Ramkrishna jeeकी वाल से।।
आर्य नमाजियों के नए अब्बाजान "राजा राममोहन रॉय"
इतने दिनों से धूर्त धर्मद्रोहियो द्वारा धर्म के महापाखंडी राजा राममोहन रॉय की इतनी महिमा मंडित की जा रही है कि इस धूर्त की महिमा में लोग गुमराह हो रहे है,इसलिए मुझ जैसे व्यक्ति को इन धर्मद्रोहियो के पाखंड का पर्दाफाश करना जरुरी हो गया है !
राजा राममोहन रॉय का परिचय-
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भारत विश्व का एकमात्र धार्मिक देश है और इसमें धर्म जितना फैला उससे ज्यादा अधर्मी फैले ! धर्म को हर दृष्टि से तोड़ने के भरसक प्रयास मलेच्छों द्वारा किये गए और देश में कई सारे उनके टुकड़ो पर पलने वाले जयचंद भी पैदा हुआ जिसका एक उदाहरण है "राजा राममोहन रॉय" !
यह छुपा रुस्तम अंग्रेजो का एजेंट था और सनातन धर्म को तोड़ने के लिए #दानव_समाज वेतनभोगी था ! मैकॉले सिस्टम ने राममोहन रॉय की बहुत महिमा मंडित की और जो बची खुची कसर थी वो आर्य नमाजी पूरा का रहे है ! इसने ईस्वी सन 1828 में ब्रह्म समाज की स्थापना की जिसका मूल उद्देश्य सनातन धर्म को तोडना,उनमे वैमनस्य उत्पन्न करना,गलत रीति रिवाज बनाना, सनातन धर्म की परम्पराओ को गलत साबित करके उनको अपने ही धर्म के प्रति द्वेष पैदा करवाना,भारत में अंग्रेजी हुकूमत को कायम रखना,अंग्रेजी शिक्षा पद्धति को घर घर पहुँचाना और आखिर में मूल उद्देश्य सनातन धर्मियों को धर्म की आड़ में ईसाई बनाना और यदि ईसाई न बने तो नास्तिक बनाना था !इसने पब्लिसिटी के लिए बहुत सारे भ्रामक आंदोलन चलवाए जिसकी हमें कोई जरुरत नहीं थी ! यदि इनकी मंशा तो ठीक से समझा जाये तो मैं कहना चाहूंगा कि आप #आर्य_समाज को देख लीजिये क्योकि दोनों संगठन एक ही है और आर्य समाज ब्रह्म समाज का नया रूप है ! तो चलो इस लेख में इस राममोहन रॉय का पूरा विश्लेषण करते है-
1. राममोहन रॉय #दानव_समाज का एजेंट- दानवो के भारत में छोड़े गए एजेंटो में ये प्रथम धर्मद्रोहियो में से एक था जिसने देश और धर्म से गद्दारी की ! ये व्यक्ति अंग्रेजो की फूट डालो राज करो की नीति से बनाया गया एक मोहरा था जिसका काम देश में अव्यवस्था फैलाना था ! ईस्वी सन 1813 में लन्दन स्थित संसद में सर्वसम्मति से अंग्रेजो ने भारत को पूर्ण रूप से ईसाई बनाने का निर्णय किया था जिसका कार्यान्वन के लिए राजा राममोहन रॉय को नियुक्त किया गया ! आप यदि इसके बारे में थोड़ी सी भी जानकारी ढूंढने की कोशिश करेंगे तो आपको इसके काले कारनामे सामने आने नहीं लगेगी !
2. ब्रह्म समाज की स्थापना एक साजिश- ब्रह्म समाज की स्थापना हिन्दुओ को उनके धर्म के प्रति द्वेष भाव पैदा करवाने के लिए की गयी थी ! इसका ताजा उदहारण देखना चाहे तो आप आर्य समाज को ही देख लीजिये,सारा माजरा समझ आ जायेगा ! इन्होने भारत में परम्परानुगत व्याप्त कई सारी परम्पराओ को तोड़ने की या यूँ कहे तो खत्म करने की कोशिश की ! ये बात हर एक आस्थावान धर्मभक्त हिन्दू जनता है कि मूर्तिपूजा हमारे धर्म के प्राण है,यही एकमात्र कर्मकांड है जो हमको हमारे धर्म से गहराई से जोड़े रखती है ! ये इतने बड़े ज्ञानी थे कि मूर्तिपूजा क्यों की जाती है किसलिए की जाती है आदि बाते पुराणो से पढ़े बिना ही मूर्तिपूजा खंडन शुरू किया और हिन्दुओ में निराकार और साकार पूजको में बंटाधार कर दिया ! आज तक भारत में साकार और निराकार पूजक घुल मिल कर रहते आये है जिसको इस पाखंडी ने तोड़ने के भरसक प्रयास किये ! परिणाम स्वरुप धर्मद्रोही संस्कृत विद्वान बैठाये गए और हिन्दू धर्म की उन लेखन को दुष्प्रचारित किया जाने लगा जिसका विवाद खड़ा कर के हिन्दुओ को ये विश्वास दिलाया जा सके कि तुम इतने दिनों से जो धर्म को मानते थे वो गलत है ! यदि आप थोड़ी मेहनत करे तो आपको इस धर्मद्रोही का अंग्रेजो से सम्बन्ध आसानी से पता चल जायेगा स्थान और समय की कमी होने के कारण इस लेख को लम्बा नहीं किया जा सकता !
3. ब्रह्म समाज के स्थापक सदस्य देवेन्द्र नाथ टैगोर- देवेन्द्र नाथ टैगोर और राजा राममोहन रॉय ने मिलकर ब्रह्म समाज की स्थापना की ! देवेन्द्र नाथ टैगोर वही व्यक्ति है जिसके कुपुत्र #रवीन्द्र_नाथ_टैगोर की अंग्रेजो से चाटुकारिता की कहानियाँ पुरे देश में प्रसिद्द है ! देवेन्द्र नाथ टैगोर एक अंग्रेजी एजेंट था जिसके गुणसूत्र उसके बेटे रबीन्द्रनाथ टैगोर में आये और उसने भी अपने पिता की भाँति अंग्रेजो के तलवे चाटे ! इसी से खुश होकर अंग्रेजो ने अपने बंगाल के सबसे बडे #वैश्यालय का पूरा कार्यभार वर्णसंकर देवेन्द्रनाथ टैगोर को सौपे जो बाद में रबीन्द्रनाथ के भाई द्वारा भी संचालित होता रहा ! अंग्रेजो की वैश्या परम्परा को जारी रखने के लिए हमारे धर्म में एक और गन्दी बात डाली गयी जिसके परिणामस्वरूप आर्य समाज की #नियोगप्रथा प्रचलित हुई और भारत के लोगो को एकाधिक सम्बन्ध बनाने के लिए प्रेरित किया गया !
4. धर्म की आड़ में भारत का ईसाईकरण करने की घिनोनी चाल- राममोहन रॉय खुद एक ईसाई था और उसने भारत को धर्म की आड़ में ईसाई बनाने का काम शुरू किया ! ये कार्य भारत में बहुत ही बड़े पैमाने पर शुरू हुआ जिसका भारत में रोष फैला और धर्मभक्तो ने पुरे देश में ब्रह्म समाजियों की करतूते पर्दाफाश करना शुरू की जो उसके पतन का कारण बना ! परिणाम स्वरुप आज ब्रह्म समाज पुरे भारत से उखड गया है ! चलो अब आर्य समाजियों पर आ जाते है- ब्रह्म समाज का और आर्य समाज का एक ही कार्य है हिन्दुओ के धर्मशास्त्रों को गलत तरीके से पेश करना जो उन्होंने बहुत ही अच्छे तरीके से किया ! बस अंतर इतना सा है कि ब्रह्म समाज ने ये काम सरेआम किया और आर्यसमाज ने ये काम परदे के पीछे से किया ! आर्य समाजियों के जाल में आये लोगो के धर्मातरण का कार्य #थियोसोफिकल_सोसाइटी (दानव समाज की सीक्रेट सोसाइटी) के द्वारा किया जाने लगा ! जिसका एक पुख्ता सबूत है कि- बनारस के प्रख्या क्वींस कॉलेज के प्राचार्य रुडोल्फ हुर्रनले (rudolf hoernley) प्राचार्य थे जो कई बार दयानंद से मिल चुके थे ! उन्होंने अपने लेख में लिखा- दयानंद हिन्दुओ के मन में यह बात भर देगा की आज का हिन्दू धर्म वैदिक हिन्दू धर्म के पूर्णतया विपरीत है और जब यह बात हिन्दुओ के मन में बैठ जाएगी तो वे तुरंत हिन्दू धर्म को त्याग देंगे ! ऐसी स्थिति में हिन्दुओ को एक विकल्प की खोज होगी जो उन्हें हिन्दू से ईसाई धर्म की ओर ले जाएगी (प्रमाण पुरानी अन्य पोस्ट में देखे) !
5. निराधार आंदोलन से किया राष्ट्र को गुमराह- देश के गुलामी के काल में अंग्रेजो द्वारा समर्थित सैकड़ो प्रायोजित आंदोलन चलवाए गए जिसका मूल उद्देश्य समाज सुधार तो बिलकुल भी नहीं था बल्कि उनका उद्देश्य था भारतीय लोगो को उनके धर्म,उनकी मान्यताएँ और उनकी संस्कृति को गलत ठहराकर भारत के लोगो को अपने ही धर्म के प्रति द्वेष पैदा करवाना था ! उनमे जो सबसे आगे संगठन थे वे सिर्फ और सिर्फ दो ही संगठन थे जो ब्रह्म समाज और आर्य समाज थे ! सभी को ज्ञात रहे की ये संगठन इलू के फ्रीमेसोन नामक संस्थान के द्वारा पोषित थे जिसका मूल उद्देश्य पुरे विश्व को नास्तिक बनाना है ! खैर इसके बारे में हम अगली पोस्ट में विस्तृत चर्चा करेंगे ! इनके आंदोलन भी विचित्र विचत्र थे जैसे मूर्तिपूजा विरोध, अवतारवाद विरोध,विधवा विवाह के लिए हल्ला, मंदिरो को ठहराना,भारत में प्रचलित अनेको संगठनो को बदमाश करार देकर खुद को ही सच्चा ईश्वरीय दूत साबित करना ! हिन्दू समाज एक बड़ा विचित्र धर्म है जो पूर्णतः लचीला है जैसे- जब विदेशी अक्रान्ताओ की बाढ़ सी आने लगी तो इज्जत बचाने के लिए हमारे पूर्वजो ने न चाहते हुए भी बालविवाह शुरू किये लेकिन जब हम इनसे मुक्त हुए तब हम खुद खड़े हुए और इस प्रथा को समाज से हटाने में कई प्रयास किया लेकिन इन धूर्त पन्थो ने इसका पूरा फायदा लिया और हमारे समाज को अपने ही प्रति दुष्प्रचारित करके आपसी वैमनस्य पैदा करवाया ! इसी पर स्वामी विवेकानंद ने कहा कि "यदि हम खुद अपनी कुप्रथाओ को सही कर रहे है तो इसमें ब्रह्म समाजियों का क्या जाता है ? यदि हम इसको करना अच्छे से जानते है तो हमें देखकर आर्य समाजी जल भून क्यों जाते है ?" ! कभी भी आप ये बात ध्यान रखे कि इन अहंकारी संगठनो की साधारण मान्यता ये होती है कि जो भी समाज सेवा का कार्य हम करे तो वो सही है लेकिन यदि कोई कार्य को हमसे अच्छा करे तो वो देशद्रोही पाखंडी न जाने क्या क्या है ! इसी पर स्वामी विवेकानंद ने कि "आज देश में जो भी भ्रामक आंदोलन चल रहे है उनमे से ७०% आंदोलनो से और लोगो से देश को कोई मतलब ही नहीं है ! यदि इनके स्थान पर आज के समयानुसार सही मायनो में समाज सुधार आंदोलन चलाये जाये तो वो ज्यादा देश हेतु लाभकारी होगा ! इसी को आगे बढ़ाते हुए राजीव दीक्षित जी कि वर्तमान के 90% आंदोलन निराधार है !
