ईद आ रहा है तो अभी से वेदिक आर्य जीव प्रेमी बन जायेगा कुछ दिनों के लिए 🥺
और गौ बकरे आदि के ऊपर ज्ञान देगा ।
।
लेकिन वेद विज्ञान ज्ञान के भंडार में दुश्मनों यानी शत्रु के गौ घोड़े के साथ उनके बच्चे के साथ क्या करना चाहिए
वेदिक ईश्वर बता रहा है –
।
वात॑ इव वृ॒क्षान्नि मृ॑णीहि पा॒दय॒ मा गामश्वं॒ पुरु॑ष॒मुच्छि॑ष एषाम्। क॒र्तॄन्नि॒वृत्ये॒तः कृ॑त्येऽप्रजा॒स्त्वाय॑ बोधय ॥
पद पाठ
वात:ऽइव । वृक्षान् । नि । मृणीहि । पादय । मा । गाम् । अश्वम् । पुरुषम् । उत् । शिष: । एषाम् । कर्तृन् । निऽवृत्य । इत: । कृत्ये । अप्रजा:ऽत्वाय । बोधय ॥१.१७॥
अथर्ववेद » काण्ड:10» सूक्त:1» पर्यायः:0» मन्त्र:17 उपलब्ध भाष्य
पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
राजा के कर्तव्य दण्ड का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (कर्तॄन्) हिंसको को (नि मृणीहि) मार डाल और (पादय=पातय) गिरा दे, (वातः इव) जैसे वायु (वृक्षान्) वृक्षों को, (एषाम्) इनकी (गाम्) गौ, (अश्वम्) घोड़ा और (पुरुषम्) पुरुष को (मा उत् शिषः) मत छोड़। (कृत्ये) हे हिंसाशील ! (इतः) यहाँ से (निवृत्य) लौट कर (अप्रजास्त्वाय) [उनकी] प्रजा [पुत्र, पौत्र, सेवक आदि] की हानि के लिये [उन्हें] (बोधय) जगा दे ॥१७॥
,
http://www.onlineved.com/atharva-ved/?language=1&kand=10&sukt=1&mantra=17
।
दुश्मनों को तो मारो साथ में उनके गौ घोड़े , बच्चे को भी मार दो ,
क्या शत्रु के गौ घोड़े माता नही रहा अब ?
,
क्या दुश्मनों के बच्चे भी दुश्मन ही है ?
।
Bhashya (4769)Accharya Vaidyanath Language (HTET). English Kand. 10 Sukt: Mantra Sankhya: 17
Mantra in Devnagan(मंत्र देवनागरी);
वातं इव वृक्षान्नि मृणीहि पादय मा गामश्वं पुरुषमुच्छिष एषाम् । कर्तृन्निवत्येतः कृत्ये ऽप्रजास्त्वार्य बोधय ॥
Commentator Accharya Vaidyanath
Bhavarth, Let this device like the wind which uproots the trees, smite and overthrow the cows, horses and men of these makers of device returning back to them from here and make them realize that they are without children.
,
Bhashya (4704): Pandit Harisharan Siddhantalank ar Language (4797): Hindi Kand: 10 Sukt: Mantra Sankhya: 17
Mantra in Devnagari(मंत्र देवनागरी):
वात इव वृक्षान्नि मृणीहि पादय मा गामश्च पुरुषमुच्छिष एषाम् । कर्तृन्निवृत्येतः कृत्ये ऽप्रजास्त्वार्य बोधय ।।
Sandarbn: हिंसा प्रयोग व वंशोच्छेद
COMMentator: Pandit Harisharan Siddhantalankar
Padarth :-(हे वृत्य) हिंसा के प्रयोग ! शत्रुओ को इसप्रकार निमृणोहि) निर्मूल कर 2 (इव) जैसेकि (पातः वृक्षान्) यापु वृक्षों को निर्मूल जर डालता है (पादप) इन्हें पाँव तले रौंद डाल-दूर भगा दे। (एणम इन्के) (गा अश्व पुरुषम) गौ, अश्वद पुरुष को (मा उच्छिषः) जीवित मत छोड। २. (इतः) यहाँ से तौरकर (कतन) इन हिंसा-प्रगोग करताल पुरुष को (आजारलारा नशिग) जाहीन हो जाने की तानने है। उन्हें यह स्पष्ट कर दे कि इन प्रयोगों का परिणम इतना भयंकर होगा कि तुम्हारा वंश ही उच्छिन्न हो जाएगा।
,
युजुर्वेद में घास फूस खाने वाला जंगली जानवर को भी मारने का आदेश हैं
No comments:
Post a Comment