलायन गृह्यसूत्र (३।३।१) की वृत्ति में लिखते हैं कि- #गाथा_नाम_ऋग्विशेषाः।
अर्थात-गाथा नाम विशेष ऋचाओं का है, इन दोनों प्रमाणों में ब्राहाणभागान्तर्गत आने वाली गाथाओं को
ऋचा के नाम से स्मरण किया है । और ऋचाएं केवल वेद में ही होती हैं अत: ब्राह्मणभाग वेद है । 

निरुक्त (४। ६) में तो स्पष्टतयाही ब्रह्म गाथामिश्र भतति' अर्थात् वेद में ही गाथा भाग होता है ऐसा लिख दिया है।

(८) तैत्तिरीयारण्यक (भाष्य २६) में सायणाचार्य जी
लिखते हैं #'गाथा_मन्त्रविशेषा:' अर्थात् मन्त्रविशेष का नाम गाथा है । सो केवल मन्त्र वेद में ही होते हैं । अत: निश्चय हुआ कि ब्राहाण वेद हैं ।

(९) पातञ्जल महाभाष्य में लिखा है कि:-

वेदे खल्वपि- 'पयोव्रतो ब्राह्मणो यवागूवतो राजन्य
मामिक्षावतो वैश्य इत्युच्यते । (महा० १ । १ । १)
अर्थात्-वेद में लिखा है कि ब्राह्मण पयोव्रत होते हैं । क्षत्रिय यवागू व्रत होते हैं और वैश्य आमिक्षाव्रत होते हैं।
उपरोक्त 'पयोव्रत' आदि वाक्य मन्त्रभाग में कहीं भी नहीं, बल्कि यह ब्राह्मणभाग का वाक्य है। पतञ्जलि जी इसे वेदवाक्य कहते हैं अत: निश्चित हुआ कि उनकी दृष्टि में ब्राह्मण वेद हैं।

(१०) इसी ग्रन्थ के दूसरे स्थान में लिखा है कि-
वेदशब्दा अप्येवमभिवदन्ति –'योऽग्निष्टोमेन
यजते य उ चैनमेवं वेद ।'(पृ १०)
अर्थात्-वेद भी ऐसा कहते हैं कि-जो अग्निष्टोम यज्ञ द्वारा
यजन करता है, और जो इसे ऐसा जानता है। यहाँ भी जो ' #योऽग्निष्टोमेन ' आदि वाक्य लिखा है वह मन्त्रमाग का नहीं, बल्कि तैत्तिरीय ब्राह्मण (३।११।८।५) का है। परन्तु पतञ्जलि महाराज इसे 'वेदशब्द के नाम से स्मरण करते हैं अत: निश्चित हुआ कि उनके मत से भी ब्राह्मण ग्रन्थ वेद हैं।

(११) मनु महाराज की दृष्टि में भी ब्राह्मण ग्रन्थ वेद ही हैं:- 

एताश्चान्याश्च सेवेत दीक्षा विप्रो वने वसन् । विविधाश्चाउपनिषदीरात्मसंसिद्धये श्रुतीः । ।
(मनुस्मृति ६ । २९)
अर्थात् - वन में रहता हुआ ब्राह्मण ऐसी धार्मिक दीक्षाओं को सेवन करे और अपने कल्याण के लिये विविध उपनिषद् ग्रन्थों की श्रुति का सेवन करे।
यहां ब्राह्मणान्तर्गत उपनिषद्-वाक्यों को श्रुति कहा है। श्रुति नाम वेदों का है, जैसा कि मनु जी ने स्थानान्तर में स्वयं 'श्रुतिस्तु वेदो विज्ञेयः' ( मनु: २ । १० ) कह कर इसे व्यक्त किया है । अत: निश्चित हुआ कि ब्राह्मण वेद हैं।

(१२) शाबर-मीमांसाभाष्य (।।२।३३) में लिखा है कि-
मन्त्राश्च_ब्राह्मणं_च_वेदः ।
अर्थात्-मन्त्र और ब्राह्मण दोनों ही वेद हैं।

(१३) मीमांसादर्शन (सूत्र १।१।८८ से आरम्भ करके ३३
सूत्रपर्यन्त) में मन्त्रभाग की तरह ब्राह्मण भाग को भी अपौरुषेय सिद्ध किया है, अतः ब्राह्मण ऋषिकृत नहीं, बल्कि मन्त्रों की तरह ऋषिदृष्ट हैं, अतः वह वेद हैं।

(१४) चरणव्यूह ( कण्डिका २ ) में कहा है कि-
#त्रिगुणं_पठ्यते_यत्र_मन्त्राब्राह्मणयोः #सह ।
#यजुर्वेदः #स_विज्ञेयः #शेषाः #शाखान्तराः #स्मृताः ॥
अर्थात्-जिसमें मन्त्रब्राह्मण-सहित त्रिगुण पढ़ा जाता है । वह यजुर्वेद है, शेष उसकी शाखाएं हैं।

यहाँ मन्त्र और ब्राह्मण दोनों को सम्मिलित करके उसे यजुर्वेद के नाम के स्मरण किया गया है। इससे निश्चित हुआ कि ब्राह्मण वेद हैं।

(१५) मनु जी ने हवन काल का निर्णय करते हुए लिखा है कि--
उदितेऽनुदिते चैव समयाध्युषिते तथा ।
सर्वथा वर्तते यज्ञ इतीयं वैदिकी श्रुतिः ।।
( मनुः २ । १५)

अर्थात्-'सूर्योदय हो जाने पर और उदय होने से पूर्व तथा
नक्षत्र सूर्यादि के अदृष्ट काल में भी हवन करना चाहिये' ऐसा वेद का।वचन है। समस्त मन्त्रभाग में ऐसा कोई मन्त्र नहीं मिलता जिस में कि स्पष्टतया यह बताया गया हो कि सूर्योदय हो जाने पर या उदय से पूर्व यज्ञ हो सकता है, ऐसे बचन ब्राह्मणभाग में अवश्य मिलते हैं।
जैसे- 
#उदिते_जुहोति_अनुदिते_जुहोति ।
(ऐतरेयब्राह्मण ५। ५ । ४)
मनु जी ने ब्राह्मण के इन वचनों को वेद बताया है । इससे निश्चित हा कि मनु जी की सम्मति में ब्राह्मण वेदग्रन्थ है।

(१६) आपस्तम्ब जी कहते हैं
मन्त्रब्राह्मणयोर्वेदनामधेयम् ।।
(आपस्तम्ब धौतसूत्र २४:१।३१)
अर्थात्-मन्त्र और ब्राह्मण दोनों को वेद कहते हैं

(१७) बौधायन जी कहते हैं।
मन्त्राब्राह्मणं वेद इत्याचक्षते ।
(बौधायन गृह्यसूत्र २।१।१)
अर्थात्-मन्ना ब्राह्मण दोनों को वेद कहा जाता है
(१८) महर्षि सत्याषाढ जी लिखते हैं-
मन्त्रब्राह्मणयोर्वेदनामधेयम् ।
( सत्याषाढ श्रौतसूत्र १।१।५)
अर्थात् - मन्त्र और ब्राह्मण का नाम वेद है।

१६) महर्षि कौशिक जी लिखते हैं-
अाम्नाय: पुनर्मन्त्राश्च ब्राह्मणानि च । (कौशिकसूत्र १ । ३)
अर्थात्-मन्त्र और ब्राह्मण दोनों को आम्नाय -वेद कहते हैं।

(२०) कात्यायन ऋषि कहते हैं-
मन्त्राब्राह्मणयोर्वेदनामधेयम् । (कात्या० प्रतिज्ञासूत्र)
अर्थात्-वैद नाम मन्त्र और ब्राह्मण का है ।

(२१) सायणाचार्य लिखते हैं-
मन्त्रब्राह्मणात्मक: शब्दराशिर्वेदः । (ऋग्वेद उपोद्धात)
अर्थात् --मन्त्रा बाहाणात्मक शब्द समुदाय को वेद कहते हैं ।

(२२) महर्षि वात्स्यायन पुराणों और ब्राह्मणों को भिन्न २ ग्रन्थ मानते हैं । यथा:--

प्रमाणेन खलु ब्राह्मणेन इतिहासपुराणस्य
प्रामाण्यमभ्युपगम्यते । (न्यायदर्शन भाष्य ४। १ । ६२)

अर्थात् ब्राह्मण के प्रमाण से इतिहास पुराण की प्रामाणिकता सिद्ध होती है। यहाँ यदि उक्त दोनों ग्रन्थों को विभिन्न न माना जाए.तो प्रामाण्य-प्रमेयभाव सगठित नहीं हो सकता। अर्थात् —अभियुक्त और
साक्षी दो भिन्न २ व्यक्ति ही हो सकते हैं।

(२३) उक्त ब्राह्मणग्रन्द स्वयं पुराणों को अपने से अलग बता रहे हैं यथाः
नवमेऽहनि किचित् पुराणमाचक्षीत ।
(शतपथ १३ । ४ । ३ । १२)
अर्थात् – यज्ञ के नवें दिन कुछ पुराण पढ़ा जाए।
यदि ब्राहाण ग्रन्थ ही पुराण होते तो वे अपने पाठ का ही आदेश न करते। 

कहाँ तक लिखें, ब्राह्मण भाग को मन्त्राभाग की भांति अविशेष वेद सिद्ध करने वाले सहस्रों प्रमाण संगहीत किये जा सकते हैं। किसी भी ऋषि मुनि आचार्य के ग्रन्थ को उठाइये, सर्वत्र ब्राहाणग्रन्थों की वैदिकता का उल्लेख मिलेगा । प्रस्थानत्रयी के भाष्यकार आद्य शङ्कराचार्य, श्रीनिम्बार्काचार्य और श्री माध्वाचार्य आदि सभी विद्वानों
ने एक स्वर से ब्राह्मणों का वेदत्व स्वीकार किया है । इतने पर भी स्वामी दयानन्द और उनके अनुयायी अपनी वेसुरी तान का अलाप नहीं छोड़ते इसके सिवा दुराग्रह के और क्या कहा जा सकता है ?

यहां तक हमने प्रमाणों द्वारा ब्राह्मणभाग का वेद होना सिद्ध किया है । अब कतिपय युक्तियों द्वारा भी इसकी पुष्टि की जाती है जिससे ' #युक्तिप्रमाणाभ्यां_हि_वस्तुसिद्धिः' के अनुसार प्रतिवादियों/समाजियो/नमाज़ियों/ नियोगियों  को
कुछ कह सकने का अवसर ही न मिल सके। इसलिए हम कुछ युक्तियाँ प्रस्तुत करते हैं यथा :――

(१) किसी भी ब्राह्मणग्रन्थ के आदि में अथवा अन्त में 'अथशतपथपुराणम्' 'इति गोपथपुराणम्' ऐसी पुष्पिका का उल्लेख नहीं अतः वे पुराण नहीं हो सकते।
(२) पुराण का सर्वविदित लक्षण-सर्ग प्रतिसर्ग, वंश, मन्वन्तर और वंशानुचरित है, परन्तु ब्राह्मण ग्रन्थ में उक्त विषयों का कहीं भीक्रमबद्ध वर्णन नहीं मिलता है । खास कर चन्द्र-सूर्य-वंशी और तत्तद् वंशीय प्रतिष्ठित व्यक्तियों के चरित्र का तो कहीं भी उल्लेख नहीं। यदि उक्त ग्रन्थों से सर्गादिक-प्रतिपादक वाक्यों का उद्धरण देकर उन्हें
पुराण कहने को दुश्चेष्टा की जाए तो इस तरह के सैंकड़ों मन्त्र मन्त्रभाग में भी विद्यमान हैं। अत: सर्गादि पञ्चलक्षण  होने के कारण ब्राह्मण भाग पुराण नहीं हो सकता ।

३) सर्वत्र शास्त्रों में पुराणों के नाम ब्राह्म, पाद्य, वैष्णव ही लिखे हैं, परन्तु ब्राह्मग्रन्थों में उक्त नामों वाला कोई भी ग्रन्थ नहीं है। अतः वे पुराण नहीं हो सकते ।

(४) पुराणों की संख्या सर्वविदित अठारह है, परन्तु ब्राह्मण ग्रन्थों की इयत्ता का कहीं भी उल्लेख नहीं तथा याज्ञिक विषयविभाग के अनुसार उन्हें विभक्त किया जाए तो वे भी चतु:संहिताओं की तरह चार प्रकार के ही प्रतीत होते हैं। अत: संख्या-रूप लक्षण के अव्याप्त होने से भी ब्राह्मण ग्रन्थ पुराण नहीं हो सकते।

(५) प्रायः सभी ऋषियों ने वेदों की ११३१ शाखायें मानी हैं। आर्य समाजियों के दादागुरु स्वामी दयानन्द जी ने भी 'सत्यार्थप्रकाश' 'ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका' आदि ग्रन्थों में कहीं ११२७ और कहीं ११३१ शाखाओं का उल्लेख किया है । सो जिस प्रकार उपलब्ध चारों संहिताएँ क्रमशः --शाकल, माध्यंदिनी, कोथुमी और शौनिकी नामक शाखाएँ हैं इसी प्रकार उपलब्ध ब्राह्मण, उपनिषद् आदि भी वेदशाखाओं के ही ग्रन्थ विशेष हैं। यदि चार शाखाएँ मान्य हो सकती हैं तो शेष भी उसी भान्ति मान्य होनी चाहिये । अतः ब्राह्मणग्रन्थ वेद शाखा होने के कारण पुराण नहीं हो सकते।

(६) पूर्व भीमांसादर्शन में मन्त्रभाग की तरह ब्राह्मणभाग को भी अपौरुषयता सिद्ध की है, अतः दोनों का 'वेदत्व' भी तुल्य है । फिर वेदभूत ब्राह्मणों को पुराण कैसे कहा जा सकता है ?

(७) यदि ब्राह्मणभाग को ऐतिहासिक-मंत्र विशिष्ट होने के कारण वेदत्व से दूर रक्खा जाता है, तो ऐसा नित्य-इतिहास तो मन्त्र भाग में ठसाठस भरा पड़ा है, जिसका यास्कादि ने अपने ग्रन्थों में स्पष्ट उल्लेख किया है तथा जैमिनि जी ने भी मीमांसादर्शन (पूर्वमीमांसा १।१। ३१) के ' #परन्तु_श्रुतिसाम्यमात्रम्' आदि सूत्रों में उसे व्यवस्थित किया है । ऐसी दशा में मन्त्र-ब्राह्मण के तुल्य होने से उनका वेदत्व भी तुल्य सिद्ध होता है, अत: वेद के अविशिष्ट अंश ब्राह्मण को पुराण नहीं कह सकते।

(८) कहा जाता है कि ब्राह्मणग्रन्थ मन्त्रों का व्याख्यान हैं, अत: वे वेद नहीं, बल्कि पुराण होने चाहिये। यदि यह तर्क ठीक है तब तो।सब मन्त्र भी अकेले ॐकार का व्याख्यान हैं इसलिए जिस प्रकार प्रणव का व्याख्यानभूत समस्त मन्त्रभाग वेद है इसी प्रकार मन्त्रभाग का व्याख्यान भूत ब्राह्मण भाग भी वेद ही हो सकता है पुराण नहीं?

अतः उपरोक्त प्रमाण और युक्तियों के अनुसारा यह सिद्ध है कि ब्राह्मण वेद ही हैं पुराण नहीं । यदि विशेष जाना हो तो पूज्य प्रातः स्मरणीय धर्म सम्राट करपात्री जी महाराज द्वारा रचित ग्रन्थ #वेदार्थपारिजात और# वेदस्वरूप_विमर्श का अवलोकन करें । 

                      ।।  जय श्री राम ।।

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#आर्य_समाज_की_चालाकियां :- 

#नवीन_मन्त्र_निर्माण :- कहां तो आर्य समाज हर बात में वेदों के प्रमाण मांगता फिरता है और स्वयं को शुद्ध वैदिक धर्मी भी घोषित करता है, किंतु यहां पर स्वामी जी ने सत्यार्थ प्रकाश में जो देव तर्पण के लिए मंत्र दिया है यह मंत्र हमें तो किसी वेद में नहीं मिला। 
यहां पर उसे पारस्कर और आश्वलायन गृहसूत्रों का मंत्र बताया है किंतु यह मंत्र तो ग्रह सूत्र में भी नहीं है। तो क्या इसे आर्य समाज की चालाकी ना समझा जाए जो वह वेदों अथवा गृहसूत्रों के नाम पर नए-नए मंत्र बनाकर लोगों को भ्रमित करने का प्रयास कर रहा है? कहीं कहीं से मन्त्र का एक अंश उठाकर उन्हें जोड़कर एक नया मन्त्र तैयार कर देना कहाँ तक उचित है?

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सत्यार्थ प्रकाश के तृतीय समुल्लास में स्वामी जी ने योगवाशिष्ठ, पंचदशी, पुराण, तुलसीदास रामायण, रुक्मिणी मंगल, भाषाग्रंथ आदि के विषय में लिखा है कि "इनको विष मिले अन्न की भांति त्याग देना चाहिए क्योंकि ये ग्रंथ असत्य हैं और जो कोई इन असत्य ग्रंथों में से कुछ सत्य का ग्रहण भी करना चाहे तो भी मिथ्या बातें उसके गले चिपट जाती हैं"। यहां साफ पता चल रहा है कि स्वामी जी ने  इन ग्रंथों की अनुपयोगिता कह दी।

जब आप पुराणों को ही नहीं मानेंगे तो आपके राजाओं और अन्य ऋषियों/महापुरुषों का चरित्र व इतिहास आपको अन्य कहीं भी नहीं मिलेगा। फिर बैठ कर arya invasion theory ही पढ़ना। 

[ वर्तमान युवा पीढ़ी को आर्य समाज का इतिहास मालूम नहीं, इसलिए इनके चक्करों में फंस जाते हैं। यदि वर्तमान पीढ़ी आर्य समाज के इतिहास की छान बीन करे, तो उन्हें मालूम पड़ेगा कि ये आर्य समाज धर्म के नाम  पर लोगों को केवल भ्रमित करता है। ]

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#आर्य_समाज_की_चालाकियां :- 

1. #घुसने_निकलने_की_कुंजी :- सत्यार्थ प्रकाश के तृतीय समुल्लास में यह लिखा गया है कि ऋषि प्रणीत ग्रन्थों को इसलिए पढ़ना चाहिए क्योंकि वे बड़े विद्वान, शास्त्रवित और धर्मात्मा थे। 
फिर आगे कह दिया गया इन ग्रंथों में भी जो जो वेद विरुद्ध हो उस-उस को छोड़ देना। 
लो बताओ, मतलब स्वामी जी एक तरफ तो कह रहे हैं कि वे सब ऋषि बड़े विद्वान, शास्त्रों के जानकार और धर्मात्मा थे, तो दूसरी तरफ कह रहे हैं कि उनके ग्रंथों में भी उन बातों को छोड़ देना जो वेद विरुद्ध हो। 
तो स्वामी जी ये तो बताएं कि यदि वे ऋषि लोग शास्त्रों के जानकार, विद्वान और धर्मात्मा थे तो उन्होंने वेद विरुद्ध बातें कैसे लिखी होंगी? या तो स्वामी जी बाहर से उन ऋषियों की बड़ाई करने के बावजूद भी भीतर से  उन ऋषियों को बुद्धू ही समझ रहे हैं तभी उनको ये ख्याल आया कि उन ऋषियों के ग्रंथों में वेदविरूद्ध बातें भी होंगी  या फिर स्वामी जी हम लोगों को बुद्धू बना रहे हैं!

 इस चालाकी से आर्य समाज को ये फायदा तो है कि जब मन करता है तब उस ग्रन्थ में लिखी किसी बात को प्रमाणिक मान लेते हैं । और जब मन करता है तब उसी ग्रन्थ की दूसरी बात को प्रमाणिक नहीं मानते। और मिलावट मिलावट का राग अलापकर लोगों को बुध्दधु बनाते हैं।
यदि कोई दूसरा मनुष्य उसी ग्रंथ में से कुछ प्रमाण देता है तो उस बात को वेदविरुद्ध और मिलावटी बोलकर अपना उल्लू सीधा करने लगते हैं। इस प्रकार से आर्य समाज के लोग वेदों की ही आड़ में लोगों को वेदों से दूर कर रहे हैं। जो इनके मन को अच्छा लगता है उसे प्रमाणिक मान लेते हैं, जो बात इनकी बुद्धि में नहीं घुसती उसको मिलावटी/वेद विरुद्ध बोलने लगते हैं। वास्तव में ये वेदों को भी नहीं मानते, केवल अपने मन की मानते हैं। जो बात अच्छी लगे, उसे ही मानते हैं।

तिलक। उपनयन। पेशाब

सत्यार्थ प्रकाश के द्वितीय समुल्लास में स्वामी जी लिखते हैं - स्त्री योनिसंकोचन, शोधन और पुरुष वीर्य
का स्तंभन करे, पुनः सन्तान जितने होंगे वे भी सब उत्तम होंगे ।

समीक्षा- स्वामी जी! आप तो कहते थे कि हमारा मत वेद है। अब आप ये बताइये कि यह किस वेदमन्त्र का अनुवाद है ? यदि सत्यार्थप्रकाश में आप योनिसंकोचन की कोई औषधि लिख देते तो विषयीसंसार का अपूर्व उपकार हो जाता, औषधि न लिखने के कारण स्त्रियों के मन की मन ही में रह गई |
 क्या ये गप्प ही वैदिकधर्म कहलाता है ?

