Saturday, 27 November 2021
Wednesday, 24 November 2021
क्या वेद ईश्वरीय ज्ञान हो सकते है।
क्या वेद ईश्वरीय ज्ञान है ?
* वेद तो स्वयं कहते है ? कि हम ईश्वरीय वाणी है परंतु
वेदों के मानने वाले वेदों के विरोध जाके कहते है कि ये ईश्वरीय ज्ञान है , ठीक पल भर के लिए मान लिया कि वेद ईश्वरीय ज्ञान है पर ऐसा अपूर्ण ज्ञान वैदिक ईश्वर को यह नही पता कि मैंने किस वेद में क्या ज्ञान दिया है और दूसरे वेद में क्या अर्थात यजुर्वेद में कुछ और कहा और अर्थववेद में कुछ वाह क्या ज्ञान है।
* कमाल है , वैदिक ईश्वर के ज्ञान पर प्रशन चिन्ह
( ? ) लगता है इसका अभिप्राय : यह है , की वेद मंत्रों में विरोधाभास है , जिसको पढ कर सर चकरा जाता है।
* की किस मूर्ख ने यह सब लिख दिया है कहि कुछ कही कुछ वेदों का ज्ञान विज्ञान की पुस्तक तो नही अपितु कामसूत्र एव मनोरंजन की पुस्तक कह सकते है जिसको देख कर केवल हंसी आए ये कोइ बात हम हवा हवाई नही बल्कि वैदिक धर्म के मानने वाले बड़े बडे प्रचीन वेदाभाष्यकर्ता स्वयं कहते है ,की वेद अर्थहीन है । आइए जानते है ?
वेदों के अर्थ
* निरुक्तकार कहते है ,की वेदों के मंत्र विषय मे यास्क द्वारा उठाये गए एक और विवाद पर विचार करते है वेदों के मंत्रों के अर्थ के सम्बंध में बहुत प्राचीन समय से शकाये उठाई जाने लगी थी। उनके 2 पक्ष थे ?
लोकायत - मत
कर्मकाण्डी
1 . लोकायत मत : - के लोग तो मंत्र को इसलिए अर्थहीन मानते थे , की इनमें उल - जलूल बाते भरी पड़ी है , वेदों की कोई सत्ता नही इन्हें मानना व्यर्थ हैं ।
2 . कर्मकाण्डीयो : - का कहना था कि वेदों का कोई अर्थ नही किंतु उनका पाठ अनिवार्य है , पाठ करने में अर्थ का ध्यान नही रहता हम निष्ठा से पाठ करते है , क्योंकि यह हमारा धर्म है ।
* क्योंकि वेद अर्थहीन भले ही झाड़ फूंक करने के निर्रथक मंत्रो में ऐसा परिवर्तन किया की कार्यकारि शक्ति नष्ट हुई । क्या मिथ्था है , हंसी आती है ।
* वैदिक मंत्र इसलिए भी निरर्थक है , क्योंक की वे आपस मे ही विरोध करते है ।
उदाहरण ० कभी तो पृथ्वी केवल एक ही रुद्र है होने की बात करते है तो कही हजारों रुद्रों को ला बैठाते है
कभी इंद्र को जन्म से ही शत्रु हीन कहते है , कभी कुछ क्या खेल है ? यास्क फिर लौकिक प्रयोग के सामने सिर झुका देते है ।
* तो बड़े बड़े भाष्यकर्ताओ का मत है , की वेदों का कोई अर्थ ही नही और ये मूर्ख वेदों में ही विज्ञान की बाते करते है क्या मिथ्था से कम प्रतीत नही होता ।
वेद और आधुनिक विज्ञान
* मेरा काम वेदों के ऊपर प्रश्न चिन्ह लगाना नही बल्कि उन लोगो की बुद्धि का ताला खोलना है जो कि वेदों में ज्ञान विज्ञान की बाते करते नजर आते है कि वे भ्रम की जिंदगी व्यतीत कर रहे है । जो इनके पंडो ने बता रखा है । ये तो 100 % स्पष्ट है , की वेद न तो कोई ईश्वरीय ज्ञान , वाणी नही कोई ईश्वरीय ग्रन्थ ।
बल्कि कोई 2 पग पर चलने वाला हवस के पुजारी के लिखे हुए जिसने अपने स्वार्थ सिद्ध करने के लिए ऐसे कलंकित ग्रन्थ की रचना की , जिससे लोगो का आर्थिक , मानसिक एव शरीरिक शोषण किया जाए जिसका उदाहरण नियोग , मारकाट आदि आदि वेदों में भरा हुआ है ।
* आये देखते है ज्ञान विज्ञान के कुछ उद्धरण जो समझदारों के लिए इशारा काफी होगा ।
नोट : - सारे भाष्य दयानंद सरस्वती और आर्य समाजीयो के ही है ।
* यजुर्वेद का यह मंत्र कह रहा है , की सूर्य केवल अपनी ही परिधि में घूमता है अन्य किसी भी लोकांतकर के नही , इसमें भी गोल माल है ,ठीक है पल भर के लिए मान लेते है , की सत्य परंतु अर्थववेद क्या कह रहा है ?
* और यहाँ कह रहा है , सब लोको के चारो और घूमता है , ये है वैदिक ईश्वर का अधूरा ज्ञान इससे शिद्ध हुआ किया ये कोई ईश्वरीय ग्रन्थ नही बल्कि मानव रचित है ईश्वर के ज्ञान में कभी भी विरोधाभास नही होता केवल मानव के ज्ञान में ।
* कुछ और उद्धरण नीचे है जिससे और आपको स्पष्ट होगा मिथ्थाई ग्रन्थ वेदों के बारे में कही घूम रहा है , कही रोका हुआ , कही कुछ कही कुछ
* इसलिए कहा था कि ये पुस्तक मनोरंजन से भरी पढ़ी है यही वजह थी कि प्रचीन काल के लोग इससे व्यर्थ समझते थे और ये गधे इस में विज्ञान बताते है क्या मिथ्था है अगर ये सब जानने के बाद भी कोई ऐसा कहे वो महामूर्ख नही तो क्या होगा आप स्वयं ही बातए ।
आतंक।
भगवा आतंकवाद ( वेद और आतंकवाद )
* " त्वमसि सहमनोs............ हिष्महि "।। 5 ।।
( अथर्वेद 19 : 32 : 5 )
* अर्थात : - है वैदिक ईश्वर तू वश ( कब्जे ) में करने वाला है और में भी बलवान ( ताकतवर) हु ,हम दोनों बलवान हो कर विरोधियों को हम वश में करे !
* भावार्थ : - वीर पुरुष वैदिक ईश्वर के साथ मिल के और सब साथियो को मिला कर शत्रुओं का नाश कर !
* Note : - शत्रु यानी हम जो वेदों की निंदा करे , वेद विरोध है और जो वेदों को नही मानते , जो अनार्य है वे सब इन के शत्रु ( दुश्मन ) है !
* " सहस्व नो ............. में बहुनकृधी " ।। 6 ।।
( अथर्वेद 19 : 32 : 6 )
* अर्थात : - हे वैदिक ईश्वर हमारे शत्रुओं को हरा और
सेना चढ़ने वालो को हरा , सब दुष्ट ( अनार्य ) वालों को हरा मेरे लिए बहुत अच्छी शांति कर ।
* दयानंद सरस्वती अपनी किताब सत्यार्थ प्रकाश के 14 समुल्लास में कहता है कि वो पालनहार कभी नही हो सकता जो मनुष्यों का शत्रु हो वही पालनहार का शत्रु भी हो क्यों कि पालनहार के नजदीक सब एक से है और पालनहार किसी को शत्रु नही रखता मतलब ऊपर☝️ मंत्रो के अनुसार जो आर्यो ( ब्रह्मणो ) के शत्रु है , वही वैदिक ईश्वर का भी शत्रु है और दोनों मिलकर दुसरो को मारने की भी शिक्षा दे रहे है , इसलिए वेदों का ईश्वर कभी पालनहार नही हो सकता दयानंद सरस्वती के अनुसार क्यों कि सच्चे पालनहार के ये गुण नही है , बरहाल आगे देखते है ?
* " इमं बध्नामि..........हद : " ।। 1 ।।
( अथर्वेद 19 : 28 : 1 )
* अर्थात : - तेरे जीव और तेज के लिए इस मनिरूप
( अति प्रशनशिय ) शत्रु को दबाने वाले और विरोधियों के दिल को तपाने वाले शत्रु विदारक लोगो को में
( वैदिक ईश्वर ) नियुक्त ( तैनात ) करता हु ।
* जो भी मोब लॉन्चिंग का असली गुनहगार वेदों का ईश्वर है , उसने ही ऐसी आज्ञा दी है , लोगो को शत्रु यानी हमे मारने की !
* " द्विषतस्ताप्यंह्र्द.........संतापयन " ।। 2 ।।
( अथर्वेद 19 : 28 : 2 )
* अर्थात : - विरोधियों के ह्रदय को तपाता हुआ और शत्रुओ के मन को तपाता हुआ ये सब दुष्ट (अनार्य )को ग्रीष्म ऋतु ( summer ) के समान तपाता हुआ तो हो ।
* भावार्थ : - जिस तरह गर्मियों के मौसम में धूप हरि भरी घास को तपा कर सुखों देता है और नष्ट कर देता है उसी प्रकार से आर्य अपनी शत्रुओं ( अनार्य ) को सदा कष्ट देते रहे और उनको नाश कर । वाहह क्या शिक्षा है ।
* " घमईवाभीतपंदर्भ.......... बलम "
( अथर्वेद 19 : 28 : 3 )
* अर्थात : - ये सेनापति ( आर्य ) ग्रीष्म ( आग )के समान तपाता हुआ विरोधियो को सन्ताप ( दुख , कष्ट , कलेश ) देता हुआ , तू दूसरे को नष्ट करते हुए इन्द्र के समान वेरियो ( दुश्मनो ) के तोड़ दे !
* भावार्थ : - दुश्मनो को नष्ट करके हरा दे !
* " भिन्धिददर्भ ......... पातय "
( अथर्वेद 19 : 28 : 4 )
* अर्थात : - हे दर्भ ( सेनापति आर्य ) दुश्मनो
( अनार्य ) विरोधियो के दिल को तोड़ दे उठता हुआ भूमि की त्वचा के समाना इन शत्रुओ के शिर को गिरा दे !
वैदिक ईश्वर।
वेदो का ईश्वर वेदो में क्या कहता है ? ये जानने की कोशिश करते है और सृष्टि की रचना किस तरह हुई इत्यादि जानते है आये देखते है ,वेदो का ज्ञान विज्ञानं क्या कहते है ? की वेदो को खुद वैदिक ईश्वर ने बनाया है ये मेरा दावा नहीं पोंगा पंडित का कहना है
* वैदिक ईश्वर ने क्या पता वेदो को कैसे दिया होगा वो चार ऋषिमुनियो को दयानन्द की विश्व प्रशिद्ध पुस्तक चूत्यार्थ प्रकाश अरे फिर सत्यार्थ प्रकाश वैसे वह पुस्तक में सत्य छोड़ कर हर चीज है और प्रकाश शब्द नाम मात्र है और अँधेरा ही अँधेरा है बरहाल उसमे में दयानद लिखता है की जिस तरह से कोई शिष्य को गुरु की आवशकता होती है ज्ञान प्राप्त करने के लिए उसी प्रकार से जो चार ऋषिमुनियों को वेद प्राप्त होए उन्हें भी तो गुरु की आवशकता थी जिस तरह से कोई गुरु अपने शिष्य को पढता है उसी प्रकार वैदिक ईश्वर ने उन चारो को पढ़ाया और पूछा जाये वैदिक ईश्वर तो निराकार कर है तो मुँह से कैसे पढ़ाया होगा ? कहते दिल में बैठाल दिया तो फिर मुर्ख आदमी ऐसा क्यों कर कहा की जैसे कोई गुरु पढता है उसी तरह गुरु तो हाथ से लिख कर और मुँह से बोल कर समझता है और पढ़ता है वाह क्या कहने बरहाल आज का मुद्दा कुछ और है इन शार्ट बात करते है तो जवाब देते है की वो सर्वशक्तिमान है उसके के लिए कोई काम क्यों कर मुश्किल हो भला !
* और जब ये जवाब हम देते है , तो कहते तर्क पर बैठना चाहिए ये काहानी है मूर्खो की बरहाल कोई नहीं आर्य समाजी और वैदिको के दिमाग में गोबर भरा है जिसके चलते जब भी मुँह खोलते है बदबू ही आती है यानि मन्दबुद्धि सवाल करते है जिनकी डिसनरी में २ + २ = 5 होते है उनके बारे क्या कहा जाये और जब हम सवाल पूछते है तो कहते है , की उसका ज्ञान हमें नहीं जिसका उद्धरण महाप्रलय की तारिख कहते है पता नहीं , वो चार ऋषिमुनि फिर धरती पर कब पुनर्जन्म लेंगे और कहा और एक लंबी लिस्ट हैं सवालो की ये क्या इनके बाप दाद भी हमारे सवालो के जवाब नहीं दे सकते और तर्क की बात करते है मुर्ख और अपने समय पर सर्वशक्तिमान का गुण गाते नजर आते है अरे मूर्खो तुम्हारा दवा है की तुम और वेद शाश्वत हो यानि कल भी थे आज भी है और रहेंगे दुनिया की उत्पत्ति के शुरुवात में वेद ही था और तुम्ही थे आएसा तुम्हारा दावा है तो सवाल किस्से होगा जो पहले आया या फिर बाद में तुम्हारे अनुसार और इस्लाम कब से है कई आर्टिकल में बता चूका हु और खुद ३००० साल पूराने हो और लाखो साल पहले की बात कर रहे हो बरहाल बात काफी लंबी होते जा रही है आज का मुद्दा कुछ और ही है , आज देखेंगे की वेदो के अनुसार वैदिक ईश्वर की पूरी कहानी ?
सृष्टि की रचना
* सबसे पहले देखते है की सृष्टि उत्पन्न होने से पहले क्या था ?
* सुर्ष्टि की उत्पत्ति के से पूर्व न अभाव वा असत्ता होता और न व्यक्त जगत रहता है , न लोक रहता और न अंतरिक्ष रहता है , जो आकाश से ऊपर निचे लोक - लोकान्तर है , वे भी नही रहते , क्या किसको घेरता वा आवरत करता है , सब कुछ कुहरान्धकार
( पूरा अंधकार होता है ) के गृह आवरण में रहता है , गहन गहरा क्योंकि रह सकता है ।
( ऋग्वेद 10 : 129 : 1)
* उस अवस्था में न तो मृत्यो रहती न ही काल व्यहार , न ही रात - दिन का चिन्ह का नही रहता ।
( ऋग्वेद 10 : 129 : 2 )
मनुस्मृति
मनुस्मृति १ : ५
* तो ये सब था और चारो तरफ कुलंध्कार था तो वैदिक ईश्वर क्या कर रहा था ?
* " नुनं तदस्य काव्यो ..........अर्धे विषिते सस्न्नू । "
( अर्थर्वेद ४ : १ : ६ )
* अर्थात : - वैदिक ईश्वर प्रलय की अवस्था में सोता सा था फिर उसने सबको रच दिया।
वैदिक ईश्वर
मनुस्मुर्ती १ : ७४
* महाराजा सो रहे थे जब आँखे खुली तो देखा मैं तो सो रहा था और जब सो कर उठे तो सोच रहे थे क्या करो तो ये किया ?
* " व्रात्य ........... समरयत।" ( अर्थवेद १५ : १ : १ )
अर्थात : - पहले वो अकेला था !
* " स प्रजापति........... जनयत ! "
( अर्थवेद १५ : १ : २ )
अर्थात : - उसने अपने देखा और सोच कर प्रकट किया !
* " तदेकम ................... प्रजायत "
( अर्थवेद १५ : १ : ३ )
अर्थात : - और जो भी प्रकृति के कण सूक्षम अवस्था में थे उसमे घुस गया
* " स उदतिष्ठत्स प्राची दिशमणु व्य चलत "
( अर्थवेद १५ : २ : १ )
अर्थात : - घुसने के बाद खड़ा हुआ और पूर्व दिशा की और चला।
निराकार को खड़े होने के लिए पैर किसने प्रदान किये ? क्या उससे भी पहले और कोई था जिसने पैर दिए ?
* " तं बृहच्च ........... देवा अनुव्य चलन।"
( अर्थवेद १५ : २ : २ )
अर्थात : - और वैदिक ईश्वर के पीछे आकाश , सूर्य आदि पीछे पीछे चले।
* और घोड़े और बेल की सवारी पर बैठ कर वहा थोड़ा बहुत रच ( कुछ बना ) दिया।
( अर्थवेद १५ : २ : ३,४ ,५,६,७ ,८ )
* " स उदतिष्ठत्स दक्षिणा दिशमणु व्य चलत "
( अर्थवेद १५ : २ : ९ )
अर्थात : - फिर वाह से खड़ा हुआ और दक्षिण दिशा की और चला !
* पूर्व पच्चिम आदि दिशा का अंदाज कहा से लगाया होगा अंतरिक्ष में ना तो कोई ऊपर निचे ना ही कोई दिशा होती है पता नहीं कोनसा विज्ञानं है वेदो मेंआगे देखते है ?
* " तं यज्ञायज्ञीय च वामदेव्य ......... चलन।
( अर्थवेद १५ : २ : १० )
अर्थात : - यज्ञ और वामवेद ,यजमान यज्ञ करने वाला और सब जिव जन्तु उसके साथ पीछे पीछे हो चले।
* फिर घोड़े और बेल की सवारी पर बैठ कर वह थोड़ा बहुत रच दिया। ( अर्थवेद १५ : २ : १२ ,१३ ,१४, )
* " स उदतिष्ठत्स प्रतीची दिशमणु व्य चलत "
( अर्थवेद १५ : २ : १५ )
अर्थात : - फिर वाह से खड़ा हुआ और पच्चिम दिशा की और चला ?
* जिस तरह सूरज आदि साथ पीछे-पीछे उसी तरह से साथ ऋषि , विरुप , वेराज और कुछ लोग
( मनुष्य ) पीछे पीछे चेले ( अर्थवेद १५ : २ : १६ )
* फिर घोड़े और बेल की सवारी पर बैठ कर वह थोड़ा बहुत रच दिया। ( अर्थवेद १५ : २ : १८ ,१९ ,२० )
* " स उदतिष्ठत्स उदीची दिशमणु व्य चलत "
( अर्थवेद १५ : २ : २१ )
अर्थात : - फिर वाह से खड़ा हुआ और उत्तर दिशा की और चला ?
* श्येत और नौधस और ७ ऋषि और थोड़े बहुत मनुष्य भी पीछे पीछे हो चले ( अर्थवेद १५ : २ : २२ )
* फिर घोड़े और बेल की सवारी पर बैठ कर वह थोड़ा बहुत रच दिया। ( अर्थवेद १५ : २ : २४ से २८ )
* ये देखो वेदो का सर्वशक्तिमान वैदिक ईश्वर जो खुद जा जा कर बनाना रहा है ,इधर उधर घूम रहा है , सब पॉप लीला है ये है ज्ञान विज्ञानं ?
ऋतुओ की रचना
* " स संवत्सरमू ............. तिष्टसीती ! "
( अर्थवेद १५ : ३ : १ )
अर्थात : - वह वैदिक ईश्वर वर्ष भर तक ऊंचा खड़ा रहा उससे देवताओ ने बोलो क्यों अब तू खड़ा है !
* पुरे साल खड़े खड़े पैर दर्द न दिए ! लगता है भूल गए थे की अब क्या करना है उसी के चकर में खड़े थे फिर देवताओ ने बताया की तू अब तक क्यों खड़ा है अब आगे ..........
* " सो sss ब्रिविदासन्दीं में सं भरत्विति "
( अर्थवेद १५ : ३ : २ )
अर्थात : - वो वैदिक ईश्वर बोला सिंहासन ( बैठने के लिए कुर्सी ) तू देवता धरो !
* बहुत जरुरी है जल्दी करो पैर दर्द जो दे रहे होंगे और ये कैसा सर्वशक्तिमान है जो अपने लिए कुर्सी को इंतजाम नहीं कर सकता ? अफ़सोस यहाँ वैदिक ईश्वर कम जोर निकला जल्दी करो देवताओ वर्ष भर से खड़े थे कही बेहोश हो के गिर न जाये ?
* " तस्मै व्रात्ययासन्दी सम्भरन "
( अर्थवेद १५ : ३ : ३ )
अर्थात : - देवताओ ने वैदिक ईश्वर के लिए सिंहासन मिलकर रखा !
* अच्छा हुआ रख दिया अब जल्दी से उनको बैठा दो और जरा पानी वाणी पिलाओ प्यासे होंगे वर्ष भर से खड़े थे !
* " तस्या ग्रीष्मश्च वर्षांश्च दौ ! "
( अर्थवेद १५ : ३ : ४ )
अर्थात : - वसंत ऋतू और घाम ऋतू उस कुर्सी के दो पैर और वरसा , शरद ऋतू दो पैर होये !
* क्या लीला है , वैदिक ईश्वर की A . C और हीटर दोनों के मजे पर ऐसी कुर्सी का अविष्कार किस वैज्ञानिक ने किया था सब पोपलीला है ?
* " वेद आस्तरण ब्रह्मापबहणम ! "
( अर्थवेद १५ : ३ : ७ )
अर्थात : - धन ( हिरे , जवाहरत आदि ) सिंहासन का बिछौना ( कुर्सी की गद्दी ) और अन्न ( खाने पिने की पिने कि चीजे ) सिरना !
* क्या बता है ? पिछवाड़े के नीचे हिरे जवाहरात की गद्दीया है और पीछे टेका लगा कर फलो के मजे वाह्ह क्या मजे है महाराजा के !
* " सामासाद उद्रीथो sssss पश्रय: ! "
( अर्थवेद १५ : ३ : ८ )
अर्थात : - सामवेद बैठने का स्थान और ओ३म सहारा था !
* सामवेद ऋषियों को मिल गया था और इतनी पवित्र पुस्तक जगह मतलब सब सामवेद पर खड़े थे और ऑक्सीज़ंन के रूप में ओ३म का उच्चारण चालू था वर्ष भर खड़े थे इसलिए घबराहट चालू होगी और हा सब हॉस्पिटलों से ऑक्सीज़ंन ( O 2 ) के सिलेंडर हटाकर टेप रिकॉर्डर में ओ३म लगा दो सब मरीज ठीक हो जायेंगे क्या मिथ्या है !
आखिरकार वैदिक ईश्वर
* " तामासन्दी व्रात्य आरोंहत ! "
( अर्थवेद १५ : ३ : ९ )
अर्थात : - उस सिंहासन पर वैदिक ईश्वर चढ़ गया !
* होओओओ अच्छा हुआ चढ़ गए नहीं तो घबराहट के मारे निचे गिर पढ़ते , पानी वाणी पिलाओ और भूख भी लगी होगी फलो का जूस वगैरा दो चिकन की बूटी- वूटी अरे माफ़ करना शाकाहारी होंगे अगर मांस खाया तो वैदिक ईश्वर खुद राक्षस हो जायेंगे कृपया मत खिलाना !
* " तस्य देवजना : परिष्ट्कंदा आसनतसंकल्पा: प्राहाय्या ३ विशवानी भूतान्युपसद : ! "
( अर्थवेद १५ : ३ : १० )
अर्थात : - देवता उसके सेवक ( नौकर ) और कुछ दूत ( सन्देश पहुंचने वाले ) बाकि उसके पास बैठ गए !
* वाह्ह बाबूजी जी के पास नौकर चाकर है क्या बात है , वर्ष भर से खड़े थे पैरो की मालिश वालिश कर दो थोड़ा आराम हो जाएंगे और बाकि उनके पास बेठ कर क्या कर रहे हो अपने अपने काम में लगो घर में बच्चे रो रहे होंगे उन्हें सम्भालो नहीं तो रात की रोटी नहीं।
पुनर्जन्म।
पुनर्जन्म का सच
वेद और पुनर्जन्म
( यजुर्वेद 4 : 15 )
* अर्थात : - मनुष्यों को आयु फिर फिर प्रप्ति होती है , शरीर आधार फिर प्रप्ति होती है ,देखने के लिए आंखे , सुनने के लिए कान और पुनः शरीर प्रप्ति होती है ।
* उसी प्रकार से गीता में भी है , की जिस तरह मनुष्य कपड़े बदलता है उसी प्रकार आत्मा भी बारम्बार शरीर बदलती रही थी है और भी कई प्रमाण मिलते है ।
कर्म के अनुसार वेदों का ईश्वर किसी को , पशु , पक्षी किसी को लंगडा, किसी को लूला , किसी को रोगी , किसी को श्रेष्ठ , किसी को शुद्रो का जन्म देता है आदि आदि ।
आत्मा , परमात्मा और प्रकुति का चक्र यहाँ दखे
अब देखते है पुनर्जन्म का नियम
* पुनर्जन्म के नियम के अनुसार जब
भी किसी मनुष्य की मृत्यु हो जाती है , उसके
पश्चात सबसे पहले हवा में आवरो की तरह से गर्दिश करता है , उसके बाद नाले , नदी , झरने इत्यादी में रहता है , फिर उसके बाद खेती वगैरा में जाता है फिर उसके बाद धान्य इत्यादि में बसर होता , उसके बाद फिर धान्य आदि उत्पन्न होकर
भोजन की शक्ल में मनुष्य उसे ग्रहण करता है
उसके बाद उसके वीर्य्य में प्रवेश करता है , उसके बाद कोई पुरूष स्त्री के साथ संभोग ( सेक्स ) करता है उसके बाद वो गर्भ में जाता है ये सब हो कर मर ने वाले को पुनः शरीर की प्रप्ति होती है ।
पुनर्जन्म
अब देखते है कि किस को किस यौनि में जन्म मिलता है ?
* मनुष्य शरीर की प्रप्ति केवल उन्हें को प्राप्त होती है जो वेद को सत्य मानते है और वेदों की आज्ञा का पालन करते है उन्ही को मनुष्य यौनि में जन्म मिलता है ।
* ऐसा है क्या ? भला बताना की वर्तमान में केवल पूरे विश्व मे 3 -5 % लोगो ही वेदों को मानते है और जानते है और जो वेदों को नही मन्नते वही नास्तिक है ।
* मतलब पुनर्जन्म में केवल 3 - 5 % लोगो को
मनुष्य शरीर की प्रप्ति होगी ।
* और जो वेद आदि को नही मानते जिनको वेदों में मारने और काटने का हुक्म दिया है ।
नियोग।
(वैदिक ईशवर) आज्ञा देता हूं, की तू मन, कर्म और शरीर से व्यभिचार कभी मत करो, किंतु धर्मपूर्वक विवाह और नियाग से संतानउतपन्न करते रहो।( वाह क्या ज्ञान है।)
* यह नियोग शिषट पुरुषों कि सम्मति और दोनों की प्रसन्नता से हो सकता है।( दोनों की मर्जी से जीना जायज़ हो गया इंदुइसम में वाह क्या बात है । )
* हे स्त्री ! अपने मूर्तक पति को छोड़ के इस जीवनलोक मे जो तेरी इच्छा हो,तो दूसरे पुरुषों के साथ नियोग करके संतानों प्रप्त कर।
* वैदिक ईशवर मनुष्यों को आज्ञा देता है, की हे इंद्र पते ! तू इस स्त्री को वीर्यदान दे (समझदार को इशारा काफी है।)के सुपुत्र और सौ भाग्ययुक्त कर। पुरुष के प्रति वेद की यह आज्ञा है कि इस विवाहित वा नियोजित स्त्री में 10 बच्चे उत्पन्न कर । अधिक नही (तो क्या ? पूरी फ़ौज पैदा करुंगे बस 10 काफी है ) और हे स्त्री ! तू नियोग 11 पति तक कर अर्थात एक तो उसमे प्रथम विवाहित पति है और 10 प्रयत्न पति कर कर अधिक नही। (तो क्या पुरो के साथ नियोग करुंगे क्या।)
* बड़े-बड़े वीर पुरूष को उतपन्न कर।
( नियोग से कई बड़े-बड़े माह पुरूष पैदा हुए है जिसमे से कुछ नाम आप भी जानते होंगे कर्ण, परशुराम इत्यादि ) तो देवर की कामना करने वाली है, तो तेरा पति विवाहित पति ने राहे या वह रोगी हो या नपुंसक हो जाये तब दूसरे पति के साथ नियोग के जरिये संतान उत्पन्न कर। (वहा पति बीमार पढा है और पत्नी देवर के साथ मजे ले बहुत खूब)
* देवर की परिभाषा वेदो मे
* जैसे विधवा स्त्री देवर के साथ संतानोत्पत्ति करती है वैसे तुम भी करो। (यहा पर ऐसी घटिया शिक्षा दी जा रही है) विधवा का दूसरा पति होता है उसको देवर कहते है।(मतलब वहा पर उसका पति मरा नही की उस स्त्री पर देवर का हक़ हो जाता है वह कितनी अच्छी शिक्षा है।
* हे स्त्री जीवित पति को लक्षय करके उठ खड़ी हो(यहा पर देवर,पंडित,ऋषि मुनि, इत्यदि की बात हो रही है।)मर्त्य इस पति के पास क्यों पड़ी है, आ हाथ ग्रहण करने वाले नियुक्त इस पति के साथ संतान जनने को लक्षय में रखकर संबंध कर।(नियोग कर) ( ऋग्वेद 10:18:8)
* ऋग्वेद 10:10 में भी पूरा नियोग का बयान है।
■■■
■■■
नियोग क्या है ?
* आखिर नियोग क्या है ? ये बात पहले बता चुके है फिर भी संक्षेप परिभाषा समझना चाहते हो इतना ही काफी है कोई विधवा स्त्री संतान ( बच्चे ) की चाह रखती है तो वो अपने मरे हुए पति के छोटे भाई या बड़े भाई , किसी ब्रह्मण , साधु इत्यादि से मुँह काला करके बच्चा पैदा कर सकती है और एक वो जिसका पति नपुंसक हो उसकी औरत भी मुँह काला करा सकती है और साधरण भाषा में समझे तो ब्रह्मणो ने अपनी हवस पूरी करने के लिए ये प्रथा चलाई थी ।
* आज भी चल रही है जिसका उद्धरण आसाराम , रामरहीम और वर्तमान के समय ऐसी घटना सुनते और दीखाई देती है ऐसी नियोग की आज्ञा वैदिक ईश्वर २ पग पर चलने वाला मुर्ख मनुष्य जिसने वेदो को अपनी हवस और दुसरो का शोषण करने के लिए 3000 वर्ष पूर्व गढ़ी थी कुछ मुर्ख इसका पालन करते नजर आते है और उससे भी आसान शब्दों में समझा जाये तो नियोग यानि बलत्कार और वैश्या खाना से कुछ कम नहीं बरहाल आज नियोग की विधि क्या है ? ये जानेगे और नियोग के बारे में जानना चाहते हो तो यहाँ देखे 👉 नियोग एक कलंक अब देखते है आगे ......................................................
नियोग विधि
* हे स्त्री जीवित पति को लक्षय करके उठ खड़ी हो (यहा पर देवर,पंडित,ऋषि मुनि, इत्यदि की बात हो रही है।) मरे हुए पति के पास क्यों पड़ी है, आ हाथ ग्रहण करने वाले नियुक्त इस पति के साथ संतान जनने को लक्षय में रखकर संबंध कर।(नियोग कर) ( ऋग्वेद 10:18:8)
* जैसा कि पाण्डु राजा की स्त्री कुंती और माद्री आदि ने किया और जैसा व्यास जी ने चित्राडद्र और विचित्रवीर्य के मारे जाने के बाद उन अपनी भाइयो की पत्नियों के साथ नियोग करके अम्बिका में धृतराष्ट्र और अम्बालिका में पाण्डु और दासी से विदुर की उत्पत्ति की ये सब नियोग से हुई संतान है इत्यादि बात इतिहास से प्रमाणित है । ( 4 समुल्लास पेज नंबर 110 )
" कालेSदाता पितावाच्यो वाच्यशचानुपयन पतिः। "
* अर्थात : - विवाह की अवस्था ( १६ वर्ष या उसे भी काम )होने पर कन्या का विवाह न करने वाला पिता निंदनीय और दोषी होता है ।
( मनुस्मृति ९ : ४ )
मनुस्मृति 9 : 90
मनुस्मृति 9 : 88
" नियोग के अनुसार उत्पन्न हुआ पुत्र पति का ही होता है ,नियोग में स्त्री के उत्त्पन हुआ पुत्र स्त्री का ही होता
है । ( मनुस्मृति ९ : ३२ ,४९ , ५२ )
अर्थात : -अगर पति नपुंसक है या बीमार है तो अपनी पत्नी को दूसरे मर्द से मुँह काला करा कर बच्चा पैदा करवा सकता है और उस से जो बच्चा पैदा होगा वो असली पति यानि जो नपुंसक या बीमार ता उसका ही बच्चा माना जाएंगा जिसको हम लोगो आज की भाषा में हराम की ओलाद कहते है जिससे कई बड़े बड़े ऋषिमुनि पैदा हुई जो ऊपर सत्यार्थ प्रकाश का प्रमाण दिया गया है उसी प्रकार कोई विधवा अपनी हवस पूरी करके बच्चा पैदा करना चाहती तो वो भी किसी पुरुष के साथ मुँह काला करा के जो बच्चा पैदा होगा वो स्त्री का होगा बच्चा किसी का भी हो यहाँ पर ब्रह्मण और देवर आदि का काम तो हो गया।
* स्त्रियाँ खेती के समान है और पुरुष बीज के
( मनुस्मृति ९ : ३३ )
* अगर कोई विधवा हो और कोई रंडवा हो दोनों में समझौता हो जाये की बच्चा दोनों का होगा तो दोनों का माना जाएंगा ( मनुस्मृति ९ : ५३ )
रात में सैया दिन में भैया
* अब देखे अश्लीलता की हद पार कर दी है रात में नियोग नाम पर व्यभिचार और बलात्कार और दिन में भाभी और बहू ।
देवर की परिभाषा ?
ऋग्वेदादिभाष्यभूमिक नियोग विषय
* नियोग का काम जिससे लिया गया हो और विधवा का दूसरा पति देवर कहलाता है ।
निरुतकम 3 : 15
मनुस्मृति 9 अधयाय
* बड़ा भाई छोटे भाई की स्त्री के साथ और छोटा भाई बड़े भाई की स्त्री के साथ नियोग द्वारा विधिपूर्वक और संभोग करे और नियोग के अलावा अपराधी माना गया है । ( मनुस्मृति 9 : 58 )
* रात में औरतों की अदला बदली करो दिन में देवर भाभी और अपराधी क्या मिथ्या है ।
* नियोग का काम हो जाने के बाद देवर और भाभी , बड़ा भाई पुत्रवधु के समान व्यवहार करें ।
( मनुस्मृति 9 : 62 , 63 )
नियोग में 11पति और 10बच्चे पैदा की आज्ञा
* नियोग में एक स्त्री 11 से काम ले सकती है ।
अगर पति दूसरे देश जाए तो
* अगर पती धर्म के काम से बाहर जाए तो 8 वर्ष तक उसकी प्रतीक्षा करे , और पढ़ने की वजह
( विद्या प्रप्ति ) के लिए बाहर गया होता 6 वर्ष प्रतीक्षा करे और कमाई के लिए गया है तो 3 वर्ष फिर ना आये तो नियोग से बच्चे पैदा करले ( मनुस्मृति 9 : 75-76 )
हिंदूइस्म और बहुविवाह
मनुस्मृति 9 : 80
* अगर स्त्री केवल पुत्री ही पुत्री जने तो दूसरा विवाह कर लेना चाहिए 👇👇👇
मनुस्मृति 9 : 81
मनुस्मृति 9 : 82
स्त्री भूमि खेती।
* बच्चे पैदा करने के लिए स्त्रियों की रचना हुई है केवल ( मनुस्मुर्ती ९ : ९६ )
* स्त्रियो को भूमि और खेती के समान माना जाता है ! ( मनुस्मुर्ती ९ : ३३ )
■■
* वेदों के अनुसार स्त्री केवल संतान उत्पादन का यंत्र है
(ऋग्वेद 10 : 85 : 45 )
■■
हिन्दुइस्म के अनुसार स्त्रियाँ खेती है ?
* बच्चे पैदा करने के लिए स्त्रियों की रचना हुई है केवल ( मनुस्मुर्ती ९ : ९६ )
* स्त्रियो को भूमि और खेती के समान माना जाता है ! ( मनुस्मुर्ती ९ : ३३ )
* आत्मा वाली उपजाऊ धरती यह नारी आई है , हे नर उस स्त्री में बीज बो वह नारी पुरुष के दूध के जैसा वीर्य ( पानी ) को धारण करती है
और तेरे लिए बच्चे पैदा करे !
( अर्थर्वेद १४ : २ : १४ )
वेदो के अनुसार कितने बच्चे पैदा करे ?
* हे वर इस स्त्री को उत्तम पुत्र कर इसमें १० बच्चो को पैदा कर और ११ तू होजा !
( ऋग्वेद १० : ८५ : ४७ )
वेदो के अनुसार स्त्री बच्चे पैदा करने की मशीन
* वीर्य सींचने , वीर्य धारण करके स्त्री बच्चे के लिए योनि में वीर्य को धारण करे वीर्य सींचने पराक्रम करके बच्चे आपके संग पुत्रो का प्राप्त होवे !
( यजुर्वेद ८ : १० )
* भावार्थ : - स्त्रियाँ बच्चो को पैदा करे और आनंद प्राप्त करे !
Ved aur nari
* यह स्त्री पुरुष की कामना करती आई है और पुरुष स्त्रियों की कामना करता हुआ आया है जैसे हिंसता हुआ घोडा ! ( अर्थववेद २ : ३० : ५ ) घोड़े के जैसा पावर से करना चाहिए !
* पुरुष का लिंग स्त्री की योनि में प्रवेश करता हुआ वीर्य को छोड़ता है
( यजुर्वेद १९ : ७६ )
* हे मनुष्य स्त्री इस पति के सुन्दर अंग से सिर के साथ सिर मुँह में मुँह मिला और दोनों बच्चे पैदा करो ! ( यजुर्वेद १९ : ८८ )
* हे स्त्री आ और योनि में पुरुष का वीर्य प्राप्त करके बच्चे पैदा कर !
( यजुर्वेद १९ : ९४ )
* मेरी याद करके बीज के भाग में योनि अंडे की आकरमें सम्भोग का आनंद लेकर लिंग से द्वारा बच्चे पैदा कर ( यजुर्वेद २० : ९ )
* पुरुष के लिए बच्चे पैदा कर !
( अर्थवेद ४५ : २ : २४ )
* हे वधु तू प्रसन्न चित होकर ऊपर चढ़ और यहाँ इस पुरुष के लिए बच्चे पैदा कर ( अर्थवेद १४ : २ : ३१ )
* स्त्री को निश्चय करके प्राप्त हुई है और उन्होंने शरीर को शरीर से मिलाया है , हे ! नारी इस पुरुष के लिए बच्चे पैदा कर ! ( अर्थवेद १४ : २ : ३२ )
* तुम दोनों सम्भोग करो और बच्चे पैदा करो पुरुष स्त्री के ऊपर हो और बच्चे पैदा कर
( अर्थवेद १४ : २ : ३७ )
* हे पुरुष उस स्त्री को काम पर लगा जिस में मनुष्य लोग वीर्य डालते है जो हमारी कामना करती हुई दोनों जंघाओं को फैलाये और कामनापूर्ण करते हुए मजे ले ! ( अर्थवेद १४ : २ : ३८ )
* तूम जांघो के ऊपर आ हाथो का सहारा दे प्रसन्न चित होकर स्त्री गर्भाधारण करके बच्चे पैदा कर !
( अर्थवेद १४ : २ : ३९ )
Ved aur nari
* तूम दोनों बच्चे पैदा करो !
( अर्थवेद १४ : २ : ४० )
* जन नियंत्रण कानून कहते है यहाँ तो बच्चे पैदा करते रहो इतने बच्चे बच्चे सुन सुनकर मेरे आँखों के सामने बच्चे ही बच्चे नजर आ रहे है ?
आर्य।
दयानंद और आर्य
* सभी मित्रों के लिए एक लेख !
*आर्य समाज का सच्च ! आर्य समाज की स्थापना लग भग 130-135 वर्ष पहले झुट की बुनियाद पर हुई है वो झुट है दुसरी की धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाना और उनकी धार्मिक ग्रर्न्थो पर अपनीं मंदबुद्धि से टिप्पणी करना ?
* आज कल हमारी युवा पीढ़ी के लोगो भी आर्य समाजी की बातो को सुनकर इस्लाम और उनके मानने वालों पर टिप्पणी करना चालू कर दि है और अपने आपको बुद्धिमान समझने लगे है , मुझे तो हंसी आती है ऐसे मूर्खो पर बरहाल इस्लाम विरोधीयो को कोइ ना कोई मुद्द चाहिए ही !
* क्या इन्हें पता है कि इन लोगो के बारे में आर्य समाजी की क्या मानसिकता रखते है ।
* या केवल आपका इस्तमाल कर रहे है मुसलमानो के विरूद्ध में ।
* चलो आओ कुछ बाते जाने ?
* आर्य समाज की पुस्तक सत्यार्थ प्रकाश और ऋग्वेदादी भाष्यभूमिक से प्रमाण लिए गए है !
हिंदूइस्म के देवी वेदता का अपमान
* प्रशन : - देखो ! कलकत्ता की काली और कामाक्ष आदि को लाखों मनुष्य मानते है ?
क्या ये चमत्कार नही ?
उत्तर : - कुछ भी नही ! वे अंधे लोग भेड़ के तुल्य है , एक के पीछे दूसरे चलते है ।खाई में गिरते है ; हट नही सकते वैसे एक मुर्ख के पीछे दूसरे चलकर मूर्ति पूजा में फंसकर दुख पाते है ।
(मूर्ति पूजक को मुर्ख कहा जा रहा है !
अगर ये एक मुसलमान कहता तो बवाल हो जाता ?)
* इसी तरह से महादेव , कोटपाल , कलभैरोव इत्यादि के बारे में टिप्पणी की गए है !
सोमनाथ का सच दयानद जी की जुबानी
* प्रश्न : - देखो सोमनाथ जी पृथ्वी के ऊपर रहता था बडा चमत्कार है , क्या यह मिथ्या बात है ?
* उत्तर : - हा ! ये मिथ्या है सुनो ऊपर नीचे चुम्ब पाषण लगा रखे थे !उसे आकर्षण से मूर्ति अधर खड़ी थी ।
( अगर ये एक मुसलमान कहता तो बवाल हो जाता ? क्योंकि की आस्था का मामला बन जाता और अब आस्था कहा गई ?)
भगवात पुराण का अपमान
* वाह रे वाह ! भागवत के बनाने वाले
लालभुजक्कड़ ?
क्या कहना ! तुझको ऐसी -ऐसी बाते मिथ्या बाते लिखने में तनिक भी लज्जा और शर्म नही आई , निपट अंधा ही बन गया ।
(अगर ये एक मुसलमान कहता तो बवाल हो जाता ?)
* जो चोर , डाकू , कुकमरी लोग है , वे भी तुम्हारे देवताओं के अधीन होंगे ?
देवता ही उन् से दुष्ट काम करता है ?
जो वैसा है तो तुम्हारे देवता और रक्षक में कोई भेद न रहेंगा ?
(अगर ये एक मुसलमान कहता तो बवाल हो जाता ?)
* प्रश्न :- क्या गरुड़ पुराण भी झुटा है ?
उत्तर :- हा असत्य है !
(अगर ये एक मुसलमान कहता तो बवाल हो जाता ?)
* प्रश्न : - क्या यमराज , चित्र गुप्त के पर्वत के समान शरीर वाले जीव को पकड़ कर ले जाते है , पाप , पुण्य के अनुसार नरक व स्वर्ग में डालते है ।
उस लिए दान ,पुण्य , श्रद्धा , तपुर्ण इत्यादि के लिए करते है , ये बाते झुट क्यों कर हो सकती है ?
प्रश्न : - ये सब पोपलीला के गपोड़े है ।
😢😢😢😢
* इसे आगे दान ,पुण्य , श्रद्धा , तपुर्ण इत्यादि का मजाक उड़ाया है ?
* दान ,पुण्य , श्रद्धा , तपुर्ण इत्यादि उन मारे हुए जीव को तो नही पूछता किंतु मृतको के प्रति निधि पॉप जी ( पंडित जी ) के घर और हाथ मे पहुचाता है ।
* यहां तो इन्होंने महाभारत के 88 अध्ययन का रद्द ही कर दिया । 😢
* सारे पुरानो को वेद विरोधी बता रहे है ये तो
क्या ये सत्य है ???????
और कई मंत्रो का भी मजाक उढाया है
*और भी बोहत कुछ है *
(सत्यार्थ प्रकाश 11 समुलास
पेज नंबर 259 to 291 )
* पुजारी लोग उनके नाम पर भीख मांगते हैं और उनको भिखारी बनाते है ।
(अगर ये एक मुसलमान कहता तो बवाल हो जाता ?)
संत कबीर का भी अपमान ?
* प्रश्न : - कबीर पंथी तो अच्छा है ?
उत्तर : -नही !
* वह उटपटांग भाषा बनाकर जुलाहै आदि नीच लोगो को समझाने लगा । तंबूरा लेकर गता था , भजन बनाता था , विशेष पंडित , शास्त्रों , वेदों की निंदा कर था ( उनको सच्च का आईना बताते थे इसलिए वो गलत हो गए जो इंके सुर में सुर मिलाए तो ठीक नही सब गलत 👍👍 )
* मुर्ख लोग उस के जाल में फंस गए जब मार गया तो उसे शिद्ध बना लिया ।
जो जो उसने लिखा था उसको उसके चेले पड़ते थे और लोगो को गुमराह करने लगे ,
भला विचार देखो की इस मे आत्मा की उनत्ति और ज्ञान क्या बढा सकता है ,
यह केवल लड़को की खेल की लीला के समान है । 😢😢😢😢😢😢😢
(सत्यार्थ प्रकाश 11 समुलास
पेज नंबर 292 to 293 )
इसी तरह से गुरु नानक जी का भी अपमान किया है ?
* नानक जी का आशय तो अच्छा था , परन्तु विद्या कुुुछ नही थी , वेददी शास्त्र कुछ नही जानते थे , नही संस्कृत । अगर जनते होते तो ,निर्भय शब्द को निर्भा क्यों लिखते ?
( इसलिए ये दयानद जी अपने सिवा किसी को विद्वान नही समझते थे , लगता है पूरे विश्व का ज्ञान दयानद को ही था ? )
* इसलिए पहले ही अपने शिष्यों के सामने कही कही वेदों के विरोध में बोलते थे , और कही कही वेदों को अच्छा भी कहा है,
क्यों कि अच्छा न बोलते तो लोगो उन्होंने नास्तिक बनाते ?
आर्यो को मिला को मिला है किसी को आस्तिक और किसी को नास्तिक बनाने का सर्टिफिकेट
* जो नानक जी वेदों ही का मान करते तो उनका संप्रदाय न चलते
न वे गुरु बन सकते थे क्यों कि संस्कृत विद्या तो आती नही थी ,
तो दूसरों को पढ़ा कर शिष्य कैसे बनाते ?
* मूर्ति पूजा तो नही करते थे परंतु विशेष ग्रंथ की पूजा करते थे , क्या ये मूर्ति पूजा नही ???????
* जैसे मूर्ति पूजा वाले लोगों अपनी दुकान जमकर जीविका ठाडि की है , वैसे इन लोगों ने भी कर ली है ।
* जैसे मूर्ति पूजारी मूर्ति के दर्शन करते है और भेंट चढ़ावाते है वैसी ही नानक पंक्ति लोग गर्न्थो की पूजा करते है ।
* जैसे मूर्ति वाले मूर्ति पूजा ते है वैसे ही ये ग्रन्थ साहब की करते है !
* हा ! यहाँ कहा जा सकता है कि न इन्होंने देखा ना हीँ सुना इसलिए !
(सत्यार्थ प्रकाश 11 समुलास
पेज नंबर 293 to 295 )
* जो वेदविद्या हीन है
यानी जो वेदों को नही जानता वो
वह अनाड़ी है ( शुद्र है । )
* मनुस्मृति का वचन *
जो वेदों की निंदा करता है वो नास्तिक है ।
( 1 : 130 )
* मतलब कि चाटु कारिता करो तो ठीक है !
मनुस्मृति ( 1 : 91 )
नही तो ?
* (वेदविरोधी) उन लोगो को काट डाल, उसकी खाल उतार दे,उसके मांस के टुकडो को बोटी-बोटी कर दे,उसके नसों को एठ दे,उसकी हड्डियों को मसल डाल उसकी मिंग निकाल दे,उसके सब अडो(हस्सो) और जुडो को ढीला कर दे(अथर्वेद 12:5:7) जो आज -कल हो रहा है, लोगो के साथ इंडिया में (अफसोस कि बात है) हमारे दलित,ईसाइयो , इत्यादि साथ हो रहा है।
ऋग्वेद 10 :90 : 12
* यजुर्वेद 31 : 10- 11
* मनुस्मृति 1 :87
💐* वाह भाई वाह या पोप लीला है *💐
शुद्रो की परिभाषा बताई है उसके मुताबिक पूरी दुनिया मे 99 % लोगो शुद्र हो गए ! 👌👌
* दयानंद सरस्वती जी का कहना है कि यूनान, मिस्र , यूरोपीय देशों, इत्यादि , हब्शी ,मगोलिन अरब देशों में बसने वाले सब शुद्र है , की इन्होंने वेदों को देखा नही ना ही सुना ?
( सत्यार्थ प्रकाश 7 समुलास )
* मतलब जानते नही थे मतलब अनाड़ी थे
तो साफ कहो न कि वह शुद्र थे ।
हर हकीकत में शूद्रो में ही ज्ञानी पैदा तो है ना कि xyz में पूरी दुनिया जानती है ।
* स्वामीनारायण का भी अपमान
* उसने देखा कि यह देश मुर्ख भोला भला है
( देश को मूर्ख कहा ईरानी ने )
जैसे इन लोगो को अपने मत में झुक ले वैसे ये झुक सकते है । वह उसने दो चार चेले
बनाये । नारायण का अवतार बात कर
प्रशिद्ध हो गया । नाक वाली कहानी तो सुना ही है उस का झुट मुट का बता कर मजाक उठाया है । (सत्यार्थ प्रकाश 11 समुलास
पेज नंबर 303 to 307)
*इसी तरह बौद्ध , जैन , ईसाई इत्यादि का अपमान किया है । 12 ,13 , 14 समुलास में
* आर्य समाजीयो ने नफरत का बीज बोया है लोगो मे नही तो कोई ये पुस्तकें के पहले की कुछ बात बता दे कि इस तरह से किसी ने किसी का अपमान किया हो ?
* उसके आगे आपकी मर्जी जितना बताने की आवश्यकता थी उतना प्रमाण दे दिया आगे स्वम देख लेना ?
* इसी बाते पढ़ कर और सुनकर मानव जाति का सिर शर्म से नीचे झुक जाता है !
😢😢😢😢😢
* आओ मिलकर ये कलंक धोते है जो मानव जाति के लिए हानिकारक है ।
जो एक दूसरे का अपमान करने की शिक्षा देता है । या फिर वेद ?
* आर्य ( ब्रह्मणो ) की चाल और धोखा यही करता है । खुद 3.5 % है , 96.5 % पर राज करना चाहते है ।
* उन्होंने एक चाल रची " हिन्दू " शब्द की हिंदूइस्म की कोइ भी किताब में हिन्दू शब्द नही है ।
* दयानद सरस्वती के मुताबिक हिंदू शब्द मुगलो की दी हुई गली है ।
* हिन्दू शब्द की चाल में इंडिया का 75-80 % लोगो को फसा रखा है ।
* अगर देखा जाये तो NT ,ST, OBC. में 1500 जाति ( गोरह ) है जो कि वेदों को नही मानते ना जानते । दयानद के मुताबिक जो वेदों को नही जानता और मानता वो अनाड़ी है ( यानी शूद्र है ) और इन्ही को हिन्दू शब्द के माया जल में फसा कर । इनसे काम लेते है ,
* ये लोग अपनी 2500 - 3000 साल की गुलामी भूल बैठे है , और बाबा अम्बेटकर , और इत्यादि की क़ुरबानी जब इनका काम निकल जायेगा तो फिर से ये तुमको गुलाम बना देंगे ।
धन्यवाद..............................
नास्तिक।
* जो वेदों और अन्य धार्मिक पुस्तकों को न माने वे अनार्य , शुद्रो , मलेच्छ , मूर्ख , नास्तिक काफिर इत्यादि है ।
* वेदों का इनकार करने वाला )
विज्ञान।
वेद और आधुनिक विज्ञान
* मेरा काम वेदों के ऊपर प्रश्न चिन्ह लगाना नही बल्कि उन लोगो की बुद्धि का ताला खोलना है जो कि वेदों में ज्ञान विज्ञान की बाते करते नजर आते है कि वे भ्रम की जिंदगी व्यतीत कर रहे है । जो इनके पंडो ने बता रखा है । ये तो 100 % स्पष्ट है , की वेद न तो कोई ईश्वरीय ज्ञान , वाणी नही कोई ईश्वरीय ग्रन्थ ।
बल्कि कोई 2 पग पर चलने वाला हवस के पुजारी के लिखे हुए जिसने अपने स्वार्थ सिद्ध करने के लिए ऐसे कलंकित ग्रन्थ की रचना की , जिससे लोगो का आर्थिक , मानसिक एव शरीरिक शोषण किया जाए जिसका उदाहरण नियोग , मारकाट आदि आदि वेदों में भरा हुआ है ।
* आये देखते है ज्ञान विज्ञान के कुछ उद्धरण जो समझदारों के लिए इशारा काफी होगा ।
* यजुर्वेद का यह मंत्र कह रहा है , की सूर्य केवल अपनी ही परिधि में घूमता है अन्य किसी भी लोकांतकर के नही , इसमें भी गोल माल है ,ठीक है पल भर के लिए मान लेते है , की सत्य परंतु अर्थववेद क्या कह रहा है ?
* और यहाँ कह रहा है , सब लोको के चारो और घूमता है , ये है वैदिक ईश्वर का अधूरा ज्ञान इससे शिद्ध हुआ किया ये कोई ईश्वरीय ग्रन्थ नही बल्कि मानव रचित है ईश्वर के ज्ञान में कभी भी विरोधाभास नही होता केवल मानव के ज्ञान में ।
* कुछ और उद्धरण नीचे है जिससे और आपको स्पष्ट होगा मिथ्थाई ग्रन्थ वेदों के बारे में कही घूम रहा है , कही रोका हुआ , कही कुछ कही कुछ ।
* इसलिए कहा था कि ये पुस्तक मनोरंजन से भरी पढ़ी है यही वजह थी कि प्रचीन काल के लोग इससे व्यर्थ समझते थे और ये गधे इस में विज्ञान बताते है क्या मिथ्था है अगर ये सब जानने के बाद भी कोई ऐसा कहे वो महामूर्ख नही तो क्या होगा आप स्वयं ही बातए ।
■■■
( अथर्वेद 6:77:1 )
* जिसमे भूमि, अंतरिक्ष और आकाश दृढ स्थापित है। (अथर्वेद 10:7:12)
* यजुर्वेद( 32:6 , 1:21 , )
अथर्वेद(13:1:6) में भी यही बाते लिखी है।
* सूर्य आदि लोको को रच कर और उसने सबको डोरी लगाकर बांद दिया है।
(अथर्वेद 4:1:4 )
अगर डोरी छोड़ दोंगे तो सब भाग जाएंगे क्या ?
* हे मनुष्य ! जो तेरा मन NOTE:-( चारो दिशाओं में भ्रंश वाली पृथ्वी पर)
( मतलब चार कोनो वाली पृथ्वी पर) दूर तक जाता है।( ऋग्विद 10:58:3)
* इस मंत्र में पृथ्वी को 4 कोनो वाली बताई गई है ।
■■■
वेद और विज्ञान
* सभी मित्रों के लिए एक महत्वपूर्ण लेख ! जो वेदों के ज्ञान - विज्ञान बताते फिरते है उनके मुह पर एक तमाचा साबित होगा अर्थात विज्ञान के नाम पर गंदगी फैलाते नजर आते है और हैरत की बात तो ये है कि मूर्खो को तनिक भर भी लज्जा नही आती और कहते है , की ( NASA ) वेदों से पढ़ कर रिसर्च अर्थात खोज करता है जो कि एक बहुत बड़ा मिथ्था भाषण है जिसका कही से न तो सिर है ना ही पाव केवल स्वयं का ह्रदय प्रसन्न करते रहते है ।
बेचारे अंधकार में फसे है और मान बैठे है , की वास्तव में वेदों में ज्ञान - विज्ञान भरा हुआ है ।
वेद और ईश्वर
* मान लिया कि वेद ईश्वरीय ज्ञान है पर ऐसा अपूर्ण ज्ञान वैदिक ईश्वर को यह नही पता कि मैंने किस वेद में क्या ज्ञान दिया है और दूसरे वेद में क्या अर्थात यजुर्वेद में कुछ और कहा और अर्थववेद में कुछ वाह क्या ज्ञान है।
* कमाल है , वैदिक ईश्वर के ज्ञान पर प्रशन चिन्ह
( ? ) लगता है इसका अभिप्राय : यह है , की वेद मंत्रों में विरोधाभास है , जिसको पढ कर सर चकरा जाता है।
* की किस मूर्ख ने यह सब लिख दिया है कहि कुछ कही कुछ वेदों का ज्ञान विज्ञान की पुस्तक तो नही अपितु कामसूत्र एव मनोरंजन की पुस्तक कह सकते है जिसको देख कर केवल हंसी आए ये कोइ बात हम हवा हवाई नही बल्कि वैदिक धर्म के मानने वाले बड़े बडे प्रचीन वेदाभाष्यकर्ता स्वयं कहते है ,की वेद अर्थहीन है । आइए जानते है ?
लोकायत - मत
कर्मकाण्डी
1 . लोकायत मत : - के लोग तो मंत्र को इसलिए अर्थहीन मानते थे , की इनमें उल - जलूल बाते भरी पड़ी है , वेदों की कोई सत्ता नही इन्हें मानना व्यर्थ हैं ।
2 . कर्मकाण्डीयो : - का कहना था कि वेदों का कोई अर्थ नही किंतु उनका पाठ अनिवार्य है , पाठ करने में अर्थ का ध्यान नही रहता हम निष्ठा से पाठ करते है , क्योंकि यह हमारा धर्म है ।
* क्योंकि वेद अर्थहीन भले ही झाड़ फूंक करने के निर्रथक मंत्रो में ऐसा परिवर्तन किया की कार्यकारि शक्ति नष्ट हुई । क्या मिथ्था है , हंसी आती है ।
वेदमन्त्र में विरोधाभास
* वैदिक मंत्र इसलिए भी निरर्थक है , क्योंक की वे आपस मे ही विरोध करते है ।
उदाहरण ० कभी तो पृथ्वी केवल एक ही रुद्र है होने की बात करते है तो कही हजारों रुद्रों को ला बैठाते है
कभी इंद्र को जन्म से ही शत्रु हीन कहते है , कभी कुछ क्या खेल है ? यास्क फिर लौकिक प्रयोग के सामने सिर झुका देते है ।
* तो बड़े बड़े भाष्यकर्ताओ का मत है , की वेदों का कोई अर्थ ही नही और ये मूर्ख वेदों में ही विज्ञान की बाते करते है क्या मिथ्था से कम प्रतीत नही होता ।
वेद और आधुनिक विज्ञान
* मेरा काम वेदों के ऊपर प्रश्न चिन्ह लगाना नही बल्कि उन लोगो की बुद्धि का ताला खोलना है जो कि वेदों में ज्ञान विज्ञान की बाते करते नजर आते है कि वे भ्रम की जिंदगी व्यतीत कर रहे है । जो इनके पंडो ने बता रखा है । ये तो 100 % स्पष्ट है , की वेद न तो कोई ईश्वरीय ज्ञान , वाणी नही कोई ईश्वरीय ग्रन्थ ।
बल्कि कोई 2 पग पर चलने वाला हवस के पुजारी के लिखे हुए जिसने अपने स्वार्थ सिद्ध करने के लिए ऐसे कलंकित ग्रन्थ की रचना की , जिससे लोगो का आर्थिक , मानसिक एव शरीरिक शोषण किया जाए जिसका उदाहरण नियोग , मारकाट आदि आदि वेदों में भरा हुआ है ।
* आये देखते है ज्ञान विज्ञान के कुछ उद्धरण जो समझदारों के लिए इशारा काफी हो
* यजुर्वेद का यह मंत्र कह रहा है , की सूर्य केवल अपनी ही परिधि में घूमता है अन्य किसी भी लोकांतकर के नही , इसमें भी गोल माल है ,ठीक है पल भर के लिए मान लेते है , की सत्य परंतु अर्थववेद क्या कह रहा है
* और यहाँ कह रहा है , सब लोको के चारो और घूमता है , ये है वैदिक ईश्वर का अधूरा ज्ञान इससे शिद्ध हुआ किया ये कोई ईश्वरीय ग्रन्थ नही बल्कि मानव रचित है ईश्वर के ज्ञान में कभी भी विरोधाभास नही होता केवल मानव के ज्ञान में ।
* कुछ और उद्धरण नीचे है जिससे और आपको स्पष्ट होगा मिथ्थाई ग्रन्थ वेदों के बारे में कही घूम रहा है , कही रोका हुआ , कही कुछ कही कुछ ।
◆◆◆
कामसूत्र
सब को पता है की केवल वेद कामसुत्र और अश्लीता से भरा पढ़ा है और इसके अलावा कुछ नहीं
* वेद केवल सेक्स की पुस्तक है जिस से मनुष्य केवल बलात्कारी बन सकता है और ज्ञान - विज्ञानं से इस का दूर दूर तक कोई लेना देना नहीं
कामसूत्र
ऋग्वेद १ : १३ : 5 में लिखा है की अंतरिक्ष पानी से भरा है यानि चंद्र , सूर्य आदि ग्रहो में पानी है और हर जगह क्या मिथ्या है
◆◆
वेद का ग्यान का भण्डार अओ जान
* सूर्य नीचे नीचे गिरता है , तो उठा लो
😊😊😊😊😊👌
■■
* कहते है कि वेदों में बहुत ज्ञान - विज्ञान भरा जिसका एक उदाहरण !
😊😊😊😊😊😊
Subscribe to:
Comments (Atom)
दयानन्द के अनर्थ
दोस्तों मैं एक मुसलमान हूं इसलिए मेरा फर्ज है समाज की गंदगी को खत्म करना इसलिए आर्य समाज नामी गंदगी को खत्म होना चाहिए जिसने समाज को गुमराह ...
-
ईश्वर निराकार हैं क्योंकि उसका कोई आकार सीमित नहीं किन्तु वह सभी प्राणियों के रूप में जन्म लेता है। वह परमातामा सभी दिशाओ उपदिशाओं जन्म लि...
-
संस्कार विधि में रजस्वला स्त्री के स्पर्श का भी निषेध। उसके हाथ का पानी भी नहीं पीना। आश्चर्य की बात है जहां आर्य समाजी रजस्वला स्त्रियों से...
-
(वैदिक ईशवर) आज्ञा देता हूं, की तू मन, कर्म और शरीर से व्यभिचार कभी मत करो, किंतु धर्मपूर्वक विवाह और नियाग से संतानउतपन्न करते रहो।( वाह क्...