6. भारत को नशेड़ी बनाने का भरसक प्रयास- दुनिया को राजा राममोहन रॉय का सिर्फ साफ चेहरा ही दिखाया जाता है लेकिन क्या आप जानते है कि ये धर्मद्रोही दानवो का कितना सार्थक प्यादा था ? इसमें कोई दो राय नही कि इल्लूमिनाती का महत्वपूर्ण व्यापारो में से एक है "नशे का व्यापार" ! अंग्रेजो द्वारा जो भारत के बेगुनाह गरीब किसानो के खेत छिने गए,उसका मालिकाना हक इन्ही धूर्त के हाथ में दिया गया और भारत को नशेड़ी बनाने का व्यापार शुरू हुआ ! जो भी खेत छिने गए उससे राममोहन रॉय ने बड़े पैमाने पर अफीम और अन्य मादक पदार्थो की खेती कर उत्पन्न किया ! उस समय उसका व्यापार इतना बड़ा था कि वो नशे की सामग्री भारत से बाहर निर्यात भी करता था ! वैसे दूसरी ओर दयानन्द जी अपने जीवनचरित्र के साक्षात्कार में लिखवाते हैं कि मुझको भांग पीने की गजब आदत है,जब भी भांग पीता हूँ तो मुझे अगले दिन तक होश नही रहता और कभी कभी तो इतना भी होश नही रहता कि नंगा होकर नंग धड़ंग घूमता हूँ ! खैर लेकिन भारत का ये सौभाग्य रहा कि उनका लेख लेख ही रहा गया और खुद आर्य नमाजियो ने भी इसे सिरे से नकार दिया !
7. अन्य- अन्य कार्यो में तो इसकी बहुत लंबी लिस्ट बन सकती है जैसे भारत में अंग्रेजी शिक्षा शुरू करना,विदेशी संस्कृति को बढावा देना आदि लेकिन समय की कमी के कारण इसे छोटा किया पड़ रहा है !
#ब्रह्म_समाज_और_आर्य_नमाज-यह इस पोस्ट का सबसे गंभीर विषय है और यदि ठीक से पूरी तरह से जानकारी दे तो सिर्फ इसी विषय पर २-३ पोस्ट लिखनी पड़ेगी कि ब्रह्म समाज और आर्य नमाज में आपसी क्या सम्बन्ध है ! इसका संक्षिप्त जवाब है कि आर्य नमाज ब्रह्म समाज का ही दूसरा नाम है ! जब पूरा देश इन ब्रह्म समाजियों और राममोहन रॉय की सच्चाई जान गया तो ब्रह्म समाज इस तेजी से खत्म हुआ जिसकी कोई सीमा नहीं (ब्रह्म समाजियों की पोल खोलने में #स्वामी_विवेकानंद का सबसे बड़ा हाथ था) ! तो बस पूरा विश्लेषण हुआ और जो जो कमियाँ ब्रह्म समाज में रह गयी वो सारी कमियाँ हटाई गयी और इसको एक ऐसे संगठन का रूप दिया गया जो पूर्ण रूप से दोगला संगठन हो ! परिणामस्वरूप भारत के सैकड़ो ग्रंथो का इन #यहूदी_पेंशनभोगियों ने बहिष्कार किया ! इनकी धूर्तता इससे भी पता चलती है कि भारत के ऋषि,महर्षियो और पंडितो ने अब तो तक कुल 134 स्मृतियाँ बनायीं लेकिन ये धूर्त सिर्फ एक स्मृति #मनुस्मृति को मानते है ! और तो और इन्होने प्रक्षेपण का कहकर धूर्तता की आड़ में मनुस्मृति को भी खंडित कर दिया ! परिणामस्वरुप आर्य नमाजी उन श्लोको को नहीं मानते जो प्रक्षेपित है जो हर हालत में उचित है लेकिन इन्होने इसके आड़ में वो भी श्लोक हटाने की भरपूर कोशिश की जो उनके पंथ के अनुसार सही नहीं बैठता ! इनकी धूर्तता तो उस समय भी सरेआम हो जाती है जब ये मन्त्रदृष्टा ऋषि #याज्ञवल्क्य स्मृति और महान राजनीतिज्ञ #चाणक्य अर्थशास्त्रीय स्मृति को भी नकार देते है ! इनके अनुसार सिर्फ और सिर्फ दयानंद सही है अन्य सब गलत ! खैर ये एक उदहारण है कि किस तरह इन्होने हमारे शास्त्रो से #मलेच्छों_का_नकाब पहने अपमान किया ! महादेव से ॐ छीनने में भी इनका ही हाथ है और भगवन राम और भगवान कृष्ण को एक साधारण पुरुष कहकर उनका अपमान करने में भी इनका ही हाथ है ! हर कही आर्य नमाजी वराह,मर्त्स्य,नरसिंह अवतार का तो ये गलियो से अपमान करते है ! आपको हर कही आर्य नमाजी धूर्त राजा राममोहन रॉय का गुणगान करते मिल जायेंगे !इन धूर्तो से
अपने सही अर्थो में गुणगान लायक महान लोगो की उपासना नहीं हुई और देश में पाखंड फ़ैलाने का हर षड़यंत्र करते है ! तो चलो मुद्दे पर आते है- राममोहन रॉय के दूसरे #अवतार हमारे प्रिय दयानंद सरस्वती थे जिन्होंने नया पंथ बनाने की सोची जिसका मूल उद्देश्य भारत और सनातन धर्म की बुराइया करना और आपसी द्वेष बढ़ाना है ! सुप्रसिद्ध गणिका #हेलेना ने भी राममोहन रॉय के बहुत गुण गए है ! जो आप आगामी पोस्ट में अच्छे से देखेंगे !
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स्वामी गड़बड़ानंद जी का संक्षिप्त मानसिक संतुलन
1. 16 वर्ष की कन्या 25 वर्ष का वर यह विवाह समय निकृष्ट अर्थात् घटिया है। (ख) 20 वर्ष की स्त्री और 40वर्ष का पुरूष का योग काम चलाऊ अर्थात् मध्यम है। (ग) 24 वर्ष की स्त्री तथा 48 वर्ष के पुरूष का विवाह समय उत्तम है। महर्षि दयानन्द जी का भावार्थ है कि 24 वर्ष की स्त्री तथा 48 वर्ष के पुरूष का विवाह तथा उपरोक्त नियमों के अनुसार नहीं किया जाता वह देश खुशहाल नहीं हो सकता।
2. जिस कुल में किसी के बवासीर, मिर्गी, क्षय, दमा, खांसी आदि रोग है, तथा किसी के शरीर पर बड़े-बड़े बाल है उस पूरे कुल की लड़की व लड़के से विवाह नहीं करना चाहिए।
3. जिस लड़की का नाम गंगा, जमुना, सरस्वती, आदि नदियों पर है तथा काली नाम तथा भूरे नेत्रों वाली हो उससे विवाह न करना चाहिए (सौंण व कुसौंण का भी पूरा ध्यान रखा है) जिस लड़की की चाल हथनी व हंस जैसी हो तथा नाम यशोदा आदि हो उससे विवाह करें।
4. सत्यार्थ प्रकाश समुल्लास 4 पृष्ट 102 पर यह भी लिखा है कि जिस स्त्री का पति जीवित है वह दूर देश में रोजगार के लिए गया हो तो उसकी स्त्री तीन वर्ष तक बाट (प्रतिक्षा) देखकर किसी अन्य पुरूष से संतान उत्पत्ति नियोग कुकर्म से करले, जब पति घर आये तो नियोग किए पति को त्याग दे तथा उस गैर संतान का गोत्र भी विवाहित पति वाला ही माना जाएगा।
5. जिस पुरूष की पत्नी अप्रिय बोलने वाली हो तो उस पुरूष को चाहिए कि किसी अन्य स्त्री से केवल नियोग करके संतान उत्पति करले तथा रहे अपनी पत्नी के साथ ही। इसी प्रकार जो पुरूष अत्यन्त दुःखदायक हो तो उसकी स्त्री भी दूसरे पुरूष से नियोग से संतान उत्पति करके उसी विवाहित पति के दायभागी संतान कर लेवे।
6. यदि किसी की स्त्री को आठ वर्ष तक संतान न हो तो वह पुरूष किसी अन्य स्त्री से नियोग (दुष्कर्म)करके संतान उत्पन्न कर ले। उस संतान को अपने घर ल आवे। जिसकी पत्नी से कन्या उत्पन्न होती हो लड़का उत्पन्न न होता हो तो वह पुरूष अन्य स्त्री से नियोग करके लड़का उत्पन्न करके घर ले आवे।
7. पृष्ठ 103 पर लिखा है:- स्त्री के गर्भ रहने के पश्चात् एक वर्ष तक स्त्री पुरूष मिलन नहीं करें। यदि पुरूष से न रहा जाए तो किसी विधवा स्त्री से नियोग (पशु तुल्य कर्म) करके संतान उत्पति कर दें।
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मुझे भी "दयानन्द " की जयजयकार करनी है
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चित भी मेरी पट भी मेरी
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सब को कहते हो " सत्य"अपनाओ , और खुद में सामर्थ्य नही है । सब का खण्डन करते हो , अपनी पर बात आते ही हाथ पावँ फूल जाते है । मुझे बताओ मित्रो , मैं कँहा गलत हूँ ?? बस मैं वो कारन आपके समक्ष रख रहा हूँ जो मुझे दयानन्द के प्रति श्रद्धा करने से रोक रहे है , मुझे लगता है , दयानन्द का जबरदस्ती महिमामण्डन किया गया , जिससे कि हिन्दू धर्म के विरुद्ध एक लोगो को खड़ा किया जाये , वही हो भी रहा है ।
अब एक बार मेरी पोस्ट को पढ़के बताईये , इसमें असत्य क्या है ?
------- " एकबार कर्णवास के ठाकुर ने स्वामी जी के आदेश से पुत्रेष्टि यज्ञ करवाया ,वंहा उपस्तिथ एक ब्राह्मण ने यज्ञ पिंड न खाया , प्रत्युत फेंक दिया ,किसी ने भी नही देखा , परन्तु स्वामी जी ने न जाने कैसे जान लिया । इस पर स्वामी जी ने ब्राह्मण का तिरस्कार किया , ब्राह्मण ने स्वीकार किया और फिर उसे पिंड खाने को दिया और यज्ञ सिद्ध हो गया , ठाकुर को पुत्र की प्राप्ति हुई " ( पृष्ट 212 ) ये घटना 1872 की है , तब लगभग 50 वर्ष उनकी आयु थी ।
मित्रो यंहा ध्यान रखने वाली बात है , प्रकरण पढ़के महसूस होता है , पिंड ब्राह्मण नही खाता तो यज्ञ सिद्ध नही होता , और पुत्रेष्टि यज्ञ में मन्त्र जाप भी किये गए होंगे । ये कोई दवाई नही या आयुर्वेदिक काम न होकर स्पष्ट रूप से यज्ञ मन्त्र सिद्धि का उदाहरण है ।
अब दूसरा प्रकरण पढ़िए -- "पौराणिक " लोग पिंड को वेदी बनाकर वेद का मन्त्र पढ़कर कहते है इससे भुत प्रेत निकट नही आते । महाराज ने कहा इससे मक्खी नही उड़ सकती , भुत प्रेत कैसे दूर जायेंगे । ( पृष्ट 419 )
यंहा मन्त्र शक्ति का खण्डन स्पष्ट तरीके से कर दिया ।
तीसरा प्रकरण देखिये -- कोई गंगाराम करके थे जिनको एक ब्रह्मचारी ने "कृष्ण अभ्रक" दिया , गंगाराम ने दयानन्द जी को बताया ये बुढ़ापे में जवानी आ जाती है , तो दयानन्द जी ने कहा ये मेरे पास भी है । तो गंगाराम ने कहा , ये तो काम देव भी बढ़ाता है , इससे कैसे बचते हो ??
तो दयानन्द ने कुछ इस तरह से कहा कि ,एकांत सेवी रहो, तभी सोया करो जब आलस्य अ जावे और प्रणव का "जाप "करो, आदि आदि । ( पृष्ट 118 )
यंहा भी जाप करने का निर्देश है ।
---- अब मेरे मित्रो , मैं कौन सी बात पर विश्वास करूँ और करूँ तो क्यों करूँ ?
एक जगह मन्त्र शक्ति और यज्ञ से उन्होंने बच्चा पैदा भी करवा दिया । एक जगह काम वासना की गोली खाने पर ॐ जाप करके नियंत्रित करना भी बता दिया ।
तीसरी जगह जो आपको बताया कि मन्त्र में ऐसा कोई प्रभाव नही है ?
--------------- किस बात पर श्रद्धा लाऊँ ??
क्रमशः .........