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सत्यार्थ प्रकाश के द्वितीय समुल्लास में स्वामी दयानंद जी ने कहा है कि शूद्र आदि का उपनयन किए बिना ही उन्हें गुरुकुल में पढ़ने भेज दिया जाए। 
 किंतु आज के आर्य समाज के अनुसार तो स्त्री और शूद्रों को भी उपनयन का अधिकार है। और वे आर्य समाज मे भर्ती होने वाले सब बालक बालिकाओं के उपनयन करवाते ही हैं। और इतना ही नहीं, आर्य समाजी गण तो घर वापसी के बहाने विधर्मियों तक का उपनयन करवा देते हैं।
 तो या तो आज के आर्य समाजी गुरु की अवज्ञा कर के गुरु द्रोह जैसा पाप कर रहे हैं। या फिर स्वामी दयानंद जी ने ये सब गलत लिखा?

[यहां पर तो स्वामी जी ने उस शुद्र का वर्ण जन्मना ही माना है न कि कर्मणा। क्योंकि अभी तो वो बेचारा बालक है। अभी से उसको शुद्र समझ के उपनयन से वंचित रखना क्या उसके साथ अन्याय नहीं?]


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बाकी धर्म नए हैं, नए वाले तो धर्म ही नहीं है। ये तो मजहब हैं, मत हैं। धर्म का अर्थ होता है धारण करना। सनातन धर्म ही असली धर्म है। बाकी सभी मजहबों का कोई प्रवर्तक है। जो शुरू हुआ वह ख़तम भी होगा, लेकिन सनातन धर्म का कोई आदि ही नहीं तो अंत भी नहीं। यह नित्य है।
इस तरह की पोस्टें आती हैं। धर्म वालों को कोई रोजगार, स्वास्थ्य और शिक्षा नहीं चाहिए, बस ऐसे ही फ़ालतू मुद्दों पर भाव विभोर हो रहे हैं। आसमान छूने वाला भव्य राम मन्दिर बन रहा है। हमारा धर्म बहुत उंचा है। बाकी मजहबों को तो कुछ पता ही नहीं हैं ।
ऐसी पोस्टें देख कर टीका टिप्पणी भी तो इन्हीं बातों पर ही होगी ना। पर ये धर्म के पैरोकार नास्तिकों को पाठ पढ़ाएंगे कि टीका टिप्पणी करनी है तो दूसरे मजहबों की भी करो। यही तो इनका एजेंडा है। दूसरे लोगों को भड़काना। इनकी चालों में नहीं आना है। यह नास्तिकों को अपने दंगों वाली मानसिकता में हथियार बनाना चाहते है।
जब ज्ञान बढ़ रहा है, विज्ञान बढ़ रहा है तो धर्म को भी आगे बढ़ना चाहिए। जब धर्म की बातें लिखी गई तब सीवर नहीं था। घर में पानी की व्यवस्था नहीं थी।
शिव पुराण में सुबह उठ कर जंगल, पानी, दातुन कुल्ला, स्नान और वस्त्र धोने की विधि लिखी हुई है। तो क्या हम आज भी वही करेंगे? उत्तर की तरफ मुंह करना है। लिंग और गुदा पर मिट्टी मलना हैै। कितनी मिट्टी मलनी है इस का परिमाण भी लिखा है। ( मैने मजाक सुना है कि मुसलमान पेशाब करने के बाद लिंग पर मिट्टी लगा कर साफ़ करते हैं।) कुल्ला कितनी बार करना है। जहां स्नान करना है वहां कपडे नहीं धोने है। कपडे धोने कैसे है वह भी लिखा है। जाहिर है यह तो लिखा नहीं हो सकता कि वाशिंग मशीन में कपडे धो लो। तो क्या असली सनातनी हिन्दू वहीं है जो इसी प्रकार करेगा ? शिव पुराण किताब का पन्ना पोस्ट कर दिया है। पढ़ कर अमल करो और बन जाओ असली सनातनी। पर मोदी के स्वच्छ भारत अभियान का क्या होगा ? इस तरीके से तो यह अभियान सनातन संस्कृति का विरोधी है।
इन फ़ालतू की बातों में कुछ नहीं रखा है। छोड़ो पुरानी बातें। धर्म निजी मसला है। इसको अपने घर तक सीमित रखें। ज्ञान की बातें करें। दिमाग को विकसित करें। इतिहास का अच्छे से अध्यन करें। इतिहास में क्या गलतियां हुई, क्यों हुई, उनका सुधार कैसे करें, ऐसी बातों पर चर्चा होनी चाहिए। अंधविश्वासी मत बनो। दिमाग को खुला रखो। विरोधी पक्ष की बात पर विचार करो। हो सकता है वह सही हो।
 

 
 
 

आर्य समाजी ग्रंथों की कमियां।

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आर्य समाज की वेदृषि वाली रामायण के भरत जी तो स्वप्न के शुभाशुभ फल को मानते हैं। लगता है आर्य श्रेष्ठ भरत जी भी पौराणिक थे।

द्वापर और त्रेता के परशुराम और हनुमान दोनों अलग अलग हैं। भला कोई लाखों वर्ष कैसे जी सकता है? जियेगा तो आर्य समाज की बात झूठी हो जाएगी

आर्य समाज की vedrishi वाली रामायण में लिखा है कि हनुमान की गर्जना से ही  राक्षस मर गए। 
कोई आर्य समाजी अपनी चीख से ऐसा करे तो माने


जगदीश्वरानंद आर्य:- हनुमान जी mono plane से गए।
राहुल आर्य:- हनुमान जी तैर कर गए।
अग्निव्रत आर्य:- हनुमान जी उड़ कर गए।


आर्य समाजियों की Vedrishi वाली रामायण के हनुमान तो अपने शरीर को बहुत छोटा और बहुत बड़ा भी कर लेते हैं। 
इसमें कौन सा विज्ञान है?

आर्य समाज के अनुसार त्रेता वाले परशुराम और द्वापर वाले परशुराम अलग-अलग व्यक्ति हैं।
लेकिन उनके माता पिता का नाम इनको नहीं मालूम।

सत्यार्थ प्रकाश के अनुसार तो कम से कम 25 वर्ष की आयु तक गरुकुल में रह कर सब विद्याओं का अध्ययन करे और 25 वर्ष की अवस्था में गरुकुल में आचार्य द्वारा परीक्षा करके बालकों का वर्ण निर्धारण होना चाहिए, जबकि हमारे भारत में तो ऐसे अनेकों उदाहरण हैं जब 15 वर्ष और इससे भी कम आयु के क्षत्रिय बालक भी युद्ध लड़ने गए। धर्मवीर छत्रपति सम्भा जी महाराज और गुरु गोविंद सिंह जी के पुत्र उन्हीं लोगों में से हैं। अब यदि आर्य समाज के थोथे सिद्धांत उस समय लागू होते तो हिंदुओं की क्या स्थिति होती, ये विचार करने योग्य है।

शिवाजी महाराज तो "जय भवानी" का ही नारा लगाते थे। "ओ३म" का नहीं। 
राजपूत योद्धा भी "जय एकलिंगनाथ" बोलते थे।
मतलब वे सब पौराणिक थे।

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ये है असली वाल्मीकि रामायण जिसमें बालकाण्ड में देवताओं का ब्रह्मा जी के पास जाने और फिर भगवान विष्णु से अवतार लेने की प्रार्थना की गई है।
ये सब वेदृषि रामायण में से उड़ा दिया गया।
 क्यों? क्योंकि अनार्य समाजी इतने गिरे हुए लोग हैं कि अपने मत की पुष्टि के लिए इनको भले ही वाल्मीकि जी की, वेद व्यास जी की लिखी बातों को काटना पड़े तो भी काटेंगे। 
ये लोग साकार भगवान को नहीं मानते, अवतार को नहीं मानते, देवी देवताओं को नहीं मानते परन्तु वाल्मीकि, व्यास आदि ऋषि तो मानते हैं।  इसलिए ले दे कर अनार्य समाजियों के पास यही उपाय बचता है कि चलो अब ऋषियों के साहित्य पर ही कैंची चलाओ। ताकि इनके मार्ग में कोई चीज़ रोड़ा न बने।
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अनार्य समाजी लोग अक्सर दूसरों पर मिलावट का आरोप लगाते हैं। वे कहते हैं कि पंडे पुजारी ब्राह्मणों ने रामायण, महाभारत में मिलावट कर दी। हालांकि वे आजतक सिद्ध नहीं कर पाए कि मिलावट किसने करी, कहाँ कहाँ करी। वास्तव में वो आरोप केवल ब्राह्मणों को गाली देने का एक बहाना है। क्योंकि लोकतंत्र में ब्राह्मणों को कोई भी गाली दे सकता है। इस बात का फायदा भीमटों के साथ साथ अनार्य समाजी भी उठाते ही हैं।

 आज मैं आपको प्रमाण सहित दिखा रहा हूँ कि कैसे अनार्य समजियों ने खुद रामायण में कांट छांट भी करी और मिलावट भी करी। दो अलग अलग श्लोकों के टुकड़े उठाकर, उन्हें एक श्लोक बना दिया, ताकि इनका अपना मत सिद्ध हो जाये। और इसी वेदृषि वाली रामायण को ये लोग शुध्द रामायण कहकर बेचते हैं। अब बेचारे लोगों को क्या मालूम कि शुध्द वाली वास्तव में शुद्ध नहीं बल्कि मिलावटी है।

अब नीचे दिए चित्रों में देखिए। ये जो सफेद वाला चित्र है ये वेदृषि रामायण के बालकाण्ड का आठवां सर्ग है जिसमें लिखा है कि दशरथ जी के पुत्रेष्टि यज्ञ सम्पन्न होने पर ऋष्यश्रृंग द्वारा रानियों को खीर का पात्र दिया गया।

और जो थोड़ा पीला चित्र है वो असली रामायण का है जिसमें यज्ञकुंड से विशालकाय पुरुष का प्रकट होना लिखा है।

अब आप इस बात पर भी गौर कीजिए कि कैसे अनार्य समाजियों ने दो अलग अलग श्लोकों से कुछ टुकड़ा उठाकर उनको जोड़ कर एक श्लोक बना दिया। असली वाल्मीकि रामायण (पीले रंग के पृष्ठ) में बालकाण्ड के 16वें सर्ग के श्लोक संख्या 11, 14, 15 में जो श्लोक दिए हैं उन्हीं को टुकड़ों में उठाकर, उनमें संस्कृत का हेरफेर करके नए श्लोक रचकर उसे वेदृषि रामायण के बालकाण्ड के सर्ग 8 में डाल दिया गया है। (लाल निशान वाले संस्कृत श्लोकों को ध्यान से पढ़िए कि कैसे श्लोक बिगाड़े गए, उनमें अनार्य समाज द्वारा मिलावट करी गयी)

पहली बात तो ये कि जो श्लोक असली रामायण में सर्ग संख्या 16 में थे वो श्लोक वेदृषि रामायण में सर्ग संख्या 8 में कैसे? लगता है बीच वाले 8 सर्ग अनार्य समाजी चाय में डुबोकर निगल गये? वो क्यों निगल गए उसका कारण अगली किसी पोस्ट में बताऊंगा। अभी आप लोग इनकी इस मक्कारी को देखिए कि कैसे ये ऋषियों के साहित्य को नष्ट करने का प्रयास कर रहे हैं, उसे अपने मतानुकूल ढालने का प्रयास कर रहे हैं। श्लोकों को काट रहे हैं, अपने नए श्लोक बना कर डाल रहे हैं। जो वाल्मीकि जी ने लिखा उसमें छेड़छाड़ करने का दुस्साहस ये लोग कर रहे हैं। क्यों? क्योंकि दिव्य देव, गन्धर्व आदि योनियों को ये नहीं मानते, चमत्कारों को ये नहीं मानते, भगवान के साकार रूप को ये नहीं मानते। इसलिए जहां कहीं भी भगवान के साकार रूप, दिव्य चमत्कारों का वर्णन ऋषियों ने किया उन सब बातों को ये लोग काट देते हैं, बदल देते हैं। ये सब नीचता किसलिए? ताकि इनके मत की पुष्टि हो जाये। मतलब ये तो वही बात हुई कि मानो कोई बालक अपनी गणित की पुस्तक में से 6 का पहाड़ा वाला पन्ना ही फाड़ फैंके और बाद में लोगों को, अध्यापकों को, कहता फिरे कि देखो 6 का पहाड़ा होता ही नहीं। 

जय श्री राम।


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वेदृषि रामायण के बालकांड के सर्ग 6 के श्लोक संख्या 5 में दशरथ जी कह रहे हैं कि "विधिहीन यज्ञ करने वाला शीघ्र नष्ट हो जाता है"।

तो कोई आर्य समाजी हमें ये बताए कि ऐसी कौन सी यज्ञ करने की विधि होती है जिसे न करने से ऐसी नौबत आ जाये कि यज्ञकर्ता ही नष्ट हो जाये? क्योंकि आर्य समाज के अनुसार तो वायुमंडल की शुद्धि के लिए ही यज्ञ किया जाता है। तो उसमें विधि क्या? अरे जब हवन सामग्री घृत आदि के साथ मिलाकर अग्नि में आहुति दोगे तो दो ही बातें होंगी। या तो वायु शुद्धि हो ही जाएगी अथवा नहीं होगी। और मान लो कि वायु शुद्धि न हुई तो उससे यज्ञकर्ता कैसे नष्ट हो सकता है?  अब बताओ कि वो कौन सी विधि है जिसे पालन न करने पर यज्ञकर्ता शीघ्र नष्ट हो जाता है?

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आर्य समाजियों की वेदृषि रामायण के बालकांड के सर्ग 3 के श्लोक संख्या 5 में लिखा है कि "दशरथ उसी प्रकार अयोध्या में निवास करते थे जिस प्रकार स्वर्ग में इन्द्र बसते हैं।" तो कृपया ये बताइये कि ये इन्द्र कौन हैं? स्वर्ग कहाँ है? और कैसा इन्द्र का ऐश्वर्य है? क्योंकि जब दशरथ जी की यहां इन्द्र से तुलना की गई है तो इसका अर्थ इन्द्र भी मौजूद है तभी तो उससे दशरथ जी की तुलना की गई है। इसलिए हम जानना चाहते हैं कि इन्द्र कहाँ रहता था, स्वर्ग कहाँ था और उसका वैभव कैसा था जो अयोध्या से उसकी तुलना की गई?
और स्वर्ग को जबरदस्ती त्रिविष्टप क्यों लिखा है तुमने?

 फिर श्लोक संख्या 6 में लिखा है कि "सब प्रकार के यंत्र अयोध्या में थे तथा नाना कलाविशारद शिल्पी वहां वास करते थे।" तो अब तुम लोग ये बताओ कि "नाना कलाविशारद शिल्पी" जो थे ये किस वर्ण के थे? ब्राह्मण थे, क्षत्रिय थे, वैश्य थे या शूद्र थे? क्योंकि तुम्हारे दयानंद के अनुसार तो शुद्र का अर्थ होता है अज्ञानी मूर्ख। तो यदि वे नाना कला विशारद लोग शुद्र वर्ण के थे तब वे मूर्ख कैसे कहे जा सकते हैं? क्योंकि उन्हें अनेक कलाएं आती हैं, वे उच्च कोटि के शिल्पकार (architects/ civil engineers) हैं तो फिर वे मूर्ख नहीं कहे जा सकते। तो अब तुम लोग बताओ कि वे कौन से वर्ण के लोग थे? यदि शुद्र थे तब तो दयानंद का खण्डन हो जाएगा क्योंकि उसने शुद्र का अर्थ अज्ञानी मूर्ख किया है और मैं समझता हूं कि किसी भी civil engineer या architect को अज्ञानी या मूर्ख नहीं कहा जा सकता। और यदि वे शुद्र नहीं थे तो शास्त्रानुसार वे किस वर्ण में गिने जाएंगे?

फिर अगले श्लोक संख्या 7 में लिखा है कि उस नगर में सूत, मागध और वंदीजन भी रहते थे। तो कर्म के आधार पर वर्णव्यवस्था मानने वाले तुम लोग अब ये बताओ कि वे सूत, मागध और वंदीजन किस वर्ण में आएंगे? क्योंकि यदि वे शुद्र हैं तो फिर उन्हें भी मूर्ख गिनना पड़ेगा (ऐसा ही स्वामी दयानंद का आदेश है)। यदि वे शुद्र नहीं थे तो किस वर्ण में गिने जाएंगे?

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वेदृषि रामायण बालकांड सर्ग 2- श्लोक संख्या 21 में लिखा है कि " श्री राम, लक्ष्मण, सीता और पत्नियों तथा राष्ट्र सहित दशरथ जी का जो हंसना, बोलना आदि वृत्तांत और चरित्र थे उन सबको महर्षि  बाल्मीकि ने अपने धर्म बल से यथावत जान लिया। " 

कोई आर्य समाजी बता सकता है कि अपने आश्रम पर बैठे हुए वाल्मीकि जी को दशरथ जी व उनके परिवार का हंसना, बोलना कैसे मालूम पड़ गया? ये तो वही बात हुई कि मैं बैठा हूँ अपने घर और मुझे मालूम पड़ जाए कि राहुल आर्य अपने कमरे में बैठा क्या कर रहा है, किससे बातें कर रहा है? बताइये ऐसा कैसे सम्भव है? हां यदि मैंने कैमरे लगा रखे हों उसके कमरे में तब तो सम्भव है।

ध्यान रहे रामायण लिखी गयी थी तब जब राम जी वनवास से लौट चुके थे, और इसमें चरित्र व घटनाएं लिखी हुई हैं वे सब जो रामायण लेखन आरम्भ से पूर्व ही घट चुके थे। तो ऐसा कैसे सम्भव है कि भूतकाल में अनेक वर्षों पहले घटी घटनाओं को वाल्मीकि जी ने जान लिया। और वो भी दशरथ जी का हंसना, बोलना तक जान लिया? मतलब भूतकाल में किस दिन दशरथ जी ने महल में कब किससे क्या बोला, कब हंसे ये बात भी वाल्मीकि जी को मालूम पड़ गयी और वो भी अपने आश्रम में बैठे बैठे। कमाल है! क्या आर्य समाज इस तरह के चमत्कारों को मानता है? यदि नहीं मानता तो आर्य समाजी बताएं कि वाल्मीकि जी को वो घटनाएं कैसे मालूम पड़ीं, जो किसी की private (हंसना, बोलना) बातें थीं??

श्लोक संख्या 22 में लिखा है कि लक्ष्मण जी के साथ राम जी ने वन में विचरते हुए जो कुछ किया था, उन सबका वाल्मीकि जी ने साक्षात्कार किया। अब कोई आर्य समाजी हमें ये बताए कि वन में तो राम, लक्ष्मण, सीता ही थे। कोई जासूस तो उनके पीछे वाल्मीकि जी ने नहीं लगाया था न? फिर वाल्मीकि जी को वो घटनाएं कैसे पता लग गईं कि राम जी ने वन में क्या क्या किया? क्या आप लोग घर बैठे बैठे पता कर सकते हो कि इस समय मैं क्या कर रहा हूँ? क्या आप घर बैठे बैठे पता कर सकते हो कि 2 वर्ष पहले मैंने क्या किया था? तो वाल्मीकि जी को कैसे पता लगा? अब इस चमत्कार को आर्य समाजी मानेंगे या नहीं? यदि नहीं मानोगे तो वेदृषि वाली रामायण झूठी हो जाएगी।  

23वें श्लोक में भी यही लिखा है कि "जो जो चरित्र पहले हो चुके थे उन सबको हथेली पर रखे आंवले की भांति देखा "। अब बताओ तुम लोग कि किसी की प्राइवेट लाइफ में  भूतकाल में घटी उन घटनाओं को जानना कैसे सम्भव है? क्या आप जान सकते हो कि मैंने 5 वर्ष पूर्व क्या काम किया था? नहीं जान सकते न? तो वाल्मीकि जी ने कैसे जाना? बात बात पर विज्ञान ढूंढने वाले आर्य समाजी हमें बताएं कि इसमें कौन सा विज्ञान है ? यदि न बता पाएं तो जाकर कहीं शर्म से डूब मरें।


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वेदृषि रामायण बालकांड सर्ग 2- श्लोक संख्या 16 में जो ब्रह्मा जी आये हैं, वे कौन हैं? वे ऋषि थे या देवलोक के दिव्य देवता? यदि वे ऋषि / मनुष्य थे तो क्या कोई आर्य समाजी उन ब्रह्मा जी के बारे में हमें बता सकता है कि वे किसके पुत्र थे, उनका जीवन चरित क्या है? 

