Friday, 9 May 2025

दयानन्द के अनर्थ

दोस्तों मैं एक मुसलमान हूं इसलिए मेरा फर्ज है समाज की गंदगी को खत्म करना इसलिए आर्य समाज नामी गंदगी को खत्म होना चाहिए जिसने समाज को गुमराह किया  ओर भोले भाले सनातनी भाइयों को अधर्म का मार्ग दिखाया
इसलिए मैं ग़लत के खिलाफ खड़ा हूं
और जो भी बात जहां से मिलती है पेश करता हूं।

नियोगानंद ने अपने गूदा में अंधा सांप घसोड़ लिया 🤣🤣🤣
जी हां दोस्तों वेद मत्रों का ऊलजुल अर्थ करने वाला दयानंद सांपों को गुदेंद्रीय में घसोड़ाने की बात करता है
चलिए शुरू करते हैं,,,

पूषणं वनिष्ठुनान्धाहीन्स्थूलगुदया सर्पान्गुदाभिर्विह्वत आन्त्रैरपो वस्तिना वृषणमाण्डाभ्यां वाजिनग्वगं शेपेन प्रजाग्वं रेतसा चाषान् पित्तेन प्रदरान् पायुना कूश्माञ्छकपिण्डैः ॥
 ~ यजुर्वेद (अध्याय २५, मंत्र ७}

दयानंद अपने यजुर्वेदभाष्य में इस मंत्र का अर्थ यह लिखते हैं कि---

हे मनुष्यों! तुम मांगने से पुष्टि करने वालों को स्थूल गुदेंद्रियों के साथ वर्तमान, अंधे सर्पों को गुदेंद्रियों के साथ वर्तमान विशेष कुटिल सर्पों को आंतों से, जलों को नाभि के नीचे के भाग से, अंडकोष को आंडों से, घोडे के लिंग और वीर्य से संतान को, पित्त से भोजनों को, पेट के अंगो को गुदेंद्रिय और शक्तियों से शिखावटों को निरंतर लेओं।

अब कोई इन नियोग समाजीयों से यह
पूछे कि उन्हें दयानंद द्वारा किये गये अधिकांश मंत्रो के ऐसे अर्थ अश्लील क्यों नहीं लगते?

तो अब नियोग समाजी हमें बताए कि दयानंद के इन भाष्यों के बारे में उनकी क्या राय है?
 दयानंद द्वारा किया यह अर्थ उन्हें अश्लील लगता है या नहीं??

प्रश्न १ दयानंदी हमें बताए कि अंधे सर्पों को गुदा में घुसाने और कुटिल सर्पों को आंतों से लेने की आज्ञा क्या ईश्वर ने देता हैं?

यदि देता है तो आर्य समाजी दिन में ये कितनी बार लेते हैं?

प्रश्न २ दयानंदी हमें यह बताये अंधे कुटिल सर्पों और घोड़े के लिंग को गुदा व आंतों में निरंतर लेते रहने के पीछे का विज्ञान क्या है 🤔 ज़रा वो भी समझा दे तो बहुत अच्छा होगा।
 दयानंदी गुदा व आंतों में अंधे कुटिल सांपों एवं घोड़ों के लिंग को निरंतर लेते रहने की विशेष युक्ति का खुलासा करें, क्योकि दयानंदीयों के सर्पों के साथ इस कृत्य की कल्पना करके भी, हमारी समझ से तो बाहर हैं कि सांपों को ये किस युक्ति से प्रवेश देते होंगें ?

प्रश्न ३ सर्पों को गुदेंद्रिय में लेने की आवश्यकता क्या हैं? 
गुदेंद्रिय आनंद ही अगर अपेक्षित हैं, तो सांप के समान आकार वाली अन्य वस्तुओं का विकल्प भी तो है न आपके लिए? 
और यदि लेते समय साँप घबराकर आपको अंदर या बाहर से काट लेवें, तो डाक्टर के पास जाकर क्या कहोगें ?

प्रश्न ४ अर्थ मे आता हैं कि "अंडकोष को आंडों से निरंतर लेओं" 
अब दयानंदी पहले तो अंडकोष और आंडों के बीच का अंतर बतायें, और फिर ये बतायें कि अंडकोष से आडों को किस प्रकार लिया जा सकता हैं?

उचित होता यदि दयानंदी गुरु आज्ञा का पालन करते हुए स्वामी जी की ही गुदा में दो चार अंधहीन सांप घसोड़  देते, 
और स्वामी जी को निरंतर घोड़े का लिंग ग्रहण कराते रहते, तब जाकर कहीं गुरु आज्ञा का पालन ढंग से होता 🤣 और तब फल प्रकट होता,

अब कोई आर्य समाजी ये न कहें कि इसका मतलब ये नहीं है, वो नहीं हैं, फलाना हैं, तो ढिमाका हैं ...

देखिये दयानंद सत्यार्थ प्रकाश के द्वादश समुल्लास में
 महीधरादि  पर अश्लील भाष्य करने का आरोप लगाते हुए लिखते हैं-- 
"हां! भांड धूर्त्त निशाचरवत् महीधरादि टीकाकार हुए हैं, उन की धूर्त्तत्ता है; वेदों की नहीं"

क्या यह बात इस नियोगानंद  पर लागू नहीं होती?
 बिल्कुल होती है, अतः पाठकगणों से निवेदन है कि वो इस बात को समझें की दयानंद ने जो ये अश्लील भाष्य किया है
 वो इस भांड धूर्त्त निशाचरवत् दयानंद की धूर्तता है, वेदों की नहीं, 

और अब यजुर्वेद का सही अर्थ प्रस्तुत करता हूं 
देखिये इस श्रुति का सही अर्थ इस प्रकार है।

पूषणं वनिष्ठुनान्धाहीन्स्थूलगुदया सर्पान्गुदाभिर्विह्वत आन्त्रैरपो वस्तिना वृषणमाण्डाभ्यां वाजिनग्वगं शेपेन प्रजाग्वं रेतसा चाषान् पित्तेन प्रदरान् पायुना कूश्माञ्छकपिण्डैः ॥ ~ यजुर्वेद {२५/७}

(पूषणं वनिष्ठना स्थूलगुदया)- स्थूल आंतों व गुदा, पाचन संबंधी अंगों का भाग पूषण देवता के लिए, हे पूषण देव हमारे पाचन तंत्र संबंधी अंगों को स्वस्थ कर शरीर की व्याधियाँ उसी प्रकार दूर करें, 
जिस प्रकार, (अन्धाहीन सर्पान)- अंधहीन सर्प आपने बांबी से दूर निकल जाते है,
 (गुदाभिर्विह्वत आन्त्रैरपो) - और हे र्विह्वत देव गुदा से संबंधी अन्य व्याधियों को दूर कर हमें रोगमुक्त स्वस्थ जीवन प्रदान करें,
 इस प्रकार (वस्तिना)- वस्ति भाग जल के लिए,
 (वृषणमाण्डाभ्यां)- अंडकोशों की शक्ति वृषण देव के लिए, 
(वाजिनं)- उपस्थ की शक्ति वाजीदेव के लिए,
 (रेतसा)- विर्य प्रजा की रक्षा के लिए,
 (चाषान् पित्तेन) - पित चाष देव के लिए,
 (प्रदरान् पायुना)- आंतों का तृतीया भाग प्रसरदेवों के लिए, 
(कूश्माञ्छकपिण्डैः)- तथा शकपिण्डों को कूश्म देव की प्रसन्नता के लिए समर्पित करते हुए रोगमुक्त,स्वस्थ जीवन की कामना करते हैं,

तो साथियों आपने सही अर्थ देख लिया
और गुदानंद नियोगवती का अर्थ भी देख लिया है
  इस नियोगानंद ने अर्थ का क्या अनर्थ किया है, वो आप लोगों के सामने है,

तो मेरे सच्चे सनातनी  भाईयों 
इस दयानंद उर्फ गुदानंद की दुष्प्रचार पर चार जूते मारकर दयानंदियो के गुदा में अंधा सांप घुसा दे।

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साथियों मैंने लगभग सभी धर्म ग्रंथो का अध्ययन किया है बस एक सत्यार्थ प्रकाश ही रह गया था।वो भी मुकम्मल हो गया है।
लेकिन मैं ये सोचता हूं कि दयानंद ने इतना घटिया तरीन ट्रांसलेट किया ही क्यों 🤔

और चाहने वाले आंख बन्द करके उसके भाष्य को पढ़ रहे हैं ज़रा भी नहीं सोचते कि उसके द्वारा किए गए अर्थ समाज के लिए सही है या नहीं 🤔

लेकिन जब ग़लत ट्रांसलेट उनके हम दर्द के सामने पेश किया जाता है तो वो गाली-गलौज करने लगते हैं।

सोचने कि बात है कि भाष्य दयानंद का ही है बस मैं उसका सही ट्रांसलेट कर उनको यह बताने का प्रयास करता हूं 
कि उसे इतना भी ज्ञान नहीं था कि समाज के लिए किस तरह के अल्फाज का उपयोग किया जाए।

चलिए दयानंद का एक और कामशास्त्र।।
दयानंद द्वारा यजुर्वेदभाष्य, भाष्य
यजुर्वेद अध्याय १९, मंत्र ७६

 दयानंद ने इस मंत्र के अर्थ का जो अनर्थ किया है, वो तो किसी को बताने योग्य भी नहीं,
 इस प्रकार का अश्लील लेख या तो आपको सेक्सी उपन्यासों में 
या फिर दयानंद द्वारा लिखित कामशास्त्र में ही पढने को मिल सकता है, 
देखिए क्या लिखता है ये भांड--

रेतो मूत्रं वि जहाति योनिं प्रविशद् इन्द्रियम्। गर्भो जरायुणावृत ऽ उल्वं जहाति जन्मना। ऋतेन सत्यम् इन्द्रियं विपानम् शुक्रम् अन्धस ऽ इन्द्रस्येन्द्रियम् इदं पयो ऽमृतं मधु॥ 
यजुर्वेद {१९/७६)

अब ज़रा देखिए दयानंद साहब भांग के नशे में अपने  इसका अर्थ क्या लिखते हैं कि--

"जैसे पुरुष का लिंग स्त्री की योनि में प्रवेश करता हुआ, वीर्य को छोडता है, और इससे अलग मूत्र को छोडता है, इससे जाना जाता है कि शरीर में मूत्र के स्थान से पृथक स्थान में विर्य रहता है"

 -- वाह रे! वेदभाष्य के नाम पर कामशास्त्र
लिखने वाले कामानंद, 
क्या कहने तेरे !
 दयानंद को ऐसी-ऐसी अश्लील बातें लिखने में जरा भी शर्म न लगी,
 दयानंद ने जो  लिखा है 
कि (जैसे पुरुष का लिंग स्त्री की योनि में प्रवेश करता हुआ, वीर्य को छोडता है और इससे अलग मूत्र को छोडता है, इससे जाना जाता है कि शरीर में मूत्र के स्थान से पृथक स्थान में विर्य रहता है) 

भला यह अर्थ तुमने कौन से पदों से लिया है भाई साहब 🤔
 भला इसमें कौन सा ईश्वरीय ज्ञान छूपा है? 

क्या तुम्हारे इस भाष्य से पूर्व मनुष्यों को इसका ज्ञान नहीं था
 कि शरीर में मूत्र और विर्य पृथक पृथक स्थान में रहते है, 
 क्या तुमने वेद के ज्ञान को इतना तुच्छ और अश्लील समझ रखा है? 

देखिये इस श्रुति का अर्थ ऐसा बिल्कुल भी नहीं है जैसा दयानंद ने अपनी अश्लील बुद्धि अनुसार किया है, 

सुनिये इसका सही अर्थ इस प्रकार है कि,,,,

"जिस प्रकार गर्भ अपनी रक्षा के लिए स्वयं को जरायु में आवृत करता है, परन्तु जन्म के पश्चात उसे विदीर्ण कर उसका परित्याग कर देता है, जैसे एक ही मार्ग से भिन्न भिन्न पदार्थ (मुत्र एवं वीर्य) निःसृत होते हैं लौकिक सत्य इसी सत्य का रूप है, यह अन्न स्वरूप सोम, विशिष्ट साधन, बल, अन्न, तेज, इन्द्रिय सामार्थ, दुग्धादि पेय और मधूर पदार्थ को परमात्मा हमारे निमित प्रदान करता है,

 देखिये इस कामानंद ने इस वेद श्रुति के अर्थ का क्या अनर्थ किया है 

दयानंद ने एक बार भी यह नही सोचा की जिन वेद ऋचाओं को ईश्वरीय वचन कहा जाता है,
 उन वेद ऋचाओं का ऐसा अश्लील अर्थ करने पर विद्वान लोग उन्हें क्या कहेंगे? 

जिन वेदों का स्थान सनातन संस्कृति में उच्चतम पुस्तकों में गिना है, 

साथियों! स्वंय विचार करकें बताए, वेदभाष्य के नाम पर अंतर्वासना लिखने वाले इस दयानंद को क्या कहना चाहिए??

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सनातन धर्म से भिन्न दयानंद द्वारा चलाए गये वेद विरुद्ध मतों में से एक मत है पशुधर्म 
जी हां पशु धर्म मैं इसलिए कह रहा हूं
 क्योंकि पशु धर्म में विवाह नहीं होते नीति नियम नहीं होते।
हां हां अब आप समझ गए होंगे मैं क्या बात करने वाला हूं।

नाम से विख्यात "नियोग प्रथा"

जी हां दयानंद ने अपने तथाकथित ग्रंथ "सत्यार्थ प्रकाश” में लगभग पूरा एक समुल्लास इस  नियोग पर ही लिखा है, 

और वेदादि शास्त्रों के अर्थ का अनर्थ कर अपने अनुयायियों के साथ साथ समस्त भारतवर्ष को इस महाअधर्म व्यभिचार नियोग फैलाने  का असफल प्रयास किया है, 
वेद मनुस्मृति आदि के अर्थ का अनर्थ कर नियोग सिद्ध किया है 
जिससे धर्म के न जानने वाले लोगों में भ्रम की स्थिति उत्पन्न होती है,
 इसलिए मैं आज एक बार फिर पोस्ट के माध्यम से मैं दयानंद के उन मिथ्या भाष्यों की धज्जियां बिखेरुंगा , 
प्रमाण के साथ यह सिद्ध करकें दिखाऊंगा की दयानंद द्वारा चलाया यह  नियोग वेद विरुद्ध होने के साथ-साथ हमारे सनातनी भाईयों को धोखे में डालने का काम किया
अब मैं दयानंद के उन सभी वेद विरुद्ध भाष्यों का खंडन करते हैं 
जिनके अर्थ का अनर्थ कर दयानंद ने नियोग सिद्ध किया है ।

दयानंद कृत ऋग्वेदभाष्य, भाष्य।

सोमः प्रथमो विविदे गन्ध्वो विविद उत्तरः। तृतीयो अग्निष्टे पतिस्तु रीयस्ते मनुष्यजाः ॥ ~ ऋग्वेद १०/८५/४०

दयानंद अपने ऋग्वेदभाष्य में इसका अर्थ यह लिखते हैं 

"हे स्त्री! जो 
(ते) तेरा
 (प्रथमः) पहला विवाहित
(पतिः) पति तुझ को
 (विविदे) प्राप्त होता है उस का नाम 
(सोमः) सुकुमारतादि गुणयुक्त होने से सोम जो
दूसरा नियोग होने से
 (विविदे) प्राप्त होता वह,
(गन्धर्वः) एक स्त्री से संभोग करने से गन्धर्व, जो
(तृतीय उत्तरः) दो के पश्चात् तीसरा पति होता है वह
(अग्निः)- अत्युष्णतायुक्त होने से अग्निसंज्ञक और
(ते) तेरे
 (तुरीयः) चौथे से लेके ग्यारहवें तक
नियोग से पति होते हैं वे 
(मनुष्यजाः) मनुष्य नाम से कहाते हैं । 
 (इमां त्वमिन्द्र)

देख रहे हो ना साथियों 1 से लेकर 11 तक नियोग जो करेगा वही मनुष्य कहलाएगा।

 इस मन्त्रा में,,,
ग्यारहवें पुरुष तक स्त्री नियोग कर सकती है, वैसे
पुरुष भी ग्यारहवीं स्त्री तक नियोग कर सकता है"

ये है स्वामी दयानंद उर्फ नियोगानंद का ज्ञान
हराम काम कि तरफ लोगों को धकेलने में नियोगीलाल ने कोई कसर नहीं छोड़ा

अर्थों का अनर्थ कर दिया है इस मंत्र का यह अर्थ नहीं जैसा कि स्वामी नियोगानंद जी ने किया है 

अब मैं इसका सही अर्थ कर रहा हूं आप सभी लोग कंपेयर कर लीजिए गा
 इसका सही अर्थ इस प्रकार है कि--

सबसे (प्रथमः) = पहले, 
(सोमः) = सोम, 
(विवदे) = इस कन्या को प्राप्त हो, (अर्थात कन्या के माता पिता सब से पहले तो ये देखें कि उसका पति 'सोम' है या नहीं, पति का स्वभाव सौम्य है या नहीं, 
तत्पश्चात इस कन्या को 
(गन्धर्व:) = 'गां वेदवायं धारयति' ज्ञान की वाणियों को धारण करने वाला हो, 
यह (उत्तर:) = अधिक उत्कृष्ट होता है, कि सौम्यता यदि पति का पहला गुण है
 तो ज्ञान की वाणियों को धारण करना उसका दुसरा गुण होना चाहिए। 
(तृतीयः) = तीसरा, 
(अग्निः) = प्रगतिशील मनोवृत्ति वाला हो {अर्थात तेरा पति वह है जो आगे बढ़ने की वृत्तिवाला हो },
 (तुरीय:) = चौथा,
 (मनुष्यजाः) = वह मनुष्य की संतान हो,
 (अर्थात जिसमें मानवता हो, जिसका स्वभाव दयालुता वाला हो क्रूरता वाला नहीं},
वही 
 (ते) = तेरा, 
(पतिः) = पति है

चलिए मैं इस ट्रांसलेट को और भी आसान कर देता हूं
 - "कन्या व उसके माता पिता उसके पति में निम्न विशेषताएं अवश्य देखें , कि पहला तो वह सौम्य हो सौम्यता पति का पहला गुण है,

 उसमें दुसरा गुण गन्धर्व हो यानी ज्ञान  को धारण करने वाला हो अर्थात ज्ञानी हो, 
तीसरा गुण प्रगतिशील मनोवृत्ति वाला हो,
 चौथा गुण वह मनुष्यजा मनुष्य की संतान हो अर्थात जिसमें मानवता हो 
जिसका स्वभाव क्षमा करना और दयालुता वाला हो 
क्रूरता वाला ना हो।

मेरे दोस्तों,
इस मंत्र में कहीं भी नियोग तो क्या नियोग कि गंध तक नहीं है 

परन्तु स्वामी नियोगानंद जी ने इसके अर्थ का ऐसा अनर्थ किया कि पूछें मत,

 अब बुद्धिमान लोग एक बार स्वयं स्वामी जी द्वारा किये भाष्य पर दृष्टि डालकर बताए

 कि दयानंदी लोग क्या उसी स्त्री से विवाह करते हैं जो प्रथम एक से विवाह और दो से नियोग कर चुकी हो?🤣

आर्य समाजियों का यही तो धर्म है
 और स्वामी नियोगानंद जी की बेशर्म है 🤣

अब विचारने की बात है यदि स्वामी नियोगानंद जी का किया अर्थ माने तो, 
न जाने समाज में नाजायज औलादे किस कदर बढ़ेगी
और इस तरह समाज का क्या हाल होगा या विचारणीय बात है।


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दयानंद की मक्कारी किसी से छुपी नहीं है दयानंद ने अपना स्वार्थ सिद्ध करने के लिए पवित्र वेदो को भी नहीं छोड़ा अपनी गंदी सोच वेदों में भी डालने का प्रयास किया ।

दयानंद सत्यार्थ प्रकाश चतुर्थ सम्मुलास में लिखते है

इमां त्वमिन्द्र मीढ्वः सुपुत्रां सुभगां कृणु। दशास्यां पुत्राना धेहि पतिमेकादशं कृधि। (ऋग्वेद 10- 85-45)

भावार्थ : "हे वीर्य सेचन हार 'शक्तिशाली वर ! तू इस विवाहित स्त्री या विधवा स्त्रियों को श्रेष्ठ पुत्र और सौभाग्य युक्त कर। इस विवाहित स्त्री से दस पुत्र उत्पन्न कर और ग्यारहवीं स्त्री को मान। हे स्त्री! तू भी विवाहित पुरुष या नियुक्त पुरुषों से दस संतान उत्पन्न कर और ग्यारहवें पति को समझ।"
ये था मिस्टर दयानंद सरस्वती का ट्रांसलेट जिसमें नियोग घसोड़ दिया और विधवा शब्द भी घसोड़ दिया और वीर्य शब्द भी घसोड़ दिया।

आइये एक नजर डालते है इस मंत्र के शब्दों पर

इमां - इसको ।। त्वम - तुम ।।
इन्द्र - इन्द्रियों को वश मे करने वाला जितेन्द्रिय पुरुष
मिढ्वाः - सब सुखो का सिंचन  करने  वाले  पुरुष ।।
सुपुत्राम - उत्तम पुत्र ।। सुभगाम उत्तम भाग्य वाली ।।
कृणु - कर
दश - दस ।। आस्याम - इस पत्नी मे ।।
पुत्राना - पुत्रो को ।। अधेही -
स्थापित कर ।। पतिम् - पति को ।।
एकादशां कृधि - ग्यारहवा कर ।।

भावार्थ - हे इन्द्रियों पर काबू पाने वाले और सुखो का सिंचन करने वाले पुरुष, तु अपनी पत्नी पर सुखो का वर्षण करता हुआ उसे सुपत्रा और सुभागा बना ।। 
( वेदिक काल मे 10 पुत्रो की सीमा थी इसलिए यहा भी ये सीमा 10 ही लिखी है )

और आगे कहा गया है की 10 पुत्रो के बाद ग्यारहवा खुद को समझ)

आप लोगों ने देखा इस मंत्र में ईश्वर एक मनुष्य से कह रहा है कि तू अपनी पत्नी को सुपत्रा यानी उत्तम पुत्र जनने वाली सौभाग्य वती बना।
इस मंत्र में विधवा शब्द है ही नहीं। 

अब कोइ आर्य समाजी बताएगा ??? 
की स्वामी जी ने इस मंत्र को क्यों तोड़ा मरोड़ा

 और इस मंत्र में "वीर्य",  "विधवा",  और "नियोग", शब्द कहा है ??? 
और स्वामी जी ने लिखा है "हे वीर्य सेचन हार" 
ये वीर्य सेचन हार क्या होता है ???

मैं जानता हु कोई नही बताएगा
क्योंकि इन धूर्त आर्य समाजियों को सिर्फ दयानंद की राह पर चलकर नियोग को बढ़ावा देना है ।।

और अपनी मक्कारी से सनातन को कलंकित करना है

असल में इन आर्य समाजी को सिर्फ दूसरों को बुरा साबित करना है लेकिन हकीकत पर पर्दा डालना है
और जब बात ना बने तो गाली गलौज कर अपनी नियोग वाली गंदी पैदाइश को जाहिर करना है
लेकिन सच स्वीकार नहीं करना।

साथियों आप खुद सोचिए एक विधवा स्त्री से दस बच्चे कैसे पैदा हो सकते हैं?
आखिर दयानंद सरस्वती को निति नियम नहीं मालूम था क्या?🤔
पहले उस विधवा स्त्री कि निति नियम से शादी होती फिर उसका पति दस बच्चे पैदा करता या बीस, 
लेकिन सनातन में तो विधवा स्त्री को दूसरी शादी करने कि इजाजत ही नहीं थी।

मगर वो तो विधवा स्त्री से ही दस बच्चे पैदा करने हेतु हराम काम करने कि सलाह दे रहा है और वेदों का अपमान कर रहा है 
आप अपनी राय जरुर दे।


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दयानंद ने वेदआदि भाष्यों के साथ छेडछाड क्यों किया इन सबके पिछे स्वामी जी का उद्देश्य क्या था ?? आइए देखते है

सत्यार्थ प्रकाश सप्तम संमुल्लास दयानन्द जी लिखते है।

अग्नेर्वा ऋग्वेदो जायते वायोर्यजुर्वेदः सुर्यात्सामवेदः ।।

स्वामी जी इसका अर्थ लिखते है-

"ईश्वर ने सृष्टि की आदि में अग्नि वायु आदित्य तथा अंगिरा ऋषियो की आत्माओ मे एक एक वेद का प्रकाशन किया" 

अब आइये जरा इस मंत्र के अर्थ पर भी नजर डाल लेते है

अग्नेर्वा - अग्नि द्वारा
ऋगवेदो - ऋग्वेद
जायते - प्रकट हुआ ।

वायोर्यजुर्वेदः - वायु द्वारा यजुर्वेद

सुर्यात्सामवेदः सूर्य के द्वारा सामवेद

अब कोई आर्य समाज के तथाकथित बुद्धिजीवी इस पर प्रकाश डालना चाहेंगे ???

 की स्वामी दयानन्द सरस्वती ने यहा पर अंगिरा और अथर्वेद कैसे जोड़ा ???? 

दूसरा प्वाइंट ये है कि दयानंद ने 
 इस मंत्र मे अग्नि, सूर्य , और वायु के लिए ऋषि शब्द का प्रयोग कहाँ हुआ है ???
जब मंत्र में ऋषि शब्द है ही नहीं 🤔

यहाँ सिद्ध हो जाता है

 की दयानन्द को ज्ञान तो बिल्कुल भी नही था
 क्योंकि इस मंत्र को कोई भी जिसमे थोडी सी भी बुद्धि होगी 
या संस्कृत का मूल अध्धयन भी किया होगा तो वो समझ सकता है 
कि दयानंद ने इस मंत्र के द्वारा लोगों को किस प्रकार चुतिया बनाने का प्रयास किया है ।।

दयानन्द के अनर्थ

दोस्तों मैं एक मुसलमान हूं इसलिए मेरा फर्ज है समाज की गंदगी को खत्म करना इसलिए आर्य समाज नामी गंदगी को खत्म होना चाहिए जिसने समाज को गुमराह ...