Friday, 9 May 2025

दयानन्द के अनर्थ

दोस्तों मैं एक मुसलमान हूं इसलिए मेरा फर्ज है समाज की गंदगी को खत्म करना इसलिए आर्य समाज नामी गंदगी को खत्म होना चाहिए जिसने समाज को गुमराह किया  ओर भोले भाले सनातनी भाइयों को अधर्म का मार्ग दिखाया
इसलिए मैं ग़लत के खिलाफ खड़ा हूं
और जो भी बात जहां से मिलती है पेश करता हूं।

नियोगानंद ने अपने गूदा में अंधा सांप घसोड़ लिया 🤣🤣🤣
जी हां दोस्तों वेद मत्रों का ऊलजुल अर्थ करने वाला दयानंद सांपों को गुदेंद्रीय में घसोड़ाने की बात करता है
चलिए शुरू करते हैं,,,

पूषणं वनिष्ठुनान्धाहीन्स्थूलगुदया सर्पान्गुदाभिर्विह्वत आन्त्रैरपो वस्तिना वृषणमाण्डाभ्यां वाजिनग्वगं शेपेन प्रजाग्वं रेतसा चाषान् पित्तेन प्रदरान् पायुना कूश्माञ्छकपिण्डैः ॥
 ~ यजुर्वेद (अध्याय २५, मंत्र ७}

दयानंद अपने यजुर्वेदभाष्य में इस मंत्र का अर्थ यह लिखते हैं कि---

हे मनुष्यों! तुम मांगने से पुष्टि करने वालों को स्थूल गुदेंद्रियों के साथ वर्तमान, अंधे सर्पों को गुदेंद्रियों के साथ वर्तमान विशेष कुटिल सर्पों को आंतों से, जलों को नाभि के नीचे के भाग से, अंडकोष को आंडों से, घोडे के लिंग और वीर्य से संतान को, पित्त से भोजनों को, पेट के अंगो को गुदेंद्रिय और शक्तियों से शिखावटों को निरंतर लेओं।

अब कोई इन नियोग समाजीयों से यह
पूछे कि उन्हें दयानंद द्वारा किये गये अधिकांश मंत्रो के ऐसे अर्थ अश्लील क्यों नहीं लगते?

तो अब नियोग समाजी हमें बताए कि दयानंद के इन भाष्यों के बारे में उनकी क्या राय है?
 दयानंद द्वारा किया यह अर्थ उन्हें अश्लील लगता है या नहीं??

प्रश्न १ दयानंदी हमें बताए कि अंधे सर्पों को गुदा में घुसाने और कुटिल सर्पों को आंतों से लेने की आज्ञा क्या ईश्वर ने देता हैं?

यदि देता है तो आर्य समाजी दिन में ये कितनी बार लेते हैं?

प्रश्न २ दयानंदी हमें यह बताये अंधे कुटिल सर्पों और घोड़े के लिंग को गुदा व आंतों में निरंतर लेते रहने के पीछे का विज्ञान क्या है 🤔 ज़रा वो भी समझा दे तो बहुत अच्छा होगा।
 दयानंदी गुदा व आंतों में अंधे कुटिल सांपों एवं घोड़ों के लिंग को निरंतर लेते रहने की विशेष युक्ति का खुलासा करें, क्योकि दयानंदीयों के सर्पों के साथ इस कृत्य की कल्पना करके भी, हमारी समझ से तो बाहर हैं कि सांपों को ये किस युक्ति से प्रवेश देते होंगें ?

प्रश्न ३ सर्पों को गुदेंद्रिय में लेने की आवश्यकता क्या हैं? 
गुदेंद्रिय आनंद ही अगर अपेक्षित हैं, तो सांप के समान आकार वाली अन्य वस्तुओं का विकल्प भी तो है न आपके लिए? 
और यदि लेते समय साँप घबराकर आपको अंदर या बाहर से काट लेवें, तो डाक्टर के पास जाकर क्या कहोगें ?

प्रश्न ४ अर्थ मे आता हैं कि "अंडकोष को आंडों से निरंतर लेओं" 
अब दयानंदी पहले तो अंडकोष और आंडों के बीच का अंतर बतायें, और फिर ये बतायें कि अंडकोष से आडों को किस प्रकार लिया जा सकता हैं?

उचित होता यदि दयानंदी गुरु आज्ञा का पालन करते हुए स्वामी जी की ही गुदा में दो चार अंधहीन सांप घसोड़  देते, 
और स्वामी जी को निरंतर घोड़े का लिंग ग्रहण कराते रहते, तब जाकर कहीं गुरु आज्ञा का पालन ढंग से होता 🤣 और तब फल प्रकट होता,

अब कोई आर्य समाजी ये न कहें कि इसका मतलब ये नहीं है, वो नहीं हैं, फलाना हैं, तो ढिमाका हैं ...

देखिये दयानंद सत्यार्थ प्रकाश के द्वादश समुल्लास में
 महीधरादि  पर अश्लील भाष्य करने का आरोप लगाते हुए लिखते हैं-- 
"हां! भांड धूर्त्त निशाचरवत् महीधरादि टीकाकार हुए हैं, उन की धूर्त्तत्ता है; वेदों की नहीं"

क्या यह बात इस नियोगानंद  पर लागू नहीं होती?
 बिल्कुल होती है, अतः पाठकगणों से निवेदन है कि वो इस बात को समझें की दयानंद ने जो ये अश्लील भाष्य किया है
 वो इस भांड धूर्त्त निशाचरवत् दयानंद की धूर्तता है, वेदों की नहीं, 

और अब यजुर्वेद का सही अर्थ प्रस्तुत करता हूं 
देखिये इस श्रुति का सही अर्थ इस प्रकार है।

पूषणं वनिष्ठुनान्धाहीन्स्थूलगुदया सर्पान्गुदाभिर्विह्वत आन्त्रैरपो वस्तिना वृषणमाण्डाभ्यां वाजिनग्वगं शेपेन प्रजाग्वं रेतसा चाषान् पित्तेन प्रदरान् पायुना कूश्माञ्छकपिण्डैः ॥ ~ यजुर्वेद {२५/७}

(पूषणं वनिष्ठना स्थूलगुदया)- स्थूल आंतों व गुदा, पाचन संबंधी अंगों का भाग पूषण देवता के लिए, हे पूषण देव हमारे पाचन तंत्र संबंधी अंगों को स्वस्थ कर शरीर की व्याधियाँ उसी प्रकार दूर करें, 
जिस प्रकार, (अन्धाहीन सर्पान)- अंधहीन सर्प आपने बांबी से दूर निकल जाते है,
 (गुदाभिर्विह्वत आन्त्रैरपो) - और हे र्विह्वत देव गुदा से संबंधी अन्य व्याधियों को दूर कर हमें रोगमुक्त स्वस्थ जीवन प्रदान करें,
 इस प्रकार (वस्तिना)- वस्ति भाग जल के लिए,
 (वृषणमाण्डाभ्यां)- अंडकोशों की शक्ति वृषण देव के लिए, 
(वाजिनं)- उपस्थ की शक्ति वाजीदेव के लिए,
 (रेतसा)- विर्य प्रजा की रक्षा के लिए,
 (चाषान् पित्तेन) - पित चाष देव के लिए,
 (प्रदरान् पायुना)- आंतों का तृतीया भाग प्रसरदेवों के लिए, 
(कूश्माञ्छकपिण्डैः)- तथा शकपिण्डों को कूश्म देव की प्रसन्नता के लिए समर्पित करते हुए रोगमुक्त,स्वस्थ जीवन की कामना करते हैं,

तो साथियों आपने सही अर्थ देख लिया
और गुदानंद नियोगवती का अर्थ भी देख लिया है
  इस नियोगानंद ने अर्थ का क्या अनर्थ किया है, वो आप लोगों के सामने है,

तो मेरे सच्चे सनातनी  भाईयों 
इस दयानंद उर्फ गुदानंद की दुष्प्रचार पर चार जूते मारकर दयानंदियो के गुदा में अंधा सांप घुसा दे।

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साथियों मैंने लगभग सभी धर्म ग्रंथो का अध्ययन किया है बस एक सत्यार्थ प्रकाश ही रह गया था।वो भी मुकम्मल हो गया है।
लेकिन मैं ये सोचता हूं कि दयानंद ने इतना घटिया तरीन ट्रांसलेट किया ही क्यों 🤔

और चाहने वाले आंख बन्द करके उसके भाष्य को पढ़ रहे हैं ज़रा भी नहीं सोचते कि उसके द्वारा किए गए अर्थ समाज के लिए सही है या नहीं 🤔

लेकिन जब ग़लत ट्रांसलेट उनके हम दर्द के सामने पेश किया जाता है तो वो गाली-गलौज करने लगते हैं।

सोचने कि बात है कि भाष्य दयानंद का ही है बस मैं उसका सही ट्रांसलेट कर उनको यह बताने का प्रयास करता हूं 
कि उसे इतना भी ज्ञान नहीं था कि समाज के लिए किस तरह के अल्फाज का उपयोग किया जाए।

चलिए दयानंद का एक और कामशास्त्र।।
दयानंद द्वारा यजुर्वेदभाष्य, भाष्य
यजुर्वेद अध्याय १९, मंत्र ७६

 दयानंद ने इस मंत्र के अर्थ का जो अनर्थ किया है, वो तो किसी को बताने योग्य भी नहीं,
 इस प्रकार का अश्लील लेख या तो आपको सेक्सी उपन्यासों में 
या फिर दयानंद द्वारा लिखित कामशास्त्र में ही पढने को मिल सकता है, 
देखिए क्या लिखता है ये भांड--

रेतो मूत्रं वि जहाति योनिं प्रविशद् इन्द्रियम्। गर्भो जरायुणावृत ऽ उल्वं जहाति जन्मना। ऋतेन सत्यम् इन्द्रियं विपानम् शुक्रम् अन्धस ऽ इन्द्रस्येन्द्रियम् इदं पयो ऽमृतं मधु॥ 
यजुर्वेद {१९/७६)

अब ज़रा देखिए दयानंद साहब भांग के नशे में अपने  इसका अर्थ क्या लिखते हैं कि--

"जैसे पुरुष का लिंग स्त्री की योनि में प्रवेश करता हुआ, वीर्य को छोडता है, और इससे अलग मूत्र को छोडता है, इससे जाना जाता है कि शरीर में मूत्र के स्थान से पृथक स्थान में विर्य रहता है"

 -- वाह रे! वेदभाष्य के नाम पर कामशास्त्र
लिखने वाले कामानंद, 
क्या कहने तेरे !
 दयानंद को ऐसी-ऐसी अश्लील बातें लिखने में जरा भी शर्म न लगी,
 दयानंद ने जो  लिखा है 
कि (जैसे पुरुष का लिंग स्त्री की योनि में प्रवेश करता हुआ, वीर्य को छोडता है और इससे अलग मूत्र को छोडता है, इससे जाना जाता है कि शरीर में मूत्र के स्थान से पृथक स्थान में विर्य रहता है) 

भला यह अर्थ तुमने कौन से पदों से लिया है भाई साहब 🤔
 भला इसमें कौन सा ईश्वरीय ज्ञान छूपा है? 

क्या तुम्हारे इस भाष्य से पूर्व मनुष्यों को इसका ज्ञान नहीं था
 कि शरीर में मूत्र और विर्य पृथक पृथक स्थान में रहते है, 
 क्या तुमने वेद के ज्ञान को इतना तुच्छ और अश्लील समझ रखा है? 

देखिये इस श्रुति का अर्थ ऐसा बिल्कुल भी नहीं है जैसा दयानंद ने अपनी अश्लील बुद्धि अनुसार किया है, 

सुनिये इसका सही अर्थ इस प्रकार है कि,,,,

"जिस प्रकार गर्भ अपनी रक्षा के लिए स्वयं को जरायु में आवृत करता है, परन्तु जन्म के पश्चात उसे विदीर्ण कर उसका परित्याग कर देता है, जैसे एक ही मार्ग से भिन्न भिन्न पदार्थ (मुत्र एवं वीर्य) निःसृत होते हैं लौकिक सत्य इसी सत्य का रूप है, यह अन्न स्वरूप सोम, विशिष्ट साधन, बल, अन्न, तेज, इन्द्रिय सामार्थ, दुग्धादि पेय और मधूर पदार्थ को परमात्मा हमारे निमित प्रदान करता है,

 देखिये इस कामानंद ने इस वेद श्रुति के अर्थ का क्या अनर्थ किया है 

दयानंद ने एक बार भी यह नही सोचा की जिन वेद ऋचाओं को ईश्वरीय वचन कहा जाता है,
 उन वेद ऋचाओं का ऐसा अश्लील अर्थ करने पर विद्वान लोग उन्हें क्या कहेंगे? 

जिन वेदों का स्थान सनातन संस्कृति में उच्चतम पुस्तकों में गिना है, 

साथियों! स्वंय विचार करकें बताए, वेदभाष्य के नाम पर अंतर्वासना लिखने वाले इस दयानंद को क्या कहना चाहिए??

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सनातन धर्म से भिन्न दयानंद द्वारा चलाए गये वेद विरुद्ध मतों में से एक मत है पशुधर्म 
जी हां पशु धर्म मैं इसलिए कह रहा हूं
 क्योंकि पशु धर्म में विवाह नहीं होते नीति नियम नहीं होते।
हां हां अब आप समझ गए होंगे मैं क्या बात करने वाला हूं।

नाम से विख्यात "नियोग प्रथा"

जी हां दयानंद ने अपने तथाकथित ग्रंथ "सत्यार्थ प्रकाश” में लगभग पूरा एक समुल्लास इस  नियोग पर ही लिखा है, 

और वेदादि शास्त्रों के अर्थ का अनर्थ कर अपने अनुयायियों के साथ साथ समस्त भारतवर्ष को इस महाअधर्म व्यभिचार नियोग फैलाने  का असफल प्रयास किया है, 
वेद मनुस्मृति आदि के अर्थ का अनर्थ कर नियोग सिद्ध किया है 
जिससे धर्म के न जानने वाले लोगों में भ्रम की स्थिति उत्पन्न होती है,
 इसलिए मैं आज एक बार फिर पोस्ट के माध्यम से मैं दयानंद के उन मिथ्या भाष्यों की धज्जियां बिखेरुंगा , 
प्रमाण के साथ यह सिद्ध करकें दिखाऊंगा की दयानंद द्वारा चलाया यह  नियोग वेद विरुद्ध होने के साथ-साथ हमारे सनातनी भाईयों को धोखे में डालने का काम किया
अब मैं दयानंद के उन सभी वेद विरुद्ध भाष्यों का खंडन करते हैं 
जिनके अर्थ का अनर्थ कर दयानंद ने नियोग सिद्ध किया है ।

दयानंद कृत ऋग्वेदभाष्य, भाष्य।

सोमः प्रथमो विविदे गन्ध्वो विविद उत्तरः। तृतीयो अग्निष्टे पतिस्तु रीयस्ते मनुष्यजाः ॥ ~ ऋग्वेद १०/८५/४०

दयानंद अपने ऋग्वेदभाष्य में इसका अर्थ यह लिखते हैं 

"हे स्त्री! जो 
(ते) तेरा
 (प्रथमः) पहला विवाहित
(पतिः) पति तुझ को
 (विविदे) प्राप्त होता है उस का नाम 
(सोमः) सुकुमारतादि गुणयुक्त होने से सोम जो
दूसरा नियोग होने से
 (विविदे) प्राप्त होता वह,
(गन्धर्वः) एक स्त्री से संभोग करने से गन्धर्व, जो
(तृतीय उत्तरः) दो के पश्चात् तीसरा पति होता है वह
(अग्निः)- अत्युष्णतायुक्त होने से अग्निसंज्ञक और
(ते) तेरे
 (तुरीयः) चौथे से लेके ग्यारहवें तक
नियोग से पति होते हैं वे 
(मनुष्यजाः) मनुष्य नाम से कहाते हैं । 
 (इमां त्वमिन्द्र)

देख रहे हो ना साथियों 1 से लेकर 11 तक नियोग जो करेगा वही मनुष्य कहलाएगा।

 इस मन्त्रा में,,,
ग्यारहवें पुरुष तक स्त्री नियोग कर सकती है, वैसे
पुरुष भी ग्यारहवीं स्त्री तक नियोग कर सकता है"

ये है स्वामी दयानंद उर्फ नियोगानंद का ज्ञान
हराम काम कि तरफ लोगों को धकेलने में नियोगीलाल ने कोई कसर नहीं छोड़ा

अर्थों का अनर्थ कर दिया है इस मंत्र का यह अर्थ नहीं जैसा कि स्वामी नियोगानंद जी ने किया है 

अब मैं इसका सही अर्थ कर रहा हूं आप सभी लोग कंपेयर कर लीजिए गा
 इसका सही अर्थ इस प्रकार है कि--

सबसे (प्रथमः) = पहले, 
(सोमः) = सोम, 
(विवदे) = इस कन्या को प्राप्त हो, (अर्थात कन्या के माता पिता सब से पहले तो ये देखें कि उसका पति 'सोम' है या नहीं, पति का स्वभाव सौम्य है या नहीं, 
तत्पश्चात इस कन्या को 
(गन्धर्व:) = 'गां वेदवायं धारयति' ज्ञान की वाणियों को धारण करने वाला हो, 
यह (उत्तर:) = अधिक उत्कृष्ट होता है, कि सौम्यता यदि पति का पहला गुण है
 तो ज्ञान की वाणियों को धारण करना उसका दुसरा गुण होना चाहिए। 
(तृतीयः) = तीसरा, 
(अग्निः) = प्रगतिशील मनोवृत्ति वाला हो {अर्थात तेरा पति वह है जो आगे बढ़ने की वृत्तिवाला हो },
 (तुरीय:) = चौथा,
 (मनुष्यजाः) = वह मनुष्य की संतान हो,
 (अर्थात जिसमें मानवता हो, जिसका स्वभाव दयालुता वाला हो क्रूरता वाला नहीं},
वही 
 (ते) = तेरा, 
(पतिः) = पति है

चलिए मैं इस ट्रांसलेट को और भी आसान कर देता हूं
 - "कन्या व उसके माता पिता उसके पति में निम्न विशेषताएं अवश्य देखें , कि पहला तो वह सौम्य हो सौम्यता पति का पहला गुण है,

 उसमें दुसरा गुण गन्धर्व हो यानी ज्ञान  को धारण करने वाला हो अर्थात ज्ञानी हो, 
तीसरा गुण प्रगतिशील मनोवृत्ति वाला हो,
 चौथा गुण वह मनुष्यजा मनुष्य की संतान हो अर्थात जिसमें मानवता हो 
जिसका स्वभाव क्षमा करना और दयालुता वाला हो 
क्रूरता वाला ना हो।

मेरे दोस्तों,
इस मंत्र में कहीं भी नियोग तो क्या नियोग कि गंध तक नहीं है 

परन्तु स्वामी नियोगानंद जी ने इसके अर्थ का ऐसा अनर्थ किया कि पूछें मत,

 अब बुद्धिमान लोग एक बार स्वयं स्वामी जी द्वारा किये भाष्य पर दृष्टि डालकर बताए

 कि दयानंदी लोग क्या उसी स्त्री से विवाह करते हैं जो प्रथम एक से विवाह और दो से नियोग कर चुकी हो?🤣

आर्य समाजियों का यही तो धर्म है
 और स्वामी नियोगानंद जी की बेशर्म है 🤣

अब विचारने की बात है यदि स्वामी नियोगानंद जी का किया अर्थ माने तो, 
न जाने समाज में नाजायज औलादे किस कदर बढ़ेगी
और इस तरह समाज का क्या हाल होगा या विचारणीय बात है।


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दयानंद की मक्कारी किसी से छुपी नहीं है दयानंद ने अपना स्वार्थ सिद्ध करने के लिए पवित्र वेदो को भी नहीं छोड़ा अपनी गंदी सोच वेदों में भी डालने का प्रयास किया ।

दयानंद सत्यार्थ प्रकाश चतुर्थ सम्मुलास में लिखते है

इमां त्वमिन्द्र मीढ्वः सुपुत्रां सुभगां कृणु। दशास्यां पुत्राना धेहि पतिमेकादशं कृधि। (ऋग्वेद 10- 85-45)

भावार्थ : "हे वीर्य सेचन हार 'शक्तिशाली वर ! तू इस विवाहित स्त्री या विधवा स्त्रियों को श्रेष्ठ पुत्र और सौभाग्य युक्त कर। इस विवाहित स्त्री से दस पुत्र उत्पन्न कर और ग्यारहवीं स्त्री को मान। हे स्त्री! तू भी विवाहित पुरुष या नियुक्त पुरुषों से दस संतान उत्पन्न कर और ग्यारहवें पति को समझ।"
ये था मिस्टर दयानंद सरस्वती का ट्रांसलेट जिसमें नियोग घसोड़ दिया और विधवा शब्द भी घसोड़ दिया और वीर्य शब्द भी घसोड़ दिया।

आइये एक नजर डालते है इस मंत्र के शब्दों पर

इमां - इसको ।। त्वम - तुम ।।
इन्द्र - इन्द्रियों को वश मे करने वाला जितेन्द्रिय पुरुष
मिढ्वाः - सब सुखो का सिंचन  करने  वाले  पुरुष ।।
सुपुत्राम - उत्तम पुत्र ।। सुभगाम उत्तम भाग्य वाली ।।
कृणु - कर
दश - दस ।। आस्याम - इस पत्नी मे ।।
पुत्राना - पुत्रो को ।। अधेही -
स्थापित कर ।। पतिम् - पति को ।।
एकादशां कृधि - ग्यारहवा कर ।।

भावार्थ - हे इन्द्रियों पर काबू पाने वाले और सुखो का सिंचन करने वाले पुरुष, तु अपनी पत्नी पर सुखो का वर्षण करता हुआ उसे सुपत्रा और सुभागा बना ।। 
( वेदिक काल मे 10 पुत्रो की सीमा थी इसलिए यहा भी ये सीमा 10 ही लिखी है )

और आगे कहा गया है की 10 पुत्रो के बाद ग्यारहवा खुद को समझ)

आप लोगों ने देखा इस मंत्र में ईश्वर एक मनुष्य से कह रहा है कि तू अपनी पत्नी को सुपत्रा यानी उत्तम पुत्र जनने वाली सौभाग्य वती बना।
इस मंत्र में विधवा शब्द है ही नहीं। 

अब कोइ आर्य समाजी बताएगा ??? 
की स्वामी जी ने इस मंत्र को क्यों तोड़ा मरोड़ा

 और इस मंत्र में "वीर्य",  "विधवा",  और "नियोग", शब्द कहा है ??? 
और स्वामी जी ने लिखा है "हे वीर्य सेचन हार" 
ये वीर्य सेचन हार क्या होता है ???

मैं जानता हु कोई नही बताएगा
क्योंकि इन धूर्त आर्य समाजियों को सिर्फ दयानंद की राह पर चलकर नियोग को बढ़ावा देना है ।।

और अपनी मक्कारी से सनातन को कलंकित करना है

असल में इन आर्य समाजी को सिर्फ दूसरों को बुरा साबित करना है लेकिन हकीकत पर पर्दा डालना है
और जब बात ना बने तो गाली गलौज कर अपनी नियोग वाली गंदी पैदाइश को जाहिर करना है
लेकिन सच स्वीकार नहीं करना।

साथियों आप खुद सोचिए एक विधवा स्त्री से दस बच्चे कैसे पैदा हो सकते हैं?
आखिर दयानंद सरस्वती को निति नियम नहीं मालूम था क्या?🤔
पहले उस विधवा स्त्री कि निति नियम से शादी होती फिर उसका पति दस बच्चे पैदा करता या बीस, 
लेकिन सनातन में तो विधवा स्त्री को दूसरी शादी करने कि इजाजत ही नहीं थी।

मगर वो तो विधवा स्त्री से ही दस बच्चे पैदा करने हेतु हराम काम करने कि सलाह दे रहा है और वेदों का अपमान कर रहा है 
आप अपनी राय जरुर दे।


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दयानंद ने वेदआदि भाष्यों के साथ छेडछाड क्यों किया इन सबके पिछे स्वामी जी का उद्देश्य क्या था ?? आइए देखते है

सत्यार्थ प्रकाश सप्तम संमुल्लास दयानन्द जी लिखते है।

अग्नेर्वा ऋग्वेदो जायते वायोर्यजुर्वेदः सुर्यात्सामवेदः ।।

स्वामी जी इसका अर्थ लिखते है-

"ईश्वर ने सृष्टि की आदि में अग्नि वायु आदित्य तथा अंगिरा ऋषियो की आत्माओ मे एक एक वेद का प्रकाशन किया" 

अब आइये जरा इस मंत्र के अर्थ पर भी नजर डाल लेते है

अग्नेर्वा - अग्नि द्वारा
ऋगवेदो - ऋग्वेद
जायते - प्रकट हुआ ।

वायोर्यजुर्वेदः - वायु द्वारा यजुर्वेद

सुर्यात्सामवेदः सूर्य के द्वारा सामवेद

अब कोई आर्य समाज के तथाकथित बुद्धिजीवी इस पर प्रकाश डालना चाहेंगे ???

 की स्वामी दयानन्द सरस्वती ने यहा पर अंगिरा और अथर्वेद कैसे जोड़ा ???? 

दूसरा प्वाइंट ये है कि दयानंद ने 
 इस मंत्र मे अग्नि, सूर्य , और वायु के लिए ऋषि शब्द का प्रयोग कहाँ हुआ है ???
जब मंत्र में ऋषि शब्द है ही नहीं 🤔

यहाँ सिद्ध हो जाता है

 की दयानन्द को ज्ञान तो बिल्कुल भी नही था
 क्योंकि इस मंत्र को कोई भी जिसमे थोडी सी भी बुद्धि होगी 
या संस्कृत का मूल अध्धयन भी किया होगा तो वो समझ सकता है 
कि दयानंद ने इस मंत्र के द्वारा लोगों को किस प्रकार चुतिया बनाने का प्रयास किया है ।।

Wednesday, 24 November 2021

क्या वेद ईश्वरीय ज्ञान हो सकते है।

क्या वेद  ईश्वरीय ज्ञान है ?

* वेद तो स्वयं कहते है ? कि हम ईश्वरीय वाणी है परंतु
वेदों के मानने वाले वेदों के विरोध जाके कहते है कि ये ईश्वरीय ज्ञान है , ठीक पल भर के लिए मान लिया कि वेद ईश्वरीय ज्ञान है पर ऐसा अपूर्ण ज्ञान वैदिक ईश्वर को यह नही पता कि मैंने किस वेद में क्या ज्ञान दिया है और दूसरे वेद में क्या अर्थात यजुर्वेद में कुछ और कहा और अर्थववेद में कुछ वाह क्या ज्ञान है। 

* कमाल है , वैदिक ईश्वर के ज्ञान पर प्रशन चिन्ह
 ( ? )  लगता है इसका अभिप्राय : यह है , की वेद मंत्रों में विरोधाभास है , जिसको पढ कर सर चकरा जाता है। 

*  की किस मूर्ख ने यह सब लिख दिया है कहि कुछ कही कुछ वेदों का ज्ञान विज्ञान की पुस्तक तो नही अपितु कामसूत्र एव मनोरंजन की पुस्तक कह सकते है जिसको देख कर केवल हंसी  आए ये कोइ बात हम हवा हवाई नही बल्कि वैदिक धर्म के मानने वाले बड़े बडे प्रचीन वेदाभाष्यकर्ता  स्वयं कहते है ,की वेद अर्थहीन है । आइए जानते है ? 

वेदों के अर्थ

* निरुक्तकार कहते है ,की वेदों के मंत्र विषय मे यास्क द्वारा उठाये गए एक और विवाद पर विचार करते है वेदों के मंत्रों के अर्थ के सम्बंध में बहुत प्राचीन समय से शकाये उठाई जाने लगी थी।  उनके 2 पक्ष थे ?

लोकायत - मत
कर्मकाण्डी

1 . लोकायत मत : - के लोग तो मंत्र को इसलिए अर्थहीन मानते थे , की इनमें उल - जलूल बाते भरी पड़ी है , वेदों की कोई सत्ता नही इन्हें मानना व्यर्थ हैं ।

2 . कर्मकाण्डीयो : - का कहना था कि वेदों का कोई अर्थ नही किंतु उनका पाठ अनिवार्य है , पाठ करने में अर्थ का ध्यान नही रहता हम निष्ठा से पाठ करते है , क्योंकि यह हमारा धर्म है ।

* क्योंकि वेद अर्थहीन भले ही झाड़ फूंक करने के निर्रथक मंत्रो में ऐसा  परिवर्तन किया की कार्यकारि शक्ति नष्ट हुई । क्या मिथ्था है , हंसी आती है ।

* वैदिक मंत्र इसलिए भी  निरर्थक है , क्योंक की वे आपस मे ही विरोध करते है ।

उदाहरण ० कभी  तो पृथ्वी केवल एक ही रुद्र है होने की बात करते है तो कही हजारों रुद्रों को ला  बैठाते है 
कभी इंद्र को जन्म से ही शत्रु हीन कहते है , कभी कुछ क्या खेल है ? यास्क फिर लौकिक प्रयोग के सामने सिर झुका देते है ।

* तो बड़े बड़े भाष्यकर्ताओ का मत है , की वेदों का कोई अर्थ ही नही और ये मूर्ख वेदों में ही विज्ञान की बाते करते है क्या मिथ्था से कम प्रतीत नही होता ।

वेद और आधुनिक विज्ञान

*  मेरा काम वेदों के ऊपर प्रश्न चिन्ह लगाना नही बल्कि उन लोगो की बुद्धि का ताला खोलना है जो कि वेदों में ज्ञान विज्ञान की बाते करते नजर आते है कि वे भ्रम की जिंदगी व्यतीत कर रहे है । जो इनके पंडो ने बता रखा है । ये तो  100 % स्पष्ट है , की वेद न तो कोई ईश्वरीय ज्ञान , वाणी नही कोई ईश्वरीय ग्रन्थ ।
बल्कि कोई 2 पग पर चलने वाला हवस के पुजारी के लिखे हुए जिसने अपने स्वार्थ सिद्ध करने के लिए ऐसे कलंकित ग्रन्थ की रचना की , जिससे लोगो का आर्थिक , मानसिक एव शरीरिक शोषण किया जाए जिसका उदाहरण नियोग , मारकाट आदि आदि वेदों में भरा हुआ है ।

* आये देखते है ज्ञान विज्ञान के कुछ उद्धरण जो समझदारों के लिए इशारा काफी होगा ।

नोट : - सारे भाष्य दयानंद सरस्वती और आर्य समाजीयो के ही है ।

*  यजुर्वेद का यह मंत्र कह रहा है , की सूर्य केवल अपनी ही परिधि में घूमता है अन्य किसी भी लोकांतकर के नही , इसमें भी गोल माल है  ,ठीक है पल भर के लिए मान लेते है , की सत्य परंतु अर्थववेद क्या कह रहा है ?

* और यहाँ कह रहा है , सब लोको के चारो और घूमता है , ये है वैदिक ईश्वर का अधूरा ज्ञान इससे शिद्ध हुआ किया ये कोई ईश्वरीय ग्रन्थ नही बल्कि मानव रचित है ईश्वर के ज्ञान में कभी भी विरोधाभास नही होता केवल मानव के ज्ञान में  । 

* कुछ और उद्धरण नीचे है जिससे और आपको स्पष्ट होगा मिथ्थाई ग्रन्थ वेदों के बारे में कही घूम रहा है , कही रोका हुआ , कही कुछ कही कुछ 

* इसलिए कहा था कि ये पुस्तक मनोरंजन से भरी पढ़ी है यही वजह थी कि प्रचीन काल के लोग इससे व्यर्थ समझते थे और ये गधे इस में विज्ञान बताते है क्या मिथ्था है अगर ये सब जानने के बाद भी कोई ऐसा कहे वो महामूर्ख नही तो क्या होगा आप स्वयं ही बातए ।

आतंक।

भगवा आतंकवाद  ( वेद और आतंकवाद )

*  " त्वमसि सहमनोs............ हिष्महि "।। 5 ।।
 ( अथर्वेद 19 : 32 : 5 ) 

* अर्थात : - है वैदिक ईश्वर तू वश ( कब्जे ) में करने वाला है  और में भी बलवान ( ताकतवर) हु ,हम दोनों बलवान हो कर विरोधियों को हम वश में करे  !

* भावार्थ : -  वीर पुरुष वैदिक ईश्वर के साथ मिल के और सब साथियो को मिला कर शत्रुओं का नाश कर !

* Note : - शत्रु यानी हम जो वेदों की निंदा करे , वेद विरोध है और जो वेदों को नही मानते , जो अनार्य है वे सब इन के शत्रु ( दुश्मन ) है !

* " सहस्व नो ............. में बहुनकृधी " ।। 6 ।।
 ( अथर्वेद 19 : 32 : 6 ) 

* अर्थात : - हे वैदिक ईश्वर हमारे शत्रुओं को हरा और
सेना चढ़ने वालो को हरा , सब दुष्ट ( अनार्य ) वालों को हरा मेरे लिए बहुत अच्छी शांति कर ।

* दयानंद सरस्वती अपनी किताब सत्यार्थ  प्रकाश के 14 समुल्लास में कहता है कि वो पालनहार कभी नही हो सकता जो मनुष्यों का शत्रु हो वही पालनहार का शत्रु भी हो क्यों कि पालनहार के नजदीक  सब एक से है  और पालनहार किसी को शत्रु नही रखता मतलब ऊपर☝️ मंत्रो के अनुसार जो आर्यो ( ब्रह्मणो ) के शत्रु है , वही वैदिक ईश्वर का भी शत्रु है और दोनों मिलकर दुसरो को मारने की भी शिक्षा दे रहे है , इसलिए वेदों का ईश्वर कभी पालनहार नही हो सकता दयानंद सरस्वती के अनुसार क्यों कि सच्चे पालनहार के ये गुण नही है , बरहाल आगे देखते है ?

*  " इमं बध्नामि..........हद : " ।। 1 ।। 
 ( अथर्वेद 19 : 28 : 1 )

* अर्थात : - तेरे जीव और तेज के लिए इस मनिरूप
( अति प्रशनशिय ) शत्रु को दबाने वाले और विरोधियों के दिल को तपाने वाले शत्रु विदारक लोगो को  में 
( वैदिक ईश्वर ) नियुक्त ( तैनात ) करता हु ।

* जो भी मोब लॉन्चिंग का असली गुनहगार वेदों का ईश्वर है , उसने ही ऐसी आज्ञा दी है , लोगो को शत्रु यानी हमे मारने की !

*  " द्विषतस्ताप्यंह्र्द.........संतापयन " ।। 2 ।।
 ( अथर्वेद 19 : 28 : 2 )

* अर्थात : - विरोधियों के ह्रदय को तपाता हुआ और शत्रुओ  के मन को तपाता हुआ ये सब दुष्ट (अनार्य )को ग्रीष्म  ऋतु ( summer ) के समान तपाता हुआ तो हो ।

* भावार्थ : - जिस तरह गर्मियों के मौसम में धूप हरि भरी घास को तपा कर सुखों देता है और नष्ट कर देता है उसी प्रकार से आर्य अपनी शत्रुओं ( अनार्य ) को सदा कष्ट देते रहे और उनको नाश कर । वाहह क्या शिक्षा है । 

* " घमईवाभीतपंदर्भ.......... बलम  "   
( अथर्वेद 19 : 28 : 3 )

* अर्थात  : - ये सेनापति  ( आर्य  ) ग्रीष्म  ( आग  )के समान  तपाता  हुआ  विरोधियो  को सन्ताप  ( दुख  , कष्ट , कलेश  ) देता हुआ  , तू दूसरे को नष्ट  करते हुए  इन्द्र  के समान  वेरियो  ( दुश्मनो  ) के तोड़  दे !

* भावार्थ  : -   दुश्मनो  को नष्ट  करके  हरा दे  !

* " भिन्धिददर्भ  .........  पातय  " 
( अथर्वेद 19 : 28 : 4  )

* अर्थात  : - हे  दर्भ  ( सेनापति  आर्य  )  दुश्मनो  
( अनार्य  ) विरोधियो  के दिल को  तोड़  दे उठता हुआ  भूमि की  त्वचा  के समाना  इन  शत्रुओ  के शिर को गिरा दे  !

वैदिक ईश्वर।

वेदो  का  ईश्वर  वेदो  में क्या कहता  है  ? ये जानने  की  कोशिश  करते है  और सृष्टि  की रचना  किस  तरह  हुई  इत्यादि  जानते है  आये देखते है ,वेदो का ज्ञान विज्ञानं क्या कहते है ? की वेदो को  खुद  वैदिक  ईश्वर  ने बनाया  है ये मेरा  दावा  नहीं पोंगा पंडित का कहना है

* वैदिक  ईश्वर ने  क्या पता वेदो को  कैसे दिया होगा वो चार ऋषिमुनियो को  दयानन्द  की विश्व  प्रशिद्ध  पुस्तक  चूत्यार्थ  प्रकाश  अरे फिर  सत्यार्थ  प्रकाश  वैसे  वह पुस्तक  में  सत्य  छोड़ कर  हर चीज  है और  प्रकाश  शब्द  नाम  मात्र है  और अँधेरा  ही  अँधेरा  है  बरहाल  उसमे में दयानद  लिखता  है की जिस तरह से  कोई  शिष्य  को  गुरु  की  आवशकता  होती है  ज्ञान प्राप्त  करने के लिए  उसी  प्रकार  से जो चार  ऋषिमुनियों  को  वेद  प्राप्त  होए  उन्हें  भी तो  गुरु  की आवशकता  थी  जिस तरह से कोई गुरु अपने  शिष्य  को पढता  है उसी प्रकार वैदिक ईश्वर  ने  उन  चारो  को पढ़ाया  और  पूछा जाये  वैदिक  ईश्वर तो  निराकार कर है तो मुँह  से कैसे पढ़ाया होगा ?  कहते दिल में बैठाल  दिया  तो फिर मुर्ख आदमी  ऐसा  क्यों  कर  कहा की जैसे  कोई गुरु पढता है उसी तरह  गुरु तो हाथ  से लिख  कर और मुँह से बोल कर समझता है  और पढ़ता है  वाह क्या कहने  बरहाल आज का मुद्दा  कुछ और है  इन शार्ट  बात करते है  तो जवाब देते है की वो  सर्वशक्तिमान  है उसके  के लिए  कोई काम क्यों कर मुश्किल हो भला  !

* और जब ये जवाब हम देते है , तो  कहते तर्क पर बैठना  चाहिए ये काहानी  है मूर्खो  की  बरहाल कोई नहीं  आर्य  समाजी और वैदिको  के दिमाग में गोबर भरा  है जिसके चलते  जब भी मुँह खोलते है बदबू ही आती है  यानि मन्दबुद्धि सवाल करते है  जिनकी  डिसनरी  में  २ + २ = 5  होते है उनके बारे क्या कहा जाये  और जब हम सवाल पूछते है तो  कहते  है , की  उसका ज्ञान हमें नहीं जिसका उद्धरण  महाप्रलय की तारिख  कहते है पता नहीं  , वो चार ऋषिमुनि  फिर धरती पर कब  पुनर्जन्म लेंगे  और कहा  और एक  लंबी लिस्ट हैं सवालो  की ये  क्या इनके बाप दाद भी  हमारे सवालो के  जवाब नहीं दे सकते और तर्क  की बात  करते है मुर्ख  और अपने  समय पर सर्वशक्तिमान  का गुण गाते  नजर आते है अरे मूर्खो  तुम्हारा  दवा है की तुम  और वेद शाश्वत  हो  यानि कल भी थे आज भी है  और रहेंगे  दुनिया की उत्पत्ति  के शुरुवात में  वेद ही था और तुम्ही थे आएसा  तुम्हारा  दावा है तो सवाल किस्से होगा जो पहले आया या फिर बाद में तुम्हारे अनुसार और इस्लाम कब से है  कई  आर्टिकल  में बता चूका हु  और खुद ३००० साल  पूराने हो और लाखो  साल पहले की बात कर रहे हो  बरहाल बात काफी लंबी  होते जा रही है  आज का मुद्दा कुछ और ही है  , आज देखेंगे की  वेदो के अनुसार  वैदिक ईश्वर की पूरी  कहानी  ? 

सृष्टि  की रचना 

*  सबसे  पहले देखते है की सृष्टि उत्पन्न  होने से पहले क्या था ?

*  सुर्ष्टि की उत्पत्ति  के से पूर्व न अभाव वा असत्ता होता  और  न व्यक्त जगत रहता है , न लोक रहता और न अंतरिक्ष रहता है , जो आकाश से  ऊपर निचे लोक - लोकान्तर  है , वे भी नही रहते , क्या किसको घेरता वा आवरत करता है , सब कुछ कुहरान्धकार 
 ( पूरा अंधकार होता है ) के गृह आवरण में रहता है , गहन गहरा क्योंकि रह सकता है ।
 ( ऋग्वेद 10 : 129 : 1)

* उस अवस्था में  न तो  मृत्यो रहती न ही काल व्यहार , न ही रात - दिन  का चिन्ह का नही रहता  । 
( ऋग्वेद 10 : 129 : 2 )

 मनुस्मृति
 मनुस्मृति    १  : ५ 

* तो ये सब था और चारो  तरफ कुलंध्कार  था तो  वैदिक ईश्वर क्या कर  रहा था ?

* " नुनं तदस्य  काव्यो ..........अर्धे विषिते सस्न्नू । "
( अर्थर्वेद ४ : १ : ६  )

* अर्थात : - वैदिक  ईश्वर  प्रलय  की  अवस्था  में सोता सा था फिर उसने सबको  रच दिया। 

वैदिक  ईश्वर 
मनुस्मुर्ती १ : ७४ 

* महाराजा सो रहे थे जब आँखे खुली तो देखा मैं  तो सो रहा था और जब सो कर  उठे तो सोच रहे थे क्या करो तो ये किया ?

* " व्रात्य ...........  समरयत।"  ( अर्थवेद १५ : १ : १ )

  अर्थात : - पहले वो अकेला  था  !

* " स प्रजापति........... जनयत ! "
  ( अर्थवेद १५ : १ : २  )

 अर्थात  : - उसने अपने देखा  और सोच कर प्रकट किया !

* " तदेकम  ................... प्रजायत "  
( अर्थवेद १५ : १ : ३  )

अर्थात  : - और जो भी प्रकृति के कण सूक्षम अवस्था में थे उसमे घुस गया

*  " स उदतिष्ठत्स प्राची दिशमणु व्य चलत " 
 ( अर्थवेद १५ : २  : १  )

 अर्थात  : - घुसने के बाद खड़ा हुआ  और पूर्व  दिशा  की और चला। 

निराकार को खड़े  होने के लिए पैर  किसने प्रदान किये  ? क्या उससे भी  पहले और कोई था जिसने पैर दिए ?

*  " तं बृहच्च ........... देवा अनुव्य चलन।"   
( अर्थवेद १५ : २  : २ )  

 अर्थात  : - और वैदिक ईश्वर के पीछे  आकाश  , सूर्य आदि  पीछे पीछे  चले। 

* और घोड़े और बेल की सवारी पर बैठ कर  वहा थोड़ा बहुत रच ( कुछ बना ) दिया। 
  ( अर्थवेद १५ : २  : ३,४ ,५,६,७ ,८ )

* " स उदतिष्ठत्स दक्षिणा दिशमणु व्य चलत "  
( अर्थवेद १५ : २  : ९   )

अर्थात : - फिर वाह  से खड़ा  हुआ और दक्षिण दिशा की और चला !

* पूर्व पच्चिम आदि दिशा  का अंदाज  कहा से लगाया होगा अंतरिक्ष  में ना तो  कोई ऊपर निचे ना  ही कोई दिशा  होती है पता नहीं  कोनसा विज्ञानं  है वेदो मेंआगे देखते  है ?

* " तं यज्ञायज्ञीय च  वामदेव्य ......... चलन।
  ( अर्थवेद १५ : २  : १० )

 अर्थात : - यज्ञ और वामवेद  ,यजमान यज्ञ करने  वाला और सब जिव जन्तु उसके साथ पीछे पीछे हो चले। 

* फिर घोड़े और बेल की सवारी पर बैठ कर  वह थोड़ा बहुत रच दिया।  ( अर्थवेद १५ : २  : १२ ,१३ ,१४, )

 * " स उदतिष्ठत्स प्रतीची दिशमणु व्य चलत "  
( अर्थवेद १५ : २  : १५   )

अर्थात : - फिर वाह  से खड़ा  हुआ और पच्चिम  दिशा की और चला ?

* जिस तरह सूरज आदि साथ पीछे-पीछे उसी तरह से साथ ऋषि , विरुप , वेराज और कुछ लोग 
( मनुष्य  ) पीछे पीछे  चेले   ( अर्थवेद १५ : २  : १६ )

* फिर घोड़े और बेल की सवारी पर बैठ कर  वह थोड़ा बहुत रच दिया।  ( अर्थवेद १५ : २  : १८ ,१९ ,२० )

* " स उदतिष्ठत्स उदीची दिशमणु व्य चलत "  
( अर्थवेद १५ : २  : २१ )

अर्थात : - फिर वाह  से खड़ा  हुआ और उत्तर  दिशा की और चला ?

* श्येत और नौधस और ७ ऋषि और थोड़े बहुत मनुष्य भी पीछे  पीछे हो चले  ( अर्थवेद १५ : २  : २२ )

* फिर घोड़े और बेल की सवारी पर बैठ कर  वह थोड़ा बहुत रच दिया।  ( अर्थवेद १५ : २  : २४ से २८  )

* ये देखो  वेदो का सर्वशक्तिमान  वैदिक  ईश्वर जो खुद जा जा कर बनाना रहा है ,इधर  उधर घूम रहा  है , सब पॉप लीला  है ये है ज्ञान विज्ञानं ?

ऋतुओ की रचना 

* " स संवत्सरमू ............. तिष्टसीती ! "  
( अर्थवेद १५ : ३  : १  )

अर्थात : - वह वैदिक  ईश्वर वर्ष भर तक ऊंचा  खड़ा रहा उससे  देवताओ  ने बोलो  क्यों अब तू खड़ा  है  !

* पुरे  साल  खड़े खड़े  पैर  दर्द न दिए ! लगता  है भूल गए थे  की अब क्या करना है  उसी के चकर  में खड़े थे फिर देवताओ  ने बताया की तू अब तक क्यों खड़ा  है  अब आगे  ..........

* " सो sss  ब्रिविदासन्दीं  में सं भरत्विति "    
( अर्थवेद १५ : ३  : २ )

अर्थात : -  वो वैदिक ईश्वर  बोला सिंहासन  ( बैठने  के लिए कुर्सी ) तू देवता धरो ! 

* बहुत जरुरी  है जल्दी करो पैर दर्द  जो दे रहे होंगे और ये कैसा सर्वशक्तिमान  है जो अपने लिए  कुर्सी  को इंतजाम  नहीं कर सकता ? अफ़सोस यहाँ वैदिक  ईश्वर कम जोर निकला  जल्दी करो देवताओ  वर्ष भर से खड़े  थे कही बेहोश  हो के गिर न जाये ?

* " तस्मै  व्रात्ययासन्दी सम्भरन  "   
( अर्थवेद १५ : ३  : ३ )

अर्थात  : - देवताओ ने वैदिक ईश्वर के लिए सिंहासन मिलकर रखा !

* अच्छा हुआ रख दिया अब जल्दी से उनको  बैठा दो और जरा पानी वाणी पिलाओ प्यासे  होंगे वर्ष भर से खड़े  थे !

*  " तस्या ग्रीष्मश्च  वर्षांश्च दौ ! "   
 ( अर्थवेद १५ : ३  : ४ )

अर्थात : - वसंत ऋतू और घाम ऋतू उस कुर्सी के दो पैर  और वरसा , शरद ऋतू  दो पैर होये !

* क्या लीला है , वैदिक ईश्वर की A . C  और हीटर  दोनों के मजे पर ऐसी कुर्सी का अविष्कार किस वैज्ञानिक ने किया था सब पोपलीला है ?

 *  " वेद आस्तरण ब्रह्मापबहणम !  "    
( अर्थवेद १५ : ३  : ७  )

अर्थात : - धन ( हिरे , जवाहरत आदि ) सिंहासन का बिछौना  ( कुर्सी की गद्दी ) और अन्न ( खाने पिने की पिने कि चीजे  ) सिरना !

* क्या बता है ? पिछवाड़े के नीचे हिरे जवाहरात की गद्दीया है और पीछे टेका लगा कर फलो के मजे वाह्ह  क्या मजे है महाराजा के !

* " सामासाद उद्रीथो sssss  पश्रय: ! "  
 ( अर्थवेद १५ : ३  : ८ )

अर्थात : - सामवेद बैठने का स्थान और ओ३म सहारा था !

* सामवेद ऋषियों  को मिल गया था और इतनी पवित्र पुस्तक जगह मतलब सब सामवेद पर खड़े थे और ऑक्सीज़ंन के रूप में ओ३म का उच्चारण चालू  था वर्ष भर खड़े थे इसलिए घबराहट  चालू  होगी और हा सब हॉस्पिटलों से ऑक्सीज़ंन (  O 2  ) के सिलेंडर हटाकर टेप रिकॉर्डर में ओ३म लगा दो सब मरीज ठीक हो जायेंगे क्या मिथ्या है !

आखिरकार वैदिक ईश्वर 

* " तामासन्दी  व्रात्य  आरोंहत ! "   
 ( अर्थवेद १५ : ३  : ९ )

अर्थात : - उस सिंहासन  पर वैदिक ईश्वर चढ़ गया  !

* होओओओ  अच्छा हुआ चढ़  गए नहीं तो घबराहट के मारे  निचे गिर पढ़ते , पानी वाणी  पिलाओ और भूख  भी लगी होगी फलो  का जूस वगैरा  दो  चिकन की बूटी- वूटी अरे माफ़ करना  शाकाहारी होंगे  अगर मांस  खाया तो वैदिक ईश्वर  खुद  राक्षस  हो जायेंगे  कृपया  मत खिलाना  !

* " तस्य देवजना : परिष्ट्कंदा आसनतसंकल्पा: प्राहाय्या ३ विशवानी भूतान्युपसद : ! " 
 ( अर्थवेद १५ : ३  : १०  )

अर्थात  : - देवता  उसके सेवक ( नौकर ) और कुछ दूत ( सन्देश पहुंचने वाले ) बाकि उसके पास बैठ गए !

* वाह्ह बाबूजी  जी के पास नौकर  चाकर है क्या बात है , वर्ष भर से खड़े थे पैरो की मालिश वालिश  कर दो थोड़ा  आराम हो जाएंगे और बाकि उनके पास बेठ कर क्या कर  रहे हो अपने अपने काम में लगो घर में बच्चे रो रहे  होंगे  उन्हें  सम्भालो  नहीं तो रात की रोटी नहीं।

पुनर्जन्म।

पुनर्जन्म का सच

                        वेद और पुनर्जन्म 
( यजुर्वेद 4 : 15 )

* अर्थात : -  मनुष्यों को आयु फिर फिर प्रप्ति होती है , शरीर आधार फिर प्रप्ति होती है ,देखने के लिए आंखे , सुनने के लिए कान और पुनः  शरीर प्रप्ति होती है ।

* उसी प्रकार से गीता में भी है , की जिस तरह मनुष्य कपड़े बदलता है उसी प्रकार आत्मा भी बारम्बार शरीर बदलती रही थी है और भी कई प्रमाण मिलते है ।

कर्म के अनुसार वेदों का ईश्वर किसी को , पशु , पक्षी किसी को लंगडा, किसी को लूला , किसी को रोगी , किसी को श्रेष्ठ , किसी को शुद्रो का जन्म देता है आदि आदि ।

आत्मा , परमात्मा और प्रकुति का चक्र यहाँ दखे

अब देखते है  पुनर्जन्म का नियम

*  पुनर्जन्म के नियम के अनुसार जब
भी किसी मनुष्य की मृत्यु हो जाती है , उसके
पश्चात सबसे पहले हवा में आवरो की तरह से गर्दिश करता है , उसके बाद नाले , नदी , झरने इत्यादी में रहता है , फिर उसके बाद खेती वगैरा में जाता है फिर उसके बाद धान्य इत्यादि में बसर होता , उसके बाद फिर धान्य आदि उत्पन्न होकर
भोजन की शक्ल में मनुष्य उसे ग्रहण करता है
उसके बाद उसके वीर्य्य में प्रवेश करता है , उसके बाद कोई पुरूष स्त्री के साथ संभोग ( सेक्स ) करता है उसके बाद वो गर्भ में जाता है ये सब हो कर मर ने वाले को पुनः शरीर की प्रप्ति होती है ।

पुनर्जन्म

अब देखते है कि किस को किस यौनि में जन्म मिलता है ?

* मनुष्य शरीर की प्रप्ति केवल उन्हें को प्राप्त होती है जो वेद को सत्य मानते है  और वेदों की आज्ञा का पालन करते है उन्ही को मनुष्य यौनि में जन्म मिलता है ।

* ऐसा है क्या ? भला बताना की वर्तमान में केवल पूरे विश्व मे  3 -5 % लोगो  ही वेदों को मानते है और जानते है और जो वेदों को नही मन्नते वही नास्तिक है ।

* मतलब पुनर्जन्म में केवल 3 - 5 % लोगो को 
मनुष्य शरीर की प्रप्ति होगी ।

* और जो वेद आदि को नही मानते जिनको वेदों में मारने और काटने का हुक्म दिया है ।

नियोग।

(वैदिक ईशवर) आज्ञा देता हूं, की तू मन, कर्म और शरीर से व्यभिचार कभी मत करो, किंतु धर्मपूर्वक विवाह और नियाग से संतानउतपन्न करते रहो।( वाह क्या ज्ञान है।)

* यह नियोग शिषट पुरुषों कि सम्मति और दोनों की प्रसन्नता से हो सकता है।( दोनों की मर्जी से जीना जायज़ हो गया इंदुइसम में  वाह क्या बात है । )  

* हे स्त्री ! अपने मूर्तक पति को छोड़ के इस जीवनलोक मे जो तेरी इच्छा हो,तो दूसरे पुरुषों के साथ नियोग करके संतानों प्रप्त कर।

* वैदिक ईशवर मनुष्यों को आज्ञा देता है, की हे इंद्र पते ! तू इस स्त्री को वीर्यदान दे (समझदार को इशारा काफी है।)के सुपुत्र और सौ भाग्ययुक्त कर। पुरुष के प्रति वेद की यह आज्ञा है कि इस विवाहित वा नियोजित स्त्री में 10 बच्चे उत्पन्न कर । अधिक नही (तो क्या ? पूरी फ़ौज पैदा करुंगे बस 10 काफी है ) और हे स्त्री ! तू नियोग 11 पति तक कर  अर्थात एक तो उसमे प्रथम विवाहित पति है और 10 प्रयत्न पति कर कर अधिक नही। (तो क्या पुरो के साथ नियोग करुंगे क्या।)
      
* बड़े-बड़े वीर पुरूष को उतपन्न कर।
( नियोग से कई बड़े-बड़े माह पुरूष पैदा हुए है जिसमे से कुछ नाम आप भी जानते होंगे कर्ण, परशुराम इत्यादि  ) तो देवर की कामना करने वाली है, तो तेरा पति विवाहित पति ने राहे या वह रोगी हो या नपुंसक हो जाये तब दूसरे पति के साथ नियोग के जरिये संतान उत्पन्न कर। (वहा पति बीमार पढा है और पत्नी देवर के साथ मजे ले बहुत खूब)

* देवर की परिभाषा वेदो मे 

* जैसे विधवा स्त्री देवर के साथ संतानोत्पत्ति करती है वैसे तुम भी करो। (यहा पर ऐसी घटिया शिक्षा दी जा रही है) विधवा का दूसरा पति होता है उसको देवर कहते है।(मतलब वहा पर उसका पति मरा नही की उस स्त्री पर देवर का हक़ हो जाता है वह कितनी अच्छी शिक्षा है। 

* हे स्त्री जीवित पति को लक्षय करके उठ खड़ी हो(यहा पर देवर,पंडित,ऋषि मुनि, इत्यदि की बात हो रही है।)मर्त्य इस पति के पास क्यों पड़ी है, आ हाथ ग्रहण करने वाले नियुक्त इस पति के साथ संतान जनने को लक्षय में रखकर संबंध कर।(नियोग कर) ( ऋग्वेद 10:18:8)

* ऋग्वेद 10:10 में भी पूरा नियोग का बयान है।


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नियोग क्या है ?

* आखिर नियोग क्या है ? ये बात पहले बता चुके है फिर भी संक्षेप परिभाषा समझना चाहते हो इतना ही काफी है  कोई विधवा स्त्री संतान ( बच्चे  ) की चाह रखती है तो वो अपने मरे हुए पति के छोटे भाई या बड़े भाई , किसी ब्रह्मण , साधु इत्यादि से मुँह काला करके बच्चा पैदा कर सकती है और एक वो जिसका पति नपुंसक हो उसकी औरत भी मुँह काला करा सकती है और साधरण भाषा में समझे तो ब्रह्मणो ने अपनी हवस पूरी करने के लिए ये प्रथा चलाई थी ।

* आज भी चल रही है जिसका उद्धरण आसाराम , रामरहीम और वर्तमान के समय ऐसी घटना सुनते और दीखाई देती है ऐसी नियोग की आज्ञा वैदिक ईश्वर २ पग पर चलने वाला मुर्ख मनुष्य जिसने वेदो को अपनी हवस और दुसरो का शोषण करने के लिए 3000 वर्ष पूर्व गढ़ी थी कुछ मुर्ख इसका पालन करते नजर आते है और उससे भी आसान शब्दों में समझा जाये तो नियोग यानि बलत्कार और वैश्या खाना से कुछ कम नहीं बरहाल आज नियोग की विधि क्या है ? ये जानेगे और नियोग  के बारे में जानना चाहते हो तो यहाँ देखे 👉  नियोग एक कलंक  अब देखते है आगे ......................................................

नियोग विधि 

 * हे स्त्री जीवित पति को लक्षय करके उठ खड़ी हो (यहा पर देवर,पंडित,ऋषि मुनि, इत्यदि की बात हो रही है।) मरे हुए पति के पास क्यों पड़ी है, आ हाथ ग्रहण करने वाले नियुक्त इस पति के साथ संतान जनने को लक्षय में रखकर संबंध कर।(नियोग कर) ( ऋग्वेद 10:18:8)

* जैसा कि पाण्डु राजा की स्त्री कुंती और माद्री आदि ने किया और जैसा व्यास जी ने  चित्राडद्र और विचित्रवीर्य के मारे जाने के बाद उन अपनी भाइयो की पत्नियों के साथ नियोग करके अम्बिका में धृतराष्ट्र और अम्बालिका में पाण्डु और दासी से विदुर की उत्पत्ति की ये सब नियोग से हुई संतान है इत्यादि बात इतिहास से प्रमाणित है । ( 4 समुल्लास  पेज नंबर 110 )

 " कालेSदाता पितावाच्यो वाच्यशचानुपयन  पतिः।  "

* अर्थात  : - विवाह की अवस्था ( १६ वर्ष या उसे भी काम )होने पर कन्या का विवाह न करने वाला पिता निंदनीय और दोषी होता है । 
 ( मनुस्मृति  ९ : ४ )

मनुस्मृति 9 : 90

मनुस्मृति 9 : 88

" नियोग के अनुसार उत्पन्न हुआ पुत्र पति का ही होता है ,नियोग में स्त्री के उत्त्पन हुआ पुत्र स्त्री का ही होता
है ।  ( मनुस्मृति  ९ : ३२ ,४९ , ५२   )

अर्थात  : -अगर पति नपुंसक है या बीमार है तो अपनी पत्नी को दूसरे मर्द से मुँह काला करा कर बच्चा पैदा करवा सकता है और उस से  जो बच्चा पैदा होगा वो असली पति यानि जो नपुंसक या बीमार ता उसका ही बच्चा माना जाएंगा जिसको हम लोगो आज की भाषा में हराम की ओलाद कहते है  जिससे कई बड़े बड़े  ऋषिमुनि पैदा हुई  जो ऊपर सत्यार्थ प्रकाश  का प्रमाण दिया गया है उसी प्रकार कोई विधवा अपनी हवस पूरी करके बच्चा पैदा करना  चाहती  तो वो भी किसी पुरुष के साथ मुँह काला करा के जो बच्चा पैदा होगा वो स्त्री का होगा बच्चा किसी का भी हो यहाँ पर ब्रह्मण और देवर आदि का काम तो हो गया। 

* स्त्रियाँ खेती के समान है और पुरुष बीज के  
( मनुस्मृति  ९ : ३३  )

* अगर कोई विधवा हो और कोई रंडवा हो दोनों में समझौता हो जाये की बच्चा दोनों का होगा तो दोनों का माना जाएंगा ( मनुस्मृति  ९ : ५३   )

रात में सैया दिन में भैया 

* अब देखे अश्लीलता की हद पार कर दी है  रात में नियोग नाम पर व्यभिचार और बलात्कार और दिन में भाभी और बहू ।

देवर की परिभाषा  ?

ऋग्वेदादिभाष्यभूमिक नियोग विषय

* नियोग का काम जिससे लिया गया हो और विधवा का दूसरा पति देवर कहलाता है । 

निरुतकम 3 : 15

मनुस्मृति 9 अधयाय

* बड़ा भाई छोटे भाई की स्त्री के साथ और छोटा भाई बड़े भाई की स्त्री के साथ नियोग द्वारा विधिपूर्वक और संभोग करे  और नियोग के अलावा अपराधी माना गया है । ( मनुस्मृति 9 : 58 )

* रात में औरतों की अदला बदली करो दिन में देवर भाभी और अपराधी क्या मिथ्या है ।

* नियोग का काम हो जाने के बाद देवर और भाभी , बड़ा भाई पुत्रवधु के समान व्यवहार करें ।
( मनुस्मृति 9 : 62 , 63 )

नियोग में 11पति और 10बच्चे पैदा की आज्ञा

* नियोग में एक स्त्री 11 से काम ले सकती है ।

 अगर पति दूसरे देश जाए तो 

* अगर पती धर्म के काम से बाहर जाए तो 8 वर्ष तक उसकी प्रतीक्षा करे , और पढ़ने की वजह
( विद्या प्रप्ति ) के लिए बाहर गया होता 6 वर्ष प्रतीक्षा करे और कमाई के लिए गया है तो 3 वर्ष फिर ना आये तो नियोग से बच्चे पैदा करले  ( मनुस्मृति 9 : 75-76 )

 हिंदूइस्म और बहुविवाह

मनुस्मृति 9 : 80

* अगर स्त्री केवल पुत्री ही पुत्री जने तो दूसरा विवाह कर लेना चाहिए 👇👇👇

मनुस्मृति 9 : 81

मनुस्मृति 9 : 82

दयानन्द के अनर्थ

दोस्तों मैं एक मुसलमान हूं इसलिए मेरा फर्ज है समाज की गंदगी को खत्म करना इसलिए आर्य समाज नामी गंदगी को खत्म होना चाहिए जिसने समाज को गुमराह ...