 श्लोक संख्या 17 में ब्रह्मा जी कह रहे हैं "जबतक धरा धाम पर पर्वत और नदियां रहेंगी तब तक राम कथा रहेगी"। क्या ये भविष्यवाणी नहीं? कोई आर्य समाजी बता सकता है कि ब्रह्मा जी ने ये बात किस बल पर कह दी? उन्हें क्या मालूम भविष्य में क्या होगा? आर्य समाजी तो भविष्यवाणी में मानते नहीं तो कोई आर्य ऋषि इस तरह का मिथ्या प्रलाप भला क्यों करेगा? हां यदि ऋषि पौराणिक हुआ तब तो वो इस तरह की बात बोल सकता है।


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वेदृषि रामायण बालकांड सर्ग 2- श्लोक संख्या 14 में वाल्मीकि जी द्वारा उस तीर्थ में स्नान करना बोला गया।  अब आर्य समाजी मुझे बताएं कि तुम लोग तो तीर्थों में मानते ही नहीं।।फिर यहां तीर्थ में विधिवत स्नान करना क्यों लिख मारा है?  इससे तो यही सिद्ध होता है कि वाल्मीकि जी भी पौराणिक थे।

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वेदृषि रामायण बालकांड सर्ग 2:-   9वें श्लोक में लिखा गया है कि वाल्मिकी जी ने कहा " है निषाद ! तुझे बहुकाल पर्यंत सुख शांति न मिले" । अब कोई आर्य समाजी मुझे बताए कि ये वाल्मीकि जी द्वारा दी गयी बद्दुआ / हाय / श्राप नहीं तो क्या है? क्या आर्य समाज श्राप में विश्वास रखता है। और श्राप भी ऐसा जिसमें भविष्य वाणी हो कि तुझे बहुकाल पर्यंत सुख न मिले। अब ऐसी भविष्यवाणी कौन कर सकता है? आर्य समाज न तो श्राप में विश्वास रखता है न ही ऐसी किसी भी तरह की भविष्यवाणियों में। क्या गारन्टी है कि उसे सुख नहीं मिलेगा? तो क्या वाल्मीकि जी पौराणिक पण्डे थे जो ऐसे श्राप देने में विश्वास रखते थे। 

श्राप देने के बाद उनका दुखी होना इसी बात का संकेत है कि उन्हें अपने श्राप के सत्य हो जाने का भय था, इसलिए वे दुखी हो गए कि उन्होंने आवेश में आकर ये क्या कर दिया! अतः सिद्ध है कि उस काल में भी श्राप आदि पर विश्वास किया जाता था। वरना आर्य समाजी तो सड़क पर रखे टोने टोटके से भी नहीं दुखी होते, और वाल्मीकि जी श्राप देने से दुखी हो गए? कमाल है।

दयानन्द स्वामी ने भर भर के दूसरे सन्तों / सम्प्रदायों को कठोर शब्द कहे, तो भी उन्हें दुख न हुआ। किंतु वाल्मीकि जी एक हत्यारे को श्राप देकर भी दुखी हुए।

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#बालकाण्ड_सर्ग_2 

आर्य समाज की वेदृषि रामायण के बालकाण्ड के सर्ग - 2 के श्लोक संख्या 2 में लिखा है कि " देवर्षि नारद " आकाश मार्ग से चले गए। और आकाश मार्ग से जाने की व्याख्या करते हुए पृष्ठ के अंत में लिखा है कि " उस काल में अनेक लोगों के पास छोटे छोटे विमान होते थे। नारद जी भी विमान से गए थे"।

● अब मैं सब आर्य समाजियों से पूछना चाहता हूं कि एक तरफ तो तुम्हारे अग्निवर्त जी बोलते हैं कि योगबल से उड़ना सम्भव है, विभूतिपाद की सिद्धियां भी सत्य हैं; और हनुमान जी योगबल से उड़कर गए थे। वहीं दूसरी तरफ तुम अपनी रामायण में ये लिखते हो कि "देवर्षि नारद" प्लेन से गए थे। मतलब एक व्यक्ति जो ऋषि से भी ऊंचा "देवर्षि" है वो तो जा रहा है प्लेन पर, और हनुमान जी गए थे उड़कर? कमाल हो गया। जब हनुमान जी मे योगबल से सिद्धियां आ सकती हैं, तो देवर्षि नारद में योगबल नहीं था क्या? बड़ी अजीब बात है। तो मतलब एक देवर्षि के योग का स्तर वन में रहने वाले वानर से भी घटिया था? फिर उनको देवर्षि कहना ही नहीं चाहिए। फिर वे देवर्षि की उपाधि के लायक ही नहीं। फिर क्यों उन्हें देवर्षि कहा गया? और यदि उस ज़माने में प्लेन अनेक लोगों के पास होते थे, तो ये बात कहीं ग्रन्थों में तो लिखी नहीं हुई। बल्कि तुम लोगों ने अपने मन से बनाकर जोड़ी है। अगर अनेक लोगों के पास विमान होते तो बताओ ईंधन क्या डलता था उनमें? जब तुमने ये बात खोज ली है कि अनेक लोगों के पास विमान होते थे, तो ईंधन की भी जानकारी दो। हवाई पट्टी/ हवाई अड्डों की भी जानकारी दो। 

● अगले श्लोक में तुमने संस्कृत के "देवलोक" का अर्थ हिंदी में "देवाश्रम" कैसे किया?  लोक और आश्रम में अंतर समझ नहीं आता तुम लोगों को? या जानबूझकर गलत अनुवाद किया ताकि भोले भाले हिंदुओं को पागल बना सको? क्योंकि तुम लोग देवलोक/ स्वर्गलोक में मानते ही नहीं हो, इसलिए। 

[ विमान केवल देवलोक के देवताओं और महान राजाओं के पास होते थे वो भी मन के संकल्प से उड़ने वाले, लेकिन आर्य समाज देवलोक के अस्तित्व को मानता ही नहीं ]

नीचे वेदृषि रामायण, बालकाण्ड, सर्ग -2 का स्क्रीनशॉट दिया जा रहा है। :-


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#बालकाण्ड_सर्ग_2

आर्य समाजियों द्वारा शुद्धिकरण के नाम पर छापी गयी वेदृषि वाली रामायण के बालकाण्ड के सर्ग- 2 में केवल 25 श्लोक ही छापे गए हैं। जबकि असली मूल वाल्मीकि रामायण के बालकाण्ड सर्ग -2 में कुल 43 श्लोक हैं। अर्थात आर्य समाजियों ने महर्षि वाल्मीकि जी की लेखनी पर कुठाराघात करते हुए उनके साहित्य को नष्ट करने का प्रयास किया। और बालकाण्ड के सर्ग - 2 में दिए गए 43 श्लोकों में से  18 श्लोकों को हटा दिया गया।

नीचे देखिए मैंने प्रमाण के तौर पर दोनों रामायणों के बालकांड के सर्ग- 2 की फ़ोटो भी लगाई है। वेदृषि रामायण के दूसरे सर्ग में केवल 23 श्लोक ही छापे गए हैं।

 मैं पूछता हूँ कि महर्षि वाल्मीकि जी की रचना में कांट छांट करने का अधिकार तुम दुष्ट समाजियों को किसने दिया? दूसरों पर तुम मिलावट का आरोप लगाते हो लेकिन खुद तुम लोगोंने क्या कारनामे कर रखे हैं, पहले अपने अंदर झांक कर देख लो। खुद तुम लोगों ने महान तपस्वी महर्षि वाल्मीकि जी के साहित्य पर कैंची चलाई और ऐसा करते हुए तुम्हें तनिक भी शर्म न आई। अरे डूब मरो जाकर।

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#बालकाण्ड_सर्ग_1 :- 

आर्य समाजियों द्वारा शुद्धिकरण के नाम पर छापी गयी वेदृषि वाली रामायण के बालकाण्ड के प्रथम सर्ग में केवल 18 श्लोक ही छापे गए हैं। जबकि असली मूल वाल्मीकि रामायण में कुल 100 श्लोक हैं। अर्थात आर्य समाजियों ने महर्षि वाल्मीकि जी की लेखनी पर कुठाराघात करते हुए उनके साहित्य को नष्ट करने का प्रयास किया। और बालकाण्ड के प्रथम सर्ग में दिए गए 100 श्लोकों में से 82 श्लोकों पर कैंची चलाकर हटा दिया गया।

 मैं पूछता हूँ कि महर्षि वाल्मीकि जी की रचना में कांट छांट करने का अधिकार तुम दुष्ट समाजियों को किसने दिया? दूसरों पर तुम मिलावट का आरोप लगाते हो लेकिन खुद तुम लोगोंने क्या कारनामे कर रखे हैं, पहले अपने अंदर झांक कर देख लो। खुद तुम लोगों ने महान तपस्वी महर्षि वाल्मीकि जी के साहित्य पर कैंची चलाई और ऐसा करते हुए तुम्हें तनिक भी शर्म न आई। अरे डूब मरो जाकर।

 ऐसा तो कुछ भी नहीं लिखा था उन श्लोकों में जो तुम्हारे मत के विपरीत था। तुम लोग अक्सर जानबूझकर उन्हीं श्लोकों को मिलावटी घोषित करते हो और वे ही श्लोक हटाते हो जिनमें भगवान के साकार रूप का वर्णन होता है अथवा कोई चमत्कारिक बात होती है अथवा कोई ऐसी बात जो तुमको आपत्तिजनक लगती है। किंतु इन हटाये गए 82 श्लोकों में से 75 श्लोक तो ऐसे थे जिनपर किसी आर्य समाजी विद्वान को कोई आपत्ति नहीं हो सकती थी। क्योंकि उन 75 श्लोकों में न तो कोई चमत्कार वाली बात थी,न ही भगवान के साकार रुप वाली। उन 82 श्लोकों में भी केवल 7 श्लोक ऐसे थे जो आर्य समाज के मत के खण्डन में थे। बाकी के 75 पर तो किसी को कोई आपत्ति हो ही नहीं सकती थी। फिर भी तुम लोगों ने हटा दिए। मतलब नीचता की सारी हदें पार करते हुए तुम लोगों ने वाल्मीकि जी के साहित्य पर मनमानी कैंची चलाई और अब इस वेदृषि रामायण को शुद्ध कहकर बेचते हो। 

मुस्लिम आक्रांता आग लगा कर हमारा साहित्य नष्ट करते थे और तुम लोग कांट छांट कर, कैंची चलाकर साहित्य नष्ट करने पर तुले हुए हो। 

 देखिए आर्य समाज की वेदृषि वाली रामायण के बालकाण्ड के सर्ग-1 की फ़ोटो जिसमें केवल 18 श्लोक हैं।  और असली वाल्मीकि रामायण के बालकाण्ड के प्रथम सर्ग की फ़ोटो जिसमें कुल 100 श्लोक हैं:-

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वेदृषि वाली रामायण की भूमिका में ही रामायण काल का  वर्णन करते हुए आप लोगों ने वायु पुराण के श्लोकों से रामायण काल की गणना की है और इतना ही नहीं बल्कि आपकी वेदृषि वाली रामायण में तो ये भी लिखा है कि रामायण काल इस मन्वन्तर के 24वें त्रेता युग में लगभग 1 करोड़ 81 लाख वर्ष पूर्व का है।

अब पाठक गण विचार करें कि एक तरफ तो राहुल आर्य, अमित आर्य जैसे youtubers अपने वीडियोस में रामायण काल को 9 लाख वर्ष पूर्व का बोलते हैं, जबकि स्वामी जगदीश्वरानंद द्वारा संपादित उनकी वेदृषि वाली रामायण में 1 करोड़ 81 लाख वर्ष पूर्व का माना गया है; तो राहुल आर्य/ अमित आर्य ठीक बोल रहे हैं या जगदीश्वरानंद सरस्वती जी ठीक बोल रहे हैं? पहले तो खुद आप लोग निर्णय लीजिये कि कौन बड़ा विद्वान है? Youtube पर गाली देकर पैसे कमाने वाला राहुल आर्य या स्वामी जगदीश्वरानंद सरस्वती जैसा बड़ा आर्य विद्वान?  निर्णय करके हम हिन्दुओ को जरूर बता देना। क्योंकि हम तुम लोगों के दोगलेपन से परेशान हो चुके हैं।

एक तरफ तो आप लोग पुराणों को मिलावटी मानते हो, उनको वेद व्यास जी द्वारा रचित भी नहीं मानते और आपके अनुसार तो पुराण रचियता को तो गर्भ में ही मर जाना चाहिए था, पुराणों को जला देना चाहिए; और दूसरी तरफ आप उन्हीं पुराणों से रामायण आदि की काल गणना भी चोरी करते हो, मन्वन्तर , युगादि के मान भी उन्हीं पुराणों से चोरी करते हो। तो ऐसा दोगलापन करते हुए आप लोगों को शर्म क्यों नहीं आती? जब दयानन्द जी ने सत्यार्थ प्रकाश में पुराणों के बारे में कह दिया कि "जो कोई उन ग्रन्थों से कुछ अच्छा भी ग्रहण करना चाहे तो भी बुराई उसके चिपट जाए, अतः उनका त्याग ही उचित है", फिर अपने गुरु की आज्ञा का पालन क्यों नहीं करते? पुराणों से क्यों काल गणना ग्रहण करते हो? ये काल गणना मिलावटी नहीं , इसका क्या सबूत है आपके पास? इसलिए अपनी ये दोहरी चाल चलना बन्द करो, और हिंदुओं को मूर्ख बनाना बन्द करो।

नीचे वेदृषि वाली रामायण से ही स्क्रीनशॉट दिया जा रहा है।

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#आर्य_समाज_की_चालाकियां :-

#पाठ_परिवर्तन :- दूसरों पर मिलावट का आरोप लगाने वाला आर्य समाज स्वयं ही ग्रंथों के श्लोकों में मिलावट करके लोगों को ठगता है। उसका एक उदाहरण आप नीचे दिए हुए फोटोस में देखिए। मनुस्मृति के दूसरे अध्याय का 28 वां श्लोक, वहां पर जो असली मनुस्मृति है उसके अंदर "स्वाध्यायेन व्रतैर्होमै" लिखा हुआ है किन्तु स्वामी जी ने सत्यार्थ प्रकाश के चतुर्थ समुल्लास में पाठ परिवर्तन करके वहां "स्वाध्यायेन जपैर्होर्मे" लिख दिया। इस प्रकार से आर्य समाज अपना मत ऊपर रखने के लिए लोगोंको बुद्धू बनाता है।
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*वैदिक सांख्य दर्शन से आर्य समाज के मत की समीक्षा*

आर्य समाज का मत है कि *"आत्मा स्वभाव से ही कर्म करता है और कर्म का फल भी स्वभाव से भोगता है"* । लेकिन क्या वैदिक दर्शनों में सांख्य दर्शन आर्य समाज के इस मत का समर्थन करता है❓👈🏻 यह जानने के लिए अब हम समीक्षा शुरू करते हैं👇🏻

*न कर्मणाप्यतद्धर्मत्वात् ॥ ५२ ॥(सांख्य दर्शन 1/52)*

*सूत्रार्थ - कर्मणा = कर्म से, अपि = भी , न = नही हो सकता (आत्मा का बंधन),अतद्धर्मत्वात् = क्योंकि यह उस (आत्मा) का धर्म नहीं है।*

*व्याख्या - किसी भी प्रकार (अच्छे अथवा बुरे) कर्म से भी आत्मा का बंधन नहीं हो सकता;क्योंकि कर्म करना (बंधित होना) आत्मा का धर्म नहीं है, कर्म करना ( बंधन) तो शरीर का धर्म है । एक के बन्धन से दूसरे का बन्धित होना तर्क संगत नहीं कहा जा सकता।*

*अतिप्रसक्तिरन्यधर्मत्वे ॥ ५३ ॥(सांख्य दर्शन1/53)*

*सूत्रार्थ - अन्यधर्मत्वे = किसी एक के धर्म से किसी दूसरे का बन्धन मान लेना, अतिप्रसाक्तिः = अति प्रसंग दोष होगा ।*

*व्याख्या - किसी एक के धर्म से दूसरे का बन्धन होना मानने से कथन अत्युक्ति (अति प्रसङ्ग) दोष से युक्त कहा जायेगा।* *अभिप्राय यह है कि एक के धर्म से दूसरे के बन्धन की उक्ति, व्यर्थ ही बात बढ़ाकर कहने के दोष से युक्त होगी।* *यदि उसे यथार्थ सिद्धान्त मान भी लें, तो किसी साधारण व्यक्ति द्वारा किये गये कर्म (धर्म) से मुक्तात्मा भी बन्धन से न बच सकेगा;* *क्योंकि किसी के कर्म का फल कोई भोगेगा। अत: यही निष्कर्ष है कि यह सिद्धान्त भी मिथ्या ही है ॥ ५३ ॥*

*निर्गुणादिश्रुतिविरोधश्चेति ॥ ५४॥ (सांख्य दर्शन 1/54)*

*सूत्रार्थ - निर्गुणादि = श्रुति द्वारा आत्मा को निर्गुण आदि कहा है*, *श्रुतिविरोधश्चेति* = *श्रुति से विरोध होगा* *(आत्मा को बंधनयुक्त कहने से)*

*व्याख्या- श्रुतियों द्वारा आत्मा को निर्गुण, असङ्ग आदि कहा गया है। यथा 'साक्षी चेता केवलो निर्गुणश्च' तथा ' असङ्गो ह्ययं पुरुषः ' आदि। श्वेता० और बृहदा० उपनिषदों में चेतन आत्मा को स्पष्ट रूप से निर्गुण और असङ्ग कहा गया है। अस्तु, प्रकट ही है कि जो निर्गुण (गुणातीत) और असङ्ग है, उसे बन्धनयुक्त कहना उचित नहीं है॥ ५४ ॥*

सांख्य दर्शन के इन सूत्रों👆🏻 ने आर्य समाज के इस मत का खंडन कर दिया। यहाँ सांख्य दर्शन ने स्पष्ट कहा है कि आत्मा स्वभाव से ही अकर्ता , असंग , निर्गुण और मुक्त है । यहाँ सांख्य दर्शन ने आत्मा के कर्ता व कर्मफल भोगता होने का तर्कपूर्वक और प्रमाणपूर्वक खंडन किया है । और वैसे भी प्रश्न यह उठता है कि जब आत्मा प्रकृति से बना ही नही है तो वह प्रकृति से निर्मित कर्म को स्वभाव से करने वाला और कर्म के फल को भोगने वाला कैसे हो सकता है❓इससे सिद्ध हो गया कि आर्य समाज का मत सनातन धर्मशास्त्र विरुद्ध है , और जो मत सनातन धर्मशास्त्र विरुद्ध है वह सनातन धर्मी हो ही नही सकता इसलिए आर्य समाज सनातन धर्मी नही है ।  आर्य समाज सनातन धर्म के विरुद्ध है ।

*🚩🚩🚩हर हर महादेव🚩🚩🚩*

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#सत्यार्थ_प्रकाश 
आर्य समाजी लोग कैवल्य उपनिषद को प्रामाणिक नहीं मानते। उनके अनुसार केवल 11 उपनिषद ही प्रामाणिक हैं और उनके प्रामाणिक अनुसार उन 11 की लिस्ट में कैवल्य का नाम नहीं। परन्तु अपना मतलब साधने के लिए तो ये गधे को भी बाप बना लें। इसलिए सत्यार्थ प्रकाश के आरम्भ में उन्होंने कैवल्य उपनिषद से भी एक मन्त्र उठा लिया।

दयानंद की पोल।

इस पोस्ट में दो चित्र हैं, और दो ही विषय हैं। एक विषय से सम्बंधित वाक्य हरे रंग से हाईलाइट कर दिए हैं। दूसरे विषय से सम्बंधित वाक्य पीले रंग से।

1. हरे रंग में - सत्यार्थ प्रकाश के चतुर्थ समुल्लास में लिखा है कि "यह गुण कर्मों से वर्णों की व्यवस्था कन्याओं की सोलहवें वर्ष और पुरुषों की पच्चीसवें वर्ष की परीक्षा में नियत करनी चाहिए"। किंतु आगे दशम समुल्लास (दूसरी फोटो) में लिखा है कि "ब्राह्मण वर्ण का सोलहवें, क्षत्रिय का बाइसवें, और वैश्य का चौबीसवें वर्ष में 'केशान्त-कर्म' और मुंडन हो जाना चाहिए"। अब पाठक लोग विचार करें कि क्या ये परस्पर विरोधी बातें नहीं? मानो स्वामी जी ने नकल करके लिखने के चक्कर में ये अक्ल भी न लगाई कि मैं पहले क्या लिख रहा हूँ और बाद में क्या लिख रहा हूँ। अब अनार्य समाजी बताएं कि जब वर्ण का निर्धारण का 25 वर्ष की आयु में एक परीक्षा लेकर होना है तो तुम 25 वर्ष की आयु तक पहुंचने से पहले ही, बिना परीक्षा लिए ही किसी को ब्राह्मण मान कर उसका केशान्त संस्कार 16 वर्ष में कैसे करवा रहे हो?  किसी को क्षत्रिय मान कर 22 वर्ष की आयु में उसका केशान्त कैसे करवा रहे हो?  किसी को वैश्य मान कर 24 वर्ष की आयु में उसका केशान्त संस्कार कैसे करवा रहे हो? ये तो मतलब तुम्हारे दयानंद ने खुद ही खुद के सिद्धांतों पर पानी फेर दिया? कुछ तो झोल किया है दयानंद ने, जिसे आजतक आम जनता समझ नहीं पाई।

2. पीले रंग में- अब यहां स्वामी दयानंद ने हिंदुओं के एक और संस्कार को नष्ट करने की नींव रख दी ये कहकर कि "अति उष्ण देश हो तो सब शिखा सहित भी छेदन करवा देना चाहिए, क्योंकि सिर में बाल रहने से उसमें उष्णता अधिक लगती है, और उससे बुद्धि कम हो जाती है।"  ये बोलकर तो स्वामी जी ने उष्ण प्रदेश में रहने वाले लोगों की शिखा उड़ाने की छूट दे दी। जबकि ऐसा कहीं किसी शास्त्र में नहीं लिखा। 
देखो भई अनार्य समाजियों यदि अपने गुरु का आदर करते हो तो गर्मियों के दिनों में बीकानेर, जोधपुर, जैसलमेर के अनार्य समाजियों को अपनी शिखा उतरवाकर मुंडन करवा लेना चाहिए। वरना तो उष्णता के कारण तुम्हारी अक्ल ही कम हो जाएगी। 

और फिर स्वामी जी की इसी आज्ञा के आधार पर अनार्य समाजी औरतों को भी अपने सिर के केश कटवा लेने चाहियें। अन्यथा वे सब कम अक्ल हो जाएंगी। उनका मुंडन भी करवा दिया करो। तुम्हारे यहां तो उन सबको वेद भी याद करने पड़ते हैं तो ऐसे में यदि गर्मी के दिनों उनकी अक्ल कम हो गयी तब बेचारी याद कैसे करेंगी? इसलिए गर्मियों में उनका मुंडन भी करवा दिया करो। और अबतक जिनका मुंडन न हो चुका हो वे कम अक्ल सिद्ध हुईं।

पाठक गण विचार करें कि शिखा उड़वा देना हिंदुओं को मुस्लिम/ ईसाई बनाने के मार्ग पर अग्रसर करना नहीं है क्या? चोटी कटवाने के लिए अनेकों हिंदुओं को विवश किया गया किंतु हिंदुओं ने मर जाना स्वीकार किया परन्तु चोटी कटवाना नहीं स्वीकार किया। और इधर स्वामी जी ने सबकी चोटी पे वैचारिक  उस्तरा फेर ही दिया। हम तो कहते हैं कि अनार्य समाजियों की दाढ़ी-मूंछो की भी सफाई हो जानी चाहिए। ताकि पूरी तरह गर्मी से बचे रहें।  और अपनी कम अक़्ली का प्रदर्शन न करें।


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अनार्य समाजी लोग अक्सर आपको ये झूठ बोलते मिल जाएंगे कि सत्यार्थ प्रकाश में शुरू से ही 14 समुल्लास थे। जबकि सच्चाई ये है कि प्रथम (स्वामी दयानंद की लिखी) सत्यार्थ प्रकाश में 12 समुल्लास थे। जिनमें हिंदु धर्म की तमाम मान्यताओं और परम्पराओं को झूठा बताने में कोई कसर नहीं छोड़ी हुई थी। और ये सब काम स्वामी दयानंद ने किया पाखण्ड मिटाने का बहाना बनाकर। जैसे आजकल बॉलीवुड वाले फिल्मों में आपकी मान्यताओं को ठेस पहुंचाते हैं, और बहाना लगाते हैं कि हम तो पाखण्ड का विरोध कर रहे हैं।
लेकिन बाद में जब हिंदुओं द्वारा इसका कड़ा विरोध हुआ,जब स्वामी जी से पूछा गया कि क्या आपको हिंदुओं में ही कमी नज़र आई, पाखण्ड नज़र आया या अपने जानबूझकर सनातन धर्म को क्षति पहुंचाने के लिए सिर्फ हिंदुओं के धार्मिक मान्यताओं पर उल जलूल बे सिर पैर की टिप्पणियां अपनी पुस्तक में करी, तब उस घोर विरोध के कारण, लोगों के सामने स्वामी दयानंद जी की छवि को साफ सुथरा और समाज सुधारक के रूप में दिखाने के लिए बाद में मुसलमानों और ईसाइयों के खण्डन में 2 समुल्लास और लिखकर सत्यार्थ प्रकाश में जोड़ दिए गए।
इसका प्रमाण नीचे दिए रहे चित्रों में हैं। ये चित्र सत्यार्थ प्रकाश के द्वितीय संस्करण के हैं। जिनमें साफ साफ लिखा है कि प्रथम संस्करण में 13वां, 14वां समुल्लास किसी कारणवश छप नहीं सके थे, जो कि अब छाप दिए गए हैं।

किसी कारणवश का क्या मतलब? क्या प्रेस वाले के पास कागज़ खत्म हो गया था? या स्याही खत्म हो गयी थी? आधी अधूरी पुस्तक कोई छपने देता है क्या? वो भी एक ऐसा व्यक्ति जो ऋषि हो? काहे का ऋषि हुए फिर? जब उसको इतनी समझ ही नहीं कि मैंने क्या छपने के लिए देना है और क्या नहीं? इतनी भी दूरदर्शिता उसमें नहीं थी  तो काहे का ऋषि?

सीधी सी बात है कि पहले ये 2 समुल्लास लिखे ही नहीं गए थे। तो छपते कैसे?
बाद में जोड़े गए ताकि समाज में दयानंद की छवि एक पाखण्ड विरोधी के रूप में बनी रहे न कि हिंदु विरोधी के रूप में। ये चित्र उन नए नए बने आर्य समाजियों के मुंह पर तमाचा है जो आर्य समाज का इतिहास जाने बीने इनसे जुड़ जाते हैं और अपने पुराणों को गाली बकते हैं।

ब्राह्मण को दान।

सत्यार्थ प्रकाश 5वें समुल्लास के पृष्ठ 144 में सन्यासियों के बारे में स्वामी जी ने लिखा कि "लोक में प्रतिष्ठा व लाभ, धन से भोग वा मान्य, पुत्रादि के मोह से अलग होके, संन्यासी लोग भिक्षुक होकर रात दिन मोक्ष के साधनों में लगे रहते हैं"। 

फिर आगे पा पंचम समुल्लास के ही पृष्ठ 153 में मनु स्मृति के श्लोक 11.6 की गलत व्याख्या करते हुए लिख मारा कि "विद्वान और परोपकारी संन्यासियों को देने में कोई दोष नहीं। नाना प्रकार के रत्न, सुवर्णादि संन्यासियों को देवे। "

यहां एक बात ध्यान देने योग्य है कि मनुस्मृति के जिस 11.6 श्लोक का हवाला स्वामी जी ने दिया है उसे तो आर्य समाजियों ने प्रक्षिप्त माना है (आर्य समाजी मनुस्मृति का चित्र संलग्न है उसमें प्रक्षिप्त लिखा है)।
और उस श्लोक का असली अर्थ देखिए (कुल्लुक भट्ट की मनुस्मृति से संलग्न चित्र में), जिसमें बताया गया है कि वहां संन्यासियों के लिए नहीं बल्कि ग्रहस्थ ब्राह्मणों के लिए गौ, भूमि, अन्न आदि देने की बात हो रही है।

अब सोचिए कि स्वामी जी ने एक तो श्लोक का गलत अर्थ करके संन्यासियों को धन संग्रह करना बता दिया, और उसी श्लोक को आर्य समाजियों ने प्रक्षिप्त भी माना। 
हे भगवान ! 
चप्पल किधर है मेरी? 

रजस्वला।


संस्कार विधि में रजस्वला स्त्री के स्पर्श का भी निषेध। उसके हाथ का पानी भी नहीं पीना।

आश्चर्य की बात है जहां आर्य समाजी रजस्वला स्त्रियों से हवन तक करवा डालते हैं,  गुरुकुलों में वेद पाठ तक करवाते रहते हैं तो वहीं स्वामी जी ने उसके हाथ का पानी पीना, उसे स्पर्श करने तक से मना किया है।

पौर्णमासी, अमावस, चतुर्दशी,अष्टमी पर समागम का निषेध। ये तो ज्योतिष वाली बात हो गयी।

राजा राम मोहन राय, दयानन्द।

Ramkrishna jeeकी वाल से।।
आर्य नमाजियों के नए अब्बाजान "राजा राममोहन रॉय"
इतने दिनों से धूर्त धर्मद्रोहियो द्वारा धर्म के महापाखंडी राजा राममोहन रॉय की इतनी महिमा मंडित की जा रही है कि इस धूर्त की महिमा में लोग गुमराह हो रहे है,इसलिए मुझ जैसे व्यक्ति को इन धर्मद्रोहियो के पाखंड का पर्दाफाश करना जरुरी हो गया है !
राजा राममोहन रॉय का परिचय-
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भारत विश्व का एकमात्र धार्मिक देश है और इसमें धर्म जितना फैला उससे ज्यादा अधर्मी फैले ! धर्म को हर दृष्टि से तोड़ने के भरसक प्रयास मलेच्छों द्वारा किये गए और देश में कई सारे उनके टुकड़ो पर पलने वाले जयचंद भी पैदा हुआ जिसका एक उदाहरण है "राजा राममोहन रॉय" !
यह छुपा रुस्तम अंग्रेजो का एजेंट था और सनातन धर्म को तोड़ने के लिए #दानव_समाज वेतनभोगी था ! मैकॉले सिस्टम ने राममोहन रॉय की बहुत महिमा मंडित की और जो बची खुची कसर थी वो आर्य नमाजी पूरा का रहे है ! इसने ईस्वी सन 1828 में ब्रह्म समाज की स्थापना की जिसका मूल उद्देश्य सनातन धर्म को तोडना,उनमे वैमनस्य उत्पन्न करना,गलत रीति रिवाज बनाना, सनातन धर्म की परम्पराओ को गलत साबित करके उनको अपने ही धर्म के प्रति द्वेष पैदा करवाना,भारत में अंग्रेजी हुकूमत को कायम रखना,अंग्रेजी शिक्षा पद्धति को घर घर पहुँचाना और आखिर में मूल उद्देश्य सनातन धर्मियों को धर्म की आड़ में ईसाई बनाना और यदि ईसाई न बने तो नास्तिक बनाना था !इसने पब्लिसिटी के लिए बहुत सारे भ्रामक आंदोलन चलवाए जिसकी हमें कोई जरुरत नहीं थी ! यदि इनकी मंशा तो ठीक से समझा जाये तो मैं कहना चाहूंगा कि आप #आर्य_समाज को देख लीजिये क्योकि दोनों संगठन एक ही है और आर्य समाज ब्रह्म समाज का नया रूप है ! तो चलो इस लेख में इस राममोहन रॉय का पूरा विश्लेषण करते है-
1. राममोहन रॉय #दानव_समाज का एजेंट- दानवो के भारत में छोड़े गए एजेंटो में ये प्रथम धर्मद्रोहियो में से एक था जिसने देश और धर्म से गद्दारी की ! ये व्यक्ति अंग्रेजो की फूट डालो राज करो की नीति से बनाया गया एक मोहरा था जिसका काम देश में अव्यवस्था फैलाना था ! ईस्वी सन 1813 में लन्दन स्थित संसद में सर्वसम्मति से अंग्रेजो ने भारत को पूर्ण रूप से ईसाई बनाने का निर्णय किया था जिसका कार्यान्वन के लिए राजा राममोहन रॉय को नियुक्त किया गया ! आप यदि इसके बारे में थोड़ी सी भी जानकारी ढूंढने की कोशिश करेंगे तो आपको इसके काले कारनामे सामने आने नहीं लगेगी !
2. ब्रह्म समाज की स्थापना एक साजिश- ब्रह्म समाज की स्थापना हिन्दुओ को उनके धर्म के प्रति द्वेष भाव पैदा करवाने के लिए की गयी थी ! इसका ताजा उदहारण देखना चाहे तो आप आर्य समाज को ही देख लीजिये,सारा माजरा समझ आ जायेगा ! इन्होने भारत में परम्परानुगत व्याप्त कई सारी परम्पराओ को तोड़ने की या यूँ कहे तो खत्म करने की कोशिश की ! ये बात हर एक आस्थावान धर्मभक्त हिन्दू जनता है कि मूर्तिपूजा हमारे धर्म के प्राण है,यही एकमात्र कर्मकांड है जो हमको हमारे धर्म से गहराई से जोड़े रखती है ! ये इतने बड़े ज्ञानी थे कि मूर्तिपूजा क्यों की जाती है किसलिए की जाती है आदि बाते पुराणो से पढ़े बिना ही मूर्तिपूजा खंडन शुरू किया और हिन्दुओ में निराकार और साकार पूजको में बंटाधार कर दिया ! आज तक भारत में साकार और निराकार पूजक घुल मिल कर रहते आये है जिसको इस पाखंडी ने तोड़ने के भरसक प्रयास किये ! परिणाम स्वरुप धर्मद्रोही संस्कृत विद्वान बैठाये गए और हिन्दू धर्म की उन लेखन को दुष्प्रचारित किया जाने लगा जिसका विवाद खड़ा कर के हिन्दुओ को ये विश्वास दिलाया जा सके कि तुम इतने दिनों से जो धर्म को मानते थे वो गलत है ! यदि आप थोड़ी मेहनत करे तो आपको इस धर्मद्रोही का अंग्रेजो से सम्बन्ध आसानी से पता चल जायेगा स्थान और समय की कमी होने के कारण इस लेख को लम्बा नहीं किया जा सकता !
3. ब्रह्म समाज के स्थापक सदस्य देवेन्द्र नाथ टैगोर- देवेन्द्र नाथ टैगोर और राजा राममोहन रॉय ने मिलकर ब्रह्म समाज की स्थापना की ! देवेन्द्र नाथ टैगोर वही व्यक्ति है जिसके कुपुत्र #रवीन्द्र_नाथ_टैगोर की अंग्रेजो से चाटुकारिता की कहानियाँ पुरे देश में प्रसिद्द है ! देवेन्द्र नाथ टैगोर एक अंग्रेजी एजेंट था जिसके गुणसूत्र उसके बेटे रबीन्द्रनाथ टैगोर में आये और उसने भी अपने पिता की भाँति अंग्रेजो के तलवे चाटे ! इसी से खुश होकर अंग्रेजो ने अपने बंगाल के सबसे बडे #वैश्यालय का पूरा कार्यभार वर्णसंकर देवेन्द्रनाथ टैगोर को सौपे जो बाद में रबीन्द्रनाथ के भाई द्वारा भी संचालित होता रहा ! अंग्रेजो की वैश्या परम्परा को जारी रखने के लिए हमारे धर्म में एक और गन्दी बात डाली गयी जिसके परिणामस्वरूप आर्य समाज की #नियोगप्रथा प्रचलित हुई और भारत के लोगो को एकाधिक सम्बन्ध बनाने के लिए प्रेरित किया गया !
4. धर्म की आड़ में भारत का ईसाईकरण करने की घिनोनी चाल- राममोहन रॉय खुद एक ईसाई था और उसने भारत को धर्म की आड़ में ईसाई बनाने का काम शुरू किया ! ये कार्य भारत में बहुत ही बड़े पैमाने पर शुरू हुआ जिसका भारत में रोष फैला और धर्मभक्तो ने पुरे देश में ब्रह्म समाजियों की करतूते पर्दाफाश करना शुरू की जो उसके पतन का कारण बना ! परिणाम स्वरुप आज ब्रह्म समाज पुरे भारत से उखड गया है ! चलो अब आर्य समाजियों पर आ जाते है- ब्रह्म समाज का और आर्य समाज का एक ही कार्य है हिन्दुओ के धर्मशास्त्रों को गलत तरीके से पेश करना जो उन्होंने बहुत ही अच्छे तरीके से किया ! बस अंतर इतना सा है कि ब्रह्म समाज ने ये काम सरेआम किया और आर्यसमाज ने ये काम परदे के पीछे से किया ! आर्य समाजियों के जाल में आये लोगो के धर्मातरण का कार्य #थियोसोफिकल_सोसाइटी (दानव समाज की सीक्रेट सोसाइटी) के द्वारा किया जाने लगा ! जिसका एक पुख्ता सबूत है कि- बनारस के प्रख्या क्वींस कॉलेज के प्राचार्य रुडोल्फ हुर्रनले (rudolf hoernley) प्राचार्य थे जो कई बार दयानंद से मिल चुके थे ! उन्होंने अपने लेख में लिखा- दयानंद हिन्दुओ के मन में यह बात भर देगा की आज का हिन्दू धर्म वैदिक हिन्दू धर्म के पूर्णतया विपरीत है और जब यह बात हिन्दुओ के मन में बैठ जाएगी तो वे तुरंत हिन्दू धर्म को त्याग देंगे ! ऐसी स्थिति में हिन्दुओ को एक विकल्प की खोज होगी जो उन्हें हिन्दू से ईसाई धर्म की ओर ले जाएगी (प्रमाण पुरानी अन्य पोस्ट में देखे) !
5. निराधार आंदोलन से किया राष्ट्र को गुमराह- देश के गुलामी के काल में अंग्रेजो द्वारा समर्थित सैकड़ो प्रायोजित आंदोलन चलवाए गए जिसका मूल उद्देश्य समाज सुधार तो बिलकुल भी नहीं था बल्कि उनका उद्देश्य था भारतीय लोगो को उनके धर्म,उनकी मान्यताएँ और उनकी संस्कृति को गलत ठहराकर भारत के लोगो को अपने ही धर्म के प्रति द्वेष पैदा करवाना था ! उनमे जो सबसे आगे संगठन थे वे सिर्फ और सिर्फ दो ही संगठन थे जो ब्रह्म समाज और आर्य समाज थे ! सभी को ज्ञात रहे की ये संगठन इलू के फ्रीमेसोन नामक संस्थान के द्वारा पोषित थे जिसका मूल उद्देश्य पुरे विश्व को नास्तिक बनाना है ! खैर इसके बारे में हम अगली पोस्ट में विस्तृत चर्चा करेंगे ! इनके आंदोलन भी विचित्र विचत्र थे जैसे मूर्तिपूजा विरोध, अवतारवाद विरोध,विधवा विवाह के लिए हल्ला, मंदिरो को ठहराना,भारत में प्रचलित अनेको संगठनो को बदमाश करार देकर खुद को ही सच्चा ईश्वरीय दूत साबित करना ! हिन्दू समाज एक बड़ा विचित्र धर्म है जो पूर्णतः लचीला है जैसे- जब विदेशी अक्रान्ताओ की बाढ़ सी आने लगी तो इज्जत बचाने के लिए हमारे पूर्वजो ने न चाहते हुए भी बालविवाह शुरू किये लेकिन जब हम इनसे मुक्त हुए तब हम खुद खड़े हुए और इस प्रथा को समाज से हटाने में कई प्रयास किया लेकिन इन धूर्त पन्थो ने इसका पूरा फायदा लिया और हमारे समाज को अपने ही प्रति दुष्प्रचारित करके आपसी वैमनस्य पैदा करवाया ! इसी पर स्वामी विवेकानंद ने कहा कि "यदि हम खुद अपनी कुप्रथाओ को सही कर रहे है तो इसमें ब्रह्म समाजियों का क्या जाता है ? यदि हम इसको करना अच्छे से जानते है तो हमें देखकर आर्य समाजी जल भून क्यों जाते है ?" ! कभी भी आप ये बात ध्यान रखे कि इन अहंकारी संगठनो की साधारण मान्यता ये होती है कि जो भी समाज सेवा का कार्य हम करे तो वो सही है लेकिन यदि कोई कार्य को हमसे अच्छा करे तो वो देशद्रोही पाखंडी न जाने क्या क्या है ! इसी पर स्वामी विवेकानंद ने कि "आज देश में जो भी भ्रामक आंदोलन चल रहे है उनमे से ७०% आंदोलनो से और लोगो से देश को कोई मतलब ही नहीं है ! यदि इनके स्थान पर आज के समयानुसार सही मायनो में समाज सुधार आंदोलन चलाये जाये तो वो ज्यादा देश हेतु लाभकारी होगा ! इसी को आगे बढ़ाते हुए राजीव दीक्षित जी कि वर्तमान के 90% आंदोलन निराधार है !
6. भारत को नशेड़ी बनाने का भरसक प्रयास- दुनिया को राजा राममोहन रॉय का सिर्फ साफ चेहरा ही दिखाया जाता है लेकिन क्या आप जानते है कि ये धर्मद्रोही दानवो का कितना सार्थक प्यादा था ? इसमें कोई दो राय नही कि इल्लूमिनाती का महत्वपूर्ण व्यापारो में से एक है "नशे का व्यापार" ! अंग्रेजो द्वारा जो भारत के बेगुनाह गरीब किसानो के खेत छिने गए,उसका मालिकाना हक इन्ही धूर्त के हाथ में दिया गया और भारत को नशेड़ी बनाने का व्यापार शुरू हुआ ! जो भी खेत छिने गए उससे राममोहन रॉय ने बड़े पैमाने पर अफीम और अन्य मादक पदार्थो की खेती कर उत्पन्न किया ! उस समय उसका व्यापार इतना बड़ा था कि वो नशे की सामग्री भारत से बाहर निर्यात भी करता था ! वैसे दूसरी ओर दयानन्द जी अपने जीवनचरित्र के साक्षात्कार में लिखवाते हैं कि मुझको भांग पीने की गजब आदत है,जब भी भांग पीता हूँ तो मुझे अगले दिन तक होश नही रहता और कभी कभी तो इतना भी होश नही रहता कि नंगा होकर नंग धड़ंग घूमता हूँ ! खैर लेकिन भारत का ये सौभाग्य रहा कि उनका लेख लेख ही रहा गया और खुद आर्य नमाजियो ने भी इसे सिरे से नकार दिया !
7. अन्य- अन्य कार्यो में तो इसकी बहुत लंबी लिस्ट बन सकती है जैसे भारत में अंग्रेजी शिक्षा शुरू करना,विदेशी संस्कृति को बढावा देना आदि लेकिन समय की कमी के कारण इसे छोटा किया पड़ रहा है !
#ब्रह्म_समाज_और_आर्य_नमाज-यह इस पोस्ट का सबसे गंभीर विषय है और यदि ठीक से पूरी तरह से जानकारी दे तो सिर्फ इसी विषय पर २-३ पोस्ट लिखनी पड़ेगी कि ब्रह्म समाज और आर्य नमाज में आपसी क्या सम्बन्ध है ! इसका संक्षिप्त जवाब है कि आर्य नमाज ब्रह्म समाज का ही दूसरा नाम है ! जब पूरा देश इन ब्रह्म समाजियों और राममोहन रॉय की सच्चाई जान गया तो ब्रह्म समाज इस तेजी से खत्म हुआ जिसकी कोई सीमा नहीं (ब्रह्म समाजियों की पोल खोलने में #स्वामी_विवेकानंद का सबसे बड़ा हाथ था) ! तो बस पूरा विश्लेषण हुआ और जो जो कमियाँ ब्रह्म समाज में रह गयी वो सारी कमियाँ हटाई गयी और इसको एक ऐसे संगठन का रूप दिया गया जो पूर्ण रूप से दोगला संगठन हो ! परिणामस्वरूप भारत के सैकड़ो ग्रंथो का इन #यहूदी_पेंशनभोगियों ने बहिष्कार किया ! इनकी धूर्तता इससे भी पता चलती है कि भारत के ऋषि,महर्षियो और पंडितो ने अब तो तक कुल 134 स्मृतियाँ बनायीं लेकिन ये धूर्त सिर्फ एक स्मृति #मनुस्मृति को मानते है ! और तो और इन्होने प्रक्षेपण का कहकर धूर्तता की आड़ में मनुस्मृति को भी खंडित कर दिया ! परिणामस्वरुप आर्य नमाजी उन श्लोको को नहीं मानते जो प्रक्षेपित है जो हर हालत में उचित है लेकिन इन्होने इसके आड़ में वो भी श्लोक हटाने की भरपूर कोशिश की जो उनके पंथ के अनुसार सही नहीं बैठता ! इनकी धूर्तता तो उस समय भी सरेआम हो जाती है जब ये मन्त्रदृष्टा ऋषि #याज्ञवल्क्य स्मृति और महान राजनीतिज्ञ #चाणक्य अर्थशास्त्रीय स्मृति को भी नकार देते है ! इनके अनुसार सिर्फ और सिर्फ दयानंद सही है अन्य सब गलत ! खैर ये एक उदहारण है कि किस तरह इन्होने हमारे शास्त्रो से #मलेच्छों_का_नकाब पहने अपमान किया ! महादेव से ॐ छीनने में भी इनका ही हाथ है और भगवन राम और भगवान कृष्ण को एक साधारण पुरुष कहकर उनका अपमान करने में भी इनका ही हाथ है ! हर कही आर्य नमाजी वराह,मर्त्स्य,नरसिंह अवतार का तो ये गलियो से अपमान करते है ! आपको हर कही आर्य नमाजी धूर्त राजा राममोहन रॉय का गुणगान करते मिल जायेंगे !इन धूर्तो से
अपने सही अर्थो में गुणगान लायक महान लोगो की उपासना नहीं हुई और देश में पाखंड फ़ैलाने का हर षड़यंत्र करते है ! तो चलो मुद्दे पर आते है- राममोहन रॉय के दूसरे #अवतार हमारे प्रिय दयानंद सरस्वती थे जिन्होंने नया पंथ बनाने की सोची जिसका मूल उद्देश्य भारत और सनातन धर्म की बुराइया करना और आपसी द्वेष बढ़ाना है ! सुप्रसिद्ध गणिका #हेलेना ने भी राममोहन रॉय के बहुत गुण गए है ! जो आप आगामी पोस्ट में अच्छे से देखेंगे !

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स्वामी गड़बड़ानंद जी का संक्षिप्त मानसिक संतुलन
1. 16 वर्ष की कन्या 25 वर्ष का वर यह विवाह समय निकृष्ट अर्थात् घटिया है। (ख) 20 वर्ष की स्त्री और 40वर्ष का पुरूष का योग काम चलाऊ अर्थात् मध्यम है। (ग) 24 वर्ष की स्त्री तथा 48 वर्ष के पुरूष का विवाह समय उत्तम है। महर्षि दयानन्द जी का भावार्थ है कि 24 वर्ष की स्त्री तथा 48 वर्ष के पुरूष का विवाह तथा उपरोक्त नियमों के अनुसार नहीं किया जाता वह देश खुशहाल नहीं हो सकता।
2. जिस कुल में किसी के बवासीर, मिर्गी, क्षय, दमा, खांसी आदि रोग है, तथा किसी के शरीर पर बड़े-बड़े बाल है उस पूरे कुल की लड़की व लड़के से विवाह नहीं करना चाहिए।
3. जिस लड़की का नाम गंगा, जमुना, सरस्वती, आदि नदियों पर है तथा काली नाम तथा भूरे नेत्रों वाली हो उससे विवाह न करना चाहिए (सौंण व कुसौंण का भी पूरा ध्यान रखा है) जिस लड़की की चाल हथनी व हंस जैसी हो तथा नाम यशोदा आदि हो उससे विवाह करें।
4. सत्यार्थ प्रकाश समुल्लास 4 पृष्ट 102 पर यह भी लिखा है कि जिस स्त्री का पति जीवित है वह दूर देश में रोजगार के लिए गया हो तो उसकी स्त्री तीन वर्ष तक बाट (प्रतिक्षा) देखकर किसी अन्य पुरूष से संतान उत्पत्ति नियोग कुकर्म से करले, जब पति घर आये तो नियोग किए पति को त्याग दे तथा उस गैर संतान का गोत्र भी विवाहित पति वाला ही माना जाएगा।
5. जिस पुरूष की पत्नी अप्रिय बोलने वाली हो तो उस पुरूष को चाहिए कि किसी अन्य स्त्री से केवल नियोग करके संतान उत्पति करले तथा रहे अपनी पत्नी के साथ ही। इसी प्रकार जो पुरूष अत्यन्त दुःखदायक हो तो उसकी स्त्री भी दूसरे पुरूष से नियोग से संतान उत्पति करके उसी विवाहित पति के दायभागी संतान कर लेवे।
6. यदि किसी की स्त्री को आठ वर्ष तक संतान न हो तो वह पुरूष किसी अन्य स्त्री से नियोग (दुष्कर्म)करके संतान उत्पन्न कर ले। उस संतान को अपने घर ल आवे। जिसकी पत्नी से कन्या उत्पन्न होती हो लड़का उत्पन्न न होता हो तो वह पुरूष अन्य स्त्री से नियोग करके लड़का उत्पन्न करके घर ले आवे।
7. पृष्ठ 103 पर लिखा है:- स्त्री के गर्भ रहने के पश्चात् एक वर्ष तक स्त्री पुरूष मिलन नहीं करें। यदि पुरूष से न रहा जाए तो किसी विधवा स्त्री से नियोग (पशु तुल्य कर्म) करके संतान उत्पति कर दें।

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मुझे भी "दयानन्द " की जयजयकार करनी है 
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चित भी मेरी पट भी मेरी 
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सब को कहते हो " सत्य"अपनाओ , और खुद में सामर्थ्य नही है । सब का खण्डन करते हो , अपनी पर बात आते ही हाथ पावँ फूल जाते है । मुझे बताओ मित्रो , मैं कँहा गलत हूँ ?? बस मैं वो कारन आपके समक्ष रख रहा हूँ जो मुझे दयानन्द के प्रति श्रद्धा करने से रोक रहे है , मुझे लगता है , दयानन्द का जबरदस्ती महिमामण्डन किया गया , जिससे कि हिन्दू धर्म के विरुद्ध एक लोगो को खड़ा किया जाये , वही हो भी रहा है ।
अब एक बार मेरी पोस्ट को पढ़के बताईये , इसमें असत्य क्या है ?
------- " एकबार कर्णवास के ठाकुर ने स्वामी जी के आदेश से पुत्रेष्टि यज्ञ करवाया ,वंहा उपस्तिथ एक ब्राह्मण ने यज्ञ पिंड न खाया , प्रत्युत फेंक दिया ,किसी ने भी नही देखा , परन्तु स्वामी जी ने न जाने कैसे जान लिया । इस पर स्वामी जी ने ब्राह्मण का तिरस्कार किया , ब्राह्मण ने स्वीकार किया और फिर उसे पिंड खाने को दिया और यज्ञ सिद्ध हो गया , ठाकुर को पुत्र की प्राप्ति हुई " ( पृष्ट 212 ) ये घटना 1872 की है , तब लगभग 50 वर्ष उनकी आयु थी ।
मित्रो यंहा ध्यान रखने वाली बात है , प्रकरण पढ़के महसूस होता है , पिंड ब्राह्मण नही खाता तो यज्ञ सिद्ध नही होता , और पुत्रेष्टि यज्ञ में मन्त्र जाप भी किये गए होंगे । ये कोई दवाई नही या आयुर्वेदिक काम न होकर स्पष्ट रूप से यज्ञ मन्त्र सिद्धि का उदाहरण है ।
अब दूसरा प्रकरण पढ़िए -- "पौराणिक " लोग पिंड को वेदी बनाकर वेद का मन्त्र पढ़कर कहते है इससे भुत प्रेत निकट नही आते । महाराज ने कहा इससे मक्खी नही उड़ सकती , भुत प्रेत कैसे दूर जायेंगे । ( पृष्ट 419 )
यंहा मन्त्र शक्ति का खण्डन स्पष्ट तरीके से कर दिया ।
तीसरा प्रकरण देखिये -- कोई गंगाराम करके थे जिनको एक ब्रह्मचारी ने "कृष्ण अभ्रक" दिया , गंगाराम ने दयानन्द जी को बताया ये बुढ़ापे में जवानी आ जाती है , तो दयानन्द जी ने कहा ये मेरे पास भी है । तो गंगाराम ने कहा , ये तो काम देव भी बढ़ाता है , इससे कैसे बचते हो ??
तो दयानन्द ने कुछ इस तरह से कहा कि ,एकांत सेवी रहो, तभी सोया करो जब आलस्य अ जावे और प्रणव का "जाप "करो, आदि आदि । ( पृष्ट 118 )
यंहा भी जाप करने का निर्देश है ।
---- अब मेरे मित्रो , मैं कौन सी बात पर विश्वास करूँ और करूँ तो क्यों करूँ ?
एक जगह मन्त्र शक्ति और यज्ञ से उन्होंने बच्चा पैदा भी करवा दिया । एक जगह काम वासना की गोली खाने पर ॐ जाप करके नियंत्रित करना भी बता दिया ।
तीसरी जगह जो आपको बताया कि मन्त्र में ऐसा कोई प्रभाव नही है ?
--------------- किस बात पर श्रद्धा लाऊँ ??
क्रमशः .........

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मुझे भी दयानन्द की जयजयकार करनी है 
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दयानन्द कितने बड़े ऋषि ??
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मित्रो , मेरा उद्देध्य् आर्य समाज के प्रति भड़ास निकालना नही है , न मेरा आर्य समाजियों के प्रति कोई द्वेष , मैं कई आर्य समाजियों को दिल से प्रेम करता हूँ , क्योकि उनकी भावना में एक तलब देखता हूँ , धर्म को देश को उन्नति के मार्ग पर ले जाने की । पाखण्ड , अंधविश्वास से छुटकारा दिलाने की ।
वो ऐसे सेकड़ो मुर्दो से ज्यादा अच्छे है , जो नीरस हो गए है , लेकिन दुःख इस बात का है , आर्य समाजी मित्र हिंदुत्व के जिसको वो आर्यत्व कहते है , उसके विरुद्ध खड़े होकर जिसको संवारना था उसी को बिगाड़ रहे है ।
और इसलिए मैं दोनों हाथ जोड़कर विनम्र विनती करूँगा , मेरी पोस्ट को पढ़िए विचार कीजिये , इसे किसने लिखा है ये मत पढ़िए ,इसमें क्या लिखा है ये पढ़िए ।
"दयानन्द " को आप जिन किताबो, जीवन चरित्र के माध्यम से जानते है , मैं उसी में दीखते विरोधाभाष को तो दिखा रहा हूँ ।
--- दयानन्द के बारे में एक बात बहुत बढ़ चढ़ के प्रचारित की गयी कि वो बहुत बड़े योगी थे । चलिए उनके उस योगी रूप के प्रचार के कुछ उदाहरण देखिये ।
1) गुप्त अभिप्राय का ज्ञान
"किसी मनुष्य को अपने पास आता देखकर ही स्वामी जी जान लेते थे , वह किस अभिप्राय से उनके पास आया है " ( पृष्ट 212)
2) मृत्यु की भविष्यवाणी
"लाहौर की स्तिथि के समय कुछ विधार्थी दयानन्द के पास संस्कृत पढ़ने आते थे ,उसमे एक गणपतिराय को दयानन्द ने कहा, तुम विवाह न करना , तुम्हारी उम्र 30 के अंदर है , और वो 28 में काल का ग्रास बन गया "( पृष्ट 401 )
3) शेर भी डर गया
" गंगा तट पर विचरते हुए वन में जा पहुंचे , वंहा सामने से एक सिंह अत दिखाई दिया ,वे सीधे चलते गए , वे सीधे चलते गए , और जब सिंह के निकट पहुचे तो सिंह ने मुह फेर लिया और जंगल में घुस गया " ( पृष्ट 404 )
---- ऐसी कुछ और भी भविष्यवाणी या गुप्त बाते दयानन्द के बारे में बताई गयी , जिसमे एक घटना है कि किसी को रस्ते में सांप दिखा तो , दयानन्द के पास पहुंचा तो दयानन्द ने खुद ही कह दिया , रास्ते में सांप दिखा क्या ? प्रमाण ध्यान नही है , एक भालू वाली घटना है ।
------ अब इसके विपरीत कुछ बाते देखिये ।
1) विषाक्त भोजन
"एक दिन एक मनुष्य भोजन और पान लेकर आया , दयानन्द ने भोजन नही किया , पान जैसे ही खोला , वो मनुष्य भाग गया ' बाद में ज्ञानत हुआ , कि पान में विष था " ( पृष्ट 193 )
2) पान में विष
" एक ब्राह्मण ने मूर्ति पूजा से रुष्ट होकर उन्हें पान में विष दे दिया था , उन्होंने न्यौली कर्म करके उसे शरीर से निकल दिया और स्वस्थ हो गए " ( पृष्ट 211 )
3) जहर मृत्यु का कारण
" महाराज दुग्ध पीकर पी कर सो गए , पर बीच में ही उदरशूल के कारन उनकी नींद भंग हो गयी । ( पृष्ट 651 )
( ये 27 सितम्बर की घटना है ,जिसके बाद एक महीने स्वामी जी की बहुत बुरी हालत हुयी और फिर मृत्यु हो गयी थी ।)
----- अब मेरे मित्रो अगर उनका महिमामण्डन जैसा कि ऊपर है , वो आते ही जान लेते थे , मौत तक की भविष्यवाणी कर देते थे , शेर उनसे डर जाता था , तो वो निचे जिन लोगो ने विषय दिया , उनके दिल की क्यों नही जान पाये ?
और उनकी मृत्यु के वक़्त इतनी बुरी हालात कैसे उनको पता नही लगी , ओरो की तो वो भविष्यवाणी कर देते थे ??
अब या तो ऊपर झूठा महिमामण्डन किया गया , या निचे गलत है , ये फैसला मैं आपके विवेक पर छोड़ता हूँ ।
क्रमश .....

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मुझे भी दयानन्द की जयजयकार करनी है 
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कौन सच्चा कौन झूठा 
------------------;------- लेखराम vs देवेन्द्रनाथ मुखोपाध्याय
जब मैं कहता हूँ , दयानन्द का झूठा , महिमामण्डन किया गया है तो मुझपर द्वेषी होने के आरोप लगते है , चलिए मैं इसके प्रमाण स्वयं इन लेखको के शोध से ही देता हूँ ।
लेखराम -- जिनको बहुत ही सम्मान की दृष्टि से आर्य समाज में देखा जाता है , उनकी लिखित जीवनी के बिना दयानन्द का कोई जीवन चरित्र पूरा नही होता , ऐसे प्रतिष्टित व्यक्ति को ही जब आर्य समाज और देवेन्द्र मुखोपधाय रचित जीवनी के संग्रहकर्ता गलत साबित कर देते है । तो दुसरो की क्या बिसात ??
और दुःख की बात ये है , देवेन्द्र मुखोपाध्याय वाली जीवनी में लेखराम को ही झूठा या आधी अधूरी जानकारी वाला साबित कर दिया है । और लेखराम अपना पक्ष रखने को जीवित नही बचे । वरना वो मुखोपाध्याय के झूठ से आपको परिचय करवाते । चन्द उदाहरण निचे देता हूँ ।
1) दयानन्द किसकी सन्तान
लेखराम अनुसार -- अम्बाशंकर जी 
मुखोपाध्याय अनुसार -- करशन जी
अब भाईयो क्या इतने प्रतिष्टित विद्धवान स्वामी जी के पिता के बारे में बिना सम्पूर्ण जानकारी इकट्ठा किये कैसे निष्कर्ष पर पहुंच गए ??
2) अहमदाबाद में मनगढ़ंत शास्त्रार्थ ।
मुखोपाध्याय वाली जीवनी इस शास्त्रार्थ को झूठा और यतार्थ से दूर का बताती है । उसमे टिप्पणी में स्पष्ट लिखा है , ये सारा वृतांत ठीक नही है ,न तो स्वामी जी अहमदाबाद में किसी जज के यंहा ठहरे न उनके स्थान पर 200- 250 पण्डित इकट्ठा हुए ।
लेखराम वाली जीवनी में लिखा गया है , दयानन्द का 200-250 लोगो से शास्त्रार्थ हुआ , जब मूर्ति पूजा सिद्ध नही हुयी तो गालियां देने लगे ।
(अब स्वयं निर्णय कीजिये , किस तरह से जानबूझकर हिन्दुओ के प्रति झूठे शास्त्रार्थ रच दिए गए )
टाइम्स ऑफ़ इण्डिया में एक घटना का उल्लेख है ,जिसमे कुछ शास्त्रियों को विज्ञापन देकर बुलाया था पर वे नही आये ।
सन्दर्भ -- महर्षि का जीवन चरित्र 
पृष्ट 311
3) झूठा सम्मान ।
लेखराम ने 11जून से 26 जून 1873 में के आसपास एक घटना का उल्लेख किया है - कलकत्ता से लौटते हुए स्वामी दुबारा आरा गए तो हरवंशलाल ने उनको बहुत सम्मान दिया और सेवा की |
जबकि मुखोपाध्याय कहते है वो डुमराऊँ के यंहा ठहरे थे , हरवंशलाल उनसे विरक्त हो गए थे । अब ऐसे झूठ महिमामण्डन पर कैसे श्रद्धा लाऊँ :(
पृष्ट 249
क्रमशः......😢

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मुझे भी "दयानन्द "की जय जयकार करनी है 
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कोर्ट में हुयी जब "दयानन्द" की किरकिरी 
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मित्रो चलिए एक उदाहरण और देता हूँ , दयानन्द का झूठा महिमामण्डन कैसे किया गया और कैसे एकतरफा मानसिकता से लिखी गया चरित्र चित्रण दिखाकर दयानन्द को किसी महापुरुष ऋषि महर्षि की तरफ दिखाया जाता है ।
जब कोई मुकदमा होता है तो उसके दो पक्ष होते है , ऐसे ही एक मुकदमे की बात उनके जीवन चरित्र में है । जिसमे सिर्फ दयानन्द का पक्ष लेखक ने लिखा है पर क्या करे मजबूर होकर न्यायालय का पक्ष भी रखना ही पड़ेगा तो आप खुद चिंतन कीजिये । दूसरे का पक्ष कितना सदृढ़ रहा होगा लेकिन उसका जिक्र नही किया गया बल्कि फिर भी उसको ही दोषी साबित करने की कोशिस की गयी है ।
-----> 1880 में मुंशी बख्तावर सिंह को वैदिक यन्त्रालय के प्रबन्धकर्ता से हटा दिया गया था और उसके बाद स्वामी जज को पता चला कुछ गड़बड़ है हिसाब किताब में । इसलिए उन्होंने 10 जनवरी 81 को बख्तावर सिंह को हिसाब समझाने के लिए पत्र लिखा ।
22 फ़रवरी को स्वामी जी ने सेठ निर्भयराम को पत्र लिखके कहा , पंचायत में निबटा दो तो ठीक नही तो केस करदो ।
25 फ़रवरी को बख्तावर सिंह स्वामी जी मिले तो स्वामी जी ने धमकी दी , मैं चुप नही बैठूंगा , बख्तावर सिंह ने कहा , आपस में सुलझा देंगे ।
पंचायत में भी बात नही बनी , तो दयानन्द ने सब-जज शाहजनहपुर में मुकदमा दायर कर दिया । 9 फ़रवरी 81 को दयानन्द का दावा खारिज हो गया । फिर दयानन्द और उनके समर्थको ने हाईकोर्ट में जाने की सोची पर नही गए ।
"और बख्तावर सिंह का कुछ भी न बिगाड़ सके । "
-----== अब मित्रो जो भक्ति से बाहर थोडा चिंतन करो तो पाओगे , यदि बख्तावर सिंह गलत होता तो क्यों वो मिलने जाता और क्यों कोर्ट दयानन्द के दावे को खारिज करती और क्यों दयानन्द हाईकोर्ट नही गया ।
इसके बावजूद बख्तावर सिंह को चोर की तरह पेश किया गया है । दयानन्द के इस चरित्र पर कैसे श्रद्धा लाऊँ :(
सन्दर्भ -- महर्षि दयानन्द का जीवन चरित्र ।
पृष्ट 588
देवेन्द्र मुखोपाध्य
------------ क्रमशः

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जब "दयानन्द" के भाषणों पर लगा था प्रतिबन्ध । 
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आप में से कई लोगो को ये शायद हैरानी होगी , लेकिन ये सच है । दयानन्द की सभाओ पर प्रतिबन्ध लगा दिया गया था । जो ईसाई मिडिया के दबाब में फिर हटाना पड़ा था ।
( खेर मित्रो उससे पहले एक बात बड़ी गहनता से विचार कीजिये । जब भी कोई इतिहास लिखा जाता है वो कभी निष्पक्ष नही होता , लेखक की अपनी मानसिकता उसमे परिलक्षित होती ही होती है , यही अकबर से लेकर ओरंगजेब या किसी और के साथ होता है तभी वो आज महान है , ठीक यही "दयानन्द" के साथ हुआ ।
दयानन्द के चरित्र का झूठा महिमामण्डन किया गया और आज के युवक जिनके लिये धर्म वही है जो उनको समझ आ जाये । न जाने ऐसे कितने लोग होंगे जो सच्चाई को जानते थे और उन्होंने विरोध किया होगा , उनकी अपनी ही औलादे आज उनके विरोधी से जा मिली है । )
21 दिसम्बर 1880 से कुछ दिन पहले से ये प्रतिबन्ध लगा था जो अप्रैल 1880 में ये प्रतिबन्ध हटाया गया । प्रतिबन्ध हटाने से पूर्व एक घण्टे दयानन्द से तत्कालीन मजिस्ट्रेट मिस्टर बाल ने उनसे बात की थी । दयानन्द ने फ्रीडम ऑफ़ स्पीच का हवाला दिया था और उनका प्रतिबन्ध के बाद पहला व्याख्यान विषय सृष्टि था ।
महर्षि दयानन्द का जीवन चरित्र के हवाले से जाए तो लेखक बहुत भर्मित है कंही इसके लिए पौराणिक को दोषी बताता है कंही मुहर्रम की छुटियों को , जो की लेफ्टिनेंट गवर्नर ने बताया ।
--- एक बात को ध्यान दीजिये ,कई जगह दयानन्द को महिमा मण्डित करने के लिए , ऐसे शब्दों का प्रयोग होता है , जैसे पौराणिकों में खलबली मच गयी आदि ।
ये सब दयानन्द के कद को बड़ा बताने की कोशिस है जिससे कोई सामान्य पाठक जल्द प्रभावित हो जाता है ।
क्रमश ..

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मुझे भी " दयानन्द" की जय जयकार करनी है 
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दयानन्द एक बिगड़ैल शिष्य । 
-------;---------;----------;------/
___ मित्रो मेरी मानसिकता गलत हो सकती है , लेकिन वो खुद तो नही बनी । मैं भी तो दयानन्द का अनुयायी था । आप इसको निष्पक्ष पढ़िए और विचार कीजिये , मैं गलत हूँ तो कृपया बिना हिचकिचाहट या संशय के मुझे मेरी गलती बताईये , मेरा भ्रम निकालिये और मुझे भी मेरी मानसिकता ठीक करने में मदद कीजिये , या स्वतः चिंतन कीजिये और निर्णय लीजिये ।
----> क्या दयानन्द अपने गुरु विरजानन्द को धमकाते थे ??
अब जिन्होंने ये जीवन चरित्र लिखा है , उन्होंने भक्त बनकर लिखा है , ज़रा इसको बिना अंधभक्त बनकर पढ़िए और बताईये , क्या यंहा स्पष्ट नही है कि दयानन्द अपने गुरु को न केवल धमकाते थे बल्कि उनके साथी भी उनकी तरफदारी करते थे ।
संदर्भ-- महर्षि दयानन्द का जीवन चरित्र 
लेखक - श्री देवेन्द्रनाथ मुखोपाध्याय
प्रकाशक -- श्री घुड़मल आर्य धर्मार्थ न्यास 
पृष्ट संख्या - 88
" एक दिन दयानन्द से दण्डी जी अप्रसन्न हो गए ,और उनके लाठी मारी ,जिससे दण्डी जी का हाथ दर्द करने लगा , तब दयानन्द ने उनसे कहा - "महाराज मुझे न मारा करे " मेरा शरीर वज्र के समान कठोर है , उस पर प्रहार करने से आपके कोमल हाथो को दर्द होगा , इस चोट का चिन्ह दयानन्द पर अंतिम समय तक रहा "
---- ऊपर भक्त बनके पढ़ेंगे तो सब सामान्य सा ही प्रतीत होगा , लेकिन ज़रा अंधभक्ति से बाहर निकलेंगे तो विचार कीजिये ।
1) ऐसी क्या गलती जो दयानन्द पर इतना गुस्सा आ गया 
2) लाठी से मारने पर हाथ में दर्द हो सकता है पर ऐसा नही के मारने वाले को ज्यादा हो 
3) दयानन्द ने दुबारा गलती न करने के बजाय ," मुझे न मारा करो " कहना , सलाह थी या धमकी ??
4) चोट इतनी लगी की वज्र जैसे शरीर पर निशान बन गया ।
(साफ़ है कि दयानन्द को भी गुस्सा आ गया था और इतनी भयंकर चोट से खफा अपना रोष प्रकट किया । )
---->> इसी पृष्ट पर एक और उदाहरण देखिये ।
" एक बार फिर दण्डी ने अप्रसन्न हो दयानन्द को सोटा मारा , नैनसुख जडीए ने दण्डी से कहा , दयानन्द सन्यासी हे , उसे न मारना चाहिए , तब दण्डी ने कहा ' भविष्य में प्रतिष्ठा के साथ पढ़ाऊंगा "
अब मित्रो ये देखिये , दयानन्द का मित्र धमकाता है और दण्डी बेचारे डर भी जाते है , वरना क्या उन्हें पता नही की वो क्यों किसलिए मार रहे है , गुरु नाकार तो नही हो सकता इतना ।
--->> आज्ञाकारी या मनमौजी दयानन्द
इसी के अगले पृष्ट 89 पर एक घटना का जिक्र हुआ है । दण्डी जी ने आज्ञा दे रखी थी कि पाठशाला में विधार्थियो के अतिरिक्त कोई न आने पावे , लेकिन दयानन्द ने खुद ही फैसला ले लिया और एक व्यक्ति को ले आये , दण्डी को फिर गुस्सा आया , दयानन्द की ड्योढ़ी बन्द कर दी , दयानन्द ने माफ़ी मांगी नही ,पर स्वीकार न हुई 
फिर आ गया वही नैनसुख उसने बोला तो बेचारे दण्डी को ड्योढ़ी खोलनी पड़ी । ( ड्योढ़ी बन्द यानी स्कुल से निकाल दिया , खोलनी यानी फिर अनुमति प्रदान की , वैसे वो 2 या 2 बार से ज्यादा स्कुल से निकाले गए )
खेर ऐसे कई घटनाये और है और होंगी , लेकिन इन सब घटनाओ से मुझे तो कंही भी उनके चरित्र में अच्छे शिष्य के लक्षण नही दिखाई देते , न आज्ञाकारी के , न शिष्ट सभ्य के ।
उनके गुरु खुद भी दुर्गापाठ करते थे , और ऐसे भी जिक्र मिलते है वो गुरु को ज्ञान देने लगते थे । और ये कोई स्कुल की नही , 30 - 35 साल की उम्र की बात है ।
अब मुझे कृपया बताये , मैं कैसे श्रद्धा रखूं , जबकि अभी ये पहली पोस्ट है और मैं अनेक ऐसी शंका आपके सम्मुख रखने वाला हूँ ।
धन्यवाद

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मुझे भी "दयानंद" की जय जयकार करनी है 
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अभी एक मित्र की पोस्ट सामने आ गयी । विषय था -- नील गाय , की हत्या का आदेश , और वो आर्य समाजी मित्र उसको सही ठहराने के लिए अपने पक्ष को रख रहे थे ।
उनके पक्ष से मैं बिल्कुल भी सहमत नही हो सकता , व्यहारिक रूप से एक बार मान भी ले पर आध्यत्मिक रूप से तो बिल्कुल भी नही । खेर यदि कोई चाहे तो मैं इस विषय पर अपना पक्ष रखने को तैयार हूँ । लेकिन मुझे परेशानी उनके कमेंट्स से होती है , जिसमे उन्होंने और उनके मित्रो ने हिन्दू मान्यता को निचा दिखाने की भरसक कोशिस की गयी ।
विषय कुछ और , निशाना हमारे इष्ट , वराह अवतार , गणेश आदि , मैं इन विषयो पर भी वो अगर चर्चा चाहे तो उन्हें आमन्त्रित करता हूँ । मुझे लगता है उनकी इस विचारधारा के लिए अगर कोई जिम्मेदार है तो सिर्फ और सिर्फ "दयानन्द "है ।
दयानन्द के लिए अंधभक्ति --- दयानन्द अगर सही है , तो फिर हिन्दू धर्म बिल्कुल गलत है , और यदि हमारी मान्यता सही है , तो दयानन्द बिल्कुल गलत । मैं अगले कुछ दिन एक बार फिर से खुद को पूरी तरह गलत मानते हुए , सिर्फ दयानन्द को सही मानते हुए प्रश्न करूँगा ।
उम्मीद करूँगा , मुझे गलत साबित करके आर्य समाजी विद्धवान मुझे भी वैदिक राह पर चलने में मदद करेंगे । मेरी जिज्ञाषा 3 चरणों में होगी ।
1) दयानन्द चरित्र -- वन्ही कमेंट्स में उनको महाभारत काल के बाद का सबसे महान बताया गया है , मैं उनके चरित्र के जो पक्ष उजागर करूँगा वो आर्य समाज द्वारा ही मुझे पता चले है और उनको जानने के बाद मुझे वो महान तो छोड़िये खास भी प्रतीत नही होते ।
2) दयानन्द भाष्य --- उनके भाष्य में ऐसे उटपटांग अर्थ मुझे मिलते है कि उनको ज्ञानी नही मान पाया ।भाष्य पर मेरी शंका भी आपके सामने रखूंगा ।
3) आर्य समाज की दिशा दशा -- आर्य समाज जो हिन्दू सुधारवादी होने का दावा करते है , मुझे हिंदुत्व की जड़े खोदने वाले , हिन्दुओ को सबसे ज्यादा नुकसान पहुचाने वाले प्रतीत होते है ।
>>>>> मैं इन्ही तीनो विषयो पर अपनी भ्रम शृंखला आपके सम्मुख रखूंगा । मैं इनको अपने वहम भ्रम पण्डा बुद्धि सब मानकर ही चलूँगा ।
आपसे विनम्रता से दोनों हाथ जोड़कर निवेदन है कि मैं गलत राह पर हूँ तो मेरे ये भ्रम दूर कीजिये । इससे सबका फायदा होगा , और हम सार्थक वार्ता करके कई लोगो को सत्य से भी अवगत करा सकते है ।
धन्यवाद ......... क्रमशः

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गुरु विरजानन्द से क्या सिखा ?
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दयानन्द ने गुरु विरजानन्द से क्या सिखा , मुझे इस बारे में उत्सुकता होने लगी है । व्याकरण संस्कृत आदि सीखी तो इसका अर्थ ये हुआ , पहले वो इनमे पारंगत नही थे ? तो जो उस वक़्त से पहले उन्होंने अध्ययन किया , 1855 मे टेहरी आदि में जो उन्होंने तन्त्र शक्ति पर आधारित ग्रन्थ पढ़े , वो उनको कैसे पूरी तरह समझ आये होंगे ??
वेदो और बाकि ग्रन्थो को विरजानन्द ने पढ़ाया या नही , इस बारे में मुझे भी सपष्ट जानकारी नही मिली । अष्टाध्यायी और महाभाष्य लेकिन विरजानन्द ने पढ़ाये , इस बारे मे पता लगता है ।
---- विरजानन्द मूर्ति पूजक थे ।
पृष्ट 88 , पर संग्रहकर्ता ने लिखा है ,पण्डित ब्रह्माशंकर ने लेखक देवेन्द्र बाबू से स्वयं कहा कि विरजानन्द दुर्गापाठ करते थे ।
---- तब दयानन्द शिवभक्त थे ।
और विरजानन्द के पास से जाने के बाद अप्रैल- मई 1863 ( यानी मृत्यु से लगभग 20 साल पहले ) जब उनकी आयु 40 साल के आसपास होनी चाहिए , तब सुंदरलाल को दयानन्द ने शिवलिंग की पूजा और दुर्गाष्टक का पाठ करने का उपदेश दिया था और अपने गले से रुद्राक्ष की माला उतारकर दे दी थी ।( प्रमाण पृष्ट 93- 94 )
इन दोनों घटनाओ से एक बात स्पष्ट होती थी , उनके गुरु ने भी तो वेद पढ़े होंगे , संस्कृत उनको भी आती होगी , लेकिन उन्होंने न तो दयानन्द को न स्वयं ही मूर्ति पूजा आदि का खण्डन किया न सिखाया ।
---- गुरूजी ने सिखाया
पृष्ट 501 में विरोधाभाष नजर आता है , जब दयानन्द किसी के पूछने पर बताते है ,प्रथम तो मुझे ही विचार हुआ था ,कि मूर्ति पूजा केवल अविद्या अंधकार है , परन्तु गुरूजी भी इसका खण्डन किया करते थे , कोई हमारा ऐसा शिष्य हो जो इस अंधकार को दूर करे ।
अब ये आश्चर्य जनक है कि नही , एक तरफ गुरु के दुर्गापाठ होने के प्रमाण मिलते है , दूसरी तरफ गुरु जी से विदा लेने के पश्च्यात भी शिवलिंग और दुर्गाष्टक के लिए ओरो को प्रेरित करना रुद्राक्ष की माला धारण करना और 1879 में कहना की सब गुरु आज्ञा से किया ।
यदि गुरु आज्ञा से ही किया होता तो शिक्षा उपरांत भी शिवपूजक क्यों बने रहे ??
क्यों रुद्राक्ष धारण करते थे ??
क्यों गुरु खुद दुर्गा पूजक थे ??
क्यों दयानन्द से पहले कोई मूर्ति पूजा खण्डन में विरजानन्द का शिष्य आया ?
फिर ये खण्डन किस आयु में किसकी प्रेरणा से आया , ये कोतूहल का विषय है , खासकर तब जब बचपन से ही शिवभक्ति से या मूर्ति पूजा से वो विरक्त हो गए थे ।
क्या ये इतिहास भरोसे लायक है ??\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\
राजीव शर्मा को ये मुगालता उनके मित्रों ने बहुत भयंकर तरीके से
पाल दिया है कि वे बहुत बड़े समीक्षक और विद्वान हैं, यहाँ तक तो
ठीक है पर अब खुद को अंतर्यामी भी समझने लगे हैं | मैं कहूँगा कि
आप गाय पालिए पर मुगालता मत पालिए |

इनका आक्षेप ये है कि चूँकि ऋषि दयानन्द के गुरु विरजानंदजी
दुर्गापाठ करते थे इसलिए वे ऋषिवर को मूर्तिपूजा खंडन की शिक्षा नही
दे सकते और स्वयं श्री महाराज भी शिवभक्त थे तब ये मूर्तिपूजा विरोध
कहाँ से आया ? तो सुनिए श्रीमानजी विरजानन्द हों या दयानन्द ये सभी
पौराणिक परिवार से थे, इसलिए दुर्गापाठ या शिवभक्ति उनको परम्परा
से मिली थी | जैसे आम हिन्दू जिसने कभी वेद देखे तक और पुराण
पढ़े तक नही पर वो इनपर श्रद्धा रखता है क्यूंकि ये संस्कार उसे परम्परा
से मिले हैं | अब आपने कहा कि क्या विरजानन्दजी ने वेद नही पढ़े थे?
तो भाई विरजानन्दजी बचपन से अंधे थे, उनको भला वेद कौन पढ़ता?
उन्होंने तो व्याकरण सुनकर कंठस्थ करी थी | और अष्टाध्यायी उन्होंने
पढ़ी तो लौकिक संस्कृत के ग्रथ यथा कौमुदी इत्यादि में उनकी अश्रद्धा
होगयी, और जान गए कि ऋषिकृत ग्रन्थ ही प्रमाणिक हैं, और वो
अक्सर कौमुदी के लेखक की कठोर निन्दा करते थे, और दयानन्द
की तर्कशक्ति और सामर्थ्य को देखकर ही उन्होंने दयानन्द से
पाखण्ड-खंडन को कहा था, क्यूंकि मार्ग वो दिखा चुके उसपर चलना
दयानन्द को था, तो जब श्री महाराज ने अपने गुरु के दिए व्याकरण
अस्त्र का प्रयोग करना शुरू किया तब वेद के रहस्य उजागर हो गए
ऋषि दयानन्द ने अपनी पारिवारिक मान्यताओ को तिलांजलि देकर
एकमात्र वेद का जयघोष किया |
Prabhat Singh Chauhan

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गवरगण्ड दयानंद की पोप लीला
दयानंद जैसा धुर्त जो खुद की कही बात से पलट जाए पुरे विश्व में नहीं मिलेगा
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स ब्रह्मा स विष्णुः स रुद्रस्स शिवस्सोऽक्षरस्स परमः स्वराट्।
स इन्द्रस्स कालाग्निस्स चन्द्रमाः।।७।। -कैवल्य उपनिषत्।
भावर्थ : सब जगत् के बनाने से ‘ब्रह्मा’, सर्वत्र व्यापक होने से ‘विष्णु’, दुष्टों को दण्ड देके रुलाने से ‘रुद्र’, मंगलमय और सब का कल्याणकर्त्ता होने से ‘शिव’, 
जो सर्वत्र व्याप्त अविनाशी, स्वयं प्रकाशस्वरूप और प्रलय में सब का काल और काल का भी काल है, इसलिए परमेश्वर का नाम ‘कालाग्नि’ है।।७।।
प्रथम समुल्लास मे ही फिर आगे लिखा है कि-
इसलिए सब मनुष्यों को योग्य है कि परमेश्वर ही की स्तुति, प्रार्थना और उपासना करें, उससे भिन्न की कभी न करें। क्योंकि ब्रह्मा, विष्णु, महादेव नामक पूर्वज महाशय विद्वान्, दैत्य दानवादि निकृष्ट मनुष्य और अन्य साधारण मनुष्यों ने भी परमेश्वर ही में विश्वास करके उसी की स्तुति, प्रार्थना और उपासना करी, उससे भिन्न की नहीं की। वैसे हम सब को करना योग्य है। 
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समीक्षा : वाह रे गवरगण्ड दयानंद स्वयं ही प्रमाण के साथ ब्रह्मा, विष्णु, शिव को ईश्वर बताता है और थोड़ा आगे बढ़ा नही की अपनी धूर्तता दिखाते हुए उनको पूर्वज विद्वान आदि बताने लगा । इसमें कोई प्रमाण तो दिया होता कि यह मनुष्य थे, और अगर प्रमाण नही मिला था तो कोई उल्टि सिधि संस्कृत ही गढ़ ली होती तेरे नियोगी चम्चे तेरे इस गपोडे को भी पत्थर कि लकिर समझ लेते ।
वैसे ये तेरे जैसे धुर्त को ही शोभा देता है कि ब्रह्मादिक नाम ईश्वर के बताकर फिर उन्हे पूर्वज बता दिया,
और तो और ये अर्थ भी तेरा गलत ही है सही अर्थ इस प्रकार है कि वो ब्रह्मारूप होकर जगत की रचना करता, विष्णु रूप हो पालन करता रूद्ररूप हो दुष्टों को कर्मफल भुगाकर रूलाता शिव ही मंगल करता है वो ही स्वराट इन्द्र चन्द्रमा है। और कालाग्निरूप धारण कर प्रलय करता है
यह सब देवता उसी के रूप है नहीं तो तुने बताया क्यो नही की यह तीनों किसके पुत्र थे
जो कहता की स्वयं उत्पन्न हो गए तो तेरा सृष्टि क्रम जाता है कि माता पिता के बिना कोई मनुष्य उत्पन्न नहीं होता
यही तो तेरी भंग की तंरग है जो जीवन चरित्र में लिखा है कि मुझे भंग पीने की ऐसी आदत थी कि दुसरे दिन ही होश आता था
भंगेड़ी कही का...

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दयानंदभाष्य खंडनम् (भूमिका)
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दयानंद ने अपनी मृत्यु से कुछ महीनों पहले सन् 1882 में इस ग्रन्थ के दूसरे संस्करण में स्वयं यह लिखा-
नियोग्
जिस समय मैंने यह ग्रन्थ ‘सत्यार्थप्रकाश’ बनाया था, उस समय और उस से पूर्व संस्कृतभाषण करने, पठन-पाठन में संस्कृत ही बोलने और जन्मभूमि की भाषा गुजराती होने के कारण से मुझ को इस भाषा का विशेष परिज्ञान न था, इससे भाषा अशुद्ध बन गई थी। अब भाषा बोलने और लिखने का अभ्यास हो गया है। इसलिए इस ग्रन्थ को भाषा व्याकरणानुसार शुद्ध करके दूसरी वार छपवाया है। कहीं-कहीं शब्द, वाक्य रचना का भेद हुआ है सो करना उचित था, क्योंकि इसके भेद किए विना भाषा की परिपाटी सुधरनी कठिन थी, परन्तु अर्थ का भेद नहीं किया गया है, प्रत्युत विशेष तो लिखा गया है। हाँ, जो प्रथम छपने में कहीं-कहीं भूल रही थी, वह निकाल शोधकर ठीक-ठीक कर दी गई है।
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समीक्षा : इस लेख से पहला सत्यार्थ प्रकाश गुजराती भाषा मिश्रित विदित होता है किन्तु इसमें कोई भी गुजराती भाषा शब्द पाया नहीं जाता भला वह तो अशुद्ध हो चुका पर अब यह तो दयानंद के लेखानुसार सम्पूर्ण ही शुद्ध है। क्योंकि इसके बनाने से पूर्व न तो स्वामी जी को लिखना ही आता था न शुद्ध भाषा ही बोलनी आती थी इससे यह भी सिद्ध होता है कि इस सत्यार्थ से पूर्व रचित वेदभाष्यभूमिका तथा यजुर्वेदादि भाष्यों की भाषा भी अशुद्ध होगी क्योंकि शुद्ध भाषा का ज्ञान तो दयानंद को इस सत्यार्थ प्रकाश को लिखने के समय हुआ है ।

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थियोसोफिकल सोसायटी आफॅ द आर्य समाज (Theosophical Society of the Arya Samaj)

स्वामी दयानंद ईसाई मिशनरी के सबसे बड़े ऐजेंट(दल्ले) ।

जी हाँ आपने सही पढ़ा स्वामी दयानंद भारत में ईसाई मिशनरी के सबसे बड़े दल्लों में से एक थे।
स्वामी दयानंद न केवल थियोसोफिकल सोसायटी के अहम सदस्य थे बल्कि थियोसोफिकल सोसायटी के संस्थापकों को पत्र लिखकर उसे भारत में लाने वाले भी दयानंद ही थे १८७८ से लेकर अपनी मृत्यु १८८३ तक स्वामी जी ने ईसाई मिशनरीओं के साथ मिलकर न केवल काम किया। बल्कि भारत में ईसाई धर्म के फलने फूलने के लिए पैर जमाने में पुरा सहयोग दिया 
स्वामी दयानंद कब और कैसे थियोसोफिकल सोसायटी के साथ जुड़े आपको विस्तार में बताते हैं
ये बात है सन १८७५ की जब स्वामी जी पंडित कृपाराम शास्त्री से भेंट करने के लिए देहरादून आये हुए थे वहीं पर दयानंद ने ईसाई मिशनरी के दो धर्मप्रचारकों मैडम हैलना पैट्रोवना ब्लैवाटस्की और कर्नल हेनरी स्टील आल्काट के बारे में सुना और उनसे मिलने का फैसला किया 
इसके बाद स्वामी दयानंद देहरादून से सहारनपुर गए वहाँ उन्होंने थियोसोफिकल सोसायटी के संस्थापक मैडम ब्लैवाटस्की और कर्नल आल्काट से भेंट की।
स्वामी दयानंद ने उन दोनों के कार्यों की प्रशंसा की और सनातन धर्म के विरुद्ध लड़ाई में उनका सहयोग मांगा 
फिर दयानंद इन दोनों के साथ मेरठ गए कुछ दिनों इन दोनों के साथ धर्म प्रचार किया उसके बाद ये दोनों मुम्बई चले गए जहाँ दयानंद ने इनकी सहायता से १० अप्रैल १८७५ में आर्य समाज की स्थापना की 
ईसाई मिशनरी के साथ मिलकर काम करने से स्वामी दयानंद को ब्रिटिश सरकार का भी अच्छा खासा समर्थन मिलने लगा ।
५-६ महिने दयानंद के साथ धर्म प्रचार करने के बाद कर्नल आल्काट और मैडम ब्लैवाटस्की न्यूयॉर्क के लिए चले गए जहाँ उन्होंने थियोसोफिकल सोसायटी की स्थापना की
१३ दिसम्बर १८७८ में स्वामी दयानंद ने कर्नल आल्काट और मैडम ब्लैवाटस्की को पत्र लिखकर थियोसोफिकल सोसायटी का प्रधान कार्यालय मुंबई में लाने का निमंत्रण दिया 
स्वामी दयानंद के निमंत्रण पर फरवरी १८७९ में सोसाइटी का प्रधान कार्यालय न्यूयार्क से मुम्बई में लाया गया। 
और आर्य समाज कार्यालय का नाम बदल कर "थियोसोफिकल सोसायटी आफॅ द आर्य समाज (Theosophical Society of the Arya Samaj)" रखा गया 

१८७९ में ही स्वामी दयानंद थियोसोफिकल सोसायटी के सदस्य बने जिसका प्रमाण स्वामी दयानंद का हस्ताक्षर किया हुआ वो पत्र है जो मैंने पोस्ट के साथ Attached किया हैं १८७९ से लेकर १८८६ तक थियोसोफिकल सोसायटी और आर्य समाज ने साथ में काम किया और इतने समय में दयानंद की सहायता से थियोसोफिकल सोसायटी ने लाखों हिन्दुओं का धर्म परिवर्तन कर उन्हें ईसाई बनाया 
दयानंद ने थियोसोफिकल सोसायटी के लिए यह कार्य कैसे किया वो भी समझ लिजिए

दयानन्द सरस्वती के बारे में क्वीन्स कॉलेज के प्राचार्य रुडॉल्फ होर्नले (Rudolf Hoernley) ने यह बात लिखी —
दयानन्द हिंदुओं के मन में यह बात भर देना चाहते हैं कि आज का हिंदूधर्म, वैदिक हिन्दू धर्म के पूर्णतया विपरीत है, और जब यह बात हिन्दुओं के मन में बैठ जायेगी तो वे तुरंत हिंदूधर्म का त्याग कर देंगे; पर तब दयानन्द के लिए उन्हें वैदिक स्थिति में वापस ले जाना सम्भव न होगा, ऐसी स्थिति में हिंदुओं को एक विकल्प की खोज होगी जो उन्हें हिंदू से ईसाई धर्म की ओर ले जायेगी।
स्रोत: The Christian Intelligence, Calcutta, March 1870, p 79 and A F R H quoted in The Arya Samaj by Lajpat Rai, 1932, p 42 quoted in Western Indologists A Study in Motives.htm, Purohit Bhagavan Dutt

स्वामी दयानंद और थियोसोफिकल सोसाइटी इसी प्रकार काम करती थी दयानंद हिन्दुओं के मन मे ये बात भर देते थे कि आज का हिंदूधर्म, वैदिक हिन्दू धर्म के पूर्णतया विपरीत है, और जब यह बात हिन्दुओं के मन में बैठ जाती तो उनमें से कुछ आर्य समाज से जुड़ जाते और बाकीयों को थियोसोफिकल सोसायटी के धर्म प्रचारक ईसाई बना देते । बदले में स्वामी दयानंद और आर्य समाज को ब्रिटिश सरकार का समर्थन मिलता
जिस किसी भी आर्य समाजी को मेरी बातों पर अंश मात्र भी संदेह हो कि दयानंद ईसाई मिशनरी के ऐजेंट( अर्थात दलाल) थे वो कृपया थियोसोफिकल सोसायटी की साइट पर जाकर चेक करें और साथ में उस पत्र की भी जांच कर लें जो थियोसोफिकल सोसायटी की ओर से जारी किया गया जिस पर दयानंद के हस्ताक्षर हैं

आर्य समाज किस प्रकार थियोसोफिकल सोसायटी से जुड़ा हुआ था ये जानने के लिए आप गूगल पर जाकर सिर्फ ये टाइप करें 
Theosophical Society of the Arya Samaj 

और यदि इसमें अब भी किसी को किसी प्रकार कोई संदेह हो कि दयानंद थियोसोफिकल सोसायटी के सदस्य थे या नहीं तो वो जाकर दयानंद की १८८२ में तैयार कराई वसीयत के बारे में पढे । स्वामी दयानंद ने अपनी वसीयत जो कि उन्होंने मेरठ में पंजीकृत कराईं थी जिसमें कुल १८ लोग थे जिन्हें दयानंद ने अपनी अंत्येष्टि करने तथा निजी वस्त्र, पुस्तक , मंत्रालय आदि का अधिकार दिया था जिसमें थियोसोफिकल सोसायटी के संस्थापक कर्नल आल्काट और मैडम ब्लैवाटस्की का भी नाम है

मुझे लगता है अपनी बात को सिद्ध करने के लिए अब मुझे और कुछ लिखने की आवश्यकता नहीं है दयानंद की ये वसीयत ही ये सिद्ध कर देती है ईसाई मिशनरीयों के साथ दयानंद के कितने अच्छे और गहरे संबंध थे 
जो काम ईसाई मिशनरी पिछले १५० सालों में न कर सकी दयानंद के समर्थन से मात्र ७ वर्षों मे ईसाई मिशनरी के धर्म प्रचारको ने लाखों सनातनीयों का धर्म परिवर्तन कर उन्हें ईसाई बनाया बडे आश्चर्य कि बात है कि स्वंय को वैदिक कहने वाले दयानंद को ईसाई मिशनरीयों के साथ मिलकर धर्म प्रचार करने में सनातन धर्म के टुकडे करने में तो कोई परहेज नही था पर अपने हिन्दु भाई आँखों मे खटकते थें ऐसा शायद इसलिए क्योकी स्वामी दयानंद और ईसाई मिशनरी का उद्देश्य एक ही था किसी भी प्रकार सनातन संस्कृति को पुरी तरह से समाप्त करना
शायद यही कारण रहा कि दयानंद ने अपने तथाकथित ग्रंथ के प्रथम संस्करण में १८७५ से लेकर १८८३ तक केवल सनातन धर्म की ही आलोचना करी है सत्यार्थ प्रकाश के प्रथम संस्करण में जो वैदिक-यंत्रालय प्रयाग में छापी गई थी उसमे दयानंद की मृत्यु (३० अक्टूबर १८८३ ई०) तक केवल ११ समुल्लास ही छपे थे । जिसमें केवल सनातन धर्म की ही आलोचना करी गई थी ईसाई या मुस्लिम मत के खिलाफ एक शब्द नहीं लिखा था शेष ३ समुल्लास उनके निधन के बाद १८८४ में वैदिक-यंत्रालय प्रयाग द्वारा दुसरे संस्करण मे छापा गया।

ये पोस्ट उन मूर्खों के मुहँ पर तमाचा है जो दयानंद को वैदिक धर्म का प्रचारक और हिन्दुओं का हितैषी बोलते हैं जबकि सत्य तो यह है कि दयानंद जैसा स्वार्थी, निच , कपटी और गद्दार व्यक्ति जो अपने देश, धर्म अपने भाई बंधुओं का नहीं हुआ पूरे संसार में नहीं मिलेगा
दयानंद का केवल एक ही उद्देश्य था सनातन धर्म को तोड के एक नया धर्म बनाना ।
मुझे लगता कि अब ये बात पूरी तरह से साफ हो चुकी है कि दयानंद ईसाई मिशनरी के बहुत बड़े ऐजेंट थे

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दयानंदभाष्य खंडनम् ✴✴
ये देखिए इस धूर्त को सत्यार्थ प्रकाश के अपने एकादश समुल्लास में ये बोलता है कि नानक जी को ज्ञान नहीं था 
अब ज्ञान था या नहीं था मैं इस चक्कर में नहीं पडना चाहता।
परन्तु दुसरो का अपमान करने वाला , दुसरो को मुर्ख समझने वाला स्वयं कितना ज्ञानी है यह जानना जरूरी हो जाता है
आइए देखते है स्वामी जी कितने समझदार मतलब ज्ञानी थे उन्हीं के शब्दों में पढ़िए
अ) सत्यार्थ प्रकाश के नवम समुल्लास में स्वामी जी कहते हैं कि
आसमान का जो ये नीला रंग है वो आसमान में उपस्थित पानी की वजह से है जो वर्षता है सो वो नीला दिखता है
वो बात अलग है कि स्वामी जी की बुद्धि यही तक काम करती थी उन्होंने ये भी नहीं सोचा कि अगर पानी की वजह से आसमान नीला दिखाता है तो फिर बादलों में तो लबालब पानी भरा होता है फिर वो काले सफेद क्यों होते हैं
वो बात अलग है कि स्वामी जी को ये भी नहीं मालूम था कि पानी स्वयं रंगहीन हैं वो दुसरे के रंग में क्या परिवर्तन करेगा
वो बात अलग है कि स्वामी जी को यह भी नहीं पता था कि आसमान का नीला रंग सूर्य से आने वाली प्रकाश का पृथ्वी के वायुमंडल में उपस्थित गैसीय अणुओं से टकराने के कारण प्रकाश के परावर्तन के कारण दिखाई देता है
और यही प्रक्रिया समुद्र के जल के साथ होती है
ब) स्वामी जी की बुद्धि का एक नमूना और देखिए
स्वामी जी सत्यार्थ प्रकाश के अष्टम समुल्लास में लिखते हैं कि सूर्य, चन्द्रमा, तारे आदि जितने भी गोल पिण्ड, ग्रह आदि है उन सब पर मनुष्यआदि प्रजा रहती है
स्वामी जी को तो एक खगोलीय वैज्ञानिक होना चाहिए था क्या दिमाग पाया है सरकार बेकार में ही करोड़ों अरबों डॉलर सिर्फ ये जानने के लिए बेकार में खर्च कर देती है कि पडोसी ग्रह पर जीवन है कि नहीं ......
काश वैज्ञानिकों ने सत्यार्थ प्रकाश पढ़ी होती तो उनके ना केवल करोड़ों अरबों डॉलर का धन बचता साथ ही कई वर्षों का समय भी बेकार के प्रयोग में नहीं खराब होता 
कमाल है यार एक अज्ञानी दुसरे की समझ पर उंगली उठा रहा है अपनी गिरेबान में ना झांककर उल्टा अपने एकादश समुल्लास में कहते हैं कि नानक जी को ज्ञान नहीं था
अरे स्वामी जी तो यही बता दीजिए की आपको क्या ज्ञान था पहले अपने आपको 
ही देख लेते नानक जी का अपमान क्यों किया।
किसी ने सत्य ही कहा है एक मुर्ख को सारी दुनिया मुर्ख ही लगती है


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दयानंदभाष्य खंडनम् ✴✴
ये देखिए इस धूर्त को सत्यार्थ प्रकाश के अपने एकादश समुल्लास में ये बोलता है कि नानक जी को ज्ञान नहीं था 
अब ज्ञान था या नहीं था मैं इस चक्कर में नहीं पडना चाहता।
परन्तु दुसरो का अपमान करने वाला , दुसरो को मुर्ख समझने वाला स्वयं कितना ज्ञानी है यह जानना जरूरी हो जाता है
आइए देखते है स्वामी जी कितने समझदार मतलब ज्ञानी थे उन्हीं के शब्दों में पढ़िए
अ) सत्यार्थ प्रकाश के नवम समुल्लास में स्वामी जी कहते हैं कि
आसमान का जो ये नीला रंग है वो आसमान में उपस्थित पानी की वजह से है जो वर्षता है सो वो नीला दिखता है
वो बात अलग है कि स्वामी जी की बुद्धि यही तक काम करती थी उन्होंने ये भी नहीं सोचा कि अगर पानी की वजह से आसमान नीला दिखाता है तो फिर बादलों में तो लबालब पानी भरा होता है फिर वो काले सफेद क्यों होते हैं
वो बात अलग है कि स्वामी जी को ये भी नहीं मालूम था कि पानी स्वयं रंगहीन हैं वो दुसरे के रंग में क्या परिवर्तन करेगा
वो बात अलग है कि स्वामी जी को यह भी नहीं पता था कि आसमान का नीला रंग सूर्य से आने वाली प्रकाश का पृथ्वी के वायुमंडल में उपस्थित गैसीय अणुओं से टकराने के कारण प्रकाश के परावर्तन के कारण दिखाई देता है
और यही प्रक्रिया समुद्र के जल के साथ होती है
ब) स्वामी जी की बुद्धि का एक नमूना और देखिए
स्वामी जी सत्यार्थ प्रकाश के अष्टम समुल्लास में लिखते हैं कि सूर्य, चन्द्रमा, तारे आदि जितने भी गोल पिण्ड, ग्रह आदि है उन सब पर मनुष्यआदि प्रजा रहती है
स्वामी जी को तो एक खगोलीय वैज्ञानिक होना चाहिए था क्या दिमाग पाया है सरकार बेकार में ही करोड़ों अरबों डॉलर सिर्फ ये जानने के लिए बेकार में खर्च कर देती है कि पडोसी ग्रह पर जीवन है कि नहीं ......
काश वैज्ञानिकों ने सत्यार्थ प्रकाश पढ़ी होती तो उनके ना केवल करोड़ों अरबों डॉलर का धन बचता साथ ही कई वर्षों का समय भी बेकार के प्रयोग में नहीं खराब होता 
कमाल है यार एक अज्ञानी दुसरे की समझ पर उंगली उठा रहा है अपनी गिरेबान में ना झांककर उल्टा अपने एकादश समुल्लास में कहते हैं कि नानक जी को ज्ञान नहीं था
अरे स्वामी जी तो यही बता दीजिए की आपको क्या ज्ञान था पहले अपने आपको 
ही देख लेते नानक जी का अपमान क्यों किया।
किसी ने सत्य ही कहा है एक मुर्ख को सारी दुनिया मुर्ख ही लगती है

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दयानंदभाष्य खंडनम् -५ ✴✴

स्वामी जी कितने महान थे....
जहाँ जिस श्लोक में नियोग की गन्ध तक नहीं होती थी पहले तो वहाँ नियोग स्वयं गढ़ते थे फिर उसमें ११, ११ वाला तडका दे मारते थे। इसके बाद ही उसे मुर्ख समाजीयो के सामने परोसते थे 😂😂😂😂
आइए स्वामी जी की धूर्तता का एक नमूना दिखाता हूँ आपको 

सत्यार्थ प्रकाश चतुर्थ संमुल्लास:-
प्रोषितो धर्मकार्याथ प्रतिक्षयोष्टौ नरः समाः ।।
विद्यार्थ षड्यशसोर्थ वा कामार्थत्रीस्तुवत्सरान् ।। 

मनुस्मृति ( 9/ 75 )

सत्यार्थ प्रकाश के चतुर्थ संमुल्लास मे दयानन्द जी ये इसका रेफरेन्स ( 9/76) मे दे रखा है खैर ये कोई मुद्दा नही है 
आते है मुद्दे पर 

स्वामी जी अपनी पुस्तक मे इसका अर्थ लिखते है की 

" स्त्री । यदि पुरुष् धर्म कार्य के उद्देश्य से परदेश गया है तो 8 वर्ष , विद्या या कीर्ति के लिए गया है तो 6 वर्ष , और धन इत्यादि कमाने गया है तो 3 वर्ष उसकी राह देखे । उसके पश्चात नियोग करके संतान उत्त्पत्ति कर ले ।
जब विवाहित पति आवे तब नियुक्त पुरुष छूट जावे ।।

जबकि मनुस्मृति मे लिखा है ।

"पति के धर्मकार्य , विद्या-यश प्राप्ति तथा व्यापार के लिए विदेश जाने पर पत्नी को क्रमशः आठ , छह और तीन वर्षो तक उसकी प्रतीक्षा करनी चाहिए"

इस श्लोक मे कही भी नियोग की कोई बात ही नही कहीं गई ।।

क्या स्वामी जी इन श्लोकों मे अपने आप से नियोग शब्द जोड़ देते है ???

इसके पश्चात स्वामी जी ने एक और श्लोक लिखा है ।।

वन्ध्याष्टमेधिवेद्याब्दे दशमे तु मृतप्रजा ।
एकादशे स्त्री जननी सद्यस्त्वप्रियवादिनि ।। मनुस्मृति मे (9/80)

स्वामी जी इसका अर्थ लिखते है 
"वैसे ही पुरुष के लिए भी नियम है , जब विवाह के आठ वर्ष तक स्त्री को गर्भ ही ना रहे , वन्ध्या हो तो आठवे , संतान हो कर मर जावे तो दशवे , जब जब हो तब तब कन्या , पुत्र न होवे तो ग्यारहवे और जो स्त्री अप्रिय बोलने वाली हो तो तुरंत उसको छोड़ कर किसी दूसरी स्त्री से नियोग करके संतानोतपत्ति कर लेवे "

जबकि मनुस्मृति मे लिखा है ।

"पत्नी के वन्ध्या, मृतक बच्चों को जन्म देने वाली तथा बार बार कन्या को ही जन्म देने वाली होने पर पति को क्रमशः आठवे, दसवे और ग्यारहवे वर्ष मे दूसरा विवाह करने का अधिकार है। स्त्री के कटुभाषिणी होने पर पुरुष उसी समय दूसरा विवाह कर सकता है"

हद है यार ये बंदा लोगों का कितना चुतिया बनाता था 
जहाँ नियोग की गन्ध तक नहीं आती वहाँ भी नियोग घुसेड़ रखा है
अब कोई आर्य समाजी कुछ बोलेगा ???

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दयानंदभाष्य खंडनम् -४ ✴✴
माता, पिता, आचार्य, अतिथि और पुरुष के लिए पत्नी की अहमियत बताते हुए स्वामी जी कहते हैं- `ये पाँच मूर्तिमान् देव जिनके संग से मनुष्‍यदेह की उत्पित्त, पालन, सत्यशिक्षा, विद्या और सत्योपदेश को प्राप्ति होती है। ये ही परमेश्वर को प्राप्त होने की सीढ़ियाँ हैं।´ (सत्यार्थप्रकाश, एकादशसमुल्लास,)
माता-पिता को छोड़कर तो वो खुद ही भागे थे। विवाह उन्होंने किया नहीं इसलिए पत्नी भी नहीं थी। वो खु़द दूसरों पर आश्रित थे और न ही कभी उन्होंने कुछ कमाया तो अतिथि सेवा का मौका भी उन्होंने खो दिया। 
सीढ़ी के चार पाएदान तो उन्होंने खुद अपने हाथों से ही तोड़ डाले।
आचार्य की सेवा उन्होंने ज़रुर की, लेकिन कभी-कभी ऐसा कुछ कर जाते थे कि या तो आचार्य पाठशाला से उनका नाम ही काट देते थे या जितना ज्यादा ज़ोर से हो सकता था उनके डण्डा जमा देते थे, 
जिनके निशान उनके शारीर पर हमेशा के लिए छप जाते थे।
तो कुल मिला कर उनके अंदर ऐसा कोई भी गुण नही था जिससे वो ईश्वर को प्राप्त कर सके ।।
कोई है जो कटाक्ष करे ????

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दयानंदभाष्य खंडनम् -३ ✴✴
दयानंद ने वेदआदि भाष्यों के साथ छेडछाड क्यों किया
इन सबके पिछे स्वामी जी का उद्देश्य क्या था ??
आइए देखते है
सत्यार्थ प्रकाश सप्तम संमुल्लास :- दयानन्द जी लिखते है ।
अग्नेर्वा ऋग्वेदो जायते वायोर्यजुर्वेद: सुर्यात्सामवेद: ।।
स्वामी जी इसका अर्थ लिखते है की
"ईश्वर ने सृष्टि की आदि मे अग्नि वायु आदित्य तथा अंगिरा ऋषियो की आत्माओ मे एक एक वेद का प्रकाशन किया"
अब आइये जरा इस मंत्र के अर्थ पर भी नजर डाल लेते है
अग्नेर्वा - अग्नि द्वारा 
ऋगवेदो - ऋग्वेद 
जायते - प्रकट हुआ /दोहन 
वायोर्यजुर्वेद: - वायु द्वारा यजुर्वेद 
सुर्यात्सामवेद: - सूर्य के द्वारा सामवेद
अब कोई आर्य समाज के तथाकथित बुद्धिजीवी इस पर प्रकाश डालना चाहेंगे ???
की स्वामी दयानन्द सरस्वती ने यहा पर अंगिरा और अथर्वेद कैसे जोड़ा ???? और इस मंत्र मे अग्नि सूर्य और वायु के लिए ऋषि शब्द का प्रयोग कहाँ हुआ है ???
यहाँ सिद्ध हो जाता है की दयानन्द को ज्ञान तो बिल्कुल भी नही था क्योंकि इस मंत्र को कोई भी जिसमे थोडी सी भी बुद्धि होगी या संस्कृत का मूल अध्धयन भी किया होगा तो वो समझ सकता है कि दयानंद ने इस मंत्र के द्धारा लोगों को किस प्रकार भ्रमित करने का प्रयास किया है ।।
चलिए बढ़ते है आगे ।
प्रश्न करता पूछता है की 
यो वै ब्राह्मणम् विदधाति पूर्वम् यो वै वेदंश्च प्रहिणोति तस्मैं ।।
इस मंत्र मे हो ब्रह्मा जी के हृदय मे किया है फिर अग्निआदि ऋषियो को क्यो कहा ??
( ये प्रश्न कर्ता का वाक्य है इसलिए इस पर गौर नही करेंगे क्योकि यहाँ प्रश्न कर्ता और जबाब देने वाला एक ही व्यक्ति है ये ढ़ोग बस लोगों को भ्रमित करने के लिए किया गया है )
स्वामी जी जवाब देते है ।
ब्रह्मा की आत्मा मे अग्निआदि द्वारा स्थापित कराया देखो मनुस्मृति मे क्या लिखा है -
अग्निवायुरविभ्यस्तु त्र्यं ब्रह्म सनातनम।
दुदोह यज्ञसिध्यर्थमृग्यजु: समलक्षणम्॥- मनु (1/23)
स्वामी जी इसका भावार्थ लिखते है की
"जिस परमात्मा ने आदि सृष्टि में मनुष्यों को उत्पन्न कर
अग्नि आदि चारों ऋषियों के द्वारा चारों वेद ब्रह्मा को प्राप्त कराए
उस ब्रह्मा ने अग्नि, वायु, आदित्य और (तु अर्थात) अंगिरा से ऋग, यजुः, साम और अथर्ववेद का ग्रहण किया"
स्वामी जी के इस भावार्थ से साबित होता है की स्वामी जी केवल अज्ञानी ही नही अपितु मूर्ख भी थे ।
या फिर उन्होंने सरासर लोगो को भ्रमित करने का कार्य किया है ( इसकी बात भी अभी करेंगे )
बढ़ते है थोड़ा आगे
प्रश्न करता आगे पूछता है 
"उन चारो मे ही प्रकाशन किया इससे ईश्वर पक्षपाती होता है"
स्वामी जी उत्तर देते है 
"वो ही चार सब जीवो से अधिक पवित्रात्मा थे , अन्य उनके सदृश नही थे । इसलिए पवित्र विद्या का उन्ही मे प्रकाश किया"
प्रश्न करता आगे कोई प्रश्न नहीं करता कुछ नही पुछता है इसका कारण कोई भी समझदार व्यक्ति समझ सकता है 
लेकिन मैं पूछना चाहूँगा
की सृष्टि उत्पत्ति के समय कोई आत्मा सबसे पवित्र , कम पवित्र और अपवित्र कैसे हुई ???
स्वामी जी के अनुसार क्या ईश्वर पक्षपाती नही हुआ ???
और सृष्टि के आदि मे जब मनुष्य की उत्त्पत्ति हुई उस वक़्त तो कोई काम, लोभ, मोह, छल इत्यादि भी नही था जबकि पैदा हुआ बच्चा पाप पुण्य के बंधन से मुक्त होता है
फिर स्वामी जी का ये कथन की वो चार सबसे अधिक पवित्रात्मा थे क्या बेवकूफी भरा नही है ???😃😃
चलिए और आगे देखते है
प्रश्न करता सवाल करता है हालांकि बेवकूफी भरा सवाल है
" किसी देश की भाषा मे वेदों का प्रकाश ना करके संस्कृत मे ही वेदों का प्रकाश क्यों किया ??"
मानता हु की ये सवाल बेतुका है 
मगर आर्य समाज के तथाकथित महाऋषि ने जो जवाब दिया वो वाकाइ मे इससे से ज्यादा बेतुका है 😃
स्वामी जी कहते है 
"जो किसी देश भाषा मे प्रकाश करता तो ईश्वर पक्षपाती होता क्योंकि जिस देश भाषा मे ईश्वर वेदों का प्रकाश करता वहाँ के लोगो को सुगमता और बाकियो को पढने मे कठिनता होती । 
इसलिए संस्कृत मे किया जो किसी देश भाषा मे ना होकर अन्य सभी भाषाओं का कारण है ।
क्या स्वामी जी का ये जवाब वाकई हास्यपद और बेवकूफी भरा नही है ??😃😃 
मैं समस्त आर्य समाजियों से पूछता हुँ 
कि सृष्टि उत्पत्ति के समय कितने देश थे ???
और कितनी भाषाए बोली जाती थी ???
जैसा स्वामी जी ने कहा है की संस्कृत हर भाषा का कारण है 
तो क्या संस्कृत कभी बोली नही जाती थी ???😃😃
ये सवाल मैं पहले भी बहुत से आर्य समाजियों से पूछ चुका हु 
उनके कुतर्क ऐसे आये 
"जैसा सवाल था वैसा जवाब दिया स्वामी जी ने"
तो मैं फिर कहना चाहता हुँ 
की क्या स्वामी जी किसी गधे या मूर्ख से सवाल जवाब कर रहे थे ???
क्या स्वामी जी ये भूल गए थे की वो एक ग्रंथ लिख रहे है 
और ग्रंथ मे ऐसी मूर्खता पूर्ण बाते शोभा नही देती ??
और बड़ी बात ग्रंथ लिखने वाला कोई मूर्ख तो नही होगा 
मतलब साफ है की स्वामी जी ने लोगो को भ्रमित करने का प्रयास किया है 
इसकी भी पुष्टि मैं कर ही देता हुँ ।
जैसा स्वामी जी ने ऊपर लिखा था
अग्निवायुरविभ्यस्तु त्र्यं ब्रह्म सनातनम।
दुदोह यज्ञसिध्यर्थमृग्यजु : समलक्षणम्॥- मनु (1/23)
जिस परमात्मा ने आदि सृष्टि में मनुष्यों को उत्पन्न कर
अग्नि आदि चारों ऋषियों के द्वारा चारों वेद ब्रह्मा को प्राप्त कराए
उस ब्रह्मा ने अग्नि, वायु, आदित्य और (तु अर्थात) अंगिरा से
ऋग, यजुः, साम और अथर्ववेद का ग्रहण किया।
स्वामी जी ने इस मंत्र से भी वैसे ही छेड छाड़ करी है 
जैसा अन्य मंत्रो के साथ किया है 
और उनके इस भावार्थ से ये साफ हो जाता है की उन्हे संस्कृत का तनिक भी ज्ञान नहीं था यदि होता सोच विचार कर भावर्थ करते यू मुर्खों कि भांति नही करते या फिर ये षडयंत्र भी हो सकता है लोगो को भ्रमित करने के लिए
क्योंकि इस मंत्र मे लिखा है 
अग्निवायुरविभ्यस्तु - अग्नि वायु और सूर्य है ।
त्रयं ब्रह्म - तीन देव ( यहाँ पर ब्रह्म देव के लिए प्रयोग किया गया है ईश्वर के लिए नही )
दुदोह - प्रकट किया / उत्पन्न किया 
यज्ञासिध्यार्थम् - यज्ञ सिद्धी के लिए 
ऋग्यजु:साम् - ऋग यजु और साम 
लक्षणम्- गुण वाले ।
भावार्थ- परमेश्वर ने यज्ञ सिद्धी के अग्नि वायु और सूर्य तीनो देव को और सम गुण वाले साम ऋग और यजु वेदों को दोहा/प्रकट किया ।।
अब बताये कोई इस मंत्र मे ऋषियों का उल्लेख कहाँ मिलता है ??
और अंगिरा ऋषि का भी कहा है ??
और स्वामी जी ने जो इसमे बकवास कर रखा है 
जैसे 
प्रारम्भ मे 4 ऋषि थे उनमे एक अंगिरा थे 
इन चारो ने ब्रह्मा को वेद ज्ञान दिया
आइये देखते है सत्य क्या है ।
मनुस्मृति 1/11
तदण्डमभवद्धैमं सहस्रांशुसमप्रभम् ।
तस्मिञजज्ञेस्वयंब्रह्मा सर्वलोकपितामहः ।।
प्रकृति मे आरोपित बीज अल्प काल से ही सूर्य के समान चमकीले अंडे के रूप मे परिणत हो गया और फिर उसी अंडे से सब लोगो के पितामह ब्रह्मा जी प्रकट हुए ।।
मनुस्मृति मे साफ शब्दों मे लिखा हुआ है की ब्रह्मा जी की उत्पत्ति सबसे पहले हुई और इस जग के पितामह वही है ।।
मनुस्मृति 1/12 
आपो नारा इति प्रोक्ता आपो वै नरसूनव:
ता यदस्यायनं पूर्व तेन नारायण: स्मृत: ।।
ब्रह्म (नर) द्वारा उत्पन्न होने के कारण आपका एक नाम नार है फिर इसी नार से ब्रह्मा की ब्रह्मरूप मे उत्पत्ति हुई ।
अतः ब्रह्मा जी का एक नाम नारायण भी है ।।
इन दोनो तथ्यों से पता चलता है की आदि सृष्टि मे मनुस्मृति के आधार पर ब्रह्मा जी सर्वप्रथम प्रकट हुए और ईश्वर ने स्वंय अपने स्वरूप को इस रूप मे प्रकट किया ।।
नोट- स्वामी दयानन्द जी खुद मानते है की मनुस्मृति सत्य है ।। फिर स्वामी जी सत्यार्थ प्रकाश मे ऐसी बेवकूफी क्यों लिखी की 4 ऋषियो ने ब्रह्मा को वेदों का ज्ञान प्राप्त कराया ???
और आइये एक नजर देखते है अंगिरा ऋषि पर 
सत्यार्थ प्रकाश मे स्वामी ने वेदों की उत्पत्ति के समय 4 ऋषियो का नाम लिया जबकि मनुस्मृति 
केवल अग्नि वायु और सूर्य को मानती है ।।
जो की ऊपर मैं लिख चुका हु ।।
आइये देखते है अंगिरा ऋषि की उत्पत्ति 
देखिए स्वामी जी की बात कितनी सही और कितनी झूठ
मनुस्मृति 1/37 
मारीचिमत्र्यंगीरसौ पुलस्त्यं पुलहं क्रतुम् ।
प्रचेतसं वसिष्ठं च भृगुं नारदमेव च ।।
मनु द्वारा उत्पन्न दस ऋषियो के नाम मारीच अत्री अंगिरा पुलत्स्य पुलह क्रतु प्रचेता वशिष्ट भृगु नारद ।।
इन बातो के साथ और इन प्रमाणों के साथ मैं विश्वास से कह सकता हु 
की स्वामी दयानन्द सरस्वती एक षड़यंत्र के तहत आये थे और मंत्रो के साथ खिलवाड़ करके सबको भ्रमित करने में कुछ हद तक सफल भी हुए ।।

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दयानंदभाष्य खंडनम्
 
नियोग समाज द्वारा ब्राह्मणों पर एक आरोप अक्सर लगता आया हे वो ये की पुराणों की रचना ब्राह्मणों ने की थी और उसमे मिलावट भी कर दी थी इसलिए वो पुराणों को नहीं मानते.....

अरे मूर्ख अल्पज्ञ समाजीयो जरा इस पर भी तो सोच विचार करकें देखो कि ३ युगों तक लगभग करोड़ सालो तक श्री वेद भी तो उन्हीं ब्राह्मणों और पौराणिकों के पास ही रहे हैं तो क्या ब्राह्मणों ने वेदों में परिवर्तन नहीं कर दिए होंगे ? 😃
उन्हें कैसे शुद्ध मान लेते हो ?.....

अगर पुराणों को गलत सिर्फ इसलिए कहते हो की ब्राह्मणों ने अपने स्वार्थ के लिए लिखे तो उन्ही ब्राह्मणों के पास ३ युगो से वेद भी रहे हैं उनको श्री वेदों को एकदम सही कैसे मान रहे हो ?????😃😃 

अब कोई ये बताए कि क्या कोई दो कौडी का व्यक्ति यह तय करेगा की कौन सा धर्म ग्रन्थ सही हे कौन सा गलत ?
नियोग समाज ब्राह्मणों को बदनाम करने के तरीके बंद करें

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✴✴ दयानंदभाष्य खंडनम् ✴✴
सोमः प्रथमो विविदे, सोमो ददद्गन्धर्वाय ( ऋग्वेद म• १०, सुक्त ८५, म• ४० व ४१) इन दोनों ऋचाओं का दयानंद ने जो अनर्थ किया है उस पर भी ध्यान देना जरूरी है
सोमः प्रथमो विविदे गन्धर्वो विविद उत्तरः । 
तृतीयो अग्निष्टे पतिस्तुरीयस्ते मनुष्यजाः ॥४०॥
अर्थ- हे स्त्रिा!जो (ते) तेरा (प्रथमः) पहला विवाहित (पतिः) पति तुझ को (विविदे) प्राप्त होता है उस का नाम (सोमः) सुकुमारतादि गुणयुक्त होने से सोम, जो दूसरा नियोग होने से (विविदे) प्राप्त होता वह (गन्धर्व:) एक स्त्री से संभोग करने से गन्धर्व, जो (तृतीय उत्तरः) दो के पश्चात् तीसरा पति होता है वह (अग्निः) अत्युष्णतायुक्त होने से अग्निसंज्ञक और जो (ते) तेरे (तुरीयः) चौथे से लेके ग्यारहवें तक नियोग से पति होते हैं वे (मनुष्यजाः) मनुष्य नाम से कहाते हैं | जैसा (इमां त्वमिन्द्र) इस मन्त्रा में ग्यारहवें पुरुष तक स्त्राी नियोग कर सकती है, वैसे पुरुष भी ग्यारहवीं स्त्री तक नियोग कर सकता है | 
फिर वही विवाह संस्कार में सोमो ददद्गन्धर्वाय गन्धर्वो दददग्नये, यह श्रुति लिखी है अर्थ इसका स्पष्ट यह लिखा है कि सोम गन्धर्व को देवे, और गन्धर्व अग्नि को और अग्नि मुझको इस स्त्री को देवे यह कथन विवाह के समय वर का हैं
#समीक्षा- स्वामी जी का भाष्य पढ़कर तो ऐसा प्रतीत होता है कि वेद क्या स्वामी जी ने तो कभी संस्कृत की भी सकल नहीं देखी हो नहीं तो वेद मंत्रों के अर्थों का इस प्रकार अनर्थ नहीं करते
#सही_भावार्थ - कन्या व उसके माता पिता उसके पति में निम्न विशेषताएं देखें हे स्त्री तेरा पति पहला तो वह सौम्य हो सौम्यता पति का पहला गुण है, दुसरा गन्धर्व ज्ञान की वाणियों को धारण करने वाला हो अर्थात ज्ञानी हो, तीसरा प्रगतिशील मनोवृत्ति वाला हो, चौथा मनुष्यजा मनुष्य की संतान हो अर्थात जिसमें मानवता हो जिसका स्वभाव दयालुता वाला हो क्रूरता वाला नहीं, ते पति: तेरा पति है
अब सोमः प्रथमो विविदे इस पहली श्रुति के अर्थ पर दृष्टि डालकर ध्यान दीजिए की दयानंदी लोग क्या उसी स्त्री से विवाह करते हैं जो प्रथम एक से विवाह और दो से नियोग कर चुकी है ? 
धन्य है यही तो धर्म और स्वामी जी की शर्म है और पूर्व के विरुद्ध यहाँ ही दूसरा विवाह भी निकाल दिया , न जाने वह पहला विवाहित सोम संज्ञावाला पति अपने जीते जी अपनी पत्नी गन्धर्व संज्ञावाले नियोगी पति को क्यों देगा ? 
और वह गन्धर्व नियोगी अपने जीते हुए अग्नि संज्ञावाले नियोगी पति को क्यों देगा ? 
और चौथा ही पति मनुष्य क्यों कहाता है क्या वे पिछले तीन किसी जानवर के बच्चे हैं ?? 
और तीसरे को ही अग्नि की संज्ञा क्यों ? 
शायद वो हमेशा यह सोच सोच कर जलता रहता हो कि पहले के समान सुकुमारतादि गुण औरों में क्यों नहीं इत्यादि इत्यादि।
इनके अतिरिक्त और भी मंत्र जैसे - 
इमां त्वमिन्द्र मीढ्वः सुपुत्रां सुभगां कृणु । 
दशास्यां पु त्रानाधेहि पतिमेकाद शं कृधि ।। -ऋ० मं० १० | सू ० ८५ | मं ० ४५ || 
कुह स्विद्दो षा कुह वस्तोर श्विना कुहापिभिपि त्वं करत: कुहोषतुः । 
को वां शयु त्रा विधवेवपिव दे वरं मर्य्य न योषा कृणुते स धस्थ आ || -ऋ० मं० १० | सू० ४० | मं० २ || 
उदीषर्व नार्य भिजीवलो वंफ ग तासुमे तमुप शेष एहि । 
ह स्त ग्रा भस्य दिधि षोस्तवे दं पत्यु र्जनि त्वम भि सं बभूथ ।।२।। – ऋ० मं० १० | सू० १८ | मं० ८ || 
इत्यादि मंत्रों के अर्थ का अनर्थ करकें नियोग बनाया है अर्थात नियोग झूठ से सिद्ध किया है । जबकि इन सभी मंत्रों में कहीं भी नियोग की गन्ध तक नहीं है 
अपना स्वार्थ सिद्ध करने के लिए दयानंद ने वेद मंत्रों के साथ कैसा अनर्थ किया वह आप सबके सामने ही है 
दयानंद का वेदों के प्रति कोई लगाव नहीं था बस अपना स्वार्थ सिद्ध करने के लिए वेदों को ढ़ाल कि तरह प्रयोग किया




दयानन्द के अनर्थ

दोस्तों मैं एक मुसलमान हूं इसलिए मेरा फर्ज है समाज की गंदगी को खत्म करना इसलिए आर्य समाज नामी गंदगी को खत्म होना चाहिए जिसने समाज को गुमराह ...