ऐतरेय ब्राह्मण(3/24/27) के अनुसार वही नारी उत्तम है, जो पुत्र को जन्म दे। (35/5/2/४7) के अनुसार पत्नी एक से अधिक पति ग्रहण नहीं कर सकती, लेकिन पति चाहे कितनी भी पत्नियां रखे। आपस्तब (1/10/51/ 52) बोधयान धर्मसूत्र (2/4/6) शतपथ ब्राह्मण (5/2/3/14) के अनुसार जो स्त्री अपुत्रा है, उसे त्याग देना चाहिए। तैत्तिरीय संहिता(6/6/4/3) के अनुसार पत्नी आजादी की हकदार नहीं है। शतपथ ब्राह्मण (9/6) के अनुसार केवल सुंदर पत्नी ही अपने पति का प्रेम पाने की अधिकारी है। बृहदारण्यक उपनिषद् (6/4/7) के अनुसार अगर पत्नी संभोग करने के लिए तैयार न हो तो उसे खुश करने का प्रयास करो। यदि फिर भी न माने तो उसे पीट-पीटकर वश में करो। मैत्रायणी संहिता(3/8/3) के अनुसार नारी अशुभ है। यज्ञ के समय नारी, कुत्ते व शूद्र को नहीं देखना चाहिए अर्थात नारी व शूद्र कुत्ते के समान हैं। (1/10/11) के अनुसार नारी तो एक पात्र(बर्तन) के समान है। महाभारत(12/40/1) के अनुसार नारी से बढक़र अशुभ कुछ भी नहीं है। इनके प्रति मन में कोई ममता नहीं होनी चाहिए। (6/33/32) के अनुसार पिछले जन्म के पाप से नारी का जन्म होता है। मनुस्मृति(100) के अनुसार पृथ्वी पर जो कुछ भी है, वह ब्राह्मणों का है। मनुस्मृति(101) के अनुसार दूसरे लोग ब्राह्मणों की दया के कारण सब पदार्थों का भोग करते हैं। मनुस्मृति (11-11-127) के अनुसार मनु ने ब्राह्मणों को संपत्ति प्राप्त करने के लिए विशेष अधिकार दिया है। वह तीनों वर्णों से बलपूर्वक धन छीन सकता है अर्थात चोरी कर सकता है। मनुस्मृति (4/165-4/१६६) के अनुसार जान-बूझकर क्रोध से जो ब्राह्मण को तिनके से भी मारता है, वह 21 जन्मों तक बिल्ली की योनी में पैदा होता है। मनुस्मृति (5/35) के अनुसार जो मांस नहीं खाएगा, वह 21 बार पशु योनी में पैदा होगा। मनुस्मृति (64 श£ोक) अछूत जातियों के छूने पर स्नान करना चाहिए। गौतम धर्म सूत्र(2-3-4) के अनुसार यदि शूद्र किसी वेद को पढ़ते सुन लें तो उनके कान में पिघला हुआ सीसा या लाख डाल देनी चाहिए। मनुस्मृति (8/21-22) के अनुसार ब्राह्मण चाहे अयोग्य हो, उसे न्यायाधीश बनाया जाए वर्ना राज्य मुसीबत में फंस जाएगा। इसका अर्थ है कि वर्तमान में भारत के उच्चत्तम न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश श्री कबीर साहब को तो हटा ही देना चाहिए। मनुस्मृति (8/267) के अनुसार यदि कोई ब्राह्मण को दुर्वचन कहेगा तो वह मृत्युदंड का अधिकारी है। मनुस्मृति (8/270) के अनुसार यदि कोई ब्राह्मण पर आक्षेप करे तो उसकी जीभ काटकर दंड दें। मनुस्मृति (5/157) के अनुसार विधवा का विवाह करना घोर पाप है। विष्णुस्मृति में स्त्री को सती होने के लिए उकसाया गया है तो शंख स्मृति में दहेज देने के लिए प्रेरित किया गया है। देवल स्मृति में तो किसी को भी बाहर देश जाने की मनाही है। बृहदहरित स्मृति में बौद्ध भिक्षु व मुंडे हुए सिर वालों को देखने की मनाही है।
गंगा से कांवड़ इसलिए लाई जाती है कि गंगा का पानी अपने स्थानीय शिव के मंदिरों में चढ़ाया जाए, जबकि हमारे धर्म शास्त्र कहते हैं कि गंगा तो शिवजी की जटाओं में रहती है। और दूसरे धर्मशास्त्र यह भी कह रहे हैं कि शिवजी तो कैलाश पर्वत पर रहते हैं। फिर यहां मूर्तियों पर गंगाजल चढ़ाने का क्या अभिप्राय: है? यह केवल एक हठयोग है। यदि पिंडदान करने से ही कोई स्वर्ग पहुंच जाता है तो आजकल के महाराज या भगवान लोगों को मोक्ष प्राप्ति के लिए किस आधार पर प्रवचन कर रहे हैं? यह काम तो केवल पिंडदान से ही हो जाएगा। मृत्यु भोज तो गिद्ध, लक्कड़बघ्घे, कब्वे व चील किया करते हैं। यह मानव का भोज कबसे हो गया?
सत्यार्थ प्रकार के चौथे समुल्लास में पुनर्विवाह के संबंध में मनु के एक श£ोक का हवाला देकर यह सिद्ध कर दिया कि वे स्वयं भी इस पाखंडवाद अर्थात ब्राह्मणवाद से पीछा नहीं छुड़वा पाए थे क्योंकि वे मनु के ही एक श£ोक का समर्थन करते हैं कि यदि ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य वर्ण(द्विज) की लडक़ी, जिसका मुकलावा(गौणा) नहीं हुआ है और विधवा हो जाती है तो उसका पुनर्विवाह किया जा सकता है, अन्यथा नहीं। यदि शूद्र वर्ण की लडक़ी है, चाहे उसका गौणा हो चुका है, विधवा होने पर उसका पुनर्विवाह किया जा सकता है.
(आर्यसमाजी भाई, कृपया सत्यार्थ प्रकाश को ध्यान से पढ़ें)।