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मुझे भी दयानन्द की जयजयकार करनी है
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दयानन्द कितने बड़े ऋषि ??
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मित्रो , मेरा उद्देध्य् आर्य समाज के प्रति भड़ास निकालना नही है , न मेरा आर्य समाजियों के प्रति कोई द्वेष , मैं कई आर्य समाजियों को दिल से प्रेम करता हूँ , क्योकि उनकी भावना में एक तलब देखता हूँ , धर्म को देश को उन्नति के मार्ग पर ले जाने की । पाखण्ड , अंधविश्वास से छुटकारा दिलाने की ।
वो ऐसे सेकड़ो मुर्दो से ज्यादा अच्छे है , जो नीरस हो गए है , लेकिन दुःख इस बात का है , आर्य समाजी मित्र हिंदुत्व के जिसको वो आर्यत्व कहते है , उसके विरुद्ध खड़े होकर जिसको संवारना था उसी को बिगाड़ रहे है ।
और इसलिए मैं दोनों हाथ जोड़कर विनम्र विनती करूँगा , मेरी पोस्ट को पढ़िए विचार कीजिये , इसे किसने लिखा है ये मत पढ़िए ,इसमें क्या लिखा है ये पढ़िए ।
"दयानन्द " को आप जिन किताबो, जीवन चरित्र के माध्यम से जानते है , मैं उसी में दीखते विरोधाभाष को तो दिखा रहा हूँ ।
--- दयानन्द के बारे में एक बात बहुत बढ़ चढ़ के प्रचारित की गयी कि वो बहुत बड़े योगी थे । चलिए उनके उस योगी रूप के प्रचार के कुछ उदाहरण देखिये ।
1) गुप्त अभिप्राय का ज्ञान
"किसी मनुष्य को अपने पास आता देखकर ही स्वामी जी जान लेते थे , वह किस अभिप्राय से उनके पास आया है " ( पृष्ट 212)
2) मृत्यु की भविष्यवाणी
"लाहौर की स्तिथि के समय कुछ विधार्थी दयानन्द के पास संस्कृत पढ़ने आते थे ,उसमे एक गणपतिराय को दयानन्द ने कहा, तुम विवाह न करना , तुम्हारी उम्र 30 के अंदर है , और वो 28 में काल का ग्रास बन गया "( पृष्ट 401 )
3) शेर भी डर गया
" गंगा तट पर विचरते हुए वन में जा पहुंचे , वंहा सामने से एक सिंह अत दिखाई दिया ,वे सीधे चलते गए , वे सीधे चलते गए , और जब सिंह के निकट पहुचे तो सिंह ने मुह फेर लिया और जंगल में घुस गया " ( पृष्ट 404 )
---- ऐसी कुछ और भी भविष्यवाणी या गुप्त बाते दयानन्द के बारे में बताई गयी , जिसमे एक घटना है कि किसी को रस्ते में सांप दिखा तो , दयानन्द के पास पहुंचा तो दयानन्द ने खुद ही कह दिया , रास्ते में सांप दिखा क्या ? प्रमाण ध्यान नही है , एक भालू वाली घटना है ।
------ अब इसके विपरीत कुछ बाते देखिये ।
1) विषाक्त भोजन
"एक दिन एक मनुष्य भोजन और पान लेकर आया , दयानन्द ने भोजन नही किया , पान जैसे ही खोला , वो मनुष्य भाग गया ' बाद में ज्ञानत हुआ , कि पान में विष था " ( पृष्ट 193 )
2) पान में विष
" एक ब्राह्मण ने मूर्ति पूजा से रुष्ट होकर उन्हें पान में विष दे दिया था , उन्होंने न्यौली कर्म करके उसे शरीर से निकल दिया और स्वस्थ हो गए " ( पृष्ट 211 )
3) जहर मृत्यु का कारण
" महाराज दुग्ध पीकर पी कर सो गए , पर बीच में ही उदरशूल के कारन उनकी नींद भंग हो गयी । ( पृष्ट 651 )
( ये 27 सितम्बर की घटना है ,जिसके बाद एक महीने स्वामी जी की बहुत बुरी हालत हुयी और फिर मृत्यु हो गयी थी ।)
----- अब मेरे मित्रो अगर उनका महिमामण्डन जैसा कि ऊपर है , वो आते ही जान लेते थे , मौत तक की भविष्यवाणी कर देते थे , शेर उनसे डर जाता था , तो वो निचे जिन लोगो ने विषय दिया , उनके दिल की क्यों नही जान पाये ?
और उनकी मृत्यु के वक़्त इतनी बुरी हालात कैसे उनको पता नही लगी , ओरो की तो वो भविष्यवाणी कर देते थे ??
अब या तो ऊपर झूठा महिमामण्डन किया गया , या निचे गलत है , ये फैसला मैं आपके विवेक पर छोड़ता हूँ ।
क्रमश .....
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मुझे भी दयानन्द की जयजयकार करनी है
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कौन सच्चा कौन झूठा
------------------;------- लेखराम vs देवेन्द्रनाथ मुखोपाध्याय
जब मैं कहता हूँ , दयानन्द का झूठा , महिमामण्डन किया गया है तो मुझपर द्वेषी होने के आरोप लगते है , चलिए मैं इसके प्रमाण स्वयं इन लेखको के शोध से ही देता हूँ ।
लेखराम -- जिनको बहुत ही सम्मान की दृष्टि से आर्य समाज में देखा जाता है , उनकी लिखित जीवनी के बिना दयानन्द का कोई जीवन चरित्र पूरा नही होता , ऐसे प्रतिष्टित व्यक्ति को ही जब आर्य समाज और देवेन्द्र मुखोपधाय रचित जीवनी के संग्रहकर्ता गलत साबित कर देते है । तो दुसरो की क्या बिसात ??
और दुःख की बात ये है , देवेन्द्र मुखोपाध्याय वाली जीवनी में लेखराम को ही झूठा या आधी अधूरी जानकारी वाला साबित कर दिया है । और लेखराम अपना पक्ष रखने को जीवित नही बचे । वरना वो मुखोपाध्याय के झूठ से आपको परिचय करवाते । चन्द उदाहरण निचे देता हूँ ।
1) दयानन्द किसकी सन्तान
लेखराम अनुसार -- अम्बाशंकर जी
मुखोपाध्याय अनुसार -- करशन जी
अब भाईयो क्या इतने प्रतिष्टित विद्धवान स्वामी जी के पिता के बारे में बिना सम्पूर्ण जानकारी इकट्ठा किये कैसे निष्कर्ष पर पहुंच गए ??
2) अहमदाबाद में मनगढ़ंत शास्त्रार्थ ।
मुखोपाध्याय वाली जीवनी इस शास्त्रार्थ को झूठा और यतार्थ से दूर का बताती है । उसमे टिप्पणी में स्पष्ट लिखा है , ये सारा वृतांत ठीक नही है ,न तो स्वामी जी अहमदाबाद में किसी जज के यंहा ठहरे न उनके स्थान पर 200- 250 पण्डित इकट्ठा हुए ।
लेखराम वाली जीवनी में लिखा गया है , दयानन्द का 200-250 लोगो से शास्त्रार्थ हुआ , जब मूर्ति पूजा सिद्ध नही हुयी तो गालियां देने लगे ।
(अब स्वयं निर्णय कीजिये , किस तरह से जानबूझकर हिन्दुओ के प्रति झूठे शास्त्रार्थ रच दिए गए )
टाइम्स ऑफ़ इण्डिया में एक घटना का उल्लेख है ,जिसमे कुछ शास्त्रियों को विज्ञापन देकर बुलाया था पर वे नही आये ।
सन्दर्भ -- महर्षि का जीवन चरित्र
पृष्ट 311
3) झूठा सम्मान ।
लेखराम ने 11जून से 26 जून 1873 में के आसपास एक घटना का उल्लेख किया है - कलकत्ता से लौटते हुए स्वामी दुबारा आरा गए तो हरवंशलाल ने उनको बहुत सम्मान दिया और सेवा की |
जबकि मुखोपाध्याय कहते है वो डुमराऊँ के यंहा ठहरे थे , हरवंशलाल उनसे विरक्त हो गए थे । अब ऐसे झूठ महिमामण्डन पर कैसे श्रद्धा लाऊँ :(
पृष्ट 249
क्रमशः......😢
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मुझे भी "दयानन्द "की जय जयकार करनी है
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कोर्ट में हुयी जब "दयानन्द" की किरकिरी
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मित्रो चलिए एक उदाहरण और देता हूँ , दयानन्द का झूठा महिमामण्डन कैसे किया गया और कैसे एकतरफा मानसिकता से लिखी गया चरित्र चित्रण दिखाकर दयानन्द को किसी महापुरुष ऋषि महर्षि की तरफ दिखाया जाता है ।
जब कोई मुकदमा होता है तो उसके दो पक्ष होते है , ऐसे ही एक मुकदमे की बात उनके जीवन चरित्र में है । जिसमे सिर्फ दयानन्द का पक्ष लेखक ने लिखा है पर क्या करे मजबूर होकर न्यायालय का पक्ष भी रखना ही पड़ेगा तो आप खुद चिंतन कीजिये । दूसरे का पक्ष कितना सदृढ़ रहा होगा लेकिन उसका जिक्र नही किया गया बल्कि फिर भी उसको ही दोषी साबित करने की कोशिस की गयी है ।
-----> 1880 में मुंशी बख्तावर सिंह को वैदिक यन्त्रालय के प्रबन्धकर्ता से हटा दिया गया था और उसके बाद स्वामी जज को पता चला कुछ गड़बड़ है हिसाब किताब में । इसलिए उन्होंने 10 जनवरी 81 को बख्तावर सिंह को हिसाब समझाने के लिए पत्र लिखा ।
22 फ़रवरी को स्वामी जी ने सेठ निर्भयराम को पत्र लिखके कहा , पंचायत में निबटा दो तो ठीक नही तो केस करदो ।
25 फ़रवरी को बख्तावर सिंह स्वामी जी मिले तो स्वामी जी ने धमकी दी , मैं चुप नही बैठूंगा , बख्तावर सिंह ने कहा , आपस में सुलझा देंगे ।
पंचायत में भी बात नही बनी , तो दयानन्द ने सब-जज शाहजनहपुर में मुकदमा दायर कर दिया । 9 फ़रवरी 81 को दयानन्द का दावा खारिज हो गया । फिर दयानन्द और उनके समर्थको ने हाईकोर्ट में जाने की सोची पर नही गए ।
"और बख्तावर सिंह का कुछ भी न बिगाड़ सके । "
-----== अब मित्रो जो भक्ति से बाहर थोडा चिंतन करो तो पाओगे , यदि बख्तावर सिंह गलत होता तो क्यों वो मिलने जाता और क्यों कोर्ट दयानन्द के दावे को खारिज करती और क्यों दयानन्द हाईकोर्ट नही गया ।
इसके बावजूद बख्तावर सिंह को चोर की तरह पेश किया गया है । दयानन्द के इस चरित्र पर कैसे श्रद्धा लाऊँ :(
सन्दर्भ -- महर्षि दयानन्द का जीवन चरित्र ।
पृष्ट 588
देवेन्द्र मुखोपाध्य
------------ क्रमशः
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जब "दयानन्द" के भाषणों पर लगा था प्रतिबन्ध ।
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आप में से कई लोगो को ये शायद हैरानी होगी , लेकिन ये सच है । दयानन्द की सभाओ पर प्रतिबन्ध लगा दिया गया था । जो ईसाई मिडिया के दबाब में फिर हटाना पड़ा था ।
( खेर मित्रो उससे पहले एक बात बड़ी गहनता से विचार कीजिये । जब भी कोई इतिहास लिखा जाता है वो कभी निष्पक्ष नही होता , लेखक की अपनी मानसिकता उसमे परिलक्षित होती ही होती है , यही अकबर से लेकर ओरंगजेब या किसी और के साथ होता है तभी वो आज महान है , ठीक यही "दयानन्द" के साथ हुआ ।
दयानन्द के चरित्र का झूठा महिमामण्डन किया गया और आज के युवक जिनके लिये धर्म वही है जो उनको समझ आ जाये । न जाने ऐसे कितने लोग होंगे जो सच्चाई को जानते थे और उन्होंने विरोध किया होगा , उनकी अपनी ही औलादे आज उनके विरोधी से जा मिली है । )
21 दिसम्बर 1880 से कुछ दिन पहले से ये प्रतिबन्ध लगा था जो अप्रैल 1880 में ये प्रतिबन्ध हटाया गया । प्रतिबन्ध हटाने से पूर्व एक घण्टे दयानन्द से तत्कालीन मजिस्ट्रेट मिस्टर बाल ने उनसे बात की थी । दयानन्द ने फ्रीडम ऑफ़ स्पीच का हवाला दिया था और उनका प्रतिबन्ध के बाद पहला व्याख्यान विषय सृष्टि था ।
महर्षि दयानन्द का जीवन चरित्र के हवाले से जाए तो लेखक बहुत भर्मित है कंही इसके लिए पौराणिक को दोषी बताता है कंही मुहर्रम की छुटियों को , जो की लेफ्टिनेंट गवर्नर ने बताया ।
--- एक बात को ध्यान दीजिये ,कई जगह दयानन्द को महिमा मण्डित करने के लिए , ऐसे शब्दों का प्रयोग होता है , जैसे पौराणिकों में खलबली मच गयी आदि ।
ये सब दयानन्द के कद को बड़ा बताने की कोशिस है जिससे कोई सामान्य पाठक जल्द प्रभावित हो जाता है ।
क्रमश ..
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मुझे भी " दयानन्द" की जय जयकार करनी है
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दयानन्द एक बिगड़ैल शिष्य ।
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___ मित्रो मेरी मानसिकता गलत हो सकती है , लेकिन वो खुद तो नही बनी । मैं भी तो दयानन्द का अनुयायी था । आप इसको निष्पक्ष पढ़िए और विचार कीजिये , मैं गलत हूँ तो कृपया बिना हिचकिचाहट या संशय के मुझे मेरी गलती बताईये , मेरा भ्रम निकालिये और मुझे भी मेरी मानसिकता ठीक करने में मदद कीजिये , या स्वतः चिंतन कीजिये और निर्णय लीजिये ।
----> क्या दयानन्द अपने गुरु विरजानन्द को धमकाते थे ??
अब जिन्होंने ये जीवन चरित्र लिखा है , उन्होंने भक्त बनकर लिखा है , ज़रा इसको बिना अंधभक्त बनकर पढ़िए और बताईये , क्या यंहा स्पष्ट नही है कि दयानन्द अपने गुरु को न केवल धमकाते थे बल्कि उनके साथी भी उनकी तरफदारी करते थे ।
संदर्भ-- महर्षि दयानन्द का जीवन चरित्र
लेखक - श्री देवेन्द्रनाथ मुखोपाध्याय
प्रकाशक -- श्री घुड़मल आर्य धर्मार्थ न्यास
पृष्ट संख्या - 88
" एक दिन दयानन्द से दण्डी जी अप्रसन्न हो गए ,और उनके लाठी मारी ,जिससे दण्डी जी का हाथ दर्द करने लगा , तब दयानन्द ने उनसे कहा - "महाराज मुझे न मारा करे " मेरा शरीर वज्र के समान कठोर है , उस पर प्रहार करने से आपके कोमल हाथो को दर्द होगा , इस चोट का चिन्ह दयानन्द पर अंतिम समय तक रहा "
---- ऊपर भक्त बनके पढ़ेंगे तो सब सामान्य सा ही प्रतीत होगा , लेकिन ज़रा अंधभक्ति से बाहर निकलेंगे तो विचार कीजिये ।
1) ऐसी क्या गलती जो दयानन्द पर इतना गुस्सा आ गया
2) लाठी से मारने पर हाथ में दर्द हो सकता है पर ऐसा नही के मारने वाले को ज्यादा हो
3) दयानन्द ने दुबारा गलती न करने के बजाय ," मुझे न मारा करो " कहना , सलाह थी या धमकी ??
4) चोट इतनी लगी की वज्र जैसे शरीर पर निशान बन गया ।
(साफ़ है कि दयानन्द को भी गुस्सा आ गया था और इतनी भयंकर चोट से खफा अपना रोष प्रकट किया । )
---->> इसी पृष्ट पर एक और उदाहरण देखिये ।
" एक बार फिर दण्डी ने अप्रसन्न हो दयानन्द को सोटा मारा , नैनसुख जडीए ने दण्डी से कहा , दयानन्द सन्यासी हे , उसे न मारना चाहिए , तब दण्डी ने कहा ' भविष्य में प्रतिष्ठा के साथ पढ़ाऊंगा "
अब मित्रो ये देखिये , दयानन्द का मित्र धमकाता है और दण्डी बेचारे डर भी जाते है , वरना क्या उन्हें पता नही की वो क्यों किसलिए मार रहे है , गुरु नाकार तो नही हो सकता इतना ।
--->> आज्ञाकारी या मनमौजी दयानन्द
इसी के अगले पृष्ट 89 पर एक घटना का जिक्र हुआ है । दण्डी जी ने आज्ञा दे रखी थी कि पाठशाला में विधार्थियो के अतिरिक्त कोई न आने पावे , लेकिन दयानन्द ने खुद ही फैसला ले लिया और एक व्यक्ति को ले आये , दण्डी को फिर गुस्सा आया , दयानन्द की ड्योढ़ी बन्द कर दी , दयानन्द ने माफ़ी मांगी नही ,पर स्वीकार न हुई
फिर आ गया वही नैनसुख उसने बोला तो बेचारे दण्डी को ड्योढ़ी खोलनी पड़ी । ( ड्योढ़ी बन्द यानी स्कुल से निकाल दिया , खोलनी यानी फिर अनुमति प्रदान की , वैसे वो 2 या 2 बार से ज्यादा स्कुल से निकाले गए )
खेर ऐसे कई घटनाये और है और होंगी , लेकिन इन सब घटनाओ से मुझे तो कंही भी उनके चरित्र में अच्छे शिष्य के लक्षण नही दिखाई देते , न आज्ञाकारी के , न शिष्ट सभ्य के ।
उनके गुरु खुद भी दुर्गापाठ करते थे , और ऐसे भी जिक्र मिलते है वो गुरु को ज्ञान देने लगते थे । और ये कोई स्कुल की नही , 30 - 35 साल की उम्र की बात है ।
अब मुझे कृपया बताये , मैं कैसे श्रद्धा रखूं , जबकि अभी ये पहली पोस्ट है और मैं अनेक ऐसी शंका आपके सम्मुख रखने वाला हूँ ।
धन्यवाद
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मुझे भी "दयानंद" की जय जयकार करनी है
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अभी एक मित्र की पोस्ट सामने आ गयी । विषय था -- नील गाय , की हत्या का आदेश , और वो आर्य समाजी मित्र उसको सही ठहराने के लिए अपने पक्ष को रख रहे थे ।
उनके पक्ष से मैं बिल्कुल भी सहमत नही हो सकता , व्यहारिक रूप से एक बार मान भी ले पर आध्यत्मिक रूप से तो बिल्कुल भी नही । खेर यदि कोई चाहे तो मैं इस विषय पर अपना पक्ष रखने को तैयार हूँ । लेकिन मुझे परेशानी उनके कमेंट्स से होती है , जिसमे उन्होंने और उनके मित्रो ने हिन्दू मान्यता को निचा दिखाने की भरसक कोशिस की गयी ।
विषय कुछ और , निशाना हमारे इष्ट , वराह अवतार , गणेश आदि , मैं इन विषयो पर भी वो अगर चर्चा चाहे तो उन्हें आमन्त्रित करता हूँ । मुझे लगता है उनकी इस विचारधारा के लिए अगर कोई जिम्मेदार है तो सिर्फ और सिर्फ "दयानन्द "है ।
दयानन्द के लिए अंधभक्ति --- दयानन्द अगर सही है , तो फिर हिन्दू धर्म बिल्कुल गलत है , और यदि हमारी मान्यता सही है , तो दयानन्द बिल्कुल गलत । मैं अगले कुछ दिन एक बार फिर से खुद को पूरी तरह गलत मानते हुए , सिर्फ दयानन्द को सही मानते हुए प्रश्न करूँगा ।
उम्मीद करूँगा , मुझे गलत साबित करके आर्य समाजी विद्धवान मुझे भी वैदिक राह पर चलने में मदद करेंगे । मेरी जिज्ञाषा 3 चरणों में होगी ।
1) दयानन्द चरित्र -- वन्ही कमेंट्स में उनको महाभारत काल के बाद का सबसे महान बताया गया है , मैं उनके चरित्र के जो पक्ष उजागर करूँगा वो आर्य समाज द्वारा ही मुझे पता चले है और उनको जानने के बाद मुझे वो महान तो छोड़िये खास भी प्रतीत नही होते ।
2) दयानन्द भाष्य --- उनके भाष्य में ऐसे उटपटांग अर्थ मुझे मिलते है कि उनको ज्ञानी नही मान पाया ।भाष्य पर मेरी शंका भी आपके सामने रखूंगा ।
3) आर्य समाज की दिशा दशा -- आर्य समाज जो हिन्दू सुधारवादी होने का दावा करते है , मुझे हिंदुत्व की जड़े खोदने वाले , हिन्दुओ को सबसे ज्यादा नुकसान पहुचाने वाले प्रतीत होते है ।
>>>>> मैं इन्ही तीनो विषयो पर अपनी भ्रम शृंखला आपके सम्मुख रखूंगा । मैं इनको अपने वहम भ्रम पण्डा बुद्धि सब मानकर ही चलूँगा ।
आपसे विनम्रता से दोनों हाथ जोड़कर निवेदन है कि मैं गलत राह पर हूँ तो मेरे ये भ्रम दूर कीजिये । इससे सबका फायदा होगा , और हम सार्थक वार्ता करके कई लोगो को सत्य से भी अवगत करा सकते है ।
धन्यवाद ......... क्रमशः
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गुरु विरजानन्द से क्या सिखा ?
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दयानन्द ने गुरु विरजानन्द से क्या सिखा , मुझे इस बारे में उत्सुकता होने लगी है । व्याकरण संस्कृत आदि सीखी तो इसका अर्थ ये हुआ , पहले वो इनमे पारंगत नही थे ? तो जो उस वक़्त से पहले उन्होंने अध्ययन किया , 1855 मे टेहरी आदि में जो उन्होंने तन्त्र शक्ति पर आधारित ग्रन्थ पढ़े , वो उनको कैसे पूरी तरह समझ आये होंगे ??
वेदो और बाकि ग्रन्थो को विरजानन्द ने पढ़ाया या नही , इस बारे में मुझे भी सपष्ट जानकारी नही मिली । अष्टाध्यायी और महाभाष्य लेकिन विरजानन्द ने पढ़ाये , इस बारे मे पता लगता है ।
---- विरजानन्द मूर्ति पूजक थे ।
पृष्ट 88 , पर संग्रहकर्ता ने लिखा है ,पण्डित ब्रह्माशंकर ने लेखक देवेन्द्र बाबू से स्वयं कहा कि विरजानन्द दुर्गापाठ करते थे ।
---- तब दयानन्द शिवभक्त थे ।
और विरजानन्द के पास से जाने के बाद अप्रैल- मई 1863 ( यानी मृत्यु से लगभग 20 साल पहले ) जब उनकी आयु 40 साल के आसपास होनी चाहिए , तब सुंदरलाल को दयानन्द ने शिवलिंग की पूजा और दुर्गाष्टक का पाठ करने का उपदेश दिया था और अपने गले से रुद्राक्ष की माला उतारकर दे दी थी ।( प्रमाण पृष्ट 93- 94 )
इन दोनों घटनाओ से एक बात स्पष्ट होती थी , उनके गुरु ने भी तो वेद पढ़े होंगे , संस्कृत उनको भी आती होगी , लेकिन उन्होंने न तो दयानन्द को न स्वयं ही मूर्ति पूजा आदि का खण्डन किया न सिखाया ।
---- गुरूजी ने सिखाया
पृष्ट 501 में विरोधाभाष नजर आता है , जब दयानन्द किसी के पूछने पर बताते है ,प्रथम तो मुझे ही विचार हुआ था ,कि मूर्ति पूजा केवल अविद्या अंधकार है , परन्तु गुरूजी भी इसका खण्डन किया करते थे , कोई हमारा ऐसा शिष्य हो जो इस अंधकार को दूर करे ।
अब ये आश्चर्य जनक है कि नही , एक तरफ गुरु के दुर्गापाठ होने के प्रमाण मिलते है , दूसरी तरफ गुरु जी से विदा लेने के पश्च्यात भी शिवलिंग और दुर्गाष्टक के लिए ओरो को प्रेरित करना रुद्राक्ष की माला धारण करना और 1879 में कहना की सब गुरु आज्ञा से किया ।
यदि गुरु आज्ञा से ही किया होता तो शिक्षा उपरांत भी शिवपूजक क्यों बने रहे ??
क्यों रुद्राक्ष धारण करते थे ??
क्यों गुरु खुद दुर्गा पूजक थे ??
क्यों दयानन्द से पहले कोई मूर्ति पूजा खण्डन में विरजानन्द का शिष्य आया ?
फिर ये खण्डन किस आयु में किसकी प्रेरणा से आया , ये कोतूहल का विषय है , खासकर तब जब बचपन से ही शिवभक्ति से या मूर्ति पूजा से वो विरक्त हो गए थे ।
क्या ये इतिहास भरोसे लायक है ??\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\
राजीव शर्मा को ये मुगालता उनके मित्रों ने बहुत भयंकर तरीके से
पाल दिया है कि वे बहुत बड़े समीक्षक और विद्वान हैं, यहाँ तक तो
ठीक है पर अब खुद को अंतर्यामी भी समझने लगे हैं | मैं कहूँगा कि
आप गाय पालिए पर मुगालता मत पालिए |
इनका आक्षेप ये है कि चूँकि ऋषि दयानन्द के गुरु विरजानंदजी
दुर्गापाठ करते थे इसलिए वे ऋषिवर को मूर्तिपूजा खंडन की शिक्षा नही
दे सकते और स्वयं श्री महाराज भी शिवभक्त थे तब ये मूर्तिपूजा विरोध
कहाँ से आया ? तो सुनिए श्रीमानजी विरजानन्द हों या दयानन्द ये सभी
पौराणिक परिवार से थे, इसलिए दुर्गापाठ या शिवभक्ति उनको परम्परा
से मिली थी | जैसे आम हिन्दू जिसने कभी वेद देखे तक और पुराण
पढ़े तक नही पर वो इनपर श्रद्धा रखता है क्यूंकि ये संस्कार उसे परम्परा
से मिले हैं | अब आपने कहा कि क्या विरजानन्दजी ने वेद नही पढ़े थे?
तो भाई विरजानन्दजी बचपन से अंधे थे, उनको भला वेद कौन पढ़ता?
उन्होंने तो व्याकरण सुनकर कंठस्थ करी थी | और अष्टाध्यायी उन्होंने
पढ़ी तो लौकिक संस्कृत के ग्रथ यथा कौमुदी इत्यादि में उनकी अश्रद्धा
होगयी, और जान गए कि ऋषिकृत ग्रन्थ ही प्रमाणिक हैं, और वो
अक्सर कौमुदी के लेखक की कठोर निन्दा करते थे, और दयानन्द
की तर्कशक्ति और सामर्थ्य को देखकर ही उन्होंने दयानन्द से
पाखण्ड-खंडन को कहा था, क्यूंकि मार्ग वो दिखा चुके उसपर चलना
दयानन्द को था, तो जब श्री महाराज ने अपने गुरु के दिए व्याकरण
अस्त्र का प्रयोग करना शुरू किया तब वेद के रहस्य उजागर हो गए
ऋषि दयानन्द ने अपनी पारिवारिक मान्यताओ को तिलांजलि देकर
एकमात्र वेद का जयघोष किया |
Prabhat Singh Chauhan
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गवरगण्ड दयानंद की पोप लीला
दयानंद जैसा धुर्त जो खुद की कही बात से पलट जाए पुरे विश्व में नहीं मिलेगा
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स ब्रह्मा स विष्णुः स रुद्रस्स शिवस्सोऽक्षरस्स परमः स्वराट्।
स इन्द्रस्स कालाग्निस्स चन्द्रमाः।।७।। -कैवल्य उपनिषत्।
भावर्थ : सब जगत् के बनाने से ‘ब्रह्मा’, सर्वत्र व्यापक होने से ‘विष्णु’, दुष्टों को दण्ड देके रुलाने से ‘रुद्र’, मंगलमय और सब का कल्याणकर्त्ता होने से ‘शिव’,
जो सर्वत्र व्याप्त अविनाशी, स्वयं प्रकाशस्वरूप और प्रलय में सब का काल और काल का भी काल है, इसलिए परमेश्वर का नाम ‘कालाग्नि’ है।।७।।
प्रथम समुल्लास मे ही फिर आगे लिखा है कि-
इसलिए सब मनुष्यों को योग्य है कि परमेश्वर ही की स्तुति, प्रार्थना और उपासना करें, उससे भिन्न की कभी न करें। क्योंकि ब्रह्मा, विष्णु, महादेव नामक पूर्वज महाशय विद्वान्, दैत्य दानवादि निकृष्ट मनुष्य और अन्य साधारण मनुष्यों ने भी परमेश्वर ही में विश्वास करके उसी की स्तुति, प्रार्थना और उपासना करी, उससे भिन्न की नहीं की। वैसे हम सब को करना योग्य है।
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समीक्षा : वाह रे गवरगण्ड दयानंद स्वयं ही प्रमाण के साथ ब्रह्मा, विष्णु, शिव को ईश्वर बताता है और थोड़ा आगे बढ़ा नही की अपनी धूर्तता दिखाते हुए उनको पूर्वज विद्वान आदि बताने लगा । इसमें कोई प्रमाण तो दिया होता कि यह मनुष्य थे, और अगर प्रमाण नही मिला था तो कोई उल्टि सिधि संस्कृत ही गढ़ ली होती तेरे नियोगी चम्चे तेरे इस गपोडे को भी पत्थर कि लकिर समझ लेते ।
वैसे ये तेरे जैसे धुर्त को ही शोभा देता है कि ब्रह्मादिक नाम ईश्वर के बताकर फिर उन्हे पूर्वज बता दिया,
और तो और ये अर्थ भी तेरा गलत ही है सही अर्थ इस प्रकार है कि वो ब्रह्मारूप होकर जगत की रचना करता, विष्णु रूप हो पालन करता रूद्ररूप हो दुष्टों को कर्मफल भुगाकर रूलाता शिव ही मंगल करता है वो ही स्वराट इन्द्र चन्द्रमा है। और कालाग्निरूप धारण कर प्रलय करता है
यह सब देवता उसी के रूप है नहीं तो तुने बताया क्यो नही की यह तीनों किसके पुत्र थे
जो कहता की स्वयं उत्पन्न हो गए तो तेरा सृष्टि क्रम जाता है कि माता पिता के बिना कोई मनुष्य उत्पन्न नहीं होता
यही तो तेरी भंग की तंरग है जो जीवन चरित्र में लिखा है कि मुझे भंग पीने की ऐसी आदत थी कि दुसरे दिन ही होश आता था
भंगेड़ी कही का...
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दयानंदभाष्य खंडनम् (भूमिका)
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दयानंद ने अपनी मृत्यु से कुछ महीनों पहले सन् 1882 में इस ग्रन्थ के दूसरे संस्करण में स्वयं यह लिखा-
नियोग्
जिस समय मैंने यह ग्रन्थ ‘सत्यार्थप्रकाश’ बनाया था, उस समय और उस से पूर्व संस्कृतभाषण करने, पठन-पाठन में संस्कृत ही बोलने और जन्मभूमि की भाषा गुजराती होने के कारण से मुझ को इस भाषा का विशेष परिज्ञान न था, इससे भाषा अशुद्ध बन गई थी। अब भाषा बोलने और लिखने का अभ्यास हो गया है। इसलिए इस ग्रन्थ को भाषा व्याकरणानुसार शुद्ध करके दूसरी वार छपवाया है। कहीं-कहीं शब्द, वाक्य रचना का भेद हुआ है सो करना उचित था, क्योंकि इसके भेद किए विना भाषा की परिपाटी सुधरनी कठिन थी, परन्तु अर्थ का भेद नहीं किया गया है, प्रत्युत विशेष तो लिखा गया है। हाँ, जो प्रथम छपने में कहीं-कहीं भूल रही थी, वह निकाल शोधकर ठीक-ठीक कर दी गई है।
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समीक्षा : इस लेख से पहला सत्यार्थ प्रकाश गुजराती भाषा मिश्रित विदित होता है किन्तु इसमें कोई भी गुजराती भाषा शब्द पाया नहीं जाता भला वह तो अशुद्ध हो चुका पर अब यह तो दयानंद के लेखानुसार सम्पूर्ण ही शुद्ध है। क्योंकि इसके बनाने से पूर्व न तो स्वामी जी को लिखना ही आता था न शुद्ध भाषा ही बोलनी आती थी इससे यह भी सिद्ध होता है कि इस सत्यार्थ से पूर्व रचित वेदभाष्यभूमिका तथा यजुर्वेदादि भाष्यों की भाषा भी अशुद्ध होगी क्योंकि शुद्ध भाषा का ज्ञान तो दयानंद को इस सत्यार्थ प्रकाश को लिखने के समय हुआ है ।
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थियोसोफिकल सोसायटी आफॅ द आर्य समाज (Theosophical Society of the Arya Samaj)
स्वामी दयानंद ईसाई मिशनरी के सबसे बड़े ऐजेंट(दल्ले) ।
जी हाँ आपने सही पढ़ा स्वामी दयानंद भारत में ईसाई मिशनरी के सबसे बड़े दल्लों में से एक थे।
स्वामी दयानंद न केवल थियोसोफिकल सोसायटी के अहम सदस्य थे बल्कि थियोसोफिकल सोसायटी के संस्थापकों को पत्र लिखकर उसे भारत में लाने वाले भी दयानंद ही थे १८७८ से लेकर अपनी मृत्यु १८८३ तक स्वामी जी ने ईसाई मिशनरीओं के साथ मिलकर न केवल काम किया। बल्कि भारत में ईसाई धर्म के फलने फूलने के लिए पैर जमाने में पुरा सहयोग दिया
स्वामी दयानंद कब और कैसे थियोसोफिकल सोसायटी के साथ जुड़े आपको विस्तार में बताते हैं
ये बात है सन १८७५ की जब स्वामी जी पंडित कृपाराम शास्त्री से भेंट करने के लिए देहरादून आये हुए थे वहीं पर दयानंद ने ईसाई मिशनरी के दो धर्मप्रचारकों मैडम हैलना पैट्रोवना ब्लैवाटस्की और कर्नल हेनरी स्टील आल्काट के बारे में सुना और उनसे मिलने का फैसला किया
इसके बाद स्वामी दयानंद देहरादून से सहारनपुर गए वहाँ उन्होंने थियोसोफिकल सोसायटी के संस्थापक मैडम ब्लैवाटस्की और कर्नल आल्काट से भेंट की।
स्वामी दयानंद ने उन दोनों के कार्यों की प्रशंसा की और सनातन धर्म के विरुद्ध लड़ाई में उनका सहयोग मांगा
फिर दयानंद इन दोनों के साथ मेरठ गए कुछ दिनों इन दोनों के साथ धर्म प्रचार किया उसके बाद ये दोनों मुम्बई चले गए जहाँ दयानंद ने इनकी सहायता से १० अप्रैल १८७५ में आर्य समाज की स्थापना की
ईसाई मिशनरी के साथ मिलकर काम करने से स्वामी दयानंद को ब्रिटिश सरकार का भी अच्छा खासा समर्थन मिलने लगा ।
५-६ महिने दयानंद के साथ धर्म प्रचार करने के बाद कर्नल आल्काट और मैडम ब्लैवाटस्की न्यूयॉर्क के लिए चले गए जहाँ उन्होंने थियोसोफिकल सोसायटी की स्थापना की
१३ दिसम्बर १८७८ में स्वामी दयानंद ने कर्नल आल्काट और मैडम ब्लैवाटस्की को पत्र लिखकर थियोसोफिकल सोसायटी का प्रधान कार्यालय मुंबई में लाने का निमंत्रण दिया
स्वामी दयानंद के निमंत्रण पर फरवरी १८७९ में सोसाइटी का प्रधान कार्यालय न्यूयार्क से मुम्बई में लाया गया।
और आर्य समाज कार्यालय का नाम बदल कर "थियोसोफिकल सोसायटी आफॅ द आर्य समाज (Theosophical Society of the Arya Samaj)" रखा गया
१८७९ में ही स्वामी दयानंद थियोसोफिकल सोसायटी के सदस्य बने जिसका प्रमाण स्वामी दयानंद का हस्ताक्षर किया हुआ वो पत्र है जो मैंने पोस्ट के साथ Attached किया हैं १८७९ से लेकर १८८६ तक थियोसोफिकल सोसायटी और आर्य समाज ने साथ में काम किया और इतने समय में दयानंद की सहायता से थियोसोफिकल सोसायटी ने लाखों हिन्दुओं का धर्म परिवर्तन कर उन्हें ईसाई बनाया
दयानंद ने थियोसोफिकल सोसायटी के लिए यह कार्य कैसे किया वो भी समझ लिजिए
दयानन्द सरस्वती के बारे में क्वीन्स कॉलेज के प्राचार्य रुडॉल्फ होर्नले (Rudolf Hoernley) ने यह बात लिखी —
दयानन्द हिंदुओं के मन में यह बात भर देना चाहते हैं कि आज का हिंदूधर्म, वैदिक हिन्दू धर्म के पूर्णतया विपरीत है, और जब यह बात हिन्दुओं के मन में बैठ जायेगी तो वे तुरंत हिंदूधर्म का त्याग कर देंगे; पर तब दयानन्द के लिए उन्हें वैदिक स्थिति में वापस ले जाना सम्भव न होगा, ऐसी स्थिति में हिंदुओं को एक विकल्प की खोज होगी जो उन्हें हिंदू से ईसाई धर्म की ओर ले जायेगी।
स्रोत: The Christian Intelligence, Calcutta, March 1870, p 79 and A F R H quoted in The Arya Samaj by Lajpat Rai, 1932, p 42 quoted in Western Indologists A Study in Motives.htm, Purohit Bhagavan Dutt
स्वामी दयानंद और थियोसोफिकल सोसाइटी इसी प्रकार काम करती थी दयानंद हिन्दुओं के मन मे ये बात भर देते थे कि आज का हिंदूधर्म, वैदिक हिन्दू धर्म के पूर्णतया विपरीत है, और जब यह बात हिन्दुओं के मन में बैठ जाती तो उनमें से कुछ आर्य समाज से जुड़ जाते और बाकीयों को थियोसोफिकल सोसायटी के धर्म प्रचारक ईसाई बना देते । बदले में स्वामी दयानंद और आर्य समाज को ब्रिटिश सरकार का समर्थन मिलता
जिस किसी भी आर्य समाजी को मेरी बातों पर अंश मात्र भी संदेह हो कि दयानंद ईसाई मिशनरी के ऐजेंट( अर्थात दलाल) थे वो कृपया थियोसोफिकल सोसायटी की साइट पर जाकर चेक करें और साथ में उस पत्र की भी जांच कर लें जो थियोसोफिकल सोसायटी की ओर से जारी किया गया जिस पर दयानंद के हस्ताक्षर हैं
आर्य समाज किस प्रकार थियोसोफिकल सोसायटी से जुड़ा हुआ था ये जानने के लिए आप गूगल पर जाकर सिर्फ ये टाइप करें
Theosophical Society of the Arya Samaj
और यदि इसमें अब भी किसी को किसी प्रकार कोई संदेह हो कि दयानंद थियोसोफिकल सोसायटी के सदस्य थे या नहीं तो वो जाकर दयानंद की १८८२ में तैयार कराई वसीयत के बारे में पढे । स्वामी दयानंद ने अपनी वसीयत जो कि उन्होंने मेरठ में पंजीकृत कराईं थी जिसमें कुल १८ लोग थे जिन्हें दयानंद ने अपनी अंत्येष्टि करने तथा निजी वस्त्र, पुस्तक , मंत्रालय आदि का अधिकार दिया था जिसमें थियोसोफिकल सोसायटी के संस्थापक कर्नल आल्काट और मैडम ब्लैवाटस्की का भी नाम है
मुझे लगता है अपनी बात को सिद्ध करने के लिए अब मुझे और कुछ लिखने की आवश्यकता नहीं है दयानंद की ये वसीयत ही ये सिद्ध कर देती है ईसाई मिशनरीयों के साथ दयानंद के कितने अच्छे और गहरे संबंध थे
जो काम ईसाई मिशनरी पिछले १५० सालों में न कर सकी दयानंद के समर्थन से मात्र ७ वर्षों मे ईसाई मिशनरी के धर्म प्रचारको ने लाखों सनातनीयों का धर्म परिवर्तन कर उन्हें ईसाई बनाया बडे आश्चर्य कि बात है कि स्वंय को वैदिक कहने वाले दयानंद को ईसाई मिशनरीयों के साथ मिलकर धर्म प्रचार करने में सनातन धर्म के टुकडे करने में तो कोई परहेज नही था पर अपने हिन्दु भाई आँखों मे खटकते थें ऐसा शायद इसलिए क्योकी स्वामी दयानंद और ईसाई मिशनरी का उद्देश्य एक ही था किसी भी प्रकार सनातन संस्कृति को पुरी तरह से समाप्त करना
शायद यही कारण रहा कि दयानंद ने अपने तथाकथित ग्रंथ के प्रथम संस्करण में १८७५ से लेकर १८८३ तक केवल सनातन धर्म की ही आलोचना करी है सत्यार्थ प्रकाश के प्रथम संस्करण में जो वैदिक-यंत्रालय प्रयाग में छापी गई थी उसमे दयानंद की मृत्यु (३० अक्टूबर १८८३ ई०) तक केवल ११ समुल्लास ही छपे थे । जिसमें केवल सनातन धर्म की ही आलोचना करी गई थी ईसाई या मुस्लिम मत के खिलाफ एक शब्द नहीं लिखा था शेष ३ समुल्लास उनके निधन के बाद १८८४ में वैदिक-यंत्रालय प्रयाग द्वारा दुसरे संस्करण मे छापा गया।
ये पोस्ट उन मूर्खों के मुहँ पर तमाचा है जो दयानंद को वैदिक धर्म का प्रचारक और हिन्दुओं का हितैषी बोलते हैं जबकि सत्य तो यह है कि दयानंद जैसा स्वार्थी, निच , कपटी और गद्दार व्यक्ति जो अपने देश, धर्म अपने भाई बंधुओं का नहीं हुआ पूरे संसार में नहीं मिलेगा
दयानंद का केवल एक ही उद्देश्य था सनातन धर्म को तोड के एक नया धर्म बनाना ।
मुझे लगता कि अब ये बात पूरी तरह से साफ हो चुकी है कि दयानंद ईसाई मिशनरी के बहुत बड़े ऐजेंट थे
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दयानंदभाष्य खंडनम् ✴✴
ये देखिए इस धूर्त को सत्यार्थ प्रकाश के अपने एकादश समुल्लास में ये बोलता है कि नानक जी को ज्ञान नहीं था
अब ज्ञान था या नहीं था मैं इस चक्कर में नहीं पडना चाहता।
परन्तु दुसरो का अपमान करने वाला , दुसरो को मुर्ख समझने वाला स्वयं कितना ज्ञानी है यह जानना जरूरी हो जाता है
आइए देखते है स्वामी जी कितने समझदार मतलब ज्ञानी थे उन्हीं के शब्दों में पढ़िए
अ) सत्यार्थ प्रकाश के नवम समुल्लास में स्वामी जी कहते हैं कि
आसमान का जो ये नीला रंग है वो आसमान में उपस्थित पानी की वजह से है जो वर्षता है सो वो नीला दिखता है
वो बात अलग है कि स्वामी जी की बुद्धि यही तक काम करती थी उन्होंने ये भी नहीं सोचा कि अगर पानी की वजह से आसमान नीला दिखाता है तो फिर बादलों में तो लबालब पानी भरा होता है फिर वो काले सफेद क्यों होते हैं
वो बात अलग है कि स्वामी जी को ये भी नहीं मालूम था कि पानी स्वयं रंगहीन हैं वो दुसरे के रंग में क्या परिवर्तन करेगा
वो बात अलग है कि स्वामी जी को यह भी नहीं पता था कि आसमान का नीला रंग सूर्य से आने वाली प्रकाश का पृथ्वी के वायुमंडल में उपस्थित गैसीय अणुओं से टकराने के कारण प्रकाश के परावर्तन के कारण दिखाई देता है
और यही प्रक्रिया समुद्र के जल के साथ होती है
ब) स्वामी जी की बुद्धि का एक नमूना और देखिए
स्वामी जी सत्यार्थ प्रकाश के अष्टम समुल्लास में लिखते हैं कि सूर्य, चन्द्रमा, तारे आदि जितने भी गोल पिण्ड, ग्रह आदि है उन सब पर मनुष्यआदि प्रजा रहती है
स्वामी जी को तो एक खगोलीय वैज्ञानिक होना चाहिए था क्या दिमाग पाया है सरकार बेकार में ही करोड़ों अरबों डॉलर सिर्फ ये जानने के लिए बेकार में खर्च कर देती है कि पडोसी ग्रह पर जीवन है कि नहीं ......
काश वैज्ञानिकों ने सत्यार्थ प्रकाश पढ़ी होती तो उनके ना केवल करोड़ों अरबों डॉलर का धन बचता साथ ही कई वर्षों का समय भी बेकार के प्रयोग में नहीं खराब होता
कमाल है यार एक अज्ञानी दुसरे की समझ पर उंगली उठा रहा है अपनी गिरेबान में ना झांककर उल्टा अपने एकादश समुल्लास में कहते हैं कि नानक जी को ज्ञान नहीं था
अरे स्वामी जी तो यही बता दीजिए की आपको क्या ज्ञान था पहले अपने आपको
ही देख लेते नानक जी का अपमान क्यों किया।
किसी ने सत्य ही कहा है एक मुर्ख को सारी दुनिया मुर्ख ही लगती है
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दयानंदभाष्य खंडनम् ✴✴
ये देखिए इस धूर्त को सत्यार्थ प्रकाश के अपने एकादश समुल्लास में ये बोलता है कि नानक जी को ज्ञान नहीं था
अब ज्ञान था या नहीं था मैं इस चक्कर में नहीं पडना चाहता।
परन्तु दुसरो का अपमान करने वाला , दुसरो को मुर्ख समझने वाला स्वयं कितना ज्ञानी है यह जानना जरूरी हो जाता है
आइए देखते है स्वामी जी कितने समझदार मतलब ज्ञानी थे उन्हीं के शब्दों में पढ़िए
अ) सत्यार्थ प्रकाश के नवम समुल्लास में स्वामी जी कहते हैं कि
आसमान का जो ये नीला रंग है वो आसमान में उपस्थित पानी की वजह से है जो वर्षता है सो वो नीला दिखता है
वो बात अलग है कि स्वामी जी की बुद्धि यही तक काम करती थी उन्होंने ये भी नहीं सोचा कि अगर पानी की वजह से आसमान नीला दिखाता है तो फिर बादलों में तो लबालब पानी भरा होता है फिर वो काले सफेद क्यों होते हैं
वो बात अलग है कि स्वामी जी को ये भी नहीं मालूम था कि पानी स्वयं रंगहीन हैं वो दुसरे के रंग में क्या परिवर्तन करेगा
वो बात अलग है कि स्वामी जी को यह भी नहीं पता था कि आसमान का नीला रंग सूर्य से आने वाली प्रकाश का पृथ्वी के वायुमंडल में उपस्थित गैसीय अणुओं से टकराने के कारण प्रकाश के परावर्तन के कारण दिखाई देता है
और यही प्रक्रिया समुद्र के जल के साथ होती है
ब) स्वामी जी की बुद्धि का एक नमूना और देखिए
स्वामी जी सत्यार्थ प्रकाश के अष्टम समुल्लास में लिखते हैं कि सूर्य, चन्द्रमा, तारे आदि जितने भी गोल पिण्ड, ग्रह आदि है उन सब पर मनुष्यआदि प्रजा रहती है
स्वामी जी को तो एक खगोलीय वैज्ञानिक होना चाहिए था क्या दिमाग पाया है सरकार बेकार में ही करोड़ों अरबों डॉलर सिर्फ ये जानने के लिए बेकार में खर्च कर देती है कि पडोसी ग्रह पर जीवन है कि नहीं ......
काश वैज्ञानिकों ने सत्यार्थ प्रकाश पढ़ी होती तो उनके ना केवल करोड़ों अरबों डॉलर का धन बचता साथ ही कई वर्षों का समय भी बेकार के प्रयोग में नहीं खराब होता
कमाल है यार एक अज्ञानी दुसरे की समझ पर उंगली उठा रहा है अपनी गिरेबान में ना झांककर उल्टा अपने एकादश समुल्लास में कहते हैं कि नानक जी को ज्ञान नहीं था
अरे स्वामी जी तो यही बता दीजिए की आपको क्या ज्ञान था पहले अपने आपको
ही देख लेते नानक जी का अपमान क्यों किया।
किसी ने सत्य ही कहा है एक मुर्ख को सारी दुनिया मुर्ख ही लगती है
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दयानंदभाष्य खंडनम् -५ ✴✴
स्वामी जी कितने महान थे....
जहाँ जिस श्लोक में नियोग की गन्ध तक नहीं होती थी पहले तो वहाँ नियोग स्वयं गढ़ते थे फिर उसमें ११, ११ वाला तडका दे मारते थे। इसके बाद ही उसे मुर्ख समाजीयो के सामने परोसते थे 😂😂😂😂
आइए स्वामी जी की धूर्तता का एक नमूना दिखाता हूँ आपको
सत्यार्थ प्रकाश चतुर्थ संमुल्लास:-
प्रोषितो धर्मकार्याथ प्रतिक्षयोष्टौ नरः समाः ।।
विद्यार्थ षड्यशसोर्थ वा कामार्थत्रीस्तुवत्सरान् ।।
मनुस्मृति ( 9/ 75 )
सत्यार्थ प्रकाश के चतुर्थ संमुल्लास मे दयानन्द जी ये इसका रेफरेन्स ( 9/76) मे दे रखा है खैर ये कोई मुद्दा नही है
आते है मुद्दे पर
स्वामी जी अपनी पुस्तक मे इसका अर्थ लिखते है की
" स्त्री । यदि पुरुष् धर्म कार्य के उद्देश्य से परदेश गया है तो 8 वर्ष , विद्या या कीर्ति के लिए गया है तो 6 वर्ष , और धन इत्यादि कमाने गया है तो 3 वर्ष उसकी राह देखे । उसके पश्चात नियोग करके संतान उत्त्पत्ति कर ले ।
जब विवाहित पति आवे तब नियुक्त पुरुष छूट जावे ।।
जबकि मनुस्मृति मे लिखा है ।
"पति के धर्मकार्य , विद्या-यश प्राप्ति तथा व्यापार के लिए विदेश जाने पर पत्नी को क्रमशः आठ , छह और तीन वर्षो तक उसकी प्रतीक्षा करनी चाहिए"
इस श्लोक मे कही भी नियोग की कोई बात ही नही कहीं गई ।।
क्या स्वामी जी इन श्लोकों मे अपने आप से नियोग शब्द जोड़ देते है ???
इसके पश्चात स्वामी जी ने एक और श्लोक लिखा है ।।
वन्ध्याष्टमेधिवेद्याब्दे दशमे तु मृतप्रजा ।
एकादशे स्त्री जननी सद्यस्त्वप्रियवादिनि ।। मनुस्मृति मे (9/80)
स्वामी जी इसका अर्थ लिखते है
"वैसे ही पुरुष के लिए भी नियम है , जब विवाह के आठ वर्ष तक स्त्री को गर्भ ही ना रहे , वन्ध्या हो तो आठवे , संतान हो कर मर जावे तो दशवे , जब जब हो तब तब कन्या , पुत्र न होवे तो ग्यारहवे और जो स्त्री अप्रिय बोलने वाली हो तो तुरंत उसको छोड़ कर किसी दूसरी स्त्री से नियोग करके संतानोतपत्ति कर लेवे "
जबकि मनुस्मृति मे लिखा है ।
"पत्नी के वन्ध्या, मृतक बच्चों को जन्म देने वाली तथा बार बार कन्या को ही जन्म देने वाली होने पर पति को क्रमशः आठवे, दसवे और ग्यारहवे वर्ष मे दूसरा विवाह करने का अधिकार है। स्त्री के कटुभाषिणी होने पर पुरुष उसी समय दूसरा विवाह कर सकता है"
हद है यार ये बंदा लोगों का कितना चुतिया बनाता था
जहाँ नियोग की गन्ध तक नहीं आती वहाँ भी नियोग घुसेड़ रखा है
अब कोई आर्य समाजी कुछ बोलेगा ???
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दयानंदभाष्य खंडनम् -४ ✴✴
माता, पिता, आचार्य, अतिथि और पुरुष के लिए पत्नी की अहमियत बताते हुए स्वामी जी कहते हैं- `ये पाँच मूर्तिमान् देव जिनके संग से मनुष्यदेह की उत्पित्त, पालन, सत्यशिक्षा, विद्या और सत्योपदेश को प्राप्ति होती है। ये ही परमेश्वर को प्राप्त होने की सीढ़ियाँ हैं।´ (सत्यार्थप्रकाश, एकादशसमुल्लास,)
माता-पिता को छोड़कर तो वो खुद ही भागे थे। विवाह उन्होंने किया नहीं इसलिए पत्नी भी नहीं थी। वो खु़द दूसरों पर आश्रित थे और न ही कभी उन्होंने कुछ कमाया तो अतिथि सेवा का मौका भी उन्होंने खो दिया।
सीढ़ी के चार पाएदान तो उन्होंने खुद अपने हाथों से ही तोड़ डाले।
आचार्य की सेवा उन्होंने ज़रुर की, लेकिन कभी-कभी ऐसा कुछ कर जाते थे कि या तो आचार्य पाठशाला से उनका नाम ही काट देते थे या जितना ज्यादा ज़ोर से हो सकता था उनके डण्डा जमा देते थे,
जिनके निशान उनके शारीर पर हमेशा के लिए छप जाते थे।
तो कुल मिला कर उनके अंदर ऐसा कोई भी गुण नही था जिससे वो ईश्वर को प्राप्त कर सके ।।
कोई है जो कटाक्ष करे ????
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दयानंदभाष्य खंडनम् -३ ✴✴
दयानंद ने वेदआदि भाष्यों के साथ छेडछाड क्यों किया
इन सबके पिछे स्वामी जी का उद्देश्य क्या था ??
आइए देखते है
सत्यार्थ प्रकाश सप्तम संमुल्लास :- दयानन्द जी लिखते है ।
अग्नेर्वा ऋग्वेदो जायते वायोर्यजुर्वेद: सुर्यात्सामवेद: ।।
स्वामी जी इसका अर्थ लिखते है की
"ईश्वर ने सृष्टि की आदि मे अग्नि वायु आदित्य तथा अंगिरा ऋषियो की आत्माओ मे एक एक वेद का प्रकाशन किया"
अब आइये जरा इस मंत्र के अर्थ पर भी नजर डाल लेते है
अग्नेर्वा - अग्नि द्वारा
ऋगवेदो - ऋग्वेद
जायते - प्रकट हुआ /दोहन
वायोर्यजुर्वेद: - वायु द्वारा यजुर्वेद
सुर्यात्सामवेद: - सूर्य के द्वारा सामवेद
अब कोई आर्य समाज के तथाकथित बुद्धिजीवी इस पर प्रकाश डालना चाहेंगे ???
की स्वामी दयानन्द सरस्वती ने यहा पर अंगिरा और अथर्वेद कैसे जोड़ा ???? और इस मंत्र मे अग्नि सूर्य और वायु के लिए ऋषि शब्द का प्रयोग कहाँ हुआ है ???
यहाँ सिद्ध हो जाता है की दयानन्द को ज्ञान तो बिल्कुल भी नही था क्योंकि इस मंत्र को कोई भी जिसमे थोडी सी भी बुद्धि होगी या संस्कृत का मूल अध्धयन भी किया होगा तो वो समझ सकता है कि दयानंद ने इस मंत्र के द्धारा लोगों को किस प्रकार भ्रमित करने का प्रयास किया है ।।
चलिए बढ़ते है आगे ।
प्रश्न करता पूछता है की
यो वै ब्राह्मणम् विदधाति पूर्वम् यो वै वेदंश्च प्रहिणोति तस्मैं ।।
इस मंत्र मे हो ब्रह्मा जी के हृदय मे किया है फिर अग्निआदि ऋषियो को क्यो कहा ??
( ये प्रश्न कर्ता का वाक्य है इसलिए इस पर गौर नही करेंगे क्योकि यहाँ प्रश्न कर्ता और जबाब देने वाला एक ही व्यक्ति है ये ढ़ोग बस लोगों को भ्रमित करने के लिए किया गया है )
स्वामी जी जवाब देते है ।
ब्रह्मा की आत्मा मे अग्निआदि द्वारा स्थापित कराया देखो मनुस्मृति मे क्या लिखा है -
अग्निवायुरविभ्यस्तु त्र्यं ब्रह्म सनातनम।
दुदोह यज्ञसिध्यर्थमृग्यजु: समलक्षणम्॥- मनु (1/23)
स्वामी जी इसका भावार्थ लिखते है की
"जिस परमात्मा ने आदि सृष्टि में मनुष्यों को उत्पन्न कर
अग्नि आदि चारों ऋषियों के द्वारा चारों वेद ब्रह्मा को प्राप्त कराए
उस ब्रह्मा ने अग्नि, वायु, आदित्य और (तु अर्थात) अंगिरा से ऋग, यजुः, साम और अथर्ववेद का ग्रहण किया"
स्वामी जी के इस भावार्थ से साबित होता है की स्वामी जी केवल अज्ञानी ही नही अपितु मूर्ख भी थे ।
या फिर उन्होंने सरासर लोगो को भ्रमित करने का कार्य किया है ( इसकी बात भी अभी करेंगे )
बढ़ते है थोड़ा आगे
प्रश्न करता आगे पूछता है
"उन चारो मे ही प्रकाशन किया इससे ईश्वर पक्षपाती होता है"
स्वामी जी उत्तर देते है
"वो ही चार सब जीवो से अधिक पवित्रात्मा थे , अन्य उनके सदृश नही थे । इसलिए पवित्र विद्या का उन्ही मे प्रकाश किया"
प्रश्न करता आगे कोई प्रश्न नहीं करता कुछ नही पुछता है इसका कारण कोई भी समझदार व्यक्ति समझ सकता है
लेकिन मैं पूछना चाहूँगा
की सृष्टि उत्पत्ति के समय कोई आत्मा सबसे पवित्र , कम पवित्र और अपवित्र कैसे हुई ???
स्वामी जी के अनुसार क्या ईश्वर पक्षपाती नही हुआ ???
और सृष्टि के आदि मे जब मनुष्य की उत्त्पत्ति हुई उस वक़्त तो कोई काम, लोभ, मोह, छल इत्यादि भी नही था जबकि पैदा हुआ बच्चा पाप पुण्य के बंधन से मुक्त होता है
फिर स्वामी जी का ये कथन की वो चार सबसे अधिक पवित्रात्मा थे क्या बेवकूफी भरा नही है ???😃😃
चलिए और आगे देखते है
प्रश्न करता सवाल करता है हालांकि बेवकूफी भरा सवाल है
" किसी देश की भाषा मे वेदों का प्रकाश ना करके संस्कृत मे ही वेदों का प्रकाश क्यों किया ??"
मानता हु की ये सवाल बेतुका है
मगर आर्य समाज के तथाकथित महाऋषि ने जो जवाब दिया वो वाकाइ मे इससे से ज्यादा बेतुका है 😃
स्वामी जी कहते है
"जो किसी देश भाषा मे प्रकाश करता तो ईश्वर पक्षपाती होता क्योंकि जिस देश भाषा मे ईश्वर वेदों का प्रकाश करता वहाँ के लोगो को सुगमता और बाकियो को पढने मे कठिनता होती ।
इसलिए संस्कृत मे किया जो किसी देश भाषा मे ना होकर अन्य सभी भाषाओं का कारण है ।
क्या स्वामी जी का ये जवाब वाकई हास्यपद और बेवकूफी भरा नही है ??😃😃
मैं समस्त आर्य समाजियों से पूछता हुँ
कि सृष्टि उत्पत्ति के समय कितने देश थे ???
और कितनी भाषाए बोली जाती थी ???
जैसा स्वामी जी ने कहा है की संस्कृत हर भाषा का कारण है
तो क्या संस्कृत कभी बोली नही जाती थी ???😃😃
ये सवाल मैं पहले भी बहुत से आर्य समाजियों से पूछ चुका हु
उनके कुतर्क ऐसे आये
"जैसा सवाल था वैसा जवाब दिया स्वामी जी ने"
तो मैं फिर कहना चाहता हुँ
की क्या स्वामी जी किसी गधे या मूर्ख से सवाल जवाब कर रहे थे ???
क्या स्वामी जी ये भूल गए थे की वो एक ग्रंथ लिख रहे है
और ग्रंथ मे ऐसी मूर्खता पूर्ण बाते शोभा नही देती ??
और बड़ी बात ग्रंथ लिखने वाला कोई मूर्ख तो नही होगा
मतलब साफ है की स्वामी जी ने लोगो को भ्रमित करने का प्रयास किया है
इसकी भी पुष्टि मैं कर ही देता हुँ ।
जैसा स्वामी जी ने ऊपर लिखा था
अग्निवायुरविभ्यस्तु त्र्यं ब्रह्म सनातनम।
दुदोह यज्ञसिध्यर्थमृग्यजु : समलक्षणम्॥- मनु (1/23)
जिस परमात्मा ने आदि सृष्टि में मनुष्यों को उत्पन्न कर
अग्नि आदि चारों ऋषियों के द्वारा चारों वेद ब्रह्मा को प्राप्त कराए
उस ब्रह्मा ने अग्नि, वायु, आदित्य और (तु अर्थात) अंगिरा से
ऋग, यजुः, साम और अथर्ववेद का ग्रहण किया।
स्वामी जी ने इस मंत्र से भी वैसे ही छेड छाड़ करी है
जैसा अन्य मंत्रो के साथ किया है
और उनके इस भावार्थ से ये साफ हो जाता है की उन्हे संस्कृत का तनिक भी ज्ञान नहीं था यदि होता सोच विचार कर भावर्थ करते यू मुर्खों कि भांति नही करते या फिर ये षडयंत्र भी हो सकता है लोगो को भ्रमित करने के लिए
क्योंकि इस मंत्र मे लिखा है
अग्निवायुरविभ्यस्तु - अग्नि वायु और सूर्य है ।
त्रयं ब्रह्म - तीन देव ( यहाँ पर ब्रह्म देव के लिए प्रयोग किया गया है ईश्वर के लिए नही )
दुदोह - प्रकट किया / उत्पन्न किया
यज्ञासिध्यार्थम् - यज्ञ सिद्धी के लिए
ऋग्यजु:साम् - ऋग यजु और साम
लक्षणम्- गुण वाले ।
भावार्थ- परमेश्वर ने यज्ञ सिद्धी के अग्नि वायु और सूर्य तीनो देव को और सम गुण वाले साम ऋग और यजु वेदों को दोहा/प्रकट किया ।।
अब बताये कोई इस मंत्र मे ऋषियों का उल्लेख कहाँ मिलता है ??
और अंगिरा ऋषि का भी कहा है ??
और स्वामी जी ने जो इसमे बकवास कर रखा है
जैसे
प्रारम्भ मे 4 ऋषि थे उनमे एक अंगिरा थे
इन चारो ने ब्रह्मा को वेद ज्ञान दिया
आइये देखते है सत्य क्या है ।
मनुस्मृति 1/11
तदण्डमभवद्धैमं सहस्रांशुसमप्रभम् ।
तस्मिञजज्ञेस्वयंब्रह्मा सर्वलोकपितामहः ।।
प्रकृति मे आरोपित बीज अल्प काल से ही सूर्य के समान चमकीले अंडे के रूप मे परिणत हो गया और फिर उसी अंडे से सब लोगो के पितामह ब्रह्मा जी प्रकट हुए ।।
मनुस्मृति मे साफ शब्दों मे लिखा हुआ है की ब्रह्मा जी की उत्पत्ति सबसे पहले हुई और इस जग के पितामह वही है ।।
मनुस्मृति 1/12
आपो नारा इति प्रोक्ता आपो वै नरसूनव:
ता यदस्यायनं पूर्व तेन नारायण: स्मृत: ।।
ब्रह्म (नर) द्वारा उत्पन्न होने के कारण आपका एक नाम नार है फिर इसी नार से ब्रह्मा की ब्रह्मरूप मे उत्पत्ति हुई ।
अतः ब्रह्मा जी का एक नाम नारायण भी है ।।
इन दोनो तथ्यों से पता चलता है की आदि सृष्टि मे मनुस्मृति के आधार पर ब्रह्मा जी सर्वप्रथम प्रकट हुए और ईश्वर ने स्वंय अपने स्वरूप को इस रूप मे प्रकट किया ।।
नोट- स्वामी दयानन्द जी खुद मानते है की मनुस्मृति सत्य है ।। फिर स्वामी जी सत्यार्थ प्रकाश मे ऐसी बेवकूफी क्यों लिखी की 4 ऋषियो ने ब्रह्मा को वेदों का ज्ञान प्राप्त कराया ???
और आइये एक नजर देखते है अंगिरा ऋषि पर
सत्यार्थ प्रकाश मे स्वामी ने वेदों की उत्पत्ति के समय 4 ऋषियो का नाम लिया जबकि मनुस्मृति
केवल अग्नि वायु और सूर्य को मानती है ।।
जो की ऊपर मैं लिख चुका हु ।।
आइये देखते है अंगिरा ऋषि की उत्पत्ति
देखिए स्वामी जी की बात कितनी सही और कितनी झूठ
मनुस्मृति 1/37
मारीचिमत्र्यंगीरसौ पुलस्त्यं पुलहं क्रतुम् ।
प्रचेतसं वसिष्ठं च भृगुं नारदमेव च ।।
मनु द्वारा उत्पन्न दस ऋषियो के नाम मारीच अत्री अंगिरा पुलत्स्य पुलह क्रतु प्रचेता वशिष्ट भृगु नारद ।।
इन बातो के साथ और इन प्रमाणों के साथ मैं विश्वास से कह सकता हु
की स्वामी दयानन्द सरस्वती एक षड़यंत्र के तहत आये थे और मंत्रो के साथ खिलवाड़ करके सबको भ्रमित करने में कुछ हद तक सफल भी हुए ।।
■■■■
दयानंदभाष्य खंडनम्
नियोग समाज द्वारा ब्राह्मणों पर एक आरोप अक्सर लगता आया हे वो ये की पुराणों की रचना ब्राह्मणों ने की थी और उसमे मिलावट भी कर दी थी इसलिए वो पुराणों को नहीं मानते.....
अरे मूर्ख अल्पज्ञ समाजीयो जरा इस पर भी तो सोच विचार करकें देखो कि ३ युगों तक लगभग करोड़ सालो तक श्री वेद भी तो उन्हीं ब्राह्मणों और पौराणिकों के पास ही रहे हैं तो क्या ब्राह्मणों ने वेदों में परिवर्तन नहीं कर दिए होंगे ? 😃
उन्हें कैसे शुद्ध मान लेते हो ?.....
अगर पुराणों को गलत सिर्फ इसलिए कहते हो की ब्राह्मणों ने अपने स्वार्थ के लिए लिखे तो उन्ही ब्राह्मणों के पास ३ युगो से वेद भी रहे हैं उनको श्री वेदों को एकदम सही कैसे मान रहे हो ?????😃😃
अब कोई ये बताए कि क्या कोई दो कौडी का व्यक्ति यह तय करेगा की कौन सा धर्म ग्रन्थ सही हे कौन सा गलत ?
नियोग समाज ब्राह्मणों को बदनाम करने के तरीके बंद करें
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✴✴ दयानंदभाष्य खंडनम् ✴✴
सोमः प्रथमो विविदे, सोमो ददद्गन्धर्वाय ( ऋग्वेद म• १०, सुक्त ८५, म• ४० व ४१) इन दोनों ऋचाओं का दयानंद ने जो अनर्थ किया है उस पर भी ध्यान देना जरूरी है
सोमः प्रथमो विविदे गन्धर्वो विविद उत्तरः ।
तृतीयो अग्निष्टे पतिस्तुरीयस्ते मनुष्यजाः ॥४०॥
अर्थ- हे स्त्रिा!जो (ते) तेरा (प्रथमः) पहला विवाहित (पतिः) पति तुझ को (विविदे) प्राप्त होता है उस का नाम (सोमः) सुकुमारतादि गुणयुक्त होने से सोम, जो दूसरा नियोग होने से (विविदे) प्राप्त होता वह (गन्धर्व:) एक स्त्री से संभोग करने से गन्धर्व, जो (तृतीय उत्तरः) दो के पश्चात् तीसरा पति होता है वह (अग्निः) अत्युष्णतायुक्त होने से अग्निसंज्ञक और जो (ते) तेरे (तुरीयः) चौथे से लेके ग्यारहवें तक नियोग से पति होते हैं वे (मनुष्यजाः) मनुष्य नाम से कहाते हैं | जैसा (इमां त्वमिन्द्र) इस मन्त्रा में ग्यारहवें पुरुष तक स्त्राी नियोग कर सकती है, वैसे पुरुष भी ग्यारहवीं स्त्री तक नियोग कर सकता है |
फिर वही विवाह संस्कार में सोमो ददद्गन्धर्वाय गन्धर्वो दददग्नये, यह श्रुति लिखी है अर्थ इसका स्पष्ट यह लिखा है कि सोम गन्धर्व को देवे, और गन्धर्व अग्नि को और अग्नि मुझको इस स्त्री को देवे यह कथन विवाह के समय वर का हैं
#समीक्षा- स्वामी जी का भाष्य पढ़कर तो ऐसा प्रतीत होता है कि वेद क्या स्वामी जी ने तो कभी संस्कृत की भी सकल नहीं देखी हो नहीं तो वेद मंत्रों के अर्थों का इस प्रकार अनर्थ नहीं करते
#सही_भावार्थ - कन्या व उसके माता पिता उसके पति में निम्न विशेषताएं देखें हे स्त्री तेरा पति पहला तो वह सौम्य हो सौम्यता पति का पहला गुण है, दुसरा गन्धर्व ज्ञान की वाणियों को धारण करने वाला हो अर्थात ज्ञानी हो, तीसरा प्रगतिशील मनोवृत्ति वाला हो, चौथा मनुष्यजा मनुष्य की संतान हो अर्थात जिसमें मानवता हो जिसका स्वभाव दयालुता वाला हो क्रूरता वाला नहीं, ते पति: तेरा पति है
अब सोमः प्रथमो विविदे इस पहली श्रुति के अर्थ पर दृष्टि डालकर ध्यान दीजिए की दयानंदी लोग क्या उसी स्त्री से विवाह करते हैं जो प्रथम एक से विवाह और दो से नियोग कर चुकी है ?
धन्य है यही तो धर्म और स्वामी जी की शर्म है और पूर्व के विरुद्ध यहाँ ही दूसरा विवाह भी निकाल दिया , न जाने वह पहला विवाहित सोम संज्ञावाला पति अपने जीते जी अपनी पत्नी गन्धर्व संज्ञावाले नियोगी पति को क्यों देगा ?
और वह गन्धर्व नियोगी अपने जीते हुए अग्नि संज्ञावाले नियोगी पति को क्यों देगा ?
और चौथा ही पति मनुष्य क्यों कहाता है क्या वे पिछले तीन किसी जानवर के बच्चे हैं ??
और तीसरे को ही अग्नि की संज्ञा क्यों ?
शायद वो हमेशा यह सोच सोच कर जलता रहता हो कि पहले के समान सुकुमारतादि गुण औरों में क्यों नहीं इत्यादि इत्यादि।
इनके अतिरिक्त और भी मंत्र जैसे -
इमां त्वमिन्द्र मीढ्वः सुपुत्रां सुभगां कृणु ।
दशास्यां पु त्रानाधेहि पतिमेकाद शं कृधि ।। -ऋ० मं० १० | सू ० ८५ | मं ० ४५ ||
कुह स्विद्दो षा कुह वस्तोर श्विना कुहापिभिपि त्वं करत: कुहोषतुः ।
को वां शयु त्रा विधवेवपिव दे वरं मर्य्य न योषा कृणुते स धस्थ आ || -ऋ० मं० १० | सू० ४० | मं० २ ||
उदीषर्व नार्य भिजीवलो वंफ ग तासुमे तमुप शेष एहि ।
ह स्त ग्रा भस्य दिधि षोस्तवे दं पत्यु र्जनि त्वम भि सं बभूथ ।।२।। – ऋ० मं० १० | सू० १८ | मं० ८ ||
इत्यादि मंत्रों के अर्थ का अनर्थ करकें नियोग बनाया है अर्थात नियोग झूठ से सिद्ध किया है । जबकि इन सभी मंत्रों में कहीं भी नियोग की गन्ध तक नहीं है
अपना स्वार्थ सिद्ध करने के लिए दयानंद ने वेद मंत्रों के साथ कैसा अनर्थ किया वह आप सबके सामने ही है
दयानंद का वेदों के प्रति कोई लगाव नहीं था बस अपना स्वार्थ सिद्ध करने के लिए वेदों को ढ़ाल कि तरह प्रयोग किया