Wednesday, 24 November 2021

आतंक।

भगवा आतंकवाद  ( वेद और आतंकवाद )

*  " त्वमसि सहमनोs............ हिष्महि "।। 5 ।।
 ( अथर्वेद 19 : 32 : 5 ) 

* अर्थात : - है वैदिक ईश्वर तू वश ( कब्जे ) में करने वाला है  और में भी बलवान ( ताकतवर) हु ,हम दोनों बलवान हो कर विरोधियों को हम वश में करे  !

* भावार्थ : -  वीर पुरुष वैदिक ईश्वर के साथ मिल के और सब साथियो को मिला कर शत्रुओं का नाश कर !

* Note : - शत्रु यानी हम जो वेदों की निंदा करे , वेद विरोध है और जो वेदों को नही मानते , जो अनार्य है वे सब इन के शत्रु ( दुश्मन ) है !

* " सहस्व नो ............. में बहुनकृधी " ।। 6 ।।
 ( अथर्वेद 19 : 32 : 6 ) 

* अर्थात : - हे वैदिक ईश्वर हमारे शत्रुओं को हरा और
सेना चढ़ने वालो को हरा , सब दुष्ट ( अनार्य ) वालों को हरा मेरे लिए बहुत अच्छी शांति कर ।

* दयानंद सरस्वती अपनी किताब सत्यार्थ  प्रकाश के 14 समुल्लास में कहता है कि वो पालनहार कभी नही हो सकता जो मनुष्यों का शत्रु हो वही पालनहार का शत्रु भी हो क्यों कि पालनहार के नजदीक  सब एक से है  और पालनहार किसी को शत्रु नही रखता मतलब ऊपर☝️ मंत्रो के अनुसार जो आर्यो ( ब्रह्मणो ) के शत्रु है , वही वैदिक ईश्वर का भी शत्रु है और दोनों मिलकर दुसरो को मारने की भी शिक्षा दे रहे है , इसलिए वेदों का ईश्वर कभी पालनहार नही हो सकता दयानंद सरस्वती के अनुसार क्यों कि सच्चे पालनहार के ये गुण नही है , बरहाल आगे देखते है ?

*  " इमं बध्नामि..........हद : " ।। 1 ।। 
 ( अथर्वेद 19 : 28 : 1 )

* अर्थात : - तेरे जीव और तेज के लिए इस मनिरूप
( अति प्रशनशिय ) शत्रु को दबाने वाले और विरोधियों के दिल को तपाने वाले शत्रु विदारक लोगो को  में 
( वैदिक ईश्वर ) नियुक्त ( तैनात ) करता हु ।

* जो भी मोब लॉन्चिंग का असली गुनहगार वेदों का ईश्वर है , उसने ही ऐसी आज्ञा दी है , लोगो को शत्रु यानी हमे मारने की !

*  " द्विषतस्ताप्यंह्र्द.........संतापयन " ।। 2 ।।
 ( अथर्वेद 19 : 28 : 2 )

* अर्थात : - विरोधियों के ह्रदय को तपाता हुआ और शत्रुओ  के मन को तपाता हुआ ये सब दुष्ट (अनार्य )को ग्रीष्म  ऋतु ( summer ) के समान तपाता हुआ तो हो ।

* भावार्थ : - जिस तरह गर्मियों के मौसम में धूप हरि भरी घास को तपा कर सुखों देता है और नष्ट कर देता है उसी प्रकार से आर्य अपनी शत्रुओं ( अनार्य ) को सदा कष्ट देते रहे और उनको नाश कर । वाहह क्या शिक्षा है । 

* " घमईवाभीतपंदर्भ.......... बलम  "   
( अथर्वेद 19 : 28 : 3 )

* अर्थात  : - ये सेनापति  ( आर्य  ) ग्रीष्म  ( आग  )के समान  तपाता  हुआ  विरोधियो  को सन्ताप  ( दुख  , कष्ट , कलेश  ) देता हुआ  , तू दूसरे को नष्ट  करते हुए  इन्द्र  के समान  वेरियो  ( दुश्मनो  ) के तोड़  दे !

* भावार्थ  : -   दुश्मनो  को नष्ट  करके  हरा दे  !

* " भिन्धिददर्भ  .........  पातय  " 
( अथर्वेद 19 : 28 : 4  )

* अर्थात  : - हे  दर्भ  ( सेनापति  आर्य  )  दुश्मनो  
( अनार्य  ) विरोधियो  के दिल को  तोड़  दे उठता हुआ  भूमि की  त्वचा  के समाना  इन  शत्रुओ  के शिर को गिरा दे  !